13 सितंबर, 2025

मछली काहे नहीं खाते.../ डॉ. नीरज दइया


बहुत पहले कहीं पढ़ा या सुना था कि एक हवाई जहाज में दो दोस्त सफर कर रहे थे। सफर लंबा था और बातचीत के लिए विषय कम पड़ रहे थे तो एक ने मजाक ही मजाक में पूछा- 'डू यू लाइक फिस?' सामने वाले ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उस समय तो यह बात हवा में उछल गई, लेकिन जिसने पूछा था, उसने इस उत्तर को बड़ी गंभीरता से ले लिया। दोस्ती में कई बार एक छोटी-सी बात दिल के कोने में टिक जाती है और फिर वक्त आने पर वह असली रूप दिखाती है। कुछ दिन बाद वही दोस्त अपने साथी को डिनर पर बुलाता है। पूरा इंतज़ाम किया गया, बड़ी तैयारी से मछली बनाई गई। जब थाली सामने आई और महकदार नॉनवेज की खुशबू फैली तो मेहमान का चेहरा अचानक बदल गया। वह घबराकर पीछे हट गया और बोला- 'भाई, मैं तो प्योर वेजीटेरियन हूं।' अब जिसने इतना मन लगाकर मछली बनाई थी, उसकी हैरानी देखिए। उसने तुरंत कहा- 'अरे! तुमने ही तो कहा था। यू लाइक फिस।' इस पर मेहमान हँसते-हँसते लोटपोट हो गया। बोला- 'भाई साहब! मुझे मछली देखना पसंद है, एक्वेरियम में। खाना नहीं।' 

यह किस्सा मुझे हमेशा याद दिलाता है कि ‘पसंद’ शब्द का अर्थ हर किसी के लिए अलग होता है। किसी को देखना अच्छा लगता है, किसी को खाना। किसी के लिए मछली तैरते हुए सुंदरता का प्रतीक है, तो किसी के लिए थाली का स्वाद। यह फर्क ही दुनिया को रोचक और विविध बनाता है।

मैं जब राजस्थान से बिहार आया तो इस किस्से की याद और भी गहरी हो गई। राजस्थान में शाकाहारी भोजन और मिठाइयों का अपना दबदबा है। मेरा बीकानेर तो भुजिया और नमकीन के लिए बहुत प्रसिद्ध है। अब तो गांव-कस्बों से लेकर शहर तक पनीर, दाल-बाटी-चूरमा और तरह-तरह की राजस्थानी सब्जियां ही घर-घर का स्वाद हैं। नॉनवेज खाने वाले भी मिलते हैं, लेकिन बहुतायत में नहीं। वहां नॉनवेज कुछ खास मौकों पर ही पकाया जाता है और कई बार लोग इसे छुपाकर खाते हैं, ताकि सामाजिक आलोचना न हो। बीकानेर राजस्थान के पुष्करणा ब्राह्मण तो लहसुन प्याज से भी परहेज करते हैं, लेकिन इसमें कुछ अपवाद भी हो सकते हैं।

मैंने बिहार आकर देखा कि यहां तो नॉनवेज खानपान का मुख्य हिस्सा है। एक सामान्य-सी दावत में भी नॉनवेज का प्रबंध ऐसे किया जाता है, जैसे बिना उसके जश्न अधूरा हो। 

एक बार दफ्तर में पार्टी का आयोजन हुआ। सभी कर्मचारियों से भोजन की चॉइस पूछी जा रही थी। मेरे लिए यह एक नया अनुभव था। पार्टी यानी पार्टी, उसमें चॉइस पूछने का कभी अनुभव नहीं रहा। यहां मैं यह देख कर चौंक गया सभी स्टाफ के सदस्यों के नाम के आगे कलम बने हुए हैं, जिसमें आपको वेज और नॉनवेज दोनों में से किसी एक पर टिक लगाना है ताकि उसकी अनुरूप व्यवस्था की जा सके। मुझे लगा कि अधिकतर लोग वेज ही चुनेंगे, पर यह देखकर हैरानी हुई कि अधिक लोगों ने नॉनवेज कॉलम में टिक किया है। उन सब ने मिलकर तय किया कि क्या बनाना है- मटन, चिकन या फिश। हर किसी की अपनी पसंद थी किंतु बहुमत के आधार पर बीस किलो मटन बनाया गया। उस अगुवाई करने वाले मित्रों का कहना था कि नॉनवेज की ऐसी शानदार व्यवस्था करेंगे कि खाने वाले खाते खाते थक जाएंगे। जो लोग वेजिटेरियन थे, उन्हें पहले खाना मटर पनीर इस मजाक के साथ खिला दिया गया कि मटन और मटर पनीर की राशि एक ही है। राशि में छुपे श्लेष पर मित्र खुश हो रहे थे। इसी ज्ञान के मित्रों ने हमारी मंडली को मूर्ख मानते हुए उस दिन बड़े शौक से नॉनवेज खाया-खिलाया। 

यह खुलापन और सहजता मेरे लिए नई बात थी। राजस्थान में लोग अपनी खाने-पीने की पसंद को छुपाते हैं, यहां लोग बड़े गर्व से कहते हैं- 'यस भाई, हम नॉनवेज खाते हैं। पीने का इंतजाम भी कर सकते हैं। वैसे यहां शराबबंदी है फिर भी आपके आदेश की पालना हो जाएगी।'

मित्र प्रभात मिलन से मुलाकात जमालपुर में हुई थी। वे बहुत अच्छे अनुवादक हैं और साहित्य के गहरे रसिक-पाठक भी। जमालपुर में मारवाड़ियों का एक पूरा इलाका है। वे वहीं रहते हैं। खाने-पीने को लेकर उनकी राय बड़ी मजेदार थी। वे हँसते हुए कहते- 'अगर हम नॉनवेज न परोसें तो लोग मानेंगे ही नहीं कि हमने तुम्हें भोजन कराया।' यह सुनकर मुझे हमेशा हँसी आती थी। मानो नॉनवेज परोसना ही मेजबानी का असली सबूत हो। यह बात उन्होंने मजाक में कही थी, लेकिन उसमें एक गहरी सच्चाई भी छिपी है। समाज में कई बार खान-पान का स्तर ही मेजबानी की कसौटी बन जाता है। उनके यहां का लजीज मारवाड़ी भोजन दो-तीन बार करने का स्वाद और आनंद आज भी नहीं भूला हूं। 

इसी सिलसिले में एक और प्रसंग का स्मरण होता है। मैं एक साहित्यिक कार्यक्रम में गया तो देखा- एक बड़ी प्लेट में सभी आगंतुकों को उबले हुए अंडे की पेशकश की जा रही है, और लोग बड़े मजे से उनका सत्कार स्वीकार कर रहे हैं। नमक मिर्च के साथ उनका बड़े आनंद से मुदित होते देखना मेरे लिए अद्भुत था। ऐसा मैंने पहले जीवन में कभी-कभी नहीं देखा था। 

मुंगेर में मेरे कवि मित्र शहंशाह आलम के घर ईद पर जाने का अवसर मिला। वहां मीठी सवैयां खिलाई गईं, जो बेहद स्वादिष्ट थीं। बातें करते हुए उन्होंने भी मजाक में कहा- 'कभी कभार तो नॉनवेज लेते होंगे।' जामालपुर मुंगेर से बिहटा पटना आ गया, तब भी पाया कि नॉनवेज ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। बिहार में नॉनवेज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। चाहे शादी हो, त्योहार हो या सामान्य मिलन-मुलाकात, नॉनवेज की मौजूदगी एक तरह से अनिवार्य मानी जाती है। एक-दो अवसरों पर तो लिट्टी चोखा भोजन में था और चोखा को देखकर मुझे अंदेशा हुआ कि यह नॉनवेज है। यहां मैंने धीरे-धीरे यह महसूस किया कि खान-पान केवल पेट भरने का साधन नहीं है। यह संस्कृति, आदत और परिवेश का आईना है। राजस्थान में पनीर, केर, सांगरी, गट्टा आदि को शान समझा जाता है। अगर शादी-ब्याह में ये सब नहीं हो तो लोग कहते हैं- 'भाई, खाना अधूरा रहा।' वहीं बिहार में यही बात नॉनवेज के लिए कही जाती है। अगर दावत में मटन या फिस-चिकन न हो तो लोग मानते हैं कि असली स्वाद अधूरा रह गया।

कुछ ट्रेन के सफर में भोजन की सुविधाएं हैं। वहां भी विविधता देखने को मिलती है। सबकी अपनी अपनी पसंद। भारतीय रेलवे के भोजन पर अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि वह महंगा है। टिकट का किराया पहले ही इतना अधिक होता है कि यात्री सोचते हैं, कम से कम खाने में तो कुछ अच्छा मिले। अब यात्री मजाक में कहते हैं कि रेलवे के महंगे टिकट का “कंपनसेशन” यही है कि भोजन में नॉनवेज खा लिया जाए। ऐसा लगता है कि महंगे टिकट की कीमत तभी वसूल होती है जब खाने में मटन या चिकन मिले। दूसरी ओर, ट्रेन में मिलने वाला पनीर अक्सर निराश कर देता है। कई लोग कहते हैं- 'इससे तो घर का साधारण खाना ही अच्छा है।' भारतीय रेल के भोजन को लेकर लोग चाहे जितनी शिकायत करें, यह तय है कि सफर के दौरान खाना भी एक अनुभव बन जाता है।

मेरे अपने अनुभवों ने मुझे यह सिखाया है कि स्वाद की कोई सार्वभौमिक परिभाषा नहीं होती। यह पूरी तरह व्यक्ति की पसंद, परवरिश और संस्कृति पर निर्भर करता है। कोई पनीर को राजा मानता है, तो कोई मछली को असली मोती। कोई बिना नॉनवेज के दावत अधूरी मानता है, तो कोई प्योर वेज होकर भी हर स्वाद का आनंद केवल दूसरों को खाते देख कर लेता है। और कोई ऐसा भी है, जो कहता है- 'भाई, मछली हमें बस तैरते हुए अच्छी लगती है, थाली में नहीं।'

कई बार लगता है कि खान-पान को लेकर लोगों की सोच उनके व्यक्तित्व का भी हिस्सा बन जाती है। कोई नॉनवेज खाता है तो उसमें एक बेफिक्री और खुलापन नजर आता है। वह कहता है- 'हां, मुझे यह पसंद है और मैं इसे छुपाकर नहीं खाऊंगा।' वहीं शाकाहारी लोग भी अपनी पसंद पर उतने ही गर्व से टिके रहते हैं। वे कहते हैं- 'भाई, हमें यह अच्छा नहीं लगता, चाहे लोग कुछ भी कहें।' दोनों ही दृष्टिकोण अपने-अपने तरीके से सशक्त हैं।

मेरे एक परिचित ने एक बार बड़ी रोचक बात कही। बोले- 'देखो, नॉनवेज खाना सिर्फ स्वाद का मामला नहीं है, यह एक तरह की सोच भी है। जो मटन खाता है, वह जिंदगी को मसालेदार समझता है, और जो पनीर खाता है, वह जिंदगी को संतुलित।' उनकी यह बात सुनकर मैं हँस पड़ा। लेकिन सच मानिए, उसमें भी थोड़ी बहुत सच्चाई थी। स्वाद केवल ज़ुबान पर नहीं, सोच पर भी असर डालता है।

मैंने यह भी देखा है कि नॉनवेज को लेकर कई मिथक चलते हैं। कोई कहता है कि यह ताकत बढ़ाता है, कोई कहता है कि यह सेहत के लिए अच्छा नहीं। लेकिन हकीकत यह है कि खाना चाहे कोई भी हो, अगर संतुलन से खाया जाए तो वही शरीर और मन दोनों को तृप्त करता है। खाने-पीने की पसंद पर विवाद करना बेकार है। यह वैसा ही है जैसे कोई यह तय करने निकले कि गुलाब का फूल अच्छा है या चमेली का। 

मेरे लिए बिहार यात्रा केवल खान-पान का अनुभव नहीं रही, बल्कि जीवन के उस सत्य की झलक रही जिसमें विविधता ही असली स्वाद है। राजस्थान की शाकाहारी थाली से लेकर बिहार की नॉनवेज दावत तक, रेलवे के पनीर से लेकर दोस्तों की मेहमाननवाजी तक- हर जगह यही सीखा कि भोजन केवल थाली का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्कृति, आदत, रिश्ते और जीवन का उत्सव है। और आखिर में वही सवाल मुस्कुराकर मन में उठता है, मेरा एक स्नेही मुझे अनेक अवसरों पर पूछता रहता है- 'सर, आप मछली काहे नहीं खाते हैं?'

डॉ. नीरज दइया

12 जुलाई, 2025

गुड़लिपटी बात/ डॉ. नीरज दइया

पति ने पत्नी को समझाते हुए कहा, "तुम जरा मम्मी जी से अच्छे से बात किया करो।"

पत्नी ने पूछा, "अच्छे से का क्या मतलब है, मैं तो हमेशा अच्छे से ही बात करती हूं।"

पति मुस्कुराया और बोला, "नहीं, जैसे तुम मुझसे बात करती हो..."

"तुम से कैसे बात करती हूं मैं?"

"गुड़लिपटी बात करती हो न तुम मुझसे। मेरी स्वीट हनी।"

"वो तो जैसे का तैसा है। आप जैसे बात करोगे, वैसा ही आपको जवाब मिलेगा। यह मुझे मम्मी जी को सीखना है।"

बेटा बेचारा क्या करे। हारकर उसने कहा, "देखो समझा करो, थोड़े दिनों की ही तो बात है।"

पत्नी चुप कहां रहने वाली थी। उसने पूछा, "थोड़े दिन बाद क्या होगा?"

बेटे ने कहा, "बुढ़िया मर जाएगी।"

बहू के चेहरे पर मुस्कान थी।

● डॉ. नीरज दइया

06 जून, 2025

युद्ध निरंतर/ नीरज दइया

 डर बना हुआ है
फिर भी- जीवन चल रहा है...

भारत-पाकिस्तान, चीन-ताइवान
और रूस-नाटो के बीच
कभी भी कुछ भी हो सकता है
डर बना हुआ है
फिर भी- जीवन चल रहा है...

यह डर केवल बाहर नहीं
कुछ अधिक है- भीतर...
बाहर से अधिक है- भीतर
देश-दुनिया की बात छोड़ दीजिए-
घर में भी जारी है- शीतयुद्ध
भाई-भाई में जंग जारी है...

यह जंग नहीं तो भला क्या है...
अब खून के रिश्तों में भी
घर कर चुका- जंग
जो बहुत कोमल थे
और जो बहुत मुलायम थे
वे अब हैं- एकदम कठोर
पत्थर जैसे संवेदन-शून्य
और लोहे से भी अधिक सख़्त
बंद है कपाट!
युद्ध जारी है... निरंतर।


 

05 जून, 2025

नीरज दइया की कविताएं

 अंजाम
=====
सत्य वचन है श्रीमान
यूज एंड थ्रो आइटम हूं मैं
यह बाजार है श्रीमान
मुझे यूज करें.... 
जानता हूं मैं
मेरा अंजाम
फिर भी कहता हूं-
श्रीमान! यूज करें मुझे.. 
‘थ्रो’ से पहले
क्या यह स्मृति काफी नहीं
‘यूज’ किया गया मैं
श्रीमान के द्वारा!
००००
अधूरी कहानी
=====
चलता जा रहा हूं मैं 
जैसे चलती है पेन की रिफिल
लिखता जा रहा हूं मैं
जैसे कोई कहानी....
और एक दिन 
यानी किसी आखिरी दिन
पेन से नहीं लिख सकूंगा मैं 
कैसे करूंगा पूरी कहानी...
०००० 
निवेदन
=====
जीवन के दो छोर हैं-
‘यूज’ और ‘थ्रो’।
मेरे ‘यूज’ में तुम साथ रहे,
‘थ्रो’ से ठीक पहले 
नजर बचा के निकल जाना
थोड़ी देर के लिए ही सही
मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकूंगा।
००००
एक जैसी बातें नहीं
=====
‘यूज’ किया तुमने मुझे
‘यूज’ हुआ मैं तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुमने मुझे ‘थ्रो’ किया
मैं ‘थ्रो’ हुआ तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुम्हें भ्रम है
मुझे भी भ्रम है
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
तुमने मुझे प्रेरणा दी
मैंने तुमसे प्रेरणा ली
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
००००
तिल भर जगह
=====
किसे बचा कर रखूं
क्या बचा कर रखूं
रखने को कोई कोना नहीं मेरा
यहां तिल भर जगह भी नहीं है मेरी
सब कुछ है तुम्हारा....
०००


 

02 जून, 2025

अनुसिरजण- च्यार पोलिश कवितावां

 मूल कवि- काज़िमिएरज़ बुर्नात (पोलैंड)

राजस्थानी अनुवाद- डॉ. नीरज दइया
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कवि परिचै - काज़िमिएरज़ बुर्नात रो जलम 1 जुलाई, 1943 डुनाजेक नदी रै कांठै बस्यै स्ज़ेपनोविस गांव मांय हुयो। व्रोकला यूनिवर्सिटी सूं आपरी भणाई हुई। पोलिश कवि, निबंधकार, अनुवादक, पत्रकार, आलोचक अर संस्कृतिकर्मी पेटै आप रो नांव जगत ओळखीजतो। आपरी 23 कविता-पोथ्यां नै 50 सूं बेसी दूजी पोथ्यां छप्योड़ी। रचनावां रो चेक, यूक्रेनी, बेलारूसी, रूसी, स्लोवेनियाई अर हंगेरियन समेत देस-विदेस री 44 भाषावां मांय अनुवाद हुयोड़ा। आप सौ नैड़ी पोथ्यां रो संपादन करियो नै इण सूं बेसी पोथ्यां री भूमिकावां लिखी। आप 370 सूं बेसी संकलनां अर मोनोग्राफ रै सहलेखक रूप ई रैया। केई साहित्यिक कार्यशालावां रा मार्गदर्शक अर पुरस्कारां रा निर्णायक ई रैया। राष्ट्रीय अर अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जलसां रो आयोजन अर सहभागी रैवण री लिस्ट लांबी। पोलानिका-ज़ड्रोज में ‘पोएट्स विदाउट बॉर्डर्स’ नांव सूं अंतरराष्ट्रीय कविता महोत्सव रो आयोजन आप कारिया करै। यूक्रेन रा लेखक संघ सूं सांस्कृतिक आयोजना मांय लांठी भागीदारी। यूक्रेनी साहित्य रै प्रचार-प्रसार खातर सम्मानित हुयोड़ा। राज्य, मंत्रालय अर प्रादेशिक स्तर रा केई पुरस्कार मिल्योड़ा, जिण में ‘ग्लोरिया आर्टिस’ रो सिल्वर मेडल जैड़ो नामी तगमो ई भेळो। बरस 2019 रो जारोस्लाव पुरस्कार, बरस 2022 रो लोअर सिलेसियन पुरस्कार, बरस 2023 रो संस्कृति मंत्रालय रो पुरस्कार अर शब्दगुच्छ अंतरराष्ट्रीय कविता पुरस्कार (यूएस/ बांग्लादेश) सूं आदरीज्या थका। पोलानिका-ज़ड्रोज रा मानद नागरिक। बरसां ‘डायसोनांस’ साहित्य समूह रा उपाध्यक्ष, फेर अध्यक्ष ई रैया। ‘बेज़ कुर्तिनी’ पत्रिका रा आप प्रधान संपादक।
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1. अचरज
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आडो अजेस बाजै
अर अथाह पवित्रता बिच्चै
कल्पना रा बूंटा आगूंच पांगरै।

खिड़कियां री सेरियां मांय सूं सुर
बायरै मांय पांख्यां री फड़फड़ाहट,
बागां री राजकंवरियां घोळै रंगां मांय खिलै।

एक चावना उण रै कळजै रड़कै–
बिदाम री
पण रोसणी मांय सोवणी आंख्यां–
उण नै नींद मांय डूबण सूं बरजै।

जूण तो बस पाणी रै एक टोपै दांई,
कांठां डूबीजणो ताबै बारै-
तो सा इण रै सार नै समझो–
अर सागर पूग्या हो तो
आणंद लेवणो ई समझो।
०००

2. बा ओळूं महकै
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मा,
म्हनै चेतै है-
फसलां अर परसेवै री खुसबू
हंसिया सूं कटती
नाज री लहरां,
तूफान सूं ढळक्यां खेतां।

टूटोड़ी चाक्की रो हथ्थो,
भारी पाट भाठां रा,
गूगळी रोसणी बाती री,
आधी काची आधी पाकी
अंधारै मांय बणती रोटी।

थूं म्हारै अंतस थरप्यो  
मैनत रो बीज,
जिको म्हरै साथै पांगरियो
जद-जद म्हैं भाळूं चाकी
सैंठा पगां बगतो रैवूं
थारै हाथां रो निवास
अबै उत्तो नीं लखावै
पण अजेस–
म्हारो संबल है थूं,
म्हारै अतंस
मा बसै है थूं।
०००

3. देवदूत
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रंग-रंगीलो घर रो बाग
दिन अबै जाग्यो है–
भवरां री गूंज सूं।
अर जीसा पैली सूं ही छगाई करै
टाबर पुळा बांधै
ललाट रै परसैवै नै
हथाळी सूं पूंछता
फेर थोड़ी बिसाई–
उभराणा पगां,
लीली घास माथै,
रूंखा री छियां हेठै।

आरती री घंट्यां बोल
बुलावै अरदास खातर
अर मा रोटी अरोगरण खातर
बाखळ ऊभी उडीकै

तप तप तावड़ै
एक मटमैली मिनकी
हुयगी राती,
उण रै नजीक एक पड़छियां
एक भोळै बाळ गोपाळ री
जिण रै मन-आंगणै
बाजै बाजा।
०००

4. सियाळै रै दिनां सूं पैली
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थकावट री होळै होळै होवै सरणाट,
फव्वारा रै लहरकां दांई साथै बगै
कैलेंडर होवतो जावै ओछो अर ओछो
पानी उमटीजै
अर फेर बरसां री धार मांय हालै–
जियां सूखो पानड़ो
तूटयां दरखत सूं
जड़ां रै नजीक री दरारां मांय
मढाई करियोड़ो जाळ मकड़ी रो–
साव पतळी डोर सूं

पण लिंडन री पांखड़ियां
अजेस ई उड़ै–
बायरै सूं  ढळाण माथै

सायत अबार बगत कोनी
सियाळै रो
जिको चक्कू सो चमकै

सिंझ्या आं दिनां चमकै है।
०००
राजस्थानी अनुवाद- डॉ. नीरज दइया