29 अगस्त, 2016

रचना की तमीज

चना का आलोचना और समाज का व्यंग्य में असली रंग-रूप दिखाई देना चाहिए। अब जब से नकली और डुपलीकेट का चलन चला है मामला गडमड हो गया है। बिना रंग-रूप की रचनाएं आजकल रचनाकार लिख रहे हैं। आलोचक का इसमें दोष क्या है? जब कोई रंग-रूप उसे दिखाई ही नहीं देता, तब वह असली रंग-रूप के नाम पर क्या दिखाएगा। बेहतर है कि वह चुप रहे। समाज का हाल तो इससे भी बुरा है। वह बेहद फास्ट हो गया है और रुकने का नाम नहीं ले रहा। देखो ना, पलक झपकते ही समाज अपना रंग-रूप बदल लेता है। कोई व्यंग्यकार किसी रंग-रूप के बारे में लिखने की सोचता है कि उसे पता चलता है कि वह जो सोचा था वह तो बदल गया। ऐसे में व्यंग्य रचनाओं का आरंभ हो जाता है और पूर्ण नहीं हो पाने के कारण वे अधूरी रहती हैं। मुझे डर है यह व्यंग्य पूरा होगा या नहीं। चलिए प्रयास करते हैं।
    बड़बोले लेखक स्वामी चेतनांदन जी कहते हैं कि समृद्ध साहित्य के लिए समर्थ लेखक मित्रो,
एकजुट होकर इतनी विधाओं में उत्कृष्ट लेखन करो कि दुनिया को पता लग जाये साहित्य की वास्तविक तासीर क्या है? हमें जुदा-जुदा गुटबंदियों में रह कर वर्तमान को नष्ट नहीं करना है। भाषा-साहित्य अगर समाज में स्थापित होगा तो स्वत: ही हमारी जय-जयकार होने लगेगी।
    स्वामी जी के एक भक्त ने सवाल किया- महाराज, एकजुट होकर उतकृष्ट लेखन नहीं होता, लेखन के लिए तो अकेलापन और एकांत चाहिए। कड़ी मेहनत और खून-पसीना एक करना पड़ता है।
    सवाल सुनकर स्वामी जी तिलमिला गए और बौखलाहट में बोले- रचना की तमीज होनी चाहिए। ऐसे किसी बात की कमीज नहीं उतारा करते। संकेत समझो। अगर संकेत नहीं समझते तो खुद को बुद्धिजीवी क्यों कहते हो? कला क्षेत्र ऐसे अज्ञानियों के लिए जगह नहीं। पहले तो यह जानना चाहिए कि एक लेखक अपनी रचना से जाना-पहचाना जाता है। वह बड़ी से बड़ी विचारधारा, संस्कृति, वांग्मय को आत्मसात करने के उपरांत ही किसी बड़े संगठन या संस्थान में पहुंचता है। ऐसे में यही कहेंगे- रचना की तमीज असल में लेखक के रूप में हमारे जीने की जमीन है। चेतनांदन जी ने आगे कहा कि आज साहित्य में रचना तो अच्छी या खराब होने की बात छोड़िए, ज्यादातर लेखकों का जीवन ही अविश्वसनीय है। इसे क्या कहेंगे?
    सब की बोलती बंद हो गई। स्वामी जी का यह रंग-रूप भी समझ नहीं आया। इसलिए इसकी भी कोई आलोचना नहीं हुई। लिखने वाले जल्दबाजी नहीं करेंगे तो समाज का असली रंग-रूप रचना में आ ही नहीं सकता। अगर लिखना है तो चौबीसों घंटों समाज पर पैनी नजर रखो। इस बीच जब समय मिले झट से लिख डालो, जो कुछ लिखने का मन करे। समकालीन सजृन में ऐसे लेखन की आलोचना नहीं हो सकती। इन दिनों व्यंग्य लेखक भी बेहद जल्दी में विषय उठाते हैं और समाज का उनमें रंग-रूप दिखई देने को होता है कि अगले व्यंग्य में रंग-रूप फिर से बदला हुआ दिखाई देने लगता है। ऐसे में कौनसा रंग-रूप असली और कौनसा नकली है। यह जबरदस्त संघर्ष है। असल में नकली-डुपलीकेट तो कुछ है ही नहीं।
    पंच चाचा ने कहा है- रचना लिखो तो आलोचना की परवाह मत करो और व्यंग्य लेखन में चिकनी-चुपड़ी के साथ लूखी भी मिक्स करो। नकली और डुपलीकेट अपनी-अपनी जगह पर असली और ओरिजनल ही है। यही नहीं तो बहुत बार नकली-डुपलीकेट को देखने के बाद, असली-ओरिजनल को ही नकली-डुपलीकेट समझा लिया जाता है। मेरा पक्का दावा है कि बड़बोले लेखक स्वामी चेतनांदन जी नकली-डुपलीकेट श्रेणी में रखने योग्य और सवाल करने वाला अनाम भक्त रचना की तमीज का असली-ओरिजनल चेहरा है।
- नीरज दइया
  

26 अगस्त, 2016

न कुछ कहना ही बेहतर कहना है

किन्हीं दो संदिग्ध व्यक्तियों ने बीती रात हमारे घर की तरफ पत्थर फेंके तो पंच काका नींद से जाग गए। उन्होंने खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें पहचाने की कोशिश की, पर वे अपने इन दो भतीजों को पूरा पहचान नहीं सके। एक तो आधी रात का वक्त और अब आंखें भी पहले जैसी कहां रही पंच चाचा की।
पर काका के कान अब भी दूर की सुन लेते हैं।
            वे बता रहे हैं कि पत्थर फेंकने वाले जोर जोर से चिल्ला रहे थे-
            पहला : तू कहानीकार नहीं है समझे।
            दूसरा : तू आलोचक नहीं है समझे।
            नए पत्थरों को नीचे से उठा कर फेंकते हुए समवेत : तू कवि भी नहीं है समझे, और हां अनुवादक तो बिल्कुल नहीं है।
            फिर इन्हीं स्वरों में पंच चाचा के कानों तक दो-चार गालियां भी पहुंची, उन उखड़े हुए भतीजों की वे गालियां पंच चाचा कहते हैं दोहराने योग्य नहीं है।
            उन्होंने ऊपर के वाक्यों की पुनरावर्ती के साथ नए वाक्य भी सुने :
            - अबे तू संपादक नहीं है।
            - समझे ले तू कुछ भी नहीं है।
            - हम तुम्हें आदमी भी नहीं मानते कमीने आलोचक। तू हम पर क्यों नहीं लिखता।
            पंच चाचा के धैर्य ने भी इतना सब देख-सुन कर साथ छोड़ दिया, उन्होंने अपनी लाठी उठाई और गेट तक पहुंचे। उनको देखते ही उनके फर्जी भतीजे भाग गए।
            पंच चाचा बड़े ज्ञानी-ध्यानी है। वे मुझे से कह रहे हैं कि तुमने मेरे उन दो फर्जी भतीजों की कितनी भैंसे खोल ली हैं, जो वे नाराज है और गालियां भी निकाल रहे हैं। नहीं तो आज कौन किसको गालियां निकालता है। अब जा ऐसा कर बाड़े में उन्हीं की भैंसों का दूध निकाल कर ला। मैं उनकी भैंसों का दूध पी कर उन भतीजों के नाम अपनी विद्या से जान लूंगा।
            मैंने कहा- नाम जान कर क्या करेंगे।
            पंच चाचा बोले- मैं कुछ भी करूं या ना करूं, ऐसे गुणी भतीजों के नाम तो जानने ही चाहिए ना।
            भैंसों के बाड़े में मैं जा तो रहा हूं पर मेरी समस्या यह है कि मैंने भैंसे तो चाचा के काफी रिस्तेदारों की खोल कर अनजाने में अपना बाड़ा भर लिया है। अब मैं पहचान कैसे करूं कि किस की भैंस कौनसी है?
       हां तो अब सुनो चाचा के अनाम भतीजो! मेरी और आपकी कोई लड़ाई नहीं है। मैंने कभी किसी से लड़ाई नहीं की है। अगर फिर भी आपकी निगाह में हमारी ऐसी कोई लड़ाई है, जिसे आप याद कर रहे हैं तो मेरा निवेदन है अब सब भूल-भाल जाओ। किसी दिन मिल-बैठ कर बात करते हैं।
      अब मैं थोड़े दिनों के लिए आलोचना का काम स्थगित कर रहा हूं। जिस काम से चारों तरफ नाराजगी ही नाराजगी हो उसे करने से क्या फायदा। मैं जब भी कुछ कहता हूं सही समझ कर कहता हूं। आलोचना को लेखक के लिए हितकर मानते हुए कहता हूं। पर यहां तो यदि किसी के लिए अच्छा लिख दिया, तो दूसरे भाई-बंधु नाराज हो जाते हैं। और कुछ ऊपर-नीचे लिख दिया तो भी नाराजगी जाहिर है। कुछ नहीं लिखा तो भी नाराज कि मेरे लेखन पर कुछ क्यों नहीं लिखा। अब सच में मुझे लगने लगा है कि न कुछ कहना ही बेहतर कहना है।
- नीरज दइया
17.11.2016 को गंगानगर दैनिक अर्जुन में

23 अगस्त, 2016

बिना विपक्ष का एक पक्ष

र्षों से भरतीय जनमानस कभी धूप, कभी छांव की संकल्पना से जुड़ा है। हरेक भारतीय जानता है कि कभी सुख और कभी दुख। वह सुख में भले दुख का इंतजार न करता हो, पर दुख में सुख का इंतजार जरूर करता है। मजे की बात यह भी कि दुख के बाद सुख बेहद सुहाता आता है। जब कोई सुखी जीवन जी राहा हो तो भला किसी दुख की कल्पना क्यों करे। दुख को जब जहां जिस रास्ते आना है आ जाए। वह अगर रोकने से रूकने वाला हो तो चिंता भी की जाए। सुख के इंतजार में दुख के दिन काटते हैं और सुख में आने वाले दुख से बेपरवाह जीवन भले जीते हो किंतु यह विषय शोध का है।
    इस नायब विषय पर किसी ने ध्यान नहीं दिया पर हमारे पंच चाचा ने गहनता से इस पर विचार-विमर्श किया। फेसबुक पर सक्रिय चाचा के एक भतीजे को श्रेय जाता है जिसने लिखा कि दूसरे पक्ष तक मेरी पहुंच नहीं है। पंच चाचा बोले- सभी तो मेरे भतीजे हैं फिर ये पहला और दूसरा क्या हुआ। एक तक पहुंच अर दूसरे तक पहुंच नहीं। यह तो निरा वहम है। आज इतने आने-जाने और पहुंचने के साधनों के बाद भी अगर पहुंच नहीं तो कब होगी। भैया तुमको चांद पर तो जाने का कहा नहीं। जब एक ही शहर में एक पक्ष और दूसरा पक्ष किए बैठे हो तो मोबाइल काहे लिए घूमते हो। अरे झट से लगाओ नंबर और करो पहुंच में सब को। तुम्हें किसी दूसरे ने नहीं, तुम्हारे लक्ष्णों ने ही डूबोया है।
    मान की जब कोई एक है तो कोई दूसरा और तीसरा भी होगा। पर बात पंच चाचा के भतीजे की फिर कभी, अभी तो हम एक ऐसे पक्ष की कल्पना करें जिसका कोई विपक्ष नहीं हो। यह देखने में जरूर कुछ पेचीदा लगता है। भैया जहां पक्ष होगा वहां विपक्ष होगा ही जैसे संसार में सुख है तो दुख भी होगा ही। बस यहीं तो इस बात का चाबी है। यहां सब सुख चाहते हैं। चाहना भी चाहिए, अब कबीर का जमाना तो रहा नहीं और वहां भी देखिए- ‘सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥’ संसार के सुखी होने का इस से बड़ा क्या प्रमाण चाहिए। पंच चाचा कहते हैं- अब कबीर जैसे दुखी होने का समय नहीं है। जागने और रोने की जगह खाना और सोना ही उचित है। खाने और सोने में अब भी अगर कोई बाधक है या हो सकता है तो वह है विपक्ष। इस विपक्ष को क्या हम पक्ष में नहीं ला सकते हैं। अधिक से अधिक कहना ही तो है कि भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये वी का तगमा उतार कर पक्ष बन जा। तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा ही फायदा।
    पंच चाचा कह रहे हैं- ये समझदार लोग फर्जी फेसबुक आईडी क्यों बनाते हैं? फेस टू फेस बात करो। बिना किसी बात के कोई बात ले बैठे हो। भैसा क्या रखा है- पक्ष और विपक्ष में। सब एक हो जाओ। चारों तरफ हमारा पक्ष ही पक्ष होना चाहिए। फर्जी आईडी से जली-बुझी को हवा देते हो। ट्विटर हो भले फेसबुक इन में कुछ सार नहीं है। कभी कुछ कहते हो कभी कुछ कहते हो। कभी खुद कहते हो, कभी दूसरे-तीसरे से कहलवाते हो। छोड़ो ये सब और अपनी पहुंच का विस्तार करो। किसी को विपक्ष मानो ही मत। कुछ करने से पहले मानना जरूरी है। मन का वहम निकालो और हो जाओ चालू। इतनी गंभीर और ज्ञान की बात को अगर बेसर करना हो तो फेसबुक में खोये रहो। दिन-रात, सुबह-शाम बस फेस बुक ही फेस बुक।
    अब तो भैया अपनी फेक-बुक को छोड़ो, पंच चाचा ने खाना खा लिया है। अब बे चूरी खाते हुए कह रहे है- “हाँ भई भाइड़ो ! फेसबुक से पेट नहीं भरेगा, कुछ खाना होगा। जो होगा देखा जाएगा। अब फेसबुक में बेसी दीदै ना लागाओ। जीमण जीमो और सुपारी-चूरी जो है, खा कर फुल मस्त हो जाओ।”
- नीरज दइया 

18 अगस्त, 2016

मीठी आलोचना का मीठा फल!!

पंच चाचा आज सुबह जल्दी उठ गए और मुझे समझाने में लगे हैं कि अब से जितने भी बड़े-बड़े संपादक, प्रकाशक और पुरस्कार समितियों से जुड़े लेखक-कवि हैं, उनकी किताबों की विस्तार से मीठी-मीठी आलोचनाएं मैं लिखा करूं। उनका कहना है भले इसे दूसरे लेखक प्रशंसा कहे, पर भविष्य में मुझे आलोचना बस मीठी-मीठी और जायकेदार ही लिखनी है।
ऊपरी तौर पर यह सलाह भले कठिन लगे पर इतनी भी कठिन नहीं है कि मानना असंभव हो। फिर इसे मानने से किसी का दम थोड़े ही निकलता है। आलोचना का तो मूलतः स्वभाव ही सामयिक और सोचने योग्य बातों से जुड़ना है। मधुरता को प्रचारित-प्रसारित करना है। यदि रसगुल्लों के लिए प्रसिद्ध शहर बीकानेर में भी रहकर भी मैं मीठी-मीठी आलोचना नहीं लिख सका, तो मेरा यहां रहना बेमानी है। ऐसा करने में लाभ ही लाभ है, यदि आलोचना ज्यादा मीठी हो जाए तो थोड़ी नमकीन खाने की भी सुविधा है।
पंच चाचा का तो कहना है कि जब भी कोई किसी की आलोचना लिखे, साथ में रसगुल्ले और भुजिया लेकर ही बैठना चाहिए। चलते-चलते कलम गलत दिशा में जाने लगे तो झट एक रसगुल्ला मुंह में डालो और कलम को संभालो। और कभी लगे कि मीठे से जी उकता रहा तो भुजिया फाक के स्वाद को पटरी पर ले आओ। पंच चाचा कहते हैं कि जरूरी नहीं हर कहानी संपादक को पसन्द आए और यह भी जरूरी नहीं कि हर किताब पर आलोचक लिखे। भाई संपादक को कोई कहानी पसंद करवाने के लिए कुछ खास तरकीबें हैं और आलोचक को खुश करने के तो बहुत से तरीके हैं।
मैंने कहा कि खास तरकीबों और बहुत से तरीकों से साहित्य का बेड़ा गर्क हो रहा है। अब तो स्वच्छता अभियान चल रहा है। साहित्य में फैलती जा रही गंदगी को अगर आलोचना साफ नहीं करेगी तो कौन करेगा। ये आपकी मीठी-मीठी आलोचना का ही असर है कि हर कोई लेखक-कवि होने का तगमा लगाए घूमता है। ऐसे में एक आलोचना ही है, जिसमें स्व-विवेक से आलोचक को तो बढ़ते रहना है। भाषा जानने-समझने वाले साथी लेखकों-आलोचकों की आलोचना अथवा पाठक-मित्रों के आग्रह से बेखबर। बाखबर यह स्व-विवेक ही है जो किसी आलोचक को स्थापित करता है। यदि मीठी-मीठी आलोचना होती रही तो एक खतरा यह भी है कि अंततः एक दिन ऐसा आएगा जब लोगों का आलोचना नाम से ही भरोसा उठ जाएगा।
पंच चाचा कहां हारने वाले थे, बोले- ‘मीठी आलोचना का मीठा फल!! कभी चखा हो तो जानो। कभी लिखो मीठी आचोलना तब पता चले कि यह मीठा फल क्या होता है। आलोचना लिखना जानते हो तो लेखकों की किताबों में सुंदर-सुंदर भूमिकाएं लिखो, ब्लर्ब लिखो। इससे मधुर संबंध बनते हैं। कभी वे आपके घर मीठा लेकर आते हैं तो कभी आप जाओ मीठा लेकर। इन संबंधों के कारण अनेक बिगड़े या बिगड़ते काम बन जाते हैं। कुछ लोग इसे एक दूसरे के संबंध भुनाना भी कहते हैं। ऐसी बातों से मन खराब नहीं करना चाहिए। हमें बस अपनी किताबें प्रकाशित करवानी है तो जो प्रकाशक करेंगे, उन से हमारे संबंध मधुर होने चाहिए। हमें पुरस्कार चाहिए तो ऐसे निर्णायक ही यह सच्चा और पुनीत कार्य करेंगे जिनसे हमारे संबंध मधुर हो। बिना मधुरता के कुछ भी संभव नहीं भतीजे। कान खोल के सुन ले- यह मधुरता ऐसे नहीं आती है, कई उपाय करने पड़ते हैं। मेरी भतिजियां तो फिर भी नैन-मटका कर के कुछ न कुछ हासिल कर ही लेती हैं पर तू ठहरा खूसट। तुझे मेरी बात माननी ही होगी। तू राजी हो तो ऐसा भी हो सकता है कि तेरी आलोचना के लिए कोई रेट फिक्स कर दूं, मतलब कुछ मीठा-मीठा अग्रिम ले लेते हैं। जैसा जो देने में सक्षम है, उस से वही कुछ लेने में बुराई कहां है। यूं सिर झुकाए मत बैठ। बोल, कुछ तो बोल।’
- नीरज दइया

12 अगस्त, 2016

हियै तराजू तोल के चक्कर में

र बात दो प्रकार की होती है। अंदर की और बाहर की। कहने वाले कहते हैं कि बाहर की बात अंदर जाती है और अंदर की बात बाहर आती है। बात के अंदर-बाहर आने-जाने के कई बार बात बदल जाती है। असली बात बीच राह कहीं खो जाती है। बात चाहे अंदर की हो या बाहर की, मगर बात लगातार होनी चाहिए। बात के समर्थकों का मानना है कि बिना बात के भी बात होनी चाहिए। यह सुन कर मुझे संदेह होता है कि जब बात होगी ही नहीं तब वह अंदर-बाहर कैसे आएगी-जाएगी। बात होती है तब हर जगह की बात अलग-अलग होती है, होनी भी चाहिए। बात पर स्थानीयता का प्रभाव अनेक स्तर पर होता है। किंतु क्या बात नहीं है तब भी ये स्थानीयता पीछा नहीं छोड़ती और दो अलग अलग जगहों पर बिना बात भी अलग-अलग बात संभव होती है। बात का होना या नहीं होना हमारे अंदर-बाहर होने या नहीं होने पर निर्भर करता है। हम एक जगह संतुष्ट नहीं होते इसिलिए कभी अंदर होते हैं और कभी बाहर। जब बात के अंदर होते हैं तब बाहर निकलना चाहते हैं और इसके विपरीत जब हमें बात से बाहर रख दिया जाता है तब बात के ऐन मध्य पहुंच कर नहीं मालूम क्या हासिल करना चाहते हैं।
फिल्म आनंद में राजेश खन्ना जब किसी अनजान आदमी से बात कर सकता है और हम जो जान-पहचान वाले से ही बात करने में कतराते हैं। घर पर कोई सगा-संबंधी आ जाए तो दो-चार सावल-जबाब के बाद सोचते हैं- आगे क्या बात करें? हम इधर-उधर की नहीं मूल बात जानना चाहते हैं कि कोई किस काम से आया है। कभी कहीं आप बिना काम ऐसे ही चले जाएं और यह कह भी दे कि ऐसे ही आ गया मिलने, तो सामने वाला विश्वास नहीं करेगा। उसे अंत तक यही लगता रहेगा कि किसी न किसी काम से ही आप उसके यहां पहुंचे हैं। आज के युग में इतनी जटिलताएं है कि बिना काम के कोई किसी के यहां आता-जाता नहीं। कहीं कहीं तो ऐसा भी है कि कहीं काम हो तो भी समयाभाव है। हम चाह कर भी कहीं आने-जाने में बहुत बार खुद को फसा हुआ पाते हैं और निकल नहीं पाते। इस समय में कोई खाली नहीं। सभी अपने में व्यस्त हैं। कुछ ने व्यस्ताएं ओढ़ रखी है। और कुछ नहीं तो इंटरनेट जो है हमारा बहुत सारा समय खा जाता है। आज जब हम कुछ नहीं, बस समय ही सब कुछ है। मैं सोचता जरूर हूं कि समय पर सही बात करूं पर अक्सर नहीं होता। कुछ समय तो ऐसे सोचते बीत जाता है कि अंदर की बात करूं या बाहर की। बात करता हूं पर बहुत आगे बात का सिरा खो जाता है और सोचने लगता हूं कि बात का आगाज ही गलत कर दिया था। पर मुंह से निकली हुई बात और कमान से निकला हुआ तीर भला वापस कब होते हैं।
‘हियै तराजू तोल के तब मुख बाहर आनी’ के चक्कर में बहुत बार बात तराजू पर तुलती नहीं और मैं चुप रहता हूं। कुछ ऐसे माहिर होते हैं जो बिना बात के भी ढेर सारी बातें कर सकते हैं। मसलन- कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहां रहते हो? घर का मकान है या किराये का? इन दिनों क्या कर रहे हो? नौकरी में गुजारा हो जाता है क्या? बच्चे कितने हैं? बेटियों के लिए कोई लड़का देखा क्या? क्यों जमाना बहुत खराब है? तबियत कैसी है? कोई बीमारी तो नहीं? थके-थके उदास क्यों नजर आते हो? तुम्हारा शर्ट बहुत सुंदर है, कहां से खरीदा? हाथ में अंगूठी शनि की पहन रखी है क्या? क्या तुम ग्रहों पर विश्वास करते हो? अखाबार में सब लोग झूठा राशिफल क्यों पढ़ते हैं? मैं तो भूत-प्रेत को नहीं मानता, तुम मानते हो क्या?
ऐसी ढेर सारी बातें को करने से क्या फायदा जो किसी काम की नहीं हो। जो भीतर हो वहीं बाहर मुख पर होनी चाहिए। बातों के बवंडर को देख पंच चाचा कहते हैं- अंदर और बाहर की बात में फर्क क्यों?