28 अक्टूबर, 2016
23 अक्टूबर, 2016
दो कविताएं • नीरज दइया
तुम को संबोधित
कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।
मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००
जान से खेल जाती हैं
क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००
कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।
मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००
जान से खेल जाती हैं
क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००
20 अक्टूबर, 2016
मुझे ‘भूत’ बना दो
सुबह-सुबह कॉल-बेल बजी तो लगा कोई आया है। देखा तो एक सज्जन
कुर्ता-पायजामा धारण किए चप्पल पहने और झोला लटकाए बाहर खड़े थे। देखते ही बोले-
‘पंच चाचा।’ मैंने कहा- ‘हां अंदर है, आएं।’ वह होले-होले कदम बढ़ते मेरे पीछे-पीछे
कमरे तक पहुंचे और कमरे में पंच चाचा को देखते ही उनके चरणों में झुक गए। पंच चाचा
बोलो- ‘अरे बैठो-बैठो।’
मैं कमरे से
बहार निकलने वाला ही था कि ‘मुझे भूत बना दो।’ उस झोलाछाप के शब्दों को सुन वहीं
रूकने का निश्चय किया। सोचा यह कौन पागल है जो भूत बनना चाहता है। पंच चाचा ने कभी
ऐसा भी नहीं बताया था कि वे किसी को भूत बनाने की कला भी जानते हैं। मैं वहीं पास
बैठ गया देखें अब चाचा क्या कहते हैं? पंच चाचा बोले- ‘क्यों भाई तुम भूत क्यों
बनना चाहते हो?’
वह आदमी बोला-
‘जीवन में जो कुछ नहीं कर सका, वह अब भूत बन कर करने की इच्छा हो गई है। घर-परिवार
और बीबी-बच्चों से परेशान हूं, कोई कहना नहीं मानता। भूत बन कर सब को सीधा कर
दूंगा।’ पंच चाचा मुस्कुराए, बोले- ‘अच्छा। ऐसे कैसे सीधा कर दोगे? तुम्हें पता है
भूत तो खुद ऊलटा होता है और जब तुम भूत बन जाओगे तुम्हें सभी जो यहां ऊलटा है सीधा
दिखेगा और जो सीधा है वह ऊलटा दिखेगा।’
‘चाचा अच्छा
किया जो आपने पहले बता दिया। वर्ना मैं भूत बन कर सब ऊलटा-पुलटा कर देता। अब ठीक
है। जो सीधा दिखेगा, उसी को मैं सीधा करूंगा।’ उस आदमी के कहते ही चाचा अपने स्थान
से उठ खड़े हुए और उसका हाथ पकड़ करा अपने हाथ में ले लिया। मैं हैरान कि चाचा को क्या
हो गया। ऐसा पहले तो कभी हुआ नहीं था। वे देर तक चुपचाप उसके हाथ को थामे मौन साधे
रहे फिर बोले- ‘अभी तुम्हारा भूत बनने का समय नहीं आया है।’ उसका हाथ छोड़ चाचा
अपने स्थान पर जाकर बैठ गए और मेरे तरफ देख कर बोले- ‘पानी तो पिलाओ।’
मैं बेमन से
उठा यह सोचते हुए कि न जाने पंच चाचा उस से क्या कुछ मेरी अनुपस्थिति में कह डाले
और मैं सुनने से वंचित रह जाऊं। मैं जल्दी-जल्दी पानी लाने की फिराक में यह गया और
यह आया की स्थिति पाना चाहता था। सच में अब तो मेरी भी इच्छा हो रही थी कि पंच
चाचा से कहूं- ‘मुझे भूत बना दो।’ अगर मैं भूत होता तो वहीं बैठे-बैठे हाथ लंबा
करता और पानी की व्यवस्था कर देता। मैं भूत नहीं था फिर भी भूतों सी जल्दबादी तो
मेरे भीतर थी। मैं जब पानी लेकर वापिस आया देखा कि वह आदमी जोर-जोर से रो रहा था
और पंच चाचा जोर-जोर से हंस रहे थे।
मैंने दोनों को
जैसे टोकते हुए कहा- ‘पानी।’ दोनों यकायक चुप हो गए। पानी पीकर वह आदमी और पंच
चाचा मेरी तरफ देखने लगे तो मैंने कहा- ‘क्या? आप हंस और यह भाई साहब रो क्यों रहे
थे?’
पंच चाचा बोले-
‘देखा, मैंने कहा था कि नहीं। यही तो भूत है जिसे हम पाना चाहते हैं। तुम यहां
नहीं थे तो तुम्हारा भूत था यहां। उसने सब देखा-सुना पर वह तुम को नहीं बता सकता।
मैं कहता हूं हम सब के अपने अपने भूत है जो हमारे भीतर-बाहर रहते हैं। हम सब हमारे
अपने भूतों के साथ रहते हैं। हम सब की समस्या यह है कि हम उल्टे को सीधा करने की
सोचते रहते हैं। उल्टे को सीधा करना सरल नहीं है। सरल है सीधे को सीधा करना। मतलब अगर
हर कोई उल्टे को सीधा करने में लग गया, तो सीधा हमारे हाथ से चला जाएगा और वह भी
उल्टा हो जाएगा। सीधों को सीधा रखो भैया।’
18 अक्टूबर, 2016
‘सामान्य’ शब्द पर आपत्ति
वैसे तो ‘सामान्य’ शब्द इतना सामान्य है, कि इस पर कोई आपत्ति मान्य नहीं। आप सहृदय हैं। देखिए जब इस शब्द की आत्मा ‘मान्य’ में है, तो यह आपत्ति भी मान्य समझ कर सुनना मंजूर कीजिए। जानते हैं कि देश और दुनिया में बहुत सी बातों पर अनेक आपत्तियां है। हम लंबी-चौड़ी बात नहीं बस एक बार करने की अनुमति चाहता हूं। आपकी सदाश्यता होगी कि इस आपत्ति को सुनना स्वीकार करेंगे।लिजिए जनाब हुआ कुछ ऐसा कि सात बार प्रतियोगिता परीक्षा में फेल होकर आत्महत्या को उतारू एक युवा को पंच काका ने एक बार तो रोक लिया है। पर पंच काका कहां-कहां किस किस को रोकेंगे। इसलिए यह सुनना अधिक जरूरी है। उसके युवा के अंधकारमय भविष्य का श्रेय परीक्षाओं के ‘सामान्य ज्ञान’ के प्रश्नों को जाता है। आजकल सभी परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान के कुछ ऐसे अति-विशिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं। वह हतोत्साहित युवा कह रहा था कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री से लेकर देश के सभी नेता हर दिन कुछ न कुछ करते हैं। तकलीफ उनके कार्य को हमारे सामान्य ज्ञान बना देने से। प्रधानमंत्री जी कब कहां गए, और उन्होंने कहां क्या-क्या किया-कहा? भला यह कोई सामान्य ज्ञान है। इतनी योजनाएं, इतना बड़ा देश और इतनी बड़ी जनसंख्या। हमारा पुराना इतिहास, भूगोल, विज्ञान, खेल-कूद सभी कुछ जब सामान्य ज्ञान है तो हद हो गई। सामान्य का अभिप्राय है ऐसा कि जिसमें कोई विशेष न हो। यहां तो बस सामान्य हम है हम पर लाद रहे हो विशेष। आपको जो मामूली बात लगती है वह हम रट-रट कर कितनी रटें। ग्रह कितने हैं, कौनसा छोटा और कौन बड़ा? कौन सा किस नंबर पर? सब याद रहता है भला। शरीर में हड्डियां कितनी और पसलियां कितनी? इन सब ने दिमाग खराब कर दिया है। कौनसा विटामिन और कौनसा खून किस-किस को दिया और नहीं दिया जा सकता है। क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल के साथ सभी खेल सामान्य हैं। कौन जीता, कब जीता... कितने सवाल बना डाले इन किताबों में। सामान्य ज्ञान को प्रणाम।आम का मतलब फल होता है और आम मतलब हम यानी सामान्य। आज हर कोई सामान्य से निकल कर, किसी न किसी कोटे में फिट होने की अभिलाषा रखता है। देश की विकास दर बढ़ रही है। आम आदमी खुशहाल हो रहा है। पर असलित में इन आमों में कुछ आम बेहद सडे हुए हैं। सडते जा रहे हैं। इन सडे हुए आमों का रस निकाल कर पीने वाले पी रहे हैं। वे अपनी सेहत बना रहे हैं। बेरोजगारी में पांच हजार का काम पांच सौ तक में करने को विवश ये सामान्य जन पढ़े-लिखें है, पर ‘सामान्य ज्ञान’ के मारे हुए हैं। अगर पन्द्राह-बीस वर्षों तक किताबों में आंखों को उलझाए ये युवा ‘सामान्य ज्ञान’ के स्तर को भी प्राप्त नहीं हुए हैं तो इन स्कूलों और कॉलेजों ने इतने सालों क्या किया? जो पढ़ाया वह किस काम का? अरे जीवन भर पढ़ाते कुछ हो, परीक्षाओं में नौकरियों के लिए पूछते कुछ हो। यह क्या खेल है? पढ़ी हमने रामकथा और सवाल आया महाभारत से। बाजार का भी बुरा हाल है। एक परीक्षा के लिए लाखों की संख्या में आवेदन किए जाते हैं, और बाजार में रातों-रात अनेक किताबें पहुंच जाती है। कौनसी खरीदे और कौनसी नहीं? दो-चार खरीद कर दिन-रात पढ़ते हैं। पढ़ते क्या घोट घोट कर पीते हैं। खाना-पीना-सोना सब कुछ हराम। केवल और केवल पढ़ाई। सपना कि कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए। सामान्य जन की कोई बड़ी अभिलाषा नहीं है। ये पेपर बनाने वाले जनाब ना मालूम किस-किस जगह से प्रश्न बटोर कर सामने परोसते हैं कि सामान्य बस सामान्य ही बन कर रह जाता है। हर बार की तरह इस बार भी गई भैंस पानी में। अरे हम सामान्य को इतना गणमान्य बना दिया है हमारे उद्धार की तो सोचो।
16 अक्टूबर, 2016
आलोचना में कोई मित्र नहीं होता : डॉ. नीरज दइया
डॉ. नीरज दइया से राजेन्द्र जोशी की बातचीत
(आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, आलोचना, अनुवाद, संपादन और बाल साहित्य आदि क्षेत्र में बहुत तेजी से उभते हुए लेखक के रूप में डॉ. नीरज दइया ने अपने काम के बल पर एक ऐसी स्थिति ला खड़ी कर दी है कि वे राजस्थानी साहित्य के एक जरूरी लेखक माने जाने लगे हैं। आपको बाल साहित्य पर साहित्य अकदेमी का बाल साहित्य पुरस्कार और अनुवाद कार्य पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने सम्मानित किया साथ ही अनेक संस्थाओं ने भी पुरस्कृत किया है। हाल ही में आपको आलोचना पुस्तक बिना हासलपाई पर इक्कीस हजार का पुरस्कार रोटरी क्लब द्वारा घोषित हुआ है। डॉ. नीरज दइया से पुरस्कृत पुस्तक और उनकी आलोचना प्रक्रिया पर कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने लंबी बातचीत की है। जिसका संपादित अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है। ० संपादक )
(आधुनिक राजस्थानी साहित्य में कविता, आलोचना, अनुवाद, संपादन और बाल साहित्य आदि क्षेत्र में बहुत तेजी से उभते हुए लेखक के रूप में डॉ. नीरज दइया ने अपने काम के बल पर एक ऐसी स्थिति ला खड़ी कर दी है कि वे राजस्थानी साहित्य के एक जरूरी लेखक माने जाने लगे हैं। आपको बाल साहित्य पर साहित्य अकदेमी का बाल साहित्य पुरस्कार और अनुवाद कार्य पर राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी ने सम्मानित किया साथ ही अनेक संस्थाओं ने भी पुरस्कृत किया है। हाल ही में आपको आलोचना पुस्तक बिना हासलपाई पर इक्कीस हजार का पुरस्कार रोटरी क्लब द्वारा घोषित हुआ है। डॉ. नीरज दइया से पुरस्कृत पुस्तक और उनकी आलोचना प्रक्रिया पर कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने लंबी बातचीत की है। जिसका संपादित अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है। ० संपादक )
० आपकी
आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर रोटरी क्लब का पहला-पहल राज्य स्तरीय पुरस्कार
घोषित होने पर कैसा लगा?
० इसका जबाब तो
आप जानते ही हैं। अच्छा लगा। पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता? खुशी की बात है कि
मुझे आलोचना विधा की पुस्तक पर पुरस्कार मिलेगा।
० कहा
जाता है कि राजस्थानी में आलोचना विधा पर लेखन बहुत कम हुआ है और जो हुआ है उसमें
भी बहुत बातें हैं। जैसे आलोचना के नाम पर जो लिखा जा रहा है वह आलोचना है भी या
नहीं इस पर भी संदेह है।
० केवल
राजस्थानी आलोचना ही क्यों, क्या हम समग्र आधुनिक राजस्थानी साहित्य लेखन से
संतुष्ट हैं? हम ऐसी बात करते हुए कटघरे में तो बीसियों को रखते हुए अनेक बातों में
व्यर्थ समय बर्बाद कर सकते हैं पर मैं मानता हूं कि एक लेखक के रूप में अपने आप से
सबाल करना चाहिए कि जो मैंने लिखा है वह पर्याप्त है क्या? साथ में यह भी कि यदि
आप राजस्थान में रहते हैं और राजस्थानी भाषा आपकी आपनी है तो आपने क्या किया है
इसके लिए? अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के लिए हम सभी की साझी जिम्मेदारी है।
क्या पाठक और लेखक के रूप में आपने राजस्थानी किताब को खरीद कर पढ़ाने की आदत डाल
ली है? स्थिति बेहद दुखद है कि लेखक किताब भेंट करते हैं और मित्र लेखक पढ़ते भी
नहीं है। ऐसे लेखक मित्रों को मैं अनपढ़ कहा करता हूं। संभवतः आलोचना के बारे में
संदेह करने वाले ऐसे ही हमारे अनपढ़ लेखक मित्र हैं, उन्हें खुद जानने-पढ़ने की
जरूरत है कि आलोचना क्या होती है। तथ्य और तर्क के बिना कही गई बात का कोई महत्त्व
नहीं होता।
० ऐसे
अनपढ़ कहना हमारे लेखकों द्वारा शायद अपमान समझा जाएगा।
० यदि इसे अपमान
समझ कर भी वे कुछ पढ़ने-लिखने लगे तो राजस्थानी के लिए अच्छा होगा। अनपढ़ लेखक केवल
बातें करते और बातें बनाते हैं। यह साहित्य का भला नहीं।
० मेरा
सवाल अधूरा रह गया कि आज जो आलोचना के नाम पर लिखा जा रहा है और आपने जो अपनी
किताब में लिखा है उसमें बहुत लेखकों को शामिल नहीं किया है।
० यदि आप मेरी
किताब में बस लेखकों के नाम ही देख रहे हैं तो माफ करें आपको लेखक परिचय कोष देखना
चाहिए। आधुनिक राजस्थानी कहानी को मैंने समझने का प्रयास किया है। इस प्रयास में
कहानी विधा के विकास की बात बिना कहानीकरों और कहानियों के नहीं हो सकती थी। इसलिए
पच्चीस कहानीकारों को प्रमुखता के साथ आधार बनाया है। इसमें आरंभ में दो आलेख अलग
से है, जिनमें कहानी आलोचना और शिल्प-संवेदना के पक्षों पर चर्चा है। मेरा मानना
है कि वर्तमान में आधुनिक कहानी पर यह पुस्तक पर्याप्त विवेक के साथ मैंने लिखन की
एक कोशिस की है।
० कहानी
आलोचना पर आप से पहले डॉ. अर्जुन देव चारण ने ‘आधुनिक राजस्थानी कहाणी : परंपरा
विकास’ पुस्तक में सभी कहानीकारों की चर्चा की थी पर आपने सभी को नहीं लिया।
० यदि आपने उस
पुस्तक को देखा है तो यह भी कहिए कि डॉ. चारण ने पांच कहानीकारों पर विशेष आधार
बना कर विवेचना की थी और अब जब मैंने पांच से पच्चीस कहानीकारों को आधार बनाया है।
इस क्षेत्र में बहुत काम करने की आवश्यकता है। मैं मूलतः रचनाकार था और रचनाकार ही
हूं, आलोचना का काम भी उसे रचना मान कर ही करता हूं।
० ऐसे
में हम क्या यह समझे कि बिना हासलपाई में आलोचना की हासलपाई यह है कि आपने जानबूझ
कर अपने मित्र कहानीकारों को ले लिया है और कुछ नामी गिरामी कहानीकारों को छोड़
दिया है।
० ‘बिना
हासलपाई’ आलोचना पुस्तक की एक सीमा है, हर पुस्तक की होती है और मेरा मानना है कि आलोचना में कोई मित्र नहीं
होता। इसमें शामिल बहुत से कहानीकारों से मेरा परिचय बस उनकी रचनात्मता से है।
मैंने राजस्थानी के लगभग सभी कहानीकारों को पढ़ा है और इस आलोचना पुस्तक में छूटे
हुए कहानीकारों से भी गहरे मित्रवत संबंध है। ऐसे मित्रों को मैं अपने पारिवारिक आयोजन
में आमंत्रण भेज सकूंगा पर आलोचना लिखते समय जब मैं अपने पिता सांवर दइया को भी एक
कहानीकार के रूप में पढ़कर ही आलोचना लिखने का प्रयास करता हूं, आप स्वयं इसका आकलन
कर सकते हैं कि मैंने अपने पिता पर नहीं एक कहानीकार पर लिखा है, जो राजस्थानी के
बड़े कहानीकर माने जाते हैं। असल में ‘बिना हालपाई’ में कहानीकारों के मेरे संबंधों
को नहीं उनकी कहानियों के सभी पक्षों को उद्घाटित करने का उदाहरण बनाने का प्रयास
है। केवल तारीफ ही तारीफ या फिर परिचय और सूचियां आलोचना नहीं हुआ करती। आदरणीय
कवि पारस अरोड़ा ने एक दिन मुझे फोन किया और बोले- नीरज तुझे समीक्षा लिखनी नहीं
आती। मैं हैरान रह गया। पूछा- ऐसा क्या लिख दिया मैंने? उन्होंने जो कहा अब वह
मेरे लिए किसी बड़े पुरस्कार या प्रमाण-पत्र से कम नहीं है। वे बोले थे- तुम
समीक्षा के नाम पर आलोचना लिखते हो। असल में किसी भी समीक्षा का धेय ही आलोचना हो
जाना होता है। आलोचना रचना को गहरे अर्थों में स्वीकार करती है।
० ऐसे
में आपने शामिल पच्चीस कहानीकारों का चयन कैसे किया। किसे लिया जाए और किसे नहीं
लिया जाए? इसका कोई तो आधार या बात आप ने ध्यान में रखी होगी?
० ‘बिना
हासलपाई’ का कोई भी किताब जब प्रकाशन की राह आती है तो उसमें रचनाकार के मित्रों
और सहयोगियों के साथ अग्रज साहित्यकारों की भी भूमिका होती है। मेरे साथ हमेशा ऐसा
रहा है। ‘आलोचना रै आंगणै’ भाई साहब बुलाकी शर्मा और रवि पुरोहित को समर्पित थी और
‘बिना हासलपाई’ भाई साहब मदन सैनी और नवनीत पाण्डे को समर्पित है। इसका फ्लैप नंद
भारद्वाज जी ने लिखा है। पहली पुस्तक से इतर जब दूसरी पुस्तक आने वाली थी तब हम सब
ने तय किया कि पुस्तक विधा केंद्रित होनी चाहिए। बहुत से आलेखों को बिना हासलपाई
में शामिल करने से पहले मैंने अनेक बार देखा परखा। आलोचना जब पत्र-पत्रिकाओं में
किसी त्वरा में लिखी जाती है तब कुछ बातें और प्रसंग साथ होते हैं ऐसे में उनका
वैसे का वैसा किताब में जाना ठीक नहीं होता है। पत्र-पत्रिका और अखबार का महत्त्व
कुछ दिनों और महीनों तक होता है जबकि किताब को तो सालों-साल रहना होता है। ऐसे में
उनकी भाषा और वस्तु-भाव सभी को परिमार्जित किया जाना जरूरी समझता हूं। बिना
हासलपाई में उन कहानीकारों को लिया गया जिन पर पर्याप्त ध्यान आलोचना ने नहीं दिया
है। शामिल कहानीकारों के अलावा भी ऐसे कहानीकार है जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
पर कुछ ऐसे कहानीकारों को छोड़ दिया गया, जिन्होंने कहानियां तो बहुत कम लिखी है और
बातें बहुत की है अथवा अपने कहानीकार होने को उन्होंने खूब प्रचारित करवाया है।
आलोचना का काम अज्ञात बातों और बिंदुओं को सामने लाना होता है, ऐसे में कुछ प्रयास
मैंने किया है। जो पसंद किया गया है तभी मेरी किताब के बारे में बात होती है।
० आलोचना
लिखते समय आप विशेष क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखते हैं?
० लिखना आज के
दौर में बेहद कठिन कार्य है और आलोचना तो उससे भी कठिन। मैं राजस्थानी साहित्य का
पाठक हूं इसलिए लेखक हूं। कुछ किताबें और लेखक मुझे प्रभावित करते हैं और वे
किताबें ही मुझे आलोचना लिखने की प्रेरणा देती है। ऐसा भी है कि संपादकों के आग्रह
पर भी मैंने आलोचना लिखने का प्रयास किया है। आलोचना में समय के साथ नया दृष्टिकोण
होना जरूरी है। मैंने आधुनिक कविता के संदर्भ में कवियों के सिलसिले में टोप टेन
कवियों की अवधारणा बाजारीकरण के चलते प्रस्तुत की थी जिस पर भिन्न भिन्न
प्रतिक्रिया हुई। मैं मानता हूं कि आजादी के बाद के मेरे बताए दस कवियों में से आप
सात-आठ पर सहमत हैं तो मेरी आलोचना के मानदंड ठीक है। मैं यह उम्मीद भी नहीं करता
कि आप शत प्रतिशत मुझसे सहमत होंगे। आपको सहमत होना भी नहीं चाहिए। यदि आप पूरे
सहमत हो जाएंगे तो मैं अपने आप में सुधार क्या करूंगा। अंत में एक बात मन से कहता
हूं कि साहित्य की कोई विधा हो बेशक वह आलोचना हो या कोई दूसरी हो, आलोचना का कोई
तयशुदा फार्मूला नहीं होता। मैं क्या और किन-किन बातों का ध्यान रखता हूं आपके
सवाल पर मेरा कहना है कि मैं लिखते समय बस लिखता हूं। जिस दिन यह क्या और किन-किन
का ध्यान रखने लग जाऊंगा तब तो मेरा लेखन ही अवरुद्ध हो जाएगा। भीतर की प्रेरणा और
विचार प्रवाह की कुछ ऐसे स्थितियों से मैं अपने भीतर धिर जाता हूं तब यह जानिए कि
बिना लिखे रह नहीं सकता और मैं लिखता हूं। हां उसके प्रकाशन से पूर्व जरूर इन क्या
और किन-किन के बारे में सोचता हूं। आलोचना में किसी लेखक के आत्म-सम्मान पर चोट
नहीं हो यह ध्यान रखता हूं साथ ही मैं अपने लेखक को बड़ा मान कर ही उसके पीछे पीछे
चलने का प्रयास करता हूं। मेरी भाषा और तर्क पर्याप्त सुसंगत हो यह भी दुबारा पढ़ते
समय देखता हूं। असल में सभी कहानीकारों का अपना अपना ढंग है, इसिलिए सभी
लेखकों-कहानीकारों का अपना-अपना महत्त्व है। इस महत्त्व के आलोक में आलोचक अपनी
दृष्टि से समय और समाज के अनेक प्रश्नों के साथ किसी व्यापक परिदृश्य अथवा कहें
साहित्य की विशाल परंपरा में उन्हें देखने-समझने का प्रयास करता है।
राजेन्द्र जोशी, तपसी भवन, नत्थूसर बास, बीकानेर - 334004
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