1.
06 जनवरी, 2025
दो कविताएं/ नीरज दइया
23 अगस्त, 2024
पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया
1.
प्रेम चाहिए पृथ्वी पर
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मेरे खून में- प्रेम है
आदम और हवा का
उसी प्रेम की असंख्य बेलें
फैली हैं- पूरी पृथ्वी पर,
जुड़ा हुआ हूं मैं
जुड़ी हुई हैं- पीढ़ियां सारी।
उस समय के साक्षी-
सूरज, चांद और सितारे
कहते हैं सारे
प्रेम चाहिए पृथ्वी पर।
हवा में चंचलता है
उसी से थिरकती है पृथ्वी
चकित है आकाश।
००००
2.
यह कवि की कल्पना नहीं
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यह कवि की कल्पना नहीं
शुद्ध यथार्थ है-
लाल पान जैसा ही होता है दिल।
वह दिखाया नहीं जा सकता
छलिया होता है वह,
ईश्वर के सारे छल
छिपाए रखता है-
अपने भीतर।
कभी धड़कता है- धीरे-धीरे
कभी जोर-जोर से
और कभी रुक जाता है-
अचानक!
विज्ञान के सारे शिक्षकों ने
देश दुनिया के सारे डॉक्टरों ने
बहरूपिये दिल को जाना
मगर मान नहीं
जैसे कवि ने माना
अगर मान लेते
वे कवि हो जाते!
००००००
3.
खरोंच
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हमारा दिल
एक पहेली है अबूझ
सब कुछ समझा जा सकता है
सिवाय दिल के।
किसी नियम या सूत्र में
बांधा नहीं जा सकता है-
प्रेम।
उम्र और देश काल की सीमाएं भी
बांध नहीं सकती उसे।
अनेक बार मैंने कहा दिल से-
अभी समय है सही
किया जा सकता है प्रेम
किंतु स्थिर रहा वह अपनी जगह
और एक दिन अचानक
करने लगा- नृत्य।
बेमौसम बिना बादल
कर सकता है वह नृत्य
मैंने पाया
इस नृत्य में
टूटा नहीं दिल
बस हल्की सी खरोंच लगी।
००००
4.
यकीन कीजिए
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प्रेम जैसा द्रव्य
दूसरा कोई नहीं है
पूरी पृथ्वी पर।
किसी सारणी में
नहीं है उसका
तयशुदा स्थान।
वह अवस्थाओं से परे
किसी भी अवस्था में
बदलता है अवस्था,
छोड़ सकता है-
अपना रंगकिसी भी रूप में
उसे दाग या धब्बा मानने वालों की कमी नहीं
पर यकीन कीजिए-
प्रेम जैसा द्रव्य
दूसरा कोई नहीं
पूरी पृथ्वी पर....।
००००००
5.
लौटना संभव नहीं
-----
जब-जब भी मैं
पहुंचा हूं-
प्रेम के परिसर में
लौटा नहीं पूरा
संभव नहीं- लौटना।
हरेक यात्रा का
अपना समय होता है
नहीं लौटता समय भी
चलता रहता है-
आगे और आगे
साथ-साथ समय के
चलते हुए मैं
देख रहा हूं- लगातार
पीछे और पीछे
जानते हुए-
कि लौटना संभव नहीं....।
००००
23 जुलाई, 2024
पांच प्रेम कविताएं ● नीरज दइया
(1.)
उसे खुश देखकर
मैंने पूछा नहीं
बस सोचा-
खुशी का क्या राज है?
उसकी खुशी
बहुत अच्छी थी
इतनी अच्छी कि सोचते हुए
खुश हो गया
मैं भी!
(2.)
यह वही चेहरा है!
मैं सोचने लगा
कल जो उदासी में डूबा था
हैरान-परेशान
अपने रंगों को कहीं भूलकर,
बेसुध-बेरंग बेजान।
यह खनकती हुई हंसी
कहां से आई?
क्या गुमसुम उदास तुम को
तुम्हारे भीतर छुपी-
अल्हड़ लड़की मिल गई है
या किसी नई उम्मीद में
भीतर बहने लगी है-
एक साथ कई चंचल नदियां,
जिनकी कलकल से
खनक रही हंसी तुम्हारी।
(3.)
प्रेम में
भीतर बजती है-
घंटी या घंटियां?
यह संगीत की बात है....
खलनायक नहीं मानते
घंटी या घंटियां
वे इन शब्दों के
केवल पुल्लिंग रूप जानते हैं,
उनके लिए प्रेम
केवल हासिल करना है!
उनका शब्दकोश ही नहीं
अलग है व्याकरण भी हमसे।
(4.)
प्रेम में लड़का
प्रेम में लड़की
प्रेम में आदमी
प्रेम में औरत
प्रेम में बुढ़ा
प्रेम में बुढ़िया....
प्रेम इतना बावला है
कि देखता ही नहीं
वह किसे भिगो रहा है।
समा जाते हैं इसके भीतर-
छोटे-बड़े देवता-दानव
या फिर पूरी दुनिया के शब्द।
(5.)
इतना गुस्सा क्यों?
अपने अतीत पर
जो बीत चुका है
वह लौटकर नहीं आएगा।
छोड़ दो
जाने दो उसे-
दूर... बहुत दूर तुमसे
वह मुक्त होना चाहता है
और उसे थामे बैठे हो तुम...
माना कि यह कहना सरल है-
'वर्तमान को थाम लो
और भविष्य को देखो।'
सच में कठिन है-
आज में रहना-सहना...
इतना गुस्सा क्यों है?
गुस्से को बह जाने दो-
उसी कल के प्रवाह में।
●
27 फ़रवरी, 2024
मूर्ख बनाने के अचूक उपाय/ नीरज दइया
नीरज दइया
19 फ़रवरी, 2024
लोकप्रियता का फार्मूला और आइंस्टीन/ नीरज दइया
जो
सही है वह हमेशालोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय होता है वह हमेशा सही
नहीं होता।’ पता नहींअल्बर्ट आइंस्टीन ने यह कब कहा था? मुझे इस बात से
कोईसरोकार नहीं है कि किसने क्या कहा? कब कहा? मैं बस यह जानता हूं कि सवाल
करनालोकप्रिय बनने का प्रथम सौपान है। जितना बड़ा सवाल और जितने बड़े आदमी
पर सवालकरेंगे आपकी लोकप्रिया का पायदान उतना ही बड़ा होगा। मैं जानता हूं
कि आइंस्टीन केइस विचार के विषय में आपको भी पता नहीं है कि यह कब कहा गया
था... और आप चुप बैठेहैं।
देश-विदेश में अनेकविद्वान,
बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक औरदार्शनिक हुए हैं और उन्होंने अनेक बातें कही हैं।
मेरा मानना है कि इन सभीश्रेणियों में जो नहीं आते हैं, वे भी कोई बात
कहने काअधिकार तो रखते ही हैं। अगर ऐसी बात कहनी नहीं आती है तो मेरे जैसे
सवाल उठाने औरदूसरों की कही बातों का प्रतिरोध करने का अधिकार तो संविधान
ने दिया है। हमें बससही के सामने आना है। अगर सही जो सही है, तो वह हमें
हटाकर खुद सामने आ जाएगा।नहीं तो हम सही का दर्जा ले लेंगे।
आजकल कुछ नया नियम चलरहा है कि खुद को सही साबित करने के लिए किसी को गलत
साबित करना पड़ता है। यह यदिनहीं हो सकता तो बहुत आसान तरीका है कि बस आप
सही के सामने आ जाओ और उसे ढक लो। बसथोड़ा इंतजार करो। कोई किसी को सामने
आने देना नहीं चाहता। सब एक दूसरे को पीछेधकेल रहे हैं। इस सामने आने के
फंडे में आपके पास आत्मविश्वास भरपूर होना चाहिए।दूसरी बात- आपको किसी से
डरना नहीं है भले वह आइंस्टीन ही क्यों नहीं हो। अगर आप आइंस्टीनका विरोध
करेंगे तो वह वापस इस संसार में आपको कोई जबाव देने नहीं आएगा। यह भीसत्य
है कि यदि कुछ कहना है तो किसी परलोक वासी को पकड़ना चाहिए। उसके विषय में
आपकुछ कहेंगे तो उसे ‘सही’ को झूठ कहने के लिए कम से कम वह खुद तो नहीं
आएगा।
अब दूसरी स्थिति यह बनती है कि आत्मविश्वाससे भरपूर
केवल आप और हम नहीं है। बहुत ऐसे भी हैं जो आत्मविश्वास से सही में भरपूरहै
और वे सही है तो वे आपके सामने आएंगे। कोई सामने आए तो इसका पहला और सीधा
अर्थयही समझना चाहिए कि आप सही हैं और इसका प्रमाण है कि कोई आपके सामने आ
रहा है, खुदको सही साबित करने के लिए।
अनेक बार कोई बात
जो बहुत सही होती हैवह मामूली सा मेरे जैसा आदमी भी कह देता है। मेरे पक्ष
में अल्बर्ट आइंस्टीन को मैंरख सकता हूं जो कह कर गए हैं कि जो सही है वह
हमेशा लोकप्रिय नहीं होता। मैं सहीहूं और लोकप्रिय नहीं हुआ हूं, किंतु
किसे हसरत नहीं होती लोकप्रिय होने की! इसलिएमैं भी लोकप्रिय होना चाहता
हूं। मैं नहीं जानता कि लोकप्रिय होने के लिएमूल-मंत्र क्या है... इसलिए
सही-सही बातें करता रहता हूं और सोचता हूं कि पता नहींकिस बात में वह असर
हो कि मुझे लोकप्रिय बना दे। मैं कभी भी लोकप्रिय हो सकता हूं।मेरे
लोकप्रिय होने का मुझे इंतजार है। सही हमेशा नहीं कभी कभी या कभी
कभारलोकप्रिय होता है।
मैं तो हमेशा से मानता आया हूं
किशास्त्र से बड़ा ज्ञान लोक में होता है। यह मुझे लगता है कि आइंस्टीन को
भी यह बातपता थी, इसलिए ही तो उन्होंने ‘सही और लोकप्रिय कासिद्धांत’ दिया।
मैं इस रचना का शीर्षक भी इसी सिद्धांत के नाम पर रखना चाहता थाकिंतु पंच
काका का कहना था कि इसे लोकप्रिय करना है तो इसके शीर्षक में आइंस्टीनका
नाम फिट होना जरूरी है। मैं पंच काका और मेरी पत्नी का हमेशा से मुरीद हूं।
येदोनों सही हैं या गलत इस विषय में मैं कुछ कह नहीं सकता हूं किंतु ये
दोनों ही मेरीगली और मोहल्ले में लोकप्रिय हैं। पत्नी इसलिए कि उसे कहीं भी
शादी-विवाह या कोईमांगलिक अवसर हो गीत गाने के लिए बुलाते हैं और पंच काका
के बिना कोई महफिल सजतीनहीं। मुझे मेरी कविता सुनने के लिए कोई नहीं
बुलाता। यही कसक मेरे भीतर रही है औरसंभव है यही कारण हो मेरे लोकप्रिय
होने की अभिलाषा का।
असल में लोकप्रिय होना ‘लोक’
मेंप्रिय होना है। लोक में प्रिय होना वैसे भी आसान नहीं है। और आइंस्टीन
तो आगाह करगए हैं कि सही कभी-कभार ही प्रिय होता है। चुनाव में पक्ष और
विपक्ष के साथनिर्दलीय उम्मीदवारों के लिए यह सिद्धांत लागू होता है किंतु
जब दूध में पानी मिलजाता है तो दूध का दूध और पानी का पानी करना बिरलों का
खेल है। ऐसे अनेक सच हैंजिनको सुनते ही मिर्ची लगती है। सही तब तक छुपे
रुस्तम की तरह होता है जब तक कि वहलोकप्रिय नहीं हो जाए। सही को लोकप्रिय
नहीं बनने देने के लिए अनेक संगठन औरसत्ताएं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में
काम करती हैं। सही अपने आप कभी भी लोकप्रियनहीं सकता है। उसे लोकप्रिय
बनाना पड़ता है और बहुत बार तो जब तक वह लोकप्रिय होताहै वह खुद प्रिय हो कर
इस संसार से चला जाता है। सही का मार्ग सरल नहीं होता इसलिएकहना चाहिए कि
लोकप्रियता के मार्ग में अवरोध बहुत होते हैं।
अब मान भी
लिया जाए कि जैसे-तैसे मैं सही लोकप्रिय हो भी जाता हूं तो संदिग्ध बन जाता
हूं। अब फिर सामने संकट है- ‘जो लोकप्रियहोता है वह हमेशा सही नहीं होता।’
अभिप्राय यह है कि पूरी जिंदगी संहेद ही संदेहबना रहेगा। इसका कारण जहां
तक मुझे समझ आया है वह है- सही को लोकप्रिय होने केमार्ग में अनेक समझौते
करने पड़ते हैं कि वह लोकप्रिय हो सके। ऐसे में पहले सही कोलगता है कि वह
सही है या नहीं। अगर सही है तो वह लोकप्रिय क्यों नहीं हो रहा है। असलमें
आइंस्टीन का सही और लोकप्रिय होना अपने आप में एक पहेली है। इस जटिल समय
मेंसही की उम्मीद करने वाले बहुत कम बचे हैं। वर्षों पहले ही आज के समय की
जटिलताओंका अहसास आइंस्टीन को हो गया था। हमें मान लेना चाहिए कि हमारे समय
में सही कालोकप्रिय होना बेहद कठिन है और उसके से भी कठिन है किसी
लोकप्रिय का सही होना।






