28 नवंबर, 2016

आज की युवा कविता / डॉ. नीरज दइया

किसी भी समय की कविता को उसकी काव्य-परंपरा में देखा जाना अनिवार्य है। बिना परंपरा अथवा विगत की बात किए वर्तमान की बात आधारहीन है और इसके अभाव में सुनहरे भविष्य के सपने बुने नहीं जा सकते।
    समकालीन राजस्थानी युवा कविता एक ऐसी काव्य-परंपरा की कविता से जुड़ी है जिसमें युद्धों का शंखनाद है, कविता में कीर्ति वर्णन के साथ शत्रु से ‘लड़ जा-भीड़ जा’ का स्थाई स्वर रहा है। ऐसी सुदीर्घ परंपरा में प्रथमत: कवि सत्यप्रकाश जोशी (1926-1990) ने ‘राधा’ काव्य-कृति में राधा के श्रीमुख से मन के मीत कान्हा से गुहार की ‘मुडज़ा फौजां नै पाछी मोड़ ले...’ यह एक नवीन सूत्रपात है। जहां महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (1815-1868) जैसे अनेक कवियों का स्वर था-
‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’
    इस  स्वर से अलहदा शांति के लिए युद्ध रोके जाने का स्वर समय की मांग और अनिवार्यता थी।
    देश की आजादी के समय राजस्थान ने अपनी जुबान काट कर राष्ट्रभाषा हिंदी के चरणों में अर्पित कर दी और जहां रजवाड़ों में राजकाज की भाषा राजस्थानी थी, राजस्थानियों ने हिंदी सीख कर देश हित के सवाल पर हिंदी को अपनाया। विड़बना है कि ऐसे बलिदानी राजस्थान राज्य को अब तक अपने भाषाई-हक से महरूम रखा गया है, और संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषा को शामिल किए जाने का संघर्ष समकालीन पीढ़ी को करना पड़ रहा है।
    महाकवि कन्हैयालाल सेठिया (1919-2008) भारतीय कवि के रूप में विख्यात है, भाषा प्रेम में रची कविताओं का संकलन आपकी काव्य कृति ‘मायड़ रो हेलो’ है। आज की युवा कविता को इसी पृष्ठभूमि के साथ नवीन कथ्य और शिल्प की विविधताओं को सहेजते-संवारते हुए अपनी रासो काव्य परंपरा से चली आ रही विरासत लिए गर्व भारतीय कविता के हमकदम चलते देखा जा सकता है।
    वर्तमान समय में अन्य भारतीय भाषाओं की भांति ही नए तकनीकी माध्यमों के बल पर कविता को जल्द से जल्द प्रस्तुत कर देने की गतिशीलता राजस्थानी में भी है। काव्य-भाषा, विषय और शिल्प के साथ कविता की बारीक बातों में जाने का अवकाश युवा पीढ़ी में निसंदेह कम देखा जा रहा है किंतु पूरे परिदृश्य को पूर्ण निराशा जनक नहीं कहा जा सकता है।
    जहां परंपरा के मोह या जुड़ाव से छंद-बद्ध कविताओं का दौर युवा कवियों में अब भी चल रहा है। भारतीय भाषाओं की रचनाओं और संदर्भों से अनविज्ञ अपने राग में खोए अनुभवों को बेहद सामान्य ढंग से अपने आनंद और आह्लाद में डूबे युवा कवि देखे जा सकते हैं। इन कवियों में कुछ सजग और गंभीर स्वर लिए ऐसे कवि भी हैं, जिनको हम भारतीय कविता के प्रांगण में गर्व से साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रयासों में संलग्न पाते हैं।
    ‘मंडाण’ के संपादकीय में लिखी कुछ बाते यहां दोहराना चाहता हूं। किसी रचनाकार के लिए अपनी मातृभाषा को अंगीकार करना और सृजनरत होना बड़ी बात है। कुछ मित्र सिर्फ और सिर्फ राजस्थानी कविता की दरिद्रता का रोना रोते हैं और मुझे लगता है कि वे सोचते हैं कि उनके ऐसे प्रलापों से यह दरिद्रता दूर हो जाएगी। जिम्मेदारी और जबाबदेही पुरानी पीढ़ी की भी बनती है कि वे नई पीढ़ी के लिए क्या कुछ कर रहे हैं। दोष देना तो बेहद सरल है आवश्यकता आज इस बात कि है कि नई पौध में जो संभावनाएं हैं उन्हें सहेजा-संवारा जाए। प्रकाशन और पत्र-पत्रिकाओं के संकट के चलते अनेक रचनाकारों की सक्रियता समय के साथ अपने आवेग को क्षीण होते जाने की त्रासदी झेलती है।
    कविता से सतत संलग्नता के लिए कहीं विदेश जाने की आवश्यकता नहीं होती है। युवा कवि को अपने आस-पास के घर-संसार को देखना, समझना और परखना है। घर-परिवार-समाज से सजी कवि की दुनिया ही उसके सृजन की जमीन हो सकती है। कवि की निजता और क्षेत्रीयता में अकूत संभावनाएं हैं। कवि को कविता में क्या लिखना है और किसे छोड़ देना है, यह विचार भी उस के लिए अनिवार्य है।
    किसी कवि को कविता लिखने से पहले खुद से सवाल करना चाहिए कि मैं कविता क्यों और किस के लिए लिखता हूं? ऐसे कुछ अन्य सवाल जरूरी है, जिनके जबाब हर युवा कवि को खोजने होते हैं। यहां यह कहना भी अनिवार्य लगता है कि आरंभिक मोह के चलते युवा कवियों को अपनी लिखी प्रत्येक पंक्ति में भरपूर कविता का अहसास होता है, परंतु समय के साथ अपनी संभावनाओं और सीमाओं को वह जान लेता है। यह सतत अभ्यास का विषय है कि कविता का प्रत्येक शब्द और उसे दिया जा रहा स्थान-क्रम भी महत्त्वपूर्ण होता है। यह कोरा ज्ञान नहीं सत्य है कि कवि को अपने भीतर काव्य मर्मज्ञ के साथ ही आलोचकीय दृष्टि का उत्थान करना चाहिए।
    कवि और कविता की कोई हद नहीं होती। जहां-जहां तक शब्दों के माध्यम से वह पहुंच सकता है, उस यात्रा और अनुभव को कागज पर मूर्त करना आसान नहीं है। ऐसे में कुछ जाहिर करते हुए भी, बहुत कुछ जाहिर होने से रह जाता है। कुछ छूट जाता है। यह हद से अनहद की यात्रा है। राजस्थानी के युवा कवि कुछ संकेतों से बात साधने का प्रयास करते हैं। रसिक कविता को पढ़ अथवा सुन कर उस अनहद तक पहुंच सकते हैं। कुछ हमारी अपनी सीमाओं को पहचानते हुए इन दोनों के बारे में बात शब्दों की सीमाओं में ही संभव है। कवि और कविता के लिए पूर्व ज्ञान कुछ भी काम नहीं आता, उसे तो हर बार हर कविता में एक नई मुठभेड़ करनी होती है।
    विज्ञान भले लाख तरक्की का दाव करे, पर कोई मशीन कविता लिखने की इजाद नहीं कर सकता। कविता को कोई किसी निश्चित सांचे या प्रारूप में स्थापित नहीं कर सकता। कविता के रूप में कवि जैसे अपनी रचना संभव करता है। रचना के लिए पीड़ा की आवश्यकता होती है। क्या बिना किसी पीड़ा या प्रसव के किसी रचना का जन्म असंभव है? क्या रचना पीड़ा का ही पर्याय है, या फिर सुख का पार्याय भी संभव है। यह गहरी और गंभीर बात इस में संलग्न रहने वाले ही जान सकेंगे।
    अब तक गाए जा रहे रागों-सुरों और साधना में कुछ नए राग-आयाम और साधक भारतीय कविता के प्रांगण में देखे जा सकते हैं। कुछ राजस्थानी के कवि निश्चय ही बड़े गर्व के साथ इसी परंपरा में देख सकते हैं।
    नई पीढ़ी से नए स्वरों की आशाएं है। इनकी नवीनता में पुरानी पीढिय़ों की भांति वयण-सगाई, छंद अथवा उपमा का मोह नहीं, समकालीन युवा कविता में नवीन शब्दावली, बदलती भाषा और अपने भावों को पहुंचाने का नवीन कौशल देखने के लिए गत वर्षों प्रकाशित युवा कवियों के कुछ संकलन देखे जा सकते हैं। जैसे- जळ-विरह, कविता देवै दीठ,  म्हारै पांती री चिंतावां, उजाळो बारणै सूं पाछो नीं मुड़ जावै, रणखार, एंजेलिना जोली अर समेस्ता, चाल भतूळिया रेत रमां, संजीवणी, जद बी माँडबा बैठूँ छू कविता, सपनां संजोवती हीरां आदि।
    राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्वारा प्रकाशित 55 युवा कवियों की कविताओं का संकलन ‘मंडाण’ (सं.- नीरज दइया) युवा कविता के संदर्भ और अप्रकाशित रहे कवियों को प्रकाश में लाने की दृष्टि से ‘थार-सप्तक’ (सं.- ओम पुरोहित ‘कागद’) जैसे उल्लेखनीय-सराहनीय कदम राजस्थानी काव्य-धारा में नए स्वरों का शुक्लपक्ष माना जाएगा।
    इस क्षेत्र में ये कृतियां सर्वाधिक प्रतिभाओं को उजागर करने वाली हैं। मंडाण की कविताओं के संदर्भ में संपादक का कथन है- ‘इन कविताओं में सरलता, सहजता, भाषा-कौशल एवं शिल्प की नवीन दृष्टि से ये ऊर्जावान कवि अपनी पृथक पहचान बनाने में सक्षम हैं।’
    राजस्थानी युवा कविता ही नहीं पूरी कविता यात्रा में अनेक कवि ऐसे हैं जिनकी स्वतंत्र पुस्तकें अब तक सामने नहीं आ सकी है। ऐसी ही पीड़ा को लेकर कवि-संपादक ओम पुरोहित ‘कागद’ ने संग्रह के रूप में अब तक अप्रकाशित कवियों की कविताओं का संकलन-संपादन ‘थार सप्तक’ के सात भागों में किया।
    थार-सप्तकों द्वारा 49 कवियों की कविताएं सामने आई जिनमें संभावनाशील अनेक युवा कवि भी सामने आए, जैसे- गौतम अरोड़ा, राजू सारसर, मनोज पुरोहित, राजूराम बिजारणियां, अंकिता पुरोहित, गौरीशंकर, पृथ्वी परिहार, सतीश गोल्याण, संजय पुरोहित, कुंजन आचार्य, मोहन पुरी, सिया चौधरी, ऋतुप्रिया, नरेंद्र व्यास, अजय कुमार सोनी, हरीश हैरी, धनपत स्वामी, जितेंद्र कुमार सोनी, ओम अंकुर, मनमीत सोनी आदि।
    पुरानी और नई कविता में मूलभूत अंतर के कारणों पर विचार करते हुए हमें आस-पास की दुनिया और देशों पर भी विचार करना होगा। आज जब पूरी दुनिया की परिकल्पना एक गांव के रूप में समझी जाने लगी है तब हमारे अपने ही घर में अथवा पास-पड़ोस से होती जा रही दूरियों के बारे में भी विचार करना होगा। लगता है इस शताब्दी में हम दौड़ते-भगते किसी युद्ध का हिस्सा बन गए हैं- यह युद्ध मनुष्य और मशीन के बीच का तो है ही, साथ ही साथ मनुष्य से मनुष्य का युद्ध भी यह है। घर, परिवार, समाज और देश-दुनिया की अथाह भीड़ में आदमी नितांत अकेला होता जा रहा है।
    कितना बेहतर होता यदि यह युद्ध किसी युद्ध के मैदान में होता। ऐसे में किसी दिन उसके अंत की संभावना तो होती, किंतु इस नित्य के युद्ध को शांति कैसे मिले। अंतस-अतंस और आंगन-आंगन चलते युद्ध से जीवन-रस के स्वर ही भंग हो गए हैं। शायद यही सब कारण है, या ऐसे ही कुछ अन्य कारण हैं, जिन के रहते नई चुनौतियों और संभावनाओं के साथ नई पीढ़ी (जिसे युवा पीढ़ी कहा जा रहा है) की नजर में सब कुछ देखने की संभावना विकल्पों के साथ मौजूद है।
    राजस्थानी कविता के क्षेत्र में अनेक संभावनाशील युवा कवियों के नामों के बीच कवयित्री संतोष मायामोहन (1974) की चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि आपको अपने प्रथम संग्रह ‘सिमरण’ (1999) के लिए वर्ष 2003 का साहित्य अकादेमी सम्मान मिला, यह युवा राजस्थानी कविता का सम्मान था। साहित्य अकादेमी के लिए भी यह ऐतिहासिक घटना है कि तीस वर्ष से कम उम्र की कवयित्री को यह सम्मान मिला, इससे पूर्व यह कीर्तिमान डोगरी की पद्मा सचदेव के नाम दर्ज था।
    राजस्थानी की अन्य कवयित्रियों में किरण राजपुरोहित, मोनिका गौड़, रचना शेखावत, गीता सामौर, सिया चौधरी, रीना मेनारिया, ऋतुप्रिया, अंकिता पुरोहित आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कवियों की तुलना में कवयित्रियां संख्या में कम है और उनमें प्रयोगशीलता के प्रति आग्रह भी कम है।
    सभी का उल्लेख संभव नहीं है फिर भी युवा कविता के क्षेत्र में साहित्य अकादेमी द्वारा युवा पुरस्कार से सम्मानित कवियों के नाम हैं- ओम नागर, कुमार अजय, राजू राम बिजारणियां और ऋतुप्रिया के अलावा प्रमुख युवा कवियों में राजेश कुमार व्यास, डॉ. मदन गोपाल लढ़ा, दुष्यत, जितेंद्र कुमार सोनी, हरीश बी. शर्मा, पृथ्वी परिहार, शिवदानसिंह जोलावास, सतीश छिम्पा, किशोर कुमार निर्वाण, संजय आचार्य, विनोद स्वामी, महेंद्र मील, सुनील गज्जाणी, कुंजन आचार्य, गौतम अरोड़ा, जय नारयाण त्रिपाठी, गौरीशंकर और गंगासागर शर्मा आदि के नाम लिए जा सकते हैं।    
    समग्र रूप से राजस्थानी की युवा कविता के लिए कहा जा सकता है कि युवा कवियों के रचाव में समकालीनता से जुड़े आज के यथार्थ की प्रस्तुतियां हैं तो कुछ नए सवालों के साथ दुनिया को बदलने के उमंग भरे सपने और हौसले भी है।
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बईमानों पर बरसी बड़ी मार

प ईमानदार है या बईमान? ये मैं आप सरकार की पार्टी नहीं, मैं तो आपकी यानी तुम्हारी बात कर रहा हूं। कितना कठिन समय है कि मैं कहना कुछ चाहता हूं और समझा कुछ और जाता है। यहां यह भी लिखना कितना कठिन है कि आप समझते कुछ है। असल बात तो यही है कि बाप बेटे को नहीं समझता और बेटा बाप को फिर ये आप और हम-तुम है ही किस खेत की मूली। भाषा में मुहवारों का प्रयोग भी खतरनाक हो गया है। पंच काका तो लोक से जुड़े है सो बात बात में उनके लोकोक्तियां और मुहावरे स्वाभाविक रूप से आते रहते हैं पर लोग है कि कुछ का कुछ समझ लेते हैं और नाराज हो जाते हैं। मैं उन्हें मना करता हूं कि ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों करते हैं कि किसी को नाराजगी हो। उन्होंने कहा बाप ने मारी मेढ़की और बेटा तीरंदाज। मैंने प्रसंग को तो नहीं सुना पर उन्हें यह मेरे बेटे के सामने बोलते जब सुना तो मुझे अच्छा नहीं लगा। माना कि मेरे काका है। घर के आका हैं तो क्या हुआ। क्या किसी को बस आका होने से कुछ भी करने, कहने और सुनने का अवसर मिल जाता है।
हां तो पूछना चाहता हूं कि हमारी ईमानदारी कितने प्रतिशत है? कहा जा सकता है कि हमारे देश में बस पांच फीसदी लोगों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे ईमानदार हैं। आजकल ये जो काला धन वाली बेईमानी की बाते है उनकी संख्या तो पांच फीसदी से भी बहुत कम होगी। अब ठीक ठीक तो पता नहीं पर देश में जब इतने ईमानदार है तब क्या आटे में नमक की तरह यह जो बईमान और काली कमाई बाले हमारे भाई-बहन है जो खुद को हमारे भाई-बहन समझते ही नहीं। इसके भी बहुत कारण है। पहला तो ये कि ये अपनी काली-सफेद सारी कमाई विदेशी बैंकों में रखते हैं। छिपा कर रखने वाले और छिप छिप कर देश के साथ गद्दारी करने वाले ये हमारे भाई ही अधिक है। मैंने तो पहले ही कह दिया कि मतलब आप कुछ भी निकालें और भले ही किसी भाई को बुरा लगे। और हां आप यदि किसी भाई के चमचे हैं तो हुए तो भाई ही। चलिए मान लेता हूं कि आप कभी स्कूल नहीं गए और आपने कभी प्रतिज्ञा नहीं की। फिर भी जब भारत आपका देश है तो समस्त भारतीय इस नाते से भाई-बहन ही कहे जाते हैं। होने और कहे जाने के साथ माने जाने के बीच भी बहुत दूरियां है। होने को तो पंच काका सभी के काका हैं और कहे भी जाते हैं पर उनको दिल से काका मानने वाले बहुत कम है। कहते हैं मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली बात हो गई। आप काका को भले काका नहीं माने और आका को आका। इसके कुछ फर्क नहीं पड़ता। काका तो सदा काका ही रहेंगे और आका का फैसला पांच साल में होता ही है। पंच काका कहते हैं कि अबकी बार बईमानों पर बरसी बड़ी मार। पर मुझे यह आकलन समझ में नहीं आता। अरे मारते क्यों हो वे भी तो हमारे ही भाई बंधु है। करना यह था तो फिर पूरे देश को लाइन में क्यों खड़ा कर दिया। बचपन में स्कूल में लाइन में खड़े होने वाले अब कम से कम लाइन बनाना सीख गए। कमाल यह कि इतनी लाइन पक्की बनना सीख गए हैं कि कुछ भी हो जाए फिर भी लाइन की गरिमा भंग नहीं करते। कोई मरे, खपे, लड़े, भीड़े या कुछ भी हो अपना नंबर लाइन का नहीं छोड़ना है। आप भले इसे संवेदनहीनता कहें और बड़ा शब्द काम में लेना चाहे तो अमानवीयता कह ले पर ऐसे शब्दों और कोरे भाषणों का हम पर हम असर होने ही नहीं देंगे। नोट और वोट बदलवाने के लिए क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं। पंच काका भी कमाल के हैं। वे कहते हैं कि बेरुत की दिवाली आ गई है। पूरे देश में लोग काली कमाई पर सफेद करने में जुटे हैं। पांच सौ रुपये की पेंशन पाने वाला बूढ़ा डरता है कि मेरे सात हजार बैंक में जमा करा दिए तो कहीं पेंशन बंद नहीं हो जाए।
० नीरज दइया

26 नवंबर, 2016

प्रेम का कांटा

लेखक परिचय
मधु आचार्य ‘आशावादी’
जन्म : 27 मार्च, 1960 (विश्व रंगमंच दिवस)
शिक्षा : एम. ए. (राजनीति विज्ञान), एलएल.बी.
सृजन : 1990 से हिंदी और राजस्थानी की विविध विधाओं में निरंतर लेखन। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध।
प्रकाशन : राजस्थानी साहित्य : ‘अंतस उजास’ (नाटक), ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’ (उपन्यास) ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (कहाणी-संग्रह), ‘अमर उडीक’ (कविता-संग्रह), ‘सबद साख’ (राजस्थानी विविधा) का शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए संपादन।
हिन्दी साहित्य : ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य काहनियां’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’ (कविता-संग्रह), ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘रंगकर्मी रणवीर सिंह’ (मोनोग्राफ) अपना होता सपना (बाल उपन्यास)
पुरस्कार : उपन्यास ‘गवाड़’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर द्वारा ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्राकारिता पुरस्कार’
अन्य : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य, लगभग 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय, कुछ रचनाएं अन्य भारतीय भासाओं में अनूदित-प्रकाशित। विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य।
स्थाई संपर्क : कलकत्तिया भवन, आचार्यां का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
ई मेल : ashawaadi@gmail.com  /  मो. 9672869385
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राजस्थानी कहानी
प्रेम का कांटा
मूल : मधु आचार्य ‘आशावादी’ ० अनुवाद : नीरज दइया
    बचपन से ही उसे घर में सारी सुविधाएं मिल गई। इसलिए मंजू उम्र से पहले ही व्यस्क हो गई। घर में ए.सी. था, एल.ई.डी. था, हाथ में स्मार्ट फोन था और कहीं आने-जाने की आजादी के साथ स्कूटी थी। ये सभी चीजें कुछ उम्र लेने पर किसी को मिला करती है, परंतु मंजू को तो समझ पकड़ते ही सब कुच मिल गया था।
    घर में किसी भी काम-काज के लिए नौकर थे, इसलिए कुछ काम तो उसे करना ही नहीं पड़ता था। मुह से बाहर आए शब्दों के साथ ही सब कुछ हाजिर हो जाता। समय ही समय था। हाथों में स्मार्ट फोन था इसलिए जैसा मन करता, वही करती। नई तकनीक और फोन ने तो दुनिया को मुट्ठी में ला दिया।
    घर बैठे पूरे संसार का भ्रमण, चाहे विदेश जाओ। कई भांति के तरीके हैं जिस से दूर बैठों को नजदीक देखो। आमने-सामने बात कर लो। एक दूसरे की तश्वीरें देख लो। चैटिंग कर लो। फेसबुक जैसा साधन है, जिसे चाहो दोस्त बनाओ और बातें करो। इंटरनेट ने दुनिया की सारी दूरियां तो पाट ही दी। फेसबुक तो लिखने और लिखे हुए पर कुछ कहने का बड़ा साधन बन गया। मंजू भी फेसबुक का बहुत उपयोग करती। उसकी फ्रेंडलिस्ट बहुत लंबी थी। उसी में वह दिन-रात लगी रहती।
    मां रोटी खाने के किए आवाजे लगाती रहती, तो मंजू कहा करती- मां, अभी मेरी अमेरिका की सहेली से बात चल रही है। यह पूरी हो जाए तो आती हूं।
    - तुमने तुम्हारी उस सहेली को देखा है क्या?
    - मां, फोटो लगी हुई है ना।
    - उसके बारे में जानती है क्या?
    - जानने की क्या जरूरत है। अपने को तो बातें करनी हैं।
    - बिना पहचाने कोई किसी का दोस्त कैसे हो सकता है।
    - मां, अब जमाना बदल गया है।
    - क्या बदल गया।
    - इंटरनेट से तो लोग व्यापार चलाते हैं और इस से बड़े-बड़े दूसरे काम भी करते हैं।
    - मुझे भी बता तो सही कि क्या क्या काम करते हैं।
    - अरे मां, तुम नासमझ हो। तुमको कुछ समझ नहीं आता।
    - मुझे समझ नहीं आता तभी तो तुझ से कह रही हूं कि तू समझा।
    - देख मां, पहले नेता चुनाव के समय वोट मांगने घर-घर जाया करते थे। पर अब तो एक साथ सभी वोटरों से वर्ता कर लेते हैं। पान की दुकान हो, चाय की दुकान हो या गांव की चौपाल, दूर बैठे उन से सीधी बात कर लेते हैं नेता।
    - हां, मैंने अखबार में पढ़ा तो था।
    - यह सच्ची बात है मां ! देख लो लोगों ने इसी इंटरनेट के बल पर सरकारें उखाड़ दी और खुद कुर्सी पर बैठ गए। चारों तरफ इसी इंटरनेट का जोर है, तुमको पता है क्या?
    - किस बात का।
    - एक सरकार तो इसलिए बन गई कि उसने सत्ता में आते ही सभी जगह इंटरनेट फ्री कर देने का कहा। लड़के-लड़कियां पीछे पड़ गए और उस पार्टी की सरकार बनवा दी।   
    - मेरी बिटिया, इस तुम्हारे इंटरनेट से सारी चीजें दूर से देखते हैं। एक न एक दिन तो उनकी पोल खुलती ही है।
    - फिर चाहे पोल खुलो, पर एक बार तो सत्ता में आ गए ना।
    - मुझे तो तुम्हारी बातें पसंद नहीं आती। तुम्हारे इस नेट को छोड़ और पहले खाना खा ले। खाना खा कर फिर से चला लेना। यह कहीं जा थोड़ी ही रहा है।
    - हां, यह बात तुम्हारी ठीक है। चलो, खाना खाते हैं।
    मंजू उठ कर मां के साथ रसोईघर में आ गई। खाना खाने बैठी। पापा भी आ गए थे। वे भी खाना खाने बैठ गए। मां ने खाना खाते खाते फिर बात चालू की।
    - यह तुम्हारी बेटी तो सभी काम नेट से करती है। पूरा दिन उसी से चिपकी रहती है।
    - आजकल इसी का चलन है। यह क्या गलत करती है।
    - अरे नेट पर सब कुछ अच्छा ही नहीं होता। यह भी तो लोग कहते हैं।
    - जो नेट चलता है उसको अच्छे-बुरे का ज्ञान होता है।
    - छोड़ो तब तो आपकी सह हो गई इसे। चलाना बेटी, मर्जी है तुम्हारी और तुम्हारे पापा की।
    पिता-पुत्री ने खाना खाया और अपने-अपने कमरे में आ गए। मां नेट को लेकर बड़-बड़ करती रही, पर दोनों पर कुछ असर नहीं था।

X    X    X     X

    उस दिन मंजू के इनबॉक्स में एक मैसेज था। उस में किसी लड़के ने उसे फ्रेंड रिक्वेक्ट मंजूर करने का लिखा था। मंजू ने उसकी प्रोफाइल खोल कर देखी। वह जवान था और फोटो में सुंदर दिखाई देता था। उस की टाइम लाइन पर या तो कविताएं थी या फिर भगवान के चित्रों के साथ भक्ति की पंक्तियां। किसी प्रकार की बुरी पोस्ट तो एक भी नहीं थी। मंजू को लगा कि इसे मित्र बनाने में ना नहीं करनी चाहिए। ठीक ही दिखाई देता है। उस की फ्रेंड रिक्वेट उसने एक्सेप्ट कर ली।
    बस, बन गए दोनों दोस्त। उसने बहुत ही सुंदर शब्दों में हाथोहाथ मंजू का आभार प्रदर्शित किया। उसका नाम अरुण था। फिर तो रोजाना कविता की पंक्तियां डालनी आरंभ कर दी। टाइम जब भी मिलता चैटिंग चालू कर देते। उसने बताया कि वह इंजीनियर है और एक कंपनी में काम करता है। घर में माता-पिता और दो बहने हैं, जिन का विवाह कर दिया। खुद ने अभी तक विवाह नहीं किया है।
    अरुण ने जब इतना बताया तो मंजू ने भी अपने घर के बारे में सब बातें बता दी। यह भी बता दिया कि वह करोड़पति पिता की इकलौती संतान है और घर में किसी चीज की कमी नहीं है, उसके पूछने पर यह भी बता दिया कि अभी तक ना तो मेरा विवाह हुआ है और ना सगाई।
    अरुण दूसरे शहर में रहता था। अब तो दिन में कई बार अरुण और मंजू चैटिंग करने लगे। बहुत बातें होने से दोनों नजदीक आते हैं, यह तो स्वभाविक ही है। अब दोनों ने आपस में ‘जी’ लगाना छोड़ कर मन लगा लिया। नाम से ही एक दूजे को लिखने लगे। दिन-भर की हर बात एक दूसरे को बताते रहते और यह भी कि बताते कि अभी कहां हैं।
    इंटरनेट ने उन दोनों के बीच की सारी दूरियों को कम कर दिया। अब तो रात को भी लंबी-लंबी चैटिंग होने लगी। दोस्ती की बातें प्रेम में बदलने लगी। आरंभ में तो दोनों डरते रहे, पर उम्र के असर के चलते एक दिन मंजू ने हां कह दिया। अब तो आपस में बहुत बातें होने लगी और बातें प्रेम की ही होती। दोनों आपस में वे बातें भी करने लगे जिनसे लोग बचा करते हैं। यह भी तय कर लिया कि यदि घर वाले नहीं मानेगे तो भाग कर विवाह कर लेंगे। मंजू में अब बदलाव आने लगा था, जो उसकी मां को तो साफ दिखाई देता था।
    एक दिन मंजू ने अपनी मां के सामने अरुण की बात की और कह दिया कि मैं शादी उसी से करूंगी। मां ने मंजू के पापा के सामने यह बात तो उन्हें धक्का लगा। इंटरनेट की दुनिया से खोजा गए दुल्हे की बात हलक से नहीं उतरी।
    माता-पिता ने मंजू को बहुत समझाने की कोशिश की, पर वह तो टस से मस नहीं हुई। कह दिया कि आप हंसी-खुशी शादी कर दें तो ठीक है, नहीं तो हम दोनों अपने आप ही शादी कर लेंगे। मां का मानना था यह सब इंटरनेट के कारण ही हुआ है। इसे बंद करवाएं। पर बेटी की जिद के सामने अड़ना पिता के भी बस की बात नहीं रही।

X    X    X     X

    विवाह के इस झगड़े में कई दिन निकल गए। मंजू और अरुण की रोजाना बातें होती थीं। मंजू ने एक दिन उसे अपने शहर में आने का कहा। पहले तो उसने ना कह दिया लेकिन फिर आने के लिए राजी हो गया। मंजू उसके शहर नहीं जा सकती थी।
    आमने-सामने तो अब तक कभी वे नहीं हुए थे। इसलिए ही मंजू ने ऐसा कहा था। दिन तय हो गया और अरुण ने आने का कह दिया। दोनों मन खोल कर मिले। शादी की बात हुई और तय कर लिया कि घर वाले यदि नहीं मनते हैं तो हम अपने निर्णय पर अटल रहेंगे।
    शादी कब करेंगे इस विषय पर बातें हुई। मंजू ने तो उसी दिन साथ चलने की बात कर ली थी। अरुण ने बताया हुआ था कि उसने घरवालों से बात कर रखी है उन्हें कोई ऐतराज नहीं है। मंजू ने कहा कि बस मुझे तो तुम्हारे घर में ही रहना है। यहां से चलें। नहीं तो घरवाले हमें एक नहीं होने देंगे।
    अरुण ने यह नहीं सोचा था कि मंजू तुरंत ही साथ चलने का कह देगी। वह कुछ असमंजस में पड़ गया। मंजू अपने मां-पापा की बात जानती थी। चाहे वे शादी के लिए हां नहीं कर रहे हो, पर मंजू उनकी इकलौती बेटी थी, इसलिए उसकी बात टालने की हिम्मत उनमें नहीं थी।
    मंजू ने देखा कि अरुण कुछ डर रहा है तो उसने अपने घर चलने का कह दिया। पर अरुण को यह भी ठीक नहीं लगा। उसने बातों में उसे राजी किया और एक महीने के बाद शादी करने की हां कर दी। साथ में यह भी कह दिया कि अगर घरवाले नहीं मानेंगे तो हम खुद शादी कर लेंगे।
    अरुण ने जाते-जाते मंजू को कल की फेसबुक पोस्ट देखने का कहा। मंजू ने कहा कि मैं तो हमेशा ही देखती हूं। पर उसने अखरा कर फिर कहा कि कल जरूर देखना। कसमें खा कर दोनों एक दूसरे से जुदा हुए। अरुण अपने शहर वापिस चल गया। मंजू खुशी-खुशी घर लौट आई। एक महीने की ही तो बात है। यह समय भी जल्दी-जल्दी बीत जाएगा।
    उस दिन वह मां से नहीं झगड़ी। हंसती रही। मां को भी यह बात कुछ अजीब लगी, पर उससे कुछ नहीं पूछा। रात को सोने गई तो सुबह का इंतजार था। अरुण कह गया था कि फेसबुक की पोस्ट देखनी है। मंजू ने सोचा कि वह कोई कविता लिखेगा।
    आज उसे अरुण से चैटिंग करनी थी पर वह एक बार भी ऑनलाइन नहीं आया। फोन मिलाया तो स्विच ऑफ था। पर इस बात को मंजू ने गंभीरता से नहीं लिया। उसे तो सुबह की पोस्ट और एक महीने का इंतजार था। इसी में खोई रही वह।
    सुबह मंजू की आंख जल्दी खुल गई। चाय भी नहीं पी। उसे अरुण की बात याद थी। इसलिए सबसे पहले फेसबुक खोली और उस की प्रोफाइल पर गई। देख कर चक्कर आ गया।
    अरुण ने अपनी पत्नी और दो लड़कों का चित्र डाल रखा था। लिखा हुआ था कि आज मेरी बारहवीं एनीवर्सी है। मंजू को यकीन नहीं हुआ। फिर फिर देखा। फोन लगाया तो स्विच ऑफ था। उस की निगाह प्रोफाइल पर गई तो प्रोफाइल की बातें भी बदली हुई थी। खुद को ‘मैरिड’ बताया हुआ था और पत्नी का नाम गीता लिख रखा था।
    इंटरनेट से बने हुए सारे सपने टूट गए। सच सामने आ गया। मंजू ने सब से पहले तो अरुण को ‘अनफ्रेंड किया। मोबाइल में से उसके नंबर निकाले और ‘रिजेक्ट लिस्ट’ में डाल दिए। फिर उठ कर खुद ही चाय पीने गई।
    वहां मां-पापा दोनों बैठे थे। चाय ली और सामने बैठ गई।
    - पापा, यह स्मार्ट फोन रखिए। मुझे अब फोन नहीं रखना। और घर का इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा देना।
    दोनों चक्करा गए, यकायक यह क्या हुआ, कुछ मालूम नहीं चला। मंजू उठी और चलते-चलते बोली- आप जहां कहेंगे वहां शादी करूंगी। बस मेरी एक प्रार्थना है कि मुझे उम्रभर फोन मत देना। यदि फोन दें तो इंटरनेट मत देना।
    पिता बात समझ गए।
    - बेटा, इंटरनेट खराब नहीं है। पर इंसानी रिश्तों में केवल इसी से काम नहीं चलता। इस के लिए तो सभी कुछ देखना होता है। इसे केवल जानकारी के लिए काम में लेंवे तो कोई खराबी नहीं है। तुम यह फोन रखो और इंटरनेट भी रहेगा। बस तुम इसे रिश्तों का नहीं, बस जानकारी का साधन समझना शुरू कर दो।
    मंजू ने निगाहें झुका ली। फोन उठाया और धीमें कदमों से अपने कमरे की तरफ चल दी।
००००००
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
  

25 नवंबर, 2016

काला धन देस में पकड़ा

जकल दिन-रात हमें बस हमारे पंच काका की चिंता है। भाग-दौड़ इतनी है कि पता ही नहीं चलता कब दिन निकला, कब रात हुई। जनाब समय का कुछ पता ही नहीं चलता। कब दिन निकलता है और कब रात हो जाती है। समय ने ऐसी करवट ली है। हम खुद को बंद कमरों में बंद किए बैठे हैं। हमें कुछ होश नहीं है। पहले भी हमारे होश उडे हुए थे। पर अब जैसा हाल बेहाल नहीं था। अब माजरा यह कि पांच सौ-हजार के नोटों ने होश उडा दिए हैं। पहले इसको जमा करने में सब कुछ खो दिया। अब चारों तरफ ऐसी हवा चली कि बाहर मुंह निकालते ही बेहोश होने का डर है। थोड़े से नोट क्या जमा कर लिए, लगता है कि अब गिरे.... अब गिरे। माननीय ने एक ही झटके में ऐसा गिराया है कि जैसे अब उठने की हिम्मत जाती रही। देखो जिसे घाव कुरेदने को आमादा है। नोटों की ही बात कर रहा है। सुन-सुन के कान पक गए। देश में चर्चा के सारे मुद्दे धरे रह गए हैं। भूला दिए गए हैं सारे मुद्दे। बस एक ही रट है। और इस नए नोटों के गीत में देश खो गया है। हर कोई एक ही गीत गा रहा है। सरकार ने पूरे देश को गाने के लिए एक नया राग दे दिया है। नोटों का गीत आज घर-घर में गाया जा रहा है। अब इसे आप सुख कहें या दुख। यह सच्चाई है कि सारे पिछले सुख-दुख हवा हो गए हैं। कोई पिछली बातें नहीं करता। जैसे सारी समस्याएं इस नोट-पुराण ने हजम कर ली हैं।
काका तो नोटों की बातें सुनते ही जैसे आपा खो बैठते हैं। उनका खून खौलता है। वे कहते हैं कि अरे पैसा जोड़ने के लिए दिन-रात एक किया। तब कहीं जाकर दो पैसे जमा हुए। अब किसे कहें और कौन सुनेगा कि बरसों अपना खून जलाया, तब कहीं जा कर ये दो पैसे हाथ आए हैं। हमने रख छोड़े कि बाज जरूरत काम आएंगे। अब काम क्या खाख आएंगे। उनका मानना है कि कोई ऐसे कैसे कह सकता है कि ये नोट नहीं चलेंगे। आपने दिए, तब चलते थे। अब क्या हो गया। पंच काका को दिन-रात चक्कर आते हैं। निवाला हलक से नीचे नहीं उतरता। ना भूख लगती है ना प्यास। बेचैन रहते हैं। ऐसे में दिन क्या और रात क्या। हमारे तो दिन-रात एक जैसे हो गए हैं। चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा गया है। क्या पता कौन कब-कहां आकर पकड़ लेगा। न जाने ये क्या चक्कर चला है। पंच काका के साथ हमारी भी शामत पक्की है।
पहले सुना करते थे कि विदेशों में काला धन जमा है। कला धन देश में लाएंगे। अब काला-काला करते ये बड़ा खेल घर में ही कर दिया है। अब तो रंगीला देश बदरंग-सा लगता है। ये काला धन क्या निकालने लगे कि लगने लगा है कि सब रंग बेरंग हो गए हैं। काला धन अब विदेशों से लाने की जरूरत ही नहीं रही, देश में ही खूब मिल गया। पंच काका का मानना है कि धन तो धन होता है। उसका काहे का काला और गोरा। सच्चाई यह है कि कोई धन आपके सामने रख दिया जाए तो एक जैसा ही लगेगा। फिर आप काहे काला-सफेद बोलते हैं। बात तो बस इतनी-सी है कि ऐसा धन जिस पर आयकर लगता है और वैसा धन जिस पर आयकार नहीं लगाता। फिर ऐसा का वैसा और वैसे का ऐसा कर देने से क्या पूरा देश बेरंग नहीं हो जाएगा। जिसे देखो डरा हुआ है। पूरा माजरा ही बेरंग हो गया है। बड़े नोटों के हाथ लगाते ही डर लगता है। चवन्नी-अठन्नी देख कर खुशी मिलती है। अब औकात चवन्नी जैसी कर दी। फिर बातें भी ऐसी ही चवन्नी छाप। जेब कितनी ही भरी हो, लगता है- खाली है। काला यानी ब्लेक, वाइट का अपोजिट। ब्लेक मनी के चक्कर मेम दिन भी अब वाइट नहीं रहा। सब कुछ फीका-फीका लगता है। माना देश तो सोने की चिड़िया था और फिर से बन जाएगा पर क्या हम सभी को फिर से बंदर बनना होगा।

० नीरज दइया 

 

21 नवंबर, 2016

पाई-पाई का हिसाब

पंच काका ने मुझे से पूछा- तुम्हें पता है पाई का मतलब? मैं सिर हिलाकर पूछा- आप कौनसी पाई की बात कर रहे हो? क्या आर्यभट्ट वाली पाई, जिसका मान बाइस बट्टा सात होता है। काका बोले- नहीं मैं तो उस पाई की बात कर रहा हूं जो मुझे बचपन में मेरे दादाजी दिया करते थे। तुम लोग क्या जानो उस समय हम क्या का क्या कर देते थे एक पाई में। इतना सुन मैं बीच में बोल- हां समझ गया, बापू जब इंग्लैण्ड गए थे तब वहां वे पाई-पाई का हिसाब रखते थे। मैंने ना तो बापू वाली पाई कभी देखी है और ना ही आपने आप वाली दिखाई है। मैं तो गणित का विद्यार्थी रहा हूं और बस इतना जानता हूं कि ज्यामिती में किसी वृत्त की परिधि की लंबाई और व्यास की लंबाई के अनुपात को पाई कहते हैं।
पंच चाचा तुनक गए। बोले- आग लगे इस ‘गणित’ को। यह गणित ही है जो बेड़ा गर्क कर देती है। सबकी पोल खोलने वाली गणित को मैं पसंद नहीं करता। अब सुन हमारे पीएम माननीय नरेंद्र मोदीजी ने महाराष्ट्र के सिंधखेड़ा में कह तो दिया है कि साठ महीने की पाई-पाई का हिसाब दूंगा। पर देंगे कैसे? इतना बड़ा देश और हिसाब भी इतना बड़ा। भला किसी से हो सकता है क्या? चाचा कुछ आगे कहते, मुझे बीच में बोलना पड़ा- देखिए चाचाजी, मैं आपसे साफ-साफ शब्दों में कहे देता हूं कि मैं ऐसी-वैसी कोई बात नहीं करना चाहता, जिस पर बाद में कोई बखेड़ा हो। कोई क्या करता है और क्या कहता है, उस से मुझे तनिक भी मतलब नहीं है। मैं तो बस अपने काम को देखूंगा कि मैं क्या करता हूं, क्या कर सकता हूं। आजकल कुछ भी कहना खतरनाक है। मैं तो इसी हिसाब में फसा रहता हूं कि क्या कुछ बोलना ठीक है। डर लगता है कि कहीं कुछ गलत बोल गया तो कौन-सी का कब-कहां आ कर कोई हिसाब मांग ले। मैं भला और मेरी चुप्पी भली। हम देशवासियों पर बहुत से नियम लगते हैं। हम नियमों के जाल में फसे हुए हैं।
पंच चाचा मुस्कुराए और बोले- यह तो बहुत समझदारी दिखाई तुमने। तुम सोचते बहुत अच्छा हो, ऐसा सोचते रहो। सोचने-समझने पर कभी कोई पाबंदी नहीं लगा सकता है। मैंने खुश हो कर सहमति में सिर हिलाया तो वे बोले- सुनो! देश में इतनी उथल-पुथल हो रही है और तुम जो अपने आप को बुद्धिजीवी कहे या पढ़-लिखे लोग, कहें जिन्हें लोकतंत्र पर भरोसा है। तुम्हारा-हमारा वर्ग बड़ा शक्तिशाली माना जाता है। पर क्या करें तुमने तो चुप बैठने का निर्णय ले लिया है। पंच चाचा ने गहरी मार कर दी तो मुझे मजबूरी में फिर बोलना पड़ा- देखिए, आप समझते नहीं। मैंने आपसे जो कहना था कह दिया और पूरे सोच-विचार के बाद ही जो कुछ कहा है.... ठीक कहा है। मुझे अपनी जिंदगी बसर करनी है और काम-धंधा करना है। घर-परिवार और बच्चों की सरी जिम्मेदारियां अभी सामने पड़ी है। आप तो अपनी पारी खेल चुके हैं। इसलिए मैं झमेलों में पड़ना ही नहीं चाहता। मुझे माफ कर दीजिए।
पंच चाचा बोले- मैं तो माफ कर दूंगा पर यह देश और जनता कभी किसी को माफ नहीं करती। इस देश का कर्ज है हमारे ऊपर। तुझे पता है कि नहीं अभी एक रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया कि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायमसिंह यादव का संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ विकास के मामले में लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके साथ ही गणित यह भी सामने है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और विपक्षी दल कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधीजी का अमेठी भी पिछड़ता जा रहा है। ये पाई-पाई का हिसाब तो सभी को करना चाहिए। बहुत अच्छी बात है, पर क्या सबसे पहले सभी को अपनों-अपनों का हिसाब भी तो मिला लेना चाहिए। जहां से हम आगे बढ़ते हैं, उनका भी बड़ा ऋण होता है।