02 जून, 2025

अनुसिरजण- च्यार पोलिश कवितावां

 मूल कवि- काज़िमिएरज़ बुर्नात (पोलैंड)

राजस्थानी अनुवाद- डॉ. नीरज दइया
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कवि परिचै - काज़िमिएरज़ बुर्नात रो जलम 1 जुलाई, 1943 डुनाजेक नदी रै कांठै बस्यै स्ज़ेपनोविस गांव मांय हुयो। व्रोकला यूनिवर्सिटी सूं आपरी भणाई हुई। पोलिश कवि, निबंधकार, अनुवादक, पत्रकार, आलोचक अर संस्कृतिकर्मी पेटै आप रो नांव जगत ओळखीजतो। आपरी 23 कविता-पोथ्यां नै 50 सूं बेसी दूजी पोथ्यां छप्योड़ी। रचनावां रो चेक, यूक्रेनी, बेलारूसी, रूसी, स्लोवेनियाई अर हंगेरियन समेत देस-विदेस री 44 भाषावां मांय अनुवाद हुयोड़ा। आप सौ नैड़ी पोथ्यां रो संपादन करियो नै इण सूं बेसी पोथ्यां री भूमिकावां लिखी। आप 370 सूं बेसी संकलनां अर मोनोग्राफ रै सहलेखक रूप ई रैया। केई साहित्यिक कार्यशालावां रा मार्गदर्शक अर पुरस्कारां रा निर्णायक ई रैया। राष्ट्रीय अर अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जलसां रो आयोजन अर सहभागी रैवण री लिस्ट लांबी। पोलानिका-ज़ड्रोज में ‘पोएट्स विदाउट बॉर्डर्स’ नांव सूं अंतरराष्ट्रीय कविता महोत्सव रो आयोजन आप कारिया करै। यूक्रेन रा लेखक संघ सूं सांस्कृतिक आयोजना मांय लांठी भागीदारी। यूक्रेनी साहित्य रै प्रचार-प्रसार खातर सम्मानित हुयोड़ा। राज्य, मंत्रालय अर प्रादेशिक स्तर रा केई पुरस्कार मिल्योड़ा, जिण में ‘ग्लोरिया आर्टिस’ रो सिल्वर मेडल जैड़ो नामी तगमो ई भेळो। बरस 2019 रो जारोस्लाव पुरस्कार, बरस 2022 रो लोअर सिलेसियन पुरस्कार, बरस 2023 रो संस्कृति मंत्रालय रो पुरस्कार अर शब्दगुच्छ अंतरराष्ट्रीय कविता पुरस्कार (यूएस/ बांग्लादेश) सूं आदरीज्या थका। पोलानिका-ज़ड्रोज रा मानद नागरिक। बरसां ‘डायसोनांस’ साहित्य समूह रा उपाध्यक्ष, फेर अध्यक्ष ई रैया। ‘बेज़ कुर्तिनी’ पत्रिका रा आप प्रधान संपादक।
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1. अचरज
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आडो अजेस बाजै
अर अथाह पवित्रता बिच्चै
कल्पना रा बूंटा आगूंच पांगरै।

खिड़कियां री सेरियां मांय सूं सुर
बायरै मांय पांख्यां री फड़फड़ाहट,
बागां री राजकंवरियां घोळै रंगां मांय खिलै।

एक चावना उण रै कळजै रड़कै–
बिदाम री
पण रोसणी मांय सोवणी आंख्यां–
उण नै नींद मांय डूबण सूं बरजै।

जूण तो बस पाणी रै एक टोपै दांई,
कांठां डूबीजणो ताबै बारै-
तो सा इण रै सार नै समझो–
अर सागर पूग्या हो तो
आणंद लेवणो ई समझो।
०००

2. बा ओळूं महकै
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मा,
म्हनै चेतै है-
फसलां अर परसेवै री खुसबू
हंसिया सूं कटती
नाज री लहरां,
तूफान सूं ढळक्यां खेतां।

टूटोड़ी चाक्की रो हथ्थो,
भारी पाट भाठां रा,
गूगळी रोसणी बाती री,
आधी काची आधी पाकी
अंधारै मांय बणती रोटी।

थूं म्हारै अंतस थरप्यो  
मैनत रो बीज,
जिको म्हरै साथै पांगरियो
जद-जद म्हैं भाळूं चाकी
सैंठा पगां बगतो रैवूं
थारै हाथां रो निवास
अबै उत्तो नीं लखावै
पण अजेस–
म्हारो संबल है थूं,
म्हारै अतंस
मा बसै है थूं।
०००

3. देवदूत
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रंग-रंगीलो घर रो बाग
दिन अबै जाग्यो है–
भवरां री गूंज सूं।
अर जीसा पैली सूं ही छगाई करै
टाबर पुळा बांधै
ललाट रै परसैवै नै
हथाळी सूं पूंछता
फेर थोड़ी बिसाई–
उभराणा पगां,
लीली घास माथै,
रूंखा री छियां हेठै।

आरती री घंट्यां बोल
बुलावै अरदास खातर
अर मा रोटी अरोगरण खातर
बाखळ ऊभी उडीकै

तप तप तावड़ै
एक मटमैली मिनकी
हुयगी राती,
उण रै नजीक एक पड़छियां
एक भोळै बाळ गोपाळ री
जिण रै मन-आंगणै
बाजै बाजा।
०००

4. सियाळै रै दिनां सूं पैली
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थकावट री होळै होळै होवै सरणाट,
फव्वारा रै लहरकां दांई साथै बगै
कैलेंडर होवतो जावै ओछो अर ओछो
पानी उमटीजै
अर फेर बरसां री धार मांय हालै–
जियां सूखो पानड़ो
तूटयां दरखत सूं
जड़ां रै नजीक री दरारां मांय
मढाई करियोड़ो जाळ मकड़ी रो–
साव पतळी डोर सूं

पण लिंडन री पांखड़ियां
अजेस ई उड़ै–
बायरै सूं  ढळाण माथै

सायत अबार बगत कोनी
सियाळै रो
जिको चक्कू सो चमकै

सिंझ्या आं दिनां चमकै है।
०००
राजस्थानी अनुवाद- डॉ. नीरज दइया



06 जनवरी, 2025

तीन प्रेम कविताएं/ नीरज दइया


1.
पारस पत्थर है प्रेम
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पारस पत्थर है प्रेम
वह नहीं मिलता उसे
जो खोजता है....

इस संसार में
है हर किसी के पास-
पारस पत्थर....

वह दिया नहीं जा सकता है,
मांग कर भी-
लिया नहीं जा सकता है।
००००

2.
पर्याप्त प्रेम
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प्रेम में सफल होने का अभिप्राय
मेरे लिए बस इतना है
कि दो दिल
ठीक उसी तरह आएं करीब
जैसे आते हैं करीब
किसी समय किसी वेग से दो पत्थर
और जन्म लेती है- चिंगारी
वैसे ही....
हां, ठीक वैसे ही.....
अगर दिख जाए कहीं प्रेम
किसी चिंगारी सरीखा
मेरे लिए पर्याप्त है....
उसे संभाले रखूंगा मैं
उसी की स्मृति में
सफल होगा- वह प्रेम।
००००

3.
विरह को चुनना
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प्रेम में यदि चुनना हो
तो विरह को चुनना पसंद करूंगा मैं
प्रेम में जीना
नहीं है संभालना प्रेम को
भारती रहती है झोली
प्रेम में रहती है- मदहोशी।

भूल जाता है प्रेमी- दिन दुनिया
उसे कुछ भी नहीं दिखता
सिवाय- प्रेम के....

यदि चुनना हो-
विरह को चुनना खुशी-खुशी
जिद मत करना
प्रेम को पकड़ने की
विरह ही है- सच्चा प्रेम।
००००

डॉ. नीरज दइया

दो कविताएं/ नीरज दइया

 1.

चकित है आकाश
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बवंडर बनने को बेताब
जब-जब भी तेज चलती हैं हवाएं
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
गुस्सा तो आग का भी नहीं चलता
धीमी आंच पर वह सेकती है-रोटियां
जब-जब बेकाबू होता है पानी
कोई कहता है-
जरा धीरे, प्यार से...।
आकाश देखता है-
अपने बोझ से परेशान दबी धरती
बदलना चाहती है अपनी गति
वह भी सुनती है-
जरा धीरे, प्यार से...।
चकित है आकाश
कहां से आ रही आवाज-
जरा धीरे, प्यार से...।
००००
2.
गालिब चाचा से सवाल
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कोई अपनी मर्जी से
कहां छूता है-
किसी भी आग को...
कोई अपनी मर्जी से
कहां पाता है-
कोई दरिया
और वह भी आग का...
मैंने नहीं
आग के दरिया ने ही
चुना है मुझे....
आग के दरिया ने ही
चाचजान चुना था तुम्हें!
सवाल है-
जाना कहां है
तैर कर मुझे
तुम डूबे, मैं डूबा
अब कौन है बाहर?
कौन समझाने से
समझा तुम्हारे??
००००
● डॉ. नीरज दइया
('प्रेरणा-अंशु' अक्टूबर, 2024 में प्रकाशित)

 

23 अगस्त, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


1.

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर

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मेरे खून में- प्रेम है

आदम और हवा का

उसी प्रेम की असंख्य बेलें

फैली हैं- पूरी पृथ्वी पर,

जुड़ा हुआ हूं मैं

जुड़ी हुई हैं- पीढ़ियां सारी।


उस समय के साक्षी-

सूरज, चांद और सितारे

कहते हैं सारे

प्रेम चाहिए पृथ्वी पर।

हवा में चंचलता है

उसी से थिरकती है पृथ्वी

चकित है आकाश।

००००

2.

यह कवि की कल्पना नहीं

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यह कवि की कल्पना नहीं

शुद्ध यथार्थ है-

लाल पान जैसा ही होता है दिल।

वह दिखाया नहीं जा सकता

छलिया होता है वह,

ईश्वर के सारे छल

छिपाए रखता है-

अपने भीतर।


कभी धड़कता है- धीरे-धीरे

कभी जोर-जोर से

और कभी रुक जाता है-

अचानक!


विज्ञान के सारे शिक्षकों ने

देश दुनिया के सारे डॉक्टरों ने

बहरूपिये दिल को जाना

मगर मान नहीं

जैसे कवि ने माना

अगर मान लेते

वे कवि हो जाते!

००००००

3.

खरोंच

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हमारा दिल

एक पहेली है अबूझ

सब कुछ समझा जा सकता है

सिवाय दिल के।

किसी नियम या सूत्र में

बांधा नहीं जा सकता है-

प्रेम।

उम्र और देश काल की सीमाएं भी

बांध नहीं सकती उसे।

अनेक बार मैंने कहा दिल से-

अभी समय है सही

किया जा सकता है प्रेम

किंतु स्थिर रहा वह अपनी जगह

और एक दिन अचानक

करने लगा- नृत्य।

बेमौसम बिना बादल

कर सकता है वह नृत्य

मैंने पाया

इस नृत्य में

टूटा नहीं दिल

बस हल्की सी खरोंच लगी।

००००

4.

यकीन कीजिए

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प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं है

पूरी पृथ्वी पर।

किसी सारणी में

नहीं है उसका

तयशुदा स्थान।

वह अवस्थाओं से परे

किसी भी अवस्था में

बदलता है अवस्था,

छोड़ सकता है-

अपना रंगकिसी भी रूप में

उसे दाग या धब्बा मानने वालों की कमी नहीं

पर यकीन कीजिए-

प्रेम जैसा द्रव्य

दूसरा कोई नहीं

पूरी पृथ्वी पर....।

००००००

5.

लौटना संभव नहीं

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जब-जब भी मैं

पहुंचा हूं-

प्रेम के परिसर में

लौटा नहीं पूरा

संभव नहीं- लौटना।

हरेक यात्रा का

अपना समय होता है

नहीं लौटता समय भी

चलता रहता है-

आगे और आगे

साथ-साथ समय के

चलते हुए मैं

देख रहा हूं- लगातार

पीछे और पीछे

जानते हुए-

कि लौटना संभव नहीं....।

००००


 

23 जुलाई, 2024

पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया


(1.)

उसे खुश देखकर 

मैंने पूछा नहीं

बस सोचा-

खुशी का क्या राज है?


उसकी खुशी 

बहुत अच्छी थी 

इतनी अच्छी कि सोचते हुए 

खुश हो गया 

मैं भी!



(2.)

यह वही चेहरा है!

मैं सोचने लगा 

कल जो उदासी में डूबा था 

हैरान-परेशान 

अपने रंगों को कहीं भूलकर,

बेसुध-बेरंग बेजान।


यह खनकती हुई हंसी 

कहां से आई? 

क्या गुमसुम उदास तुम को

तुम्हारे भीतर छुपी-

अल्हड़ लड़की मिल गई है

या किसी नई उम्मीद में 

भीतर बहने लगी है-

एक साथ कई चंचल नदियां,

जिनकी कलकल से 

खनक रही हंसी तुम्हारी।



(3.)

प्रेम में 

भीतर बजती है- 

घंटी या घंटियां?

यह संगीत की बात है....


खलनायक नहीं मानते 

घंटी या घंटियां 

वे इन शब्दों के 

केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,

उनके लिए प्रेम 

केवल हासिल करना है!

उनका शब्दकोश ही नहीं

अलग है व्याकरण भी हमसे।



(4.)

प्रेम में लड़का 

प्रेम में लड़की 

प्रेम में आदमी 

प्रेम में औरत 

प्रेम में बुढ़ा 

प्रेम में बुढ़िया....


प्रेम इतना बावला है 

कि देखता ही नहीं

वह किसे भिगो रहा है। 


समा जाते हैं इसके भीतर- 

छोटे-बड़े देवता-दानव

या फिर पूरी दुनिया के शब्द।



(5.)

इतना गुस्सा क्यों? 

अपने अतीत पर 

जो बीत चुका है 

वह लौटकर नहीं आएगा।


छोड़ दो 

जाने दो उसे- 

दूर... बहुत दूर तुमसे

वह मुक्त होना चाहता है

और उसे थामे बैठे हो तुम...


माना कि यह कहना सरल है-

'वर्तमान को थाम लो 

और भविष्य को देखो।'

सच में कठिन है-

आज में रहना-सहना...

इतना गुस्सा क्यों है?

गुस्से को बह जाने दो-

उसी कल के प्रवाह में।