29 फ़रवरी, 2016

नीरज दइया की कविताएं

रिश्ते
आप कहते हैं-
हमें नाकारा-नालायक
काम के नहीं किसी भी
मगर हम, जब भी पुकारोगे
होंगे हाजिर जैसे भी हैं
दूजे कहां से आएंगे?
कहां से लाओगे?
ले भी आए तो
धो देने से नहीं धुलेंगे
रिश्ते हैं जो भी।

जहां कहीं मन लगे
जिस घर में मन लगे
      जहां-कहीं मन लगे
      जीना मन से
            सुख से।

जीना होता है-
      - सुख से रहना
      - दुख भी सुख से भोगना
      - मौन को देखते रहना उत्साह से
      - हर दिन जीना हर्ष से

घर जीने के लिए होता है
बेमन जीना
अपने ही घर में
      मरना होता है।

यदि मरना ही है
      घर मसान क्यों बनें
बदल लें घर- जीने के लिए
      जीना मन लगा कर
जिस घर में मन रमे
      जहां-कहीं मन जमे।

नंगे पैर ऊंट
समय के
पहाड़ पर
संस्कार विहीन ऊंट
घूमता है-
मुंहबाए
अभी तक नंगे पांव।

ठीक ऐसे ही
बिना भाषा के
घूमते हम नंगे पांव।

भाषा है संजीवनी
आप देखते नहीं
या दिखाई नहीं देता आपको।
बिना भाषा के

वस्त्रों के रहते हुए
हम निर्वस्त्र-नंगे।

नित्य तिल-तिल मरते
भीतर ही भीतर
दिन-रात घुट-घुट कर जीते
बोलते ही लड़खड़ाती है जुबान
इसी के रहते तो-
यह हठ किए हैं।

लाइए!
हम मरणासन्नों को भाषा दे दें
भाषा है संजीवनी।
(राजस्थानी से अनुवाद : कवि स्वयं)
“दुनिया इन दिनों” साहित्य विशेषांक-2 में प्रकाशित

22 मार्च, 2015

प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द

कमरे की साफ-सफाई झाड-फौंछ के सिलसिल में हाथ में एक पुरानी डायरी आ गई है। यह संयोग ही है कि जो पृष्ठ मेरे सामने खुला है, उस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द। आगे के पृष्ठ पर एक फूल का अधूरा-सा चित्र बनाने की गई मेरी कोशिश देखते ही हरी हो गई है। पहली पंक्ति- वह उससे आखिरी मुलाकात थी, को पढ़कर एक स्मित भीतर ही भीतर जैसे खिल आई। जैसे कोई पुरानी कहानी जवान हो गई हो। कुछ क्षण पहले सब कुछ सामान्य था, बस पलक झकते ही किसी एक शब्द, चित्र या पंक्ति से बंधा मैं कहां से कहां चला गया।
एक ही बस में हम दोनों एक ही शहर से रवाना हुए थे। उसकी और मेरी मंजिल जुदा-जुदा थी, बस हमारा रास्ता एक था। मेरा शहर उसके रास्ते में आता था। सोचा थोड़ा सफर साथ-साथ रहेगा। मैंने कहा कुछ नहीं बस सोचा था कि यदि वह चाहती तो मेरे यहां रुक सकती थी। आगे दो दिन की छुट्टी थी। उसे या मुझे कोई जल्दी नहीं थी। अब इस पल भी सोचता हूं कि मैंने उससे रुकने का कहा क्यों नहीं। वह रुकती या फिर नहीं रुकती किंतु मुझे कहना तो चाहिए था। पता नहीं रुकने का कहता तो वह रुकती भी या नहीं। कहीं एक डर और संदेह था कि मेरे रुकने का कहने का वह क्या अर्थ लेगी? कोई स्त्री-पुरुष साथ या पास-पास आते ही कहानी जन्म लेती है। कहानी तो कोई भी पास-पास और साथ-साथ आए तो आरंभ होती ही है। हमारे समय में ऐसी मित्रता कठिन है। उसके रुकने का अथवा मेरे इस सोचने का सिरा आप पकड़ कर इस कहानी को कहां से कहां ले जाएंगे। क्या एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्रेम के अतिरिक्ति कोई दूसरा संबंध भी होता है।
उसकी समय की याद एक खुशबू की तरफ अब भी अपने अहसास को लिए जिंदा है। मैं इतने वर्षों बाद अब तक मैं इसे अपनी प्रेम कहानी की तरह संभाले हुए हूं। आज भी लगता है कि वह जख्म हरा है। पीड़ा नहीं, बस कोई सुखद अहसास है जो किसी हवा के झोंके के साथ आया है। वैसे आप जानते हैं कि वर्तमान में जीते हुए, हमारा अतीत में विचरण कभी सुखद और कभी दुखद होता है। मैं अपना काम करते-करते, क्यों सुखद-दुखद जैसी बातें लेकर आत्म-संवाद करने लगा हूं। अभी काम काफी बाकी है। आपका कभी किसी लेखक के कमरे को देखने का अनुभव रहा होगा तो आप जानते होंगे कि कितनी किताबें, पत्र- पत्रिकाएं और भी ढेर सारी सामग्री रहा करती है लेखकों के कमरों में… कोई जरा-सा कागद या पुर्जा भी बेहद जरूरी होता है। किसी कविता की कोई पंक्ति या फिर कहानी की शुरुआत की कुछ पंक्तियां ना जाने कहां कहां लिखी हुई मिल जाती है। हमारे भीतर बहुत सारे नदी-नाले और खिड़कियां-दरवाजे आदी-आदी हुआ करते हैं, जहां से हम जब चाहे-अनचाहे निकलते हैं, और बस खो जाते हैं।
एक समय में एक जीवन के साथ, समांनतर हम अनेक जीवन जिया करते हैं। करने को तो मैं अब भी अपने कमरे को ठीक-ठाक करने का नाटक कर रहा हूं, किंतु खो गया हूं उस कहानी में। मैंने उससे कहा था कि घर पहुंच कर मिस कॉल जरूर करना, और उसका उस रात मिस कॉल आया भी था। वह अच्छे से अपने घर पहुंच गई और फिर कभी नहीं मिली। जरा-सी कोई बात जीवन में खलबली मचा सकती है। एक कोड वर्ड हो सकता है- मिस कॉल वाली। अतीत की यह छोटी-सी कहानी वर्तमान में अनेक कहानियों को जन्म दे सकती है। पत्नी, बेटे-बेटियां और मेरे मित्र, सब के सब अपनी अपनी नजर से इसका पोस्टमार्टम करेंगे।
सच में ऐसी कहानियां जग-जाहिर नहीं करते। बहुत-सी कहानियां पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होती, जैसे- यह प्रेम-कहानी। आप उत्सुक हैं जानने को कि आगे मैं क्या लिखने वाला हूं। हम दोनों किसी एक कार्यशाला के सिलसिले अपने अपने शहरों से रवाना होकर किसी एक शहर में मिले थे। वह देखने में सुंदर और दूसरों से अलग-सी दिखती थी। मेरा उसके प्रति आकर्षण का कारण उसकी सुंदरता या विपरित लिंगी होना नहीं था। हम दोनों के अलग-अलग समूह थे। चाय के वक्त जब मैंने पहली बार उसको देखा और उसकी तरफ देखता रहा, तो इसका कारण उसके हाथ में हिंदी की प्रसिद्ध कथा-पत्रिका का होना था। उसका साहित्य-प्रेम जाहिर हो रहा था। मैं हैरान था कि इस उजाड़ में और हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के आरंभिक दौर को जानने-पहचानने वाले मास्टरों और मास्टरनियों में इक्कीसवी शताब्दी की आधुनिक साहिबा कौन है? मेरा अनुमान ठीक निकला वह कहानी लेखिका थी और उसकी कहानी उस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
अपनी और उसकी कहानी मैं आगे बढ़ाता हूं, किंतु बीच में जो मैंने एक आकलन प्रस्तुत कर दिया है उसके भी स्पष्ट करता चलू। जिससे आपको लगे कि मैं सही हूं। मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। वहां मौजूद जमात से यदि सवाल किया जाए कि हिंदी कहानीकार कौन-कौन? तो जबाब होगा- प्रेमचंद। और उनके लिए प्रेमचंद के आगे-पीछे भी प्रेमचंद। जिनकी दुनिया सूर, कबीर, तुलसी से आरंभ होकर पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी तक पूरी हो जाती हो, वह भला उस कथा-पत्रिका को क्या जानेंगे। उस पत्रिका के बारे में उससे कुछ मित्रों ने पूछा और उन्हें अफसोस हुआ- अरे यह पत्रिका तो प्रेमचंदजी निकाला करते थे, क्या फिर से निकालने लगे? मैं बिना किसी नाटकीय मुद्रा और व्यंग्य के यह सत्य वचन लिख रहा हूं कि हिंदी साहित्य को पढ़ाने वाले समकालीन साहित्य से पर्याप्त सरोकार नहीं रखते। मैं जानता हूं कि आपको भी इस कहानी की नायिका से सरोकार है, कि कैसे-क्या हुआ?
आपको यह जानना अच्छा लगेगा कि मैं जानता हूं कि आपको पता है- आंखें सेकना क्या होता है। यह दोनों तरफ से होता है। चाय के वक्त एक दृश्य बहुत करीब मेरी आंखों के सामने घटित हो रहा था, जिसमें भाई लोग उस कथा-पत्रिका को ले लेकर उलट-पलट कर अपना ज्ञान आलाप कर रहे थे। मैंने एक काम करने की हिम्मत जुटा ली। अपने थेले में से एक पत्रिका निकाली और उस रुपसी को यह कहते हुए दे दी कि मेरी कहानी छपी है। इस उजड़े चमन में यह चुपके-चुपके कोई फिज़ा थी। आश्चर्य कि वहां हिंदी कहानी में अकहानी का दौर कब तक चलेगा… जैसी आवश्यक बहस गर्म थी, और एक साहब तो कह रहे थे कि हिंदी कहानी में प्रेमचंदजी के बाद कोई ढंग का कहानीकार पैदा ही नहीं हुआ। ठीक उस समय हम एक-दूसरे को देख रहे थे! आज इतने लंबे अंतराल के बाद भी मैं उसी जगह जा कर खड़ा हो गया हूं- उसे देखते हुए। थोड़ी देर बाद ही वह मधुर मुस्कान के साथ पत्रिका मुझे लौटाते हुए आंखों ही आंखों में कुछ कहती है। मैं उसका कहना सुनता हूं। अब वह मित्र-मंडली से संबोधित है- प्रेमचंद के बाद… वाह री अकहानी…. उसकी हंसी भीतर गूंज रही है। इस कहानी का यहां कोई सूत्र कस कर हमे एक दूसरे से अब भी जैसे बांधे हुए है।
क्या मैं अब भी उसकी स्मृति में कहीं हूं या यह कोरी मेरी ही स्मृति है जो उसे अब तक बांधे है। आपको यह जादू जैसा नहीं लगता। हम जिसे बांधे बैठे हैं और उसको इसकी खबर नहीं! संबंधों में ऐसा कुछ बीज जैसा होता है कि वह सपना बुनता है। क्या उसकी स्मृति कोई सपना है, जो जड़े फैलाए मेरे भीतर अब भी जिंदा है। आज वह भले ही मुझे भूल गई हो, किंतु जब किसी सूत्र से उसकी स्मृति विगत के उस बिंदु पर पहुंचेगी तब मैं उसके भीतर किसी दृश्य में उपस्थित हो जाऊंगा। मेरी उस उपस्थिति का मुझे भला कैसे अहसास होगा। मुझे इसकी कोई खबर नहीं होगी। बेखबर हमारा ऐसा होना, असल में होना नहीं चाहिए। हम शादी-सुदा ऐसे आकर्षण में अनचाहे बंध गए। हमारी इस कहानी के लिए हमें प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द नहीं मिल सकता। अंतस में कोई दृश्य कहां से कहां पहुंच कर जुड़ जाता है! इस समय भीतर जैसे गीत बज रहा है- प्यार को प्यार रहने दो…. कोई नाम ना दो…. । इस अनाम कहानी का कोई नाम नहीं, फिर भी एक नाम है। घर-परिवार की आत्मीय बातों, किस्सों-कहानियों में जो संबंध का सिरा बना और विकसित हुआ, वह हमारी आखिरी मुलाकात में कहीं पीछे छूट गया। नहीं ऐसा नहीं हुआ, उसका कोई अंश अब भी भीतर बच है। जो कि अब भी लहरा रहा है। उसका लहराना या रोकना मेरे बस में नहीं।
मैंने एक बार सोचा भी था कि हमारी उस मुलाकात पर एक कहानी लिख कर प्रकाशनार्थ भिजवा दूं। किंतु नहीं लिख सका। सोचता हूं कि हमारा मन क्या किसी कागद की तरह होता है कि उस पर कभी कोई पेपरवेट रख दे, और वह हवा में फड़फड़ाता रहे। ऐसा प्रम जो कभी आकार लेता संभव होता दिखता है, उसे दिखाया कैसे जाए? और क्यों दिखाया जाए? दिखने से दूर सदा छुपा कर रखने वाला प्रेम हमे जिंदा रखता है। भले ऐसे प्रेम पर किसी को यकीन हो या नहीं, किसी के यकीन की आवश्यकता भी नहीं। यह है तो बस है। इस प्रेम को अपना नाम नहीं दिया जा सकता, इसलिए उस पृष्ठ पर मैंने उस दिन लिखा था- प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द … फूल का वह अधूरा-सा चित्र बनाया था, जो अब भी कभी-कभार महक उठता है। बस मेरे लिए, जैसे आज अभी-अभी सजीव हो गया हो।
(राजस्थान पत्रिका 22.03.2015)

29 मार्च, 2014

तेरी उम्मीद तेरा इंतजार....

मूल कहानीकार : डॉ. प्रकाश अमरावत
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया
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बीकानेर के डूंगर कॉलेज में राजस्थानी स्नातकोत्तर विभाग की अध्यक्ष डॉ. प्रकाश अमरावत कहानीकार के रूप में अपनी पहचान रखती हैं, वही शोध-संपादन के क्षेत्र में “आजादी री अलख” और “शक्ति लीला सागर” कृतियां उल्लेखनीय कही गई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा नवोदय योजना के अंतर्गत राजस्थानी कहानी संग्रह “हियै रा हरफ” प्रकाशित। आपकी कहानियों में हमारे लोक-जीवन में सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है। प्रस्तुत कहानी में स्त्री के धैर्य, स्वयं को समायोजिय कर लेने के पारंपरारिक विकल्प की सांकेतिक प्रस्तुति मिलती है।


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दफ्तर से सीधे आज मैं मेरे सहकर्मी के घर गया। वह काफी दिनों से वह रट लगाए था कि एक दिन मैं उसके साथ घर चलूं। आखिर आज मन बना ही लिया। दफ्तर से छूटते ही उसके संग हो लिया वर्ना रास्ता ढूंढ़ने में काफी झंझट होता। वह घर पहुंचते ही पहले सीधा भीतर गया और ड्राईंगरूम का दरवाजा खोला। मुझे अंदर आने का संकेत किया तो मैं अंदर पहुंचा और कमरे में इधर-उधर ऊपर-नीचे देखा। शानदार सजावट से लकदक, दीवारों पर लगी तश्वीेरों में लोक-जीवन, पारंपारिक संस्कारों की छवियों के साथ आधुनिकता के मनोहर चित्र सजे थे। पेंटिंग देखकर लगता नहीं था कि ये घर पर ही बनाई गई है, यह तो मेरे पूछने से रहस्य उद्धाटित हुआ वर्ना मेरा अंदाजा कुछ और ही रहता। मैं काफी समय तक उन कला-कृतियों को निहारता रहा। एक कला-कृति पर मेरी नजर जैसे ठहर-सी गई। यह किसने बनाई होगी, क्या इस दृश्य के पीछे कोई कहानी है, क्या शीर्षक हो सकता है... इन सब बातों में खोया मैं उसको देखता रहा। बेहद सहज, स्वभाविक और बोधगम्य। परंतु कितना दर्द संजोये थी वह कलाकृति... उसमें चहरे के भावों में दर्द देख रहा था... हल्के रंगों में भावों की गहराई मुखरित हो रही थी। इसे किसने बनाया होगा ? मेरा सहकर्मी दोस्त चाय-नाश्ते को लिए भीतर आया। टेबल पर ट्रे रखते हुए बोला- "इतनी देर से क्या सोचने में लगे थे... चलो थोड़ा नाश्ता कर लो।"
- "हूं... क्या कहा आपने?" मैं तंद्रा से बाहर आया।
वह बोला- "किस सोच में खो गए....?"
मैंने अपना सवाल दाग दिया- "यह पेंटिंग किसने बनाई है ? मैं तो इसे देखने में ही खो गया... कितना गहरा दर्द छुपा है इसमें। इसको देखकर तो कोई कहानी लिखी जा सकती है।" मेरे इतना कहने पर भी जब कोई जबाब नहीं आया तो मैंने उसके चेहरे पर गौर किया कि उसकी आंखें भर आईं थी। मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा- "क्या हुआ... मैंने तो बस इस तश्वी.र के बारे में कह रहा था...."
वह रुंआसे स्वर में बोला- "यह तश्वी.र भी किसी के जीवन का सच है.. बस और क्या कहूं।" यह तो मैंने भी सोचा था कि इसमें कोई गहरा सच छुपा है पर किसका, मैंने पूछा- "किसके जीवन का सच है और तुम्हारी आंखें नम क्यों हो गई ? बोलो यह किसके जीवन का सच है..."
- "यह मेरी भाभी के जीवन का सच है।"
- "क्या.... !"
- "हां... यार। मैं सच कह रहा हूं। यह दस वर्ष पुराना किस्सा है जब मेरे भाई का विवाह हुआ था। घर में लक्ष्मी जैसी भाभी के आते ही भैया की बैंक में नौकरी लग गई। उनके जीवन में खुशियां ही खुशियां थी और यह देख कर हम सब खुश थे... मां, पिताजी, मेरी बहनें और मैं.....। भाभी ने तो जैसे आते ही पूरे घर का काम-काज संभाल लिया था। समय गुजरता गया और ऐसी संस्कारवार गुणवान बहू पा कर मां-पिताजी निश्चिंत हो गए। मैं बड़े आनंद में था, चाचा जो बनने वाला था। घर में हंसी-खुशी के साथ मजाक मस्ती का माहौल था।"  
एक दिन न जाने वह कौनसी सांझ थी कि भाई साहब बैंक से आए चाय पीने के बाद बोले- “मां मेरे सभी दोस्त सपत्नीक घूमने जा रहे हैं.... जिनकी शादी हुए साल-दो साल हुए उनकी यह विशेष मंडली है। तुम कहो तो तुम्हारी बहू और मैं भी घुमने साथ-साथ चले जाते हैं।”
मां ने समझाया- “बेटा ! बहू ऐसी हालत में कैसे जा सकती है ? कहीं कोई बात हो गई तो लोग कहेंगे- सास की मति मारी गई थी जो ऐसी हालत में बहू को भटकने भेज दिया।”
भाई ने कहा- “मां ! तुम भी किस जमाने की बात लेकर बैठ गई हो। अब तो कदम-कदम पर अस्पताल है और हर जगह साधन-सुविधाएं है.. फिर हम क्या कोई गांव-ढाणियों में थोड़े ही जा रहे हैं ?”
“नहीं बेटा ! मेरा मन नहीं मानता .... मैं बहू को ऐसी हालत में नहीं भेज सकती। तुझे जाना है तो तू जा” और मां के इतना कहने पर घर में किसी की क्या हिम्मत थी। सन्नाटा छा गया तो भाभी ने ही कहा- “आप मन क्यों छोटा करते हैं.. इस बार अकेले अपने साथियों के संग घूम आओ... अगली बार सभी साथ चलेंगे।” ऐसा कहते हुए भाभी ने अपने पेट की तरफ संकेत किया तो भाई साहब के चेहरे की मघुर मुस्कान किसी भी छुप नहीं सकी।
- “पंद्राह दिन लग ही जाएंगे, इसी रविवार को रवाना होना है और पंद्रहवें दिन वापस आ जाऊंगा। ऐसा कहने वाले भाई साहब अपने पंद्राह-बीस दोस्तों के संग उत्तरी भारत के बर्फीले टीलों की सैर के लिए रवाना तो हो गया पर... आज तक नहीं लौटे।”
- “क्यों... क्या हुआ ?”
- “ उनके साथियों से पता चला कि वे साथ थे पर न जाने कहां से रास्ता भटक गए... और लौटे ही नहीं। नजरों से दूर गए किसी की खबर आती है पर उसकी खबर का क्या जो कह कर गया हो कि मेरा इंतजार करना....!!
- “तुम्हारी भाभी...?”
- “उन्होंने समय के साथ समझौता कर लिया है। पास के स्कूल में पढ़ाने जाती हैं और कभी ऐसी पेंटिंग में मन रमाते हुए किसी उम्मीद इंतजार में अब भी वैसी ही हैं... वह जो उस वक्त पेट में था आज दस बरस का होने को आया है.... क्या करें.. ।”
मेरी नजर टेबल पर गई जहां चाय ठंडे पानी जैसी हो चुकी थी। मेरे भीतर स्वर-लहरी की गूंज मैंने महसूस की... कोई बरफीलां धोरां सूं आवै संदेश / जी श्यामा प्यारी ऐ.../ मूमल चालै तो ले चालूं....।
उस कलाकृति को फिर से देख कर भीतर देखने की कोशिश की.... तेरी उम्मीद तेरा इंतजार से बेहतर उस पेंटिंग का नाम मुझसे सोचा नहीं जा सकता था।                                                      
(मूल शीर्षक : उडीक)


02 फ़रवरी, 2014

कोई आवाज सुनाई दी है

राजस्थानी कहानी :  भंवरलाल ‘भ्रमर’
अनुवाद : डॉ. नीरज दइया


“क्या लाऊं सरजी ?”
“एक कप चाय और एक कैवेंडर सिगरेट।”
    नजर चारों तरफ दौड़ाते हुए सरजी ने सिगरेट-कश खींच कर घुंए से गोल-गोल चक्कर बनाने लगे। वह घुंए के बादलों में खो गए। उन्हें स्कूल की बातें याद आने लगी। ओफ्फ यह भी कोई नौकरी है ? रोजना लड़ाई-झगड़ा। कभी टाइम-टेबल का झगड़ा तो कभी ट्यूशन का और कभी परीक्षा का। हेडमास्टर भी साला खुद को खुदा समझता है।
    पिछले तीन-चार दिन रो रोज सिर खाता है कि रिजल्ट सुधारिए.. रिजल्ट सुधारिए। यह क्या मेरे बस की बात है ! लड़कों को पूरा क भी नहीं आता लेकिन आदेश दे देते हैं रिजल्ट अच्छा रहना चाहिए। वे कुछ न कुछ लिखेंगे तभी यह होगा। मैं खाली कापी में तो नम्बर देने से रहा। ऐसे तो देश गर्त में जा रहा है और रसातल में चला जाएगा।
    हुंह ! टारगेट प्रतिशत वाली बात भी सिरदर्दी है। मास्टरों को बांध देते हैं कि इतना तो परिणाम रहना ही चाहिए। नहीं तो वेतन-वृद्धि बंद। तब हमें भी जबरदस्ती नम्बर बढ़ा कर पास करना पड़ता है लड़कों को।
    हेडमास्टर भी कहता है- “सभी का भला हो ऐसा काम ही करना चाहिए, बच्चों का परिणाम अच्छा तो बच्चे खुश और उनके मां-बाप भी खुश। हेडमास्टर खुश और इस्पैक्टर खुश मतलब सभी खुश। हमारा क्या ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य।
    बुद्धि निकल गई है साले की, कहता है कि हमारा क्या लिया ? नहीं पढ़ते अगर बच्चे तो उनका दुर्भाग्य। अरे उनका कैसा दुर्भाग्य ? दुर्भाग्य तो इस देश का है जिसमें ऐसे मास्टर और ऐसे हेडमास्टर हैं।
    मैंने तो जालिम को साफ कह दिया कि मैं कापियों में अंक-वृद्धि नहीं करूंगा। लेकिन आज सभी साथियों के कहने से एक के दस और दो के बीस करने पड़े, रिजल्ट जो सुधारना था। आपसदारी में साथ वालों का तो कहना मानना ही पड़ता है।
    परिणाम सुन कर सभी लड़के हंस रहे थे। हेडमास्टर और स्टाफ भी खुश नजर आ रहा था। परीक्षा-परिणाम सुनने आए अभिभावक भी खुश थे। देखिए परिणाम कितना अच्छा रहा। यहां के मास्टर मेहनती हैं। परंतु मेरा तो कलेजा जल रहा था। घायल की गति घायल जाने, दूसरे किसी को क्या समझ। इस प्रकार जबरदस्ती पास हुए लड़के आगे चलकर देश का क्या भला करेंगे ? यदि यही सब कुछ चलता रहा तो इस देश को फिर से गुलाम होना पड़ सकता है।
    इन बच्चों को जबरदस्ती पास करवा कर उनके साथ भी अन्याय करवाया गया है। स्कूल प्रशासन ने उनकी जिंदगियां बर्बाद की है। इससे बढ़ कर और क्या अपराध हो सकता है ?
    “सर ! चाय लिजिए....।” आवाज सुनकर वह चौंका। चाय की चुस्कियां लेते हुए उसने चारों तरफ गौर किया। पास ही दो-तीन आदमी ऊन की कूटाई वाले आए हुए थे और चाय पी रहे थे। वे आपसी बातों में मशगूल थे। इस कहानी के कथा-नायक सरजी का ध्यान उनकी तरफ चला गया।
“यार तूने वह वूलन मील वाली नौकरी छोड़ कर भूल ही कर दी। वहां मशीनों पर आराम का काम था। अब हाथ में कामड़ी लिए दिनभर माथा-फोड़ी करनी पड़ती है। बंधी-बंधाई नौकरी की कोई होड थोड़े ही होती है।”
    उसने गर्वोन्नत जबाब दिया, “दोस्त मैं दबता क्यों रहूं ? मैनेजर का बच्चा कोई मुझे उधार तोलता है क्या ? पगार फ्री की तो देता नहीं.... बिना काम की गालियां किस बात की सुनता ? मेहनत कर कमता-खाता हूं। हाथ में काम हो तो काम की किसे कमी ? लोग पीछे भाग भाग कर काम करवाते हैं। अब ऊन कूट के कमाई करता हूं तो किसी की सुननी तो नहीं पड़ती ना ?” यह कह कर वह रुक गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था और कानों के पास की नशे तन हुई थी।
    वह आगे बोला, “मैं मेरे हिसाब से जितनी ऊन तोलवाता हूं उतनी कूट कर दे देता हूं। वह यदि गड़बड करेगा या अक्कड़ दिखाएगा तो दूसरे बहुतेरे काम है। काम में सुनना किस बात का। यह तो मैं आठवीं पास हूं। यदि बी.ए. पास होता तो भी क्या हुआ ? इज्जत गिरवी रख कर मैं काम नहीं कर सकता। भला... आत्मा को कोई बेचा जा सकता है।”   
    इन बातों के हवाले मास्टर ने सोचा कि यह एक मजदूर आदमी है, पर कितना स्वाभिमानी है ! कितनी सच्ची बात कहता है। इसे नौकरी की कोई परवाह ही नहीं.. और एक मैं हूं जो जान-बूझ कर भी इतना अधीन हो गया। जैसे समझदारी में रेत गिर गई।
    फिर मन ही मन विचार किया कि यदि मैं नौकरी छोड़ देता तो करता क्या ? मेरे घर तो खाने-पीने का संकट हो जाएगा। इन हाथों को कोई काम करना ही नहीं आता। और अगर थोड़ा कुछ आता भी है तो अब कैसे करूंगा ? मास्टर हूं मैं तो... अच्छा लगेगा क्या ? मन ही मन मुस्कुरा कर वह उठ गए और चाय-सिगरेट के पैसे चुका कर बाहर निकल गए।
००००
राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा ‘सातूं सुख’ कहानी संग्रह के लिए पुरस्कृत भंवरलाल ‘भ्रमर’ का जन्म 22 अक्टूबर, 1946 को बीकानेर में हुआ। आप राजस्थानी नई कहानी के प्रमुख काहनीकारों में से एक हैं, साथ ही राजस्थानी भाषा में कहानी केंद्रित पहली पत्रिका ‘मरवण’ के संपादक भी रहे हैं। आपके तीन मौलिक कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक संपादित कहानी संग्रह और एक उपन्यस प्रकाशित हैं। 

29 दिसंबर, 2013

बेटी के नए जूते

मूल कहानी - मोहन आलोक 
अनुवाद- नीरज दइया
    ‘पापा, आज तो आप की छुट्टी है। मेरे जूते ला दो ना। धूप में पैर जलते है।’ लड़की ने इसे लय के साथ इस प्रकार कहा जैसे कोई लोरी गा रही हो, और उसके सामने आकर खड़ी हो गई।
    आज वास्तव में उस की छुट्टी थी। महीने का दूसरा शनिवार। इस दिन छुट्टी इसलिए होती है कि नौकरी-पेशा आदमी आराम से बाजार जा सके और महीने भर का सौदा-सुल्फ खरीद सके।
    ‘हां बेटी, आज तुमको जूते जरूर दिला दूंगा। आज मेरी छुट्टी भी है। तू ऐसा कर कि तैयार हो जा। मेरे साथ अभी चल चलना, सुंदर देखकर पसंद करना और अपनी नाप के पहन लेना। क्यों, ठीक है ना ?’
    आज उस के मुंह से इस प्रकार दुलार-प्यार बरसता देख कर उसकी पत्नी को बहुत आश्चर्य हुआ। आंगन में झाड़ू लगाते लगाते वह अपनी कमर सीधी करती बोली- ‘आज न जाने किधर से सूर्योदय हुआ है रे छोरी। तेरा तो भाग्य जाग उठा। अच्छे से छांट के पसंद के लेना।’ और मन ही मन सोचने लगी कि चलो छोरी की रोज-रोज की एक झिक-झिक तो बंद होगी।
    पिछले तीन महीनों से लड़की अपने जूतों के लिए बार-बार कह रही थी। उस की मां बार बार कहते कहते थक गई- ‘छोरी बेचारी नंगे पैर जाती है, बेटी के पिता हो कुछ तो दया करो! इसे कोई मंहगे-सस्ते कोई भी जूते या चप्पल तो दिला दो। आप जाकर नहीं दिला सकते तो मुझे रुपये दो मैं दिलाकर लाती हूं।’
    पर वह इस बात को आगे से आगे पर टालता रहा। आज नहीं कल। कहता- ‘लाऊंगा, लाऊंगा... कल जरूर लेता आऊंगा।’ हमेशा उसका यही जबाब होता। कभी-कभी तो कहता- ‘आओ रे बच्चो! आज तुम सब नाप दे दो... आज लौटते हुए अच्छी सी चप्पले लेते आऊंगा।’ नाप लिखा वह कागज आठ-दस दिन तो उसकी जेब में रहता बाद में कहीं गुम हो जाता।
    और बच्चों का गीत बना रहता-
    ‘पापा मेरे जूते लाए?’
    ‘मेरी चप्पल।’
    ‘मेरी जूतियां।’
    शाम को घर पहुंचने पर तीनों बच्चे एक साथ उस को घेर लेते। बाद में साइकिल की टोकरी में देखते, पर वहां कुछ नहीं मिलता। बच्चों का हर रोज इस तरह टोकरी की तरफ दौड़ते आना अर फिर मुंह लटका कर बैठ जाना.... ऐसी बात नहीं कि उसे यह सब दिखाई नहीं देता और वह अंधा भी तो नहीं था किंतु... और इस किंतु के साथ ही उसकी आंखों के आगे थोड़े दिन पहली मिली साढ़े चार हजार पगार के रुपयों का इतिहास घूम जाता। उस में डॉक्टर माया शंकर की दवाइयों के बिलों से लेकर चाय वाले मक्खन सिंह तक की उधारी के लिए लड़ी लड़ाइयों का सारांश यही होता था कि अगले माह की मौहलत। अगली पगार पर कर्ज चुकाने के मियादी संधि प्रस्ताव।
    बच्चों के उदास चेहरे और निराशा में बुझी आंखें उस को घर में आते ही घेर लेती। इन सब से जैसे पीछे छुडाने के लिए ही वह फुर्ती से अपनी साइकिल आंगन में खड़ी करके अपने कमरे में जाते जाते कहता- ‘ना भाई ना, आज नहीं। आज तो मैं दफ्तर से सीधे ही आ गया, बाजार की तरफ गया ही नहीं...। कल जरूर लेते हुए आऊंगा।’
    ‘क्या हुआ, भूल से आए तो... कह तो रहे हैं कि कल जरूर लेते हुए आएंगे।’ उस की पत्नी हमेशा अपने निराश हुए बच्चों को भरोसा बंधाती। फिर दोनों पक्षों की में सुलह करवाती। कहती- ‘कल जरूर याद कर के ले आना। भूलना नहीं।’ और वह बोलते बोलते खुद रुआंसी-सी हो जाती। कारण साफ था कि उस से असलियत छुपी नहीं थी.. और वह कल कभी नहीं आता।
    ‘लो चलो पापा! मैं तैयार हो गई।’ लड़की उसके सामने खड़ी थी। वह जैसे नींद से जगा। उस ने सामने देखा तो वादे के अनुसार लड़की घुली फ्राक और पायजामी पहने कमर के दरवाजे के पास खड़ी थी।
    ‘अच्छा तो तुम तैयार हो।’ उसने बेमतलब का सवाल किया और मन ही मन अपनी जेब की थाह लेने लगा। एक नोट पांच सौ का और एक नोट सौ रुपये का था। उसने सोचा कि इतने काफी होंगे। डेढ़ सौ रुपये से अधिक क्या खर्च होंगे। अधिक से अधिक दो सौ रुपये। इसके आगे तो हद है।
    उस के अनुसार बच्चों के जूतों के लिए दो सौ रुपये की रकम बहुत बड़ी थी। बड़ी क्या काफी पर्याप्त भी। पर इस बड़ी रकम के कारण ही बाजार पहुंच गया और किसी रईशी ठाठ को दिखाते हुए एक जूतों की दुकान में जा कर बैठ गया।
    ‘पहले आपके दिखा दूं या बहन के?’ दुकानदार नम्र वाणी में बोला।
    ‘नहीं, नहीं... आज तो इस बहन के ही। मेरे लिए फिर कभी देखूंगा।’
    सेल्समैन ने लड़की का पैर ‘तिकठी’ पर रखा। उस के नम्बर देखे और फिर सामने के रेक से भांति भांति के जूते, चप्पले और सेंडिल निकाल निकाल कर ढेर लगाने लगा।
    उसने दो-चार जूते लड़की के पैरों में पहना पहना कर वापस निकाल दिए। फिर एक दूर रखे डिब्बे को अपनी तरफ खिसकाया और उसमें से जूते बाहर निकाल कर लड़की के पैरों में पहना दिए। ये जूते कुछ मजबूत लग रहे हैं। दूसरे जूतों की तुलना में इनका तला कुछ मोटा था और ऐड़िया तीन-चार अंगुल ऊंची। फौजी जूतों जैसी इसकी आगे की नोक गोल और मजबूत दिखती थी।
    ‘बाबू जी। आजकल बच्चों के लिए इन्हीं जूतों का फैशन कुछ अधिक है। आप तो यही लें। मुन्नी के पहने हुए अच्छे लग रहे है।’ सैल्समैन ने उसे अपनी राय दी।
    ‘हां पापा, मेरी क्लास में ऐसे जूते दो-तीन लड़कियों के भी है।’ लड़की ने सैल्समैन के सुर में राग मिलाया, और मेरी मंजूरी की आशा लिए अपने पापा की तरफ देखने लगी। लड़की के इस व्यवहार से तो जैसे सैल्समैन अपनी ड्यूटी से ऑफ हो गया। उस ने बिखरे डिब्बों को तनिक दूर सरकाया और जम कर बैठ गया।
    ‘और कुछ दिखलाऊं साहब?’ सैल्समैन जैसे जूतों की खरीद पुखता करने के लिहाज से बोला।   
    ‘नहीं, रुको। इनकी कीमत क्या है?’ उस ने सैल्समैन से पूछा और सोचने लगा कि मंहगाई और दुकानदारों की लूट के मध्यनजर दो सौ रुपये से अधिक क्या लेगा?... उस ने अंदाजा लगाया और सैल्समैन के मुख से ‘दो सौ’ सुनने की उम्मीद करने लगा।
    ‘कीमत? कीमत का क्या है साहब .... आप को क्या बतलाऊं.. बाजार में यह जोड़ी पांच सौ से कम में नहीं मिलेगी। चाहें तो आप ट्राई कर के देख लीजिए। पर आप हमारे पुराने ग्राहक हैं इसलिए आपके लिए कीमत केवल चार सौ पचास रुपये हैं। कल ही बिल्कुल नया स्टाक आया है। आप तो बेफिक्र हो कर ले जाइए। भाव में फर्क आ जाए तो मेरी गारंटी है। बस...।’
    चार सौ पचास का आंकड़ा सुनकर उस के तो मानो कान के सारे कीड़े ही झड़ गए। उसकी आंखें फटी की फटी रह गई।
    ‘चार सौ पचास के नहीं चाहिए, कुछ कम कीमत के दिखलाओ।’ उसने सामने पड़े ढेर की तरफ देखकर, लड़की की तरफ देखा। लड़की तो अपने नए जूते पहने जैसे तैयार हो कर ही बैठी थी, उसे अपने पिता के मन में चल रही द्विगुणित चिंताओं से दस वर्ष की उम्र में क्या सरोकार हो सकता था? वह मस्त और बेफिक्र बैठी थी, बैठी रही।
    लड़की को ऐसे बेफिक्र बैठे देख कर उसे गुस्सा आया। कितनी बेवकूफ लड़की है! बिना मोल-भाव किए ही जूते पहन कर ऐसे बैठी है जैसे इनकी कीमत चुका दी गई हो। किंतु नहीं बैठे तो क्या करे?.... वह बात को हजम कर गया और सैल्समैन से निगाहे बचाकर लड़की की तरफ आंखें निकालते हुए उसने जूते उतारने का इशारा किया। किंतु लड़की तो दुकान की सजावट देखने में खोयी थी। वह क्यों ऐसा ख्याल करती?
    ‘मेरी गारंटी है जी। मैं फिर कहता हूं कि इस से कम कीमत में ऐसे मजबूत जूते आप को पूरे बाजार में कहीं नहीं मिलेंगे। आप बेफिक्र होकर ले जाइए। आप को कोई शिकायत नहीं होगी। आप तो हमारे पुराने ग्राहक है, नहीं तो मैं ये जूते पचास रुपये कम करके नहीं देता।... आप कहें तो इसके साथ जुराब दिखाऊं साहब?’
    ‘नहीं भाई, नहीं। कोई दूसरे जूते दिखाइए। कम कीमत के। लड़की अभी बच्ची है। कल कहीं खो देगी।’ बात अभी पूरी मुंह से भी नहीं निकली थी कि लड़की बीच में ही बोल पड़ी- ‘नहीं पापा, मैं कहीं नहीं खूऊंगी...।’
    लड़की के इस उत्तर से उस का रहा साहा पानी भी एकदम जाता रहा। उसे ऐसा लगा जैसे उसका झूठ पकड़ा गया हो। उसे इस बात का पछतावा हुआ कि उसे कोई दूसरा बहाना गढ़ना चाहिए था। लड़की अपने पापा की इस बात पर जैसे उदास हो गई- एकदम उदास। किंतु जूते उस ने फिर भी नहीं उतारे। एक बार तो उसके जी में आया कि लड़की को झिड़क दे। साफ साफ कह दे कि अपने को नहीं लेने यह जूते। पैरों से बाहर निकाल दे। दूसरी दुकान पर चलेंगे।.... पर लड़की की उदासी और सैल्समैन के लिहाज के आगे उसकी कुछ कहने की हिम्मत जबाब दे गई।
    ‘जुराब दिखलाऊं साहब?’ सैल्समैन ने हिम्मत नहीं हारी।
    ‘नहीं रे भाई... नहीं देखने।’ वह थोड़े गुस्से में बोला और तुरंत खड़ा हो गया। उसे ऐसा लगा कि जैसे वह बैठा रह गया तो जुराबों का खर्च भी साथ चेंठ जाएगा। वह उठा तो लड़की भी उसके पीछे-पीछे धीरे से रवाना हो गई। दुकान के काउंटर पर जा कर उसने अपनी जेब से पांच सौ रुपये का नोट निकाला और दुकानदार को पकड़ा दिया। पचास रुपये वापस उसने सावधानी से जेब में रखे और वह दुकान से बाहर आ गया।
    बाजार से ले कर घर तक सड़क लोगों से भरी हुई थी। उसने घर पहुंचने तक लड़की से कुछ नहीं कहा। संयम रखा किंतु उसके साइकिल चलाने के ढंग और चढ़ी हुई त्यौरियों को देख कर कोई भी कह सकता था कि वह गुस्से में है। ऐसे में जसा-सी बात उसे भड़का सकती है।
    साइकिल के आगले चक्के में हवा बिल्कुल कम थी। सड़क के खड्डों से हिचकोले आ रहे थे और लड़की बार-बार जैसे उछल रही थी। लड़की का मुंह सुर्ख लाल हि चला था और वह बस रोने जैसी हालत में थी। उसने किसी बात की जरा भी कोई परवाह नहीं की, बस वह साइकिल तेज और तेज चलाता रहा।
    घर में प्रवेश कर जैसे ही साइकिल एक तरफ खड़ी की वैसे ही हाथ पकड़ कर लड़की को जैसे नीचे पटक गिराया। उसकी पत्नी आंगन में खड़ी इंतजार कर रही थी। वह उसे साइकिल रखने के ढंग से और लड़की की उठा-पटक की गति से ही समझ गयी कि कुछ तो हुआ जरूर है। बात को सामान्य करने की गरज से वह बाहर निकली और जबरदस्ती हंसती हुयी बोली- ‘देखें तो सही, गुड्डी कितने सुंदर जूते तू लायी है?’
    पत्नी को इस प्रकार खुशी प्रगट करते देख उसका गुस्सा और भड़का। जैसे जलते में किसी ने घास की ढेरी गिरा दी हो। लड़की अभी गुमसुम नीचे गिराई वहीं जमीन पर साइकिल के पास खड़ी थी।
    ‘लायी है मां रांड का सिर...।’ वह जोर से चीखा और फिर एक जोरदार थप्पड़ लड़की के गाल पर जड़ दिया।.... ‘पैरों में पहनने के बाद वापस उतारने का नाम ही नहीं लिया।... ’ उसने जाड़ भींची और दूसरा हाथ हवा में उछाल दिया।
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मूल राजस्थानी कहानी ‘बाप’ (पिता) नाम से राजस्थानी मासिक माणक के दिसम्बर 1989 अंक में प्रकाशित हुई, जिसे ‘मोहन आलोक री कहाणियां (संचै नीरज दइया)’ 2010 में में संकलित किया गया। बाजारवाद पर केंद्रित इस अनुपम कहानी में अनुवादक ने रुपयों के हलावे में एक शून्य की वृद्धि कर इसे समसामयिक बनाने का प्रयास मूल लेखक की अनुमति से किया है।