20 मार्च, 2023

लघुकथा- मामूली खर्च/ डॉ. नीरज दइया

 रामगोपाल को एकएक आवेश आया। मन विचलित हो उठा। ‘ऐसा कैसे कर सकते हैं वे?’ उन्होंने जोर से कहा तो उनकी पत्नी ने बताया- ‘ऐसा तो वे पहले भी कर चुके हैं? जो फ्रिज हमने बेटी के दहेज में दिया उसे उन्होंने आगे किसी को गिफ्ट दे दिया।’ रामगोपाल के गुस्से का बांध सीमा लांध रहा था- ‘यह कब की बात है, मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’ पत्नी ने धीरे से कहा- ‘बताती कैसे, तुम्हारी बेटी अब तुम्हारी हमारी नहीं रही। वह उनकी तरफ हो गई है, उसने बताया ही नहीं। यह तो बातों बातों में उसके मुंह से निकल गया कि वाशिंग मसीन जो हमने दहेज में दी उसे वे किसी रिश्तेदार की शादी में गिफ्ट देंगे।’
    रामगोपाल ने सोचा कि वह फोन लगा कर अपने समधी जी से बात करे पर अगले ही पल यह विचार त्याग दिया। आगे भी ऐसा हुआ कि उसने फोन किया और उन्होंने फोन उठाया ही नहीं, ना ही वापस उनका फोन आया। पत्नी ने पूछा- ‘क्या हुआ?’
    ‘कुछ नहीं।’ कहते हुए उन्होंने धीरज बंधाते हुए कहा- ‘शांता, तुम चिंता मत करो। भगवान के घर न्याय है और देखना यहीं का यहीं है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। ऊपरवाला सारे कर्मों का हिसाब रखता है।’
    शांता को यह सुनकर भी धीरज नहीं आया। उसने कहा- ‘ऊपरवाला तो करेगा जब करेगा, अब मैं करूंगी।’
    ‘क्या करोगी भागवान?’ रामगोपाल को आश्चर्य हुआ कि यह तो कभी ऐसा नहीं करती। उनको उत्तर मिला- ‘ऑनलाइन ऑडर कर के समधी के घर मैं एक नई वाशिंग मसीन भिजवा दूंगी। बेटी के दहेज में इतने रुपये खर्च किए, इस मामूली खर्च से क्या डरना।’ वह मुस्कुरा रही थी।    
- डॉ. नीरज दइया

17 मार्च, 2023

पुरस्कारों की अर्थी/ डॉ. नीरज दइया

 सुबह-सुबह अखबार मेरे हाथों में आते ही मैं खोजना आरंभ कर देता हूं। अखबार की पहली खबर से चालू होकर अंतिम पंक्ति तक बस मैं बस खोजता और खोजता रहता हूं कि कहीं कोई मेरे काम की खबर मिल जाए। रविवार और साहित्य परिशिष्ठ के दिन तो मैं अपनी रचना को खोजता हूं कि संपादक ने मेरी रचना को स्थान दिया है या नहीं बाकी दिनों में मेरी खोज अलग होती है। अब आपसे क्या छिपाना आप कोई मुझ से अलग थोड़ी हैं मैं तो जैसे कोई कुंवरा वैवाहिक विज्ञापनों में वधू को खोजता है वैसे ही पुरस्कारों को ढूंढ़ता हूं। यह मेरा दुर्भाग्य कि मुझे सफलता बहुत कम नसीब होती। संपादकों के लिए मैं आदर के अतिरिक्त अन्य शब्दों का प्रयोग करते हुए कुछ कह भी कैसे सकता हूं वर्ना जो कभी कभार मेरी रचना को स्थान देते हैं वह भी बंद कर देंगे।

            मैं निवेदन की मुद्रा में यह तो कह सकता हूं कि वे पुरस्कारों की खबरें जरा विस्तार से और पूरी प्रकाशित किया करें। जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है कि यह पुरस्कार कैसे मिला है, पर मैं लेखक के रूप में यह जानने का थोड़ा हक और अधिकार रखता हूं। मेरे लिए यह जानकारी बहुत जरूरी है कि पुरस्कार किसे मिला, किस रचना पर मिला, कितनी राशि का मिला और संस्था ने किन-किन को निर्णायक बनाया है। सबसे अधिक जरूरी यह पुरस्कार सम्मान दूसरे लेखकों यानी कि मुझे कैसे मिल सकता है। मैं इसे पाने के लिए क्या क्या तैयारी करूं। जैसे कंपटीशन की तैयारी के लिए देश में जगह जगह कोचिंग सेंटर खुले हैं वैसे ही पुरस्कार पाने के लिए संस्थाओं को ऐसे सेंटर भी खोलने चाहिए।

            सुना है कि कुछ जुगाड़ू किस्म के लेखक पुरस्कार पाने के लिए डोनेशन के नाम पर बढ़ चढ़ कर रकद सहायता-सहयोग के नाम पर देते हैं। आश्चर्य की बात है कि पुरस्कार और सम्मान का पूरा खर्च गोपनीय रूप से उठाने वाले लेखकों को हसंते खिलखिलाते देखा गया है। उनके कांधे या सिर पर कोई शिकन या बोझ कहीं दिखाई ही नहीं देता है। माना कि संपादक यह सब गोपनीय बातें नहीं छाप सकता है किंतु कुछ तो उसका उत्तरदायित्त्व होता है। कुछ लेखक किस्म के संपादक खुद तो ऐसे जानकरियों से लाभ उठा लेते हैं किंतु अपने पाठकों और अन्य लेखकों को वंचित रखते हैं जिससे वे पुरस्कार की दौड़ में पीछे रह जाते हैं।

            मैं यह अध्ययन अर शोध लंबे समय से कर रहा हूं और अब मेरे अध्ययन के परिणाम या कहें सार आपके सामने प्रस्तुत करने का समय आ गया है। मैं योग्य लेखक हूं और आप में से भी अनेक योग्य लेखक होंगे। हमें कुछ ऐसा करना यह है कि साहित्य के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। मेरे इस अध्ययन में अकादमी के पुरस्कारों पर विशेष अध्ययन किया गया है क्यों कि वहां सूचना का अधिकार सक्रिय है। सेठों और साहूकारों की संस्थाओं के नाम भले सेठ-साहूकार रखें हो किंतु असल में ये सब चोरों-लुटेरों की संस्थाएं होती हैं। इनका साहित्य और पुरस्कार से लेश मात्र का लोभ नहीं होता ये बस इस नाम पर वीआईपी को बुलाकर उनके हाथों पुरस्कार प्रदान कराते समय अपनी फोटो और लाभों को ध्यान में रखते हैं।

            पुरस्कार रहस्य जो जितना मैंने जाना वह यह है कि पुरस्कार की प्रविधि को शमशाम में ले जाने वाली अर्थी से समझ सकते हैं। जिस प्रकार अर्थी को उठाने की होड लगी रहती है वैसे ही पुरस्कार को पाने के लिए और कंधा देने के लिए चारों तरफ होड़ लगी हुई है। यह विचित्र संयोग है कि पुरस्कार समिति में भी एक संयोजक और तीन निर्णायक अर्थात कुछ चार होते हैं और अर्थी भी चार लोग मिलकर उठाते हैं। अर्थ काच की तरफ एकदम साफ है कि ये चारों साहित्य के ठेकेदार चाहे तो किसी लेखक की अर्थी उठाएंगे और कहेंगे तो नहीं उठाएंगे। मना कर देंगे। कहने को तो कहा जाता है कि संयोजक की भूमिका मूकदर्शक भर होती है किंतु मूक बधिर भी इशारे में बहुत कुछ कह देते हैं फिर यह तो ठहरा तुर्रम खां संयोजक। कभी निर्णायक कोई बाप किस्म का आदमी आ जाए तो बात अलग है वर्ना सारी बात संयोजन के संकेतों पर ही रहती है।

            मेरे देश के महान संपादकों और अखबारों को मालिकों मैं आपके किस्म किस्म के पत्रकारों और पत्रकारिता के घटकों की दुहाई देते हुए वॉच डॉग पत्रकारिता के मसीहाओं का आह्वान करता हूं कि मेरे इस अध्ययन का फायदा उठाएं और अकादमी पुरस्कारों को अर्थी से समझें कि अर्थी को वैसे तो कोई भी कंधा दे देता है एक राह चलता राहगीर भी। किंतु असल सवाल है कि किसी की अर्थी को कंधा देने का असली हकदार कौन है? शव किसी बाप का है तो बेटे हकदार होगा और बेटे का है तो उसके बाप-दादा। साहित्य पुरस्कारों में घोर अंधेरा देखा जा रहा है। कंधा देने वाले ऐसे गैरे नत्थू खैरे हैं। जो साहित्य के अ-आ-ई सीख रहे हैं उनको संयुक्ताक्षरों तक पहुंचा दिया गया है। निर्णायक स्कूल कॉलेज के अध्यापक प्रोफेसर बन रहे हैं जिनको सृजनात्मक साहित्य का अर्थ केवल पाठ्यक्रम में लगी पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त कुछ आता है। निर्णायक की हैसियत नहीं है कि वह पुरस्कार के लिए सामने प्रस्तुत पुस्तकों का अर्थ अभिप्राय और साहित्य-परंपरा में प्रासंगिकता का आकलन तो बहुत दूर की बात वे अच्छे से उनका वाचन नहीं कर पाएंगे।

            अस्तु हे संपादक श्रेष्ठ आप ही आशा का केंद्र है कि कुछ ऐसा करें कि इस युग के जुगाड़ू लेखकों की टें बोल जाए। आदरणीय आपसे इतना कुछ संभव नहीं हो तो इतनी कृपा अवश्य करें कि मेरी इस अधकचरी तृतीय कोटि की रचना को थोड़ा सा स्थान आपने प्रतिष्ठित अखबार में प्रदान करें। आपकी इसी अनुकंपा से मैं स्वयं को धन्य समझूंगा।

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11 मार्च, 2023

पेपर लीक/ डॉ. नीरज दइया

‘पेपर लीक’ यह दो शब्द पढ़ते ही खलबली मच जाती है। विगत वर्षों से पेपर देदे कर लगातार असफल होने वाले बेरोजगारों के मुंह से भद्दी गालियों की रेलगाड़ी छूटती है। उनके पिताओं को पूरी सरकार और व्यवस्था नाकारा लगने लगती है। माताएं कहती हैं- ‘हमारे समय तो ऐसा नहीं होता था।’ दादा-दादी अपने आशीर्वाद को रिपेयर करते हुए कहते हैं- ‘कोई बात नहीं बेटा, फिर तैयारी कर। भगवान सब ठीक करेगा।’ सत्ता पक्ष वाले इन दो शब्दों से बेहद दुखी होते हैं तो विपक्ष वाले लड्डू बाँटने की तैयारी में लग जाते हैं। इन सब से अलग मेरे जैसा कोई लेखक इन शब्दों को चेलेंज देता हुआ इनके अर्थ में परिवर्तन कर ‘होली अंक’ के लिए रचना तैयार करने की सोचता है!

            पेपर का मतलब केवल परीक्षा का प्रश्न पत्र नहीं होता। प्यारे, जिसे प्रतिदिन आप पढ़ते हैं- अखबार वह न्यूज पेपर कहलता है और लोग उसे केवल पेपर कहते हैं। मैं जिस कागज पर लिख रहा हूं, उसे भी पेपर संज्ञा से सुशोभित किया जाता है। मैं यहां किसी अज्ञात पेपर की बात कर रहा हूं, जिसे होली में सालियों ने जीजाजी के लिए तैयार किया था। नए नए जीजाजी को अपनी नई नवेली सालियों के संग होली खेलने-खिलाने का आनंद रसगुल्लों के स्वाद से भी ज्यादा होता है। रंग और गाल तो वही होते हैं, जो पिछली होली में थे। किंतु इस बार के रंग को छूने वाले कोमल-कोमल हाथों से और एक दूसरे के गालों तक पहुंचने के लिए जो खुशी होती है वह निराली होती है। जैसे खुशी खुद मचलती-इठलाती दिखाई देती है। सालियों में उत्साह-उमंग की मात्रा चरम को पार करती देखी जा सकती है। जीजाजी के मन में लड्डू फूटते हैं कि कैसी कैसी कितनी सालियां मिलेंगी। दोनों पक्षों में बस विचारों की तेज आंधियां चलती है। जब मौका मिलेगा तो उनके साथ ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे और भी ना जाने कैसा-कैसा करेंगे।

            बडी, मझली और छोटी सालियों के संग आस-पड़ौस की लड़कियों और बहुओं ने भी जीजाजी की सालियों की संख्या में इजाफा कर दिया। अब जीजाजी के ठाठ हो गए। एक साली ने कहा- ‘जैसे ही जीजू गेट पर पहुंचेंगे, मैं छत से रंग की बालटी उन पर उडेल दूंगी।’ दूसरी बोली- ‘तेरे नंबर से पहले तो मेरा नंबर आएगा। मैं अपनी बॉलकनी से रंग के गुब्बारों से जीजाजी और उनके दोस्तों पर धावा बोल दूंगी और मेरा पिंटू अपनी पिचकारी से उन पर रंग बरसाएगा।’ फिर क्या था सब ने बारी बारी से अपने-अपने कामों को बड़े जोश के साथ वर्णित किया- ‘मैं दरवाजे के पीछे छिपी रहूंगी, जैसे ही भीतर आएंगे पीछे से उन पर जबरदस्त रंग डाल कर पूरा रंग दूंगी।’ एक के बाद एक रंगारंग कार्यक्रम फिक्स हुए। उनको क्या-क्या खियाला-पिलाया जाएगा। उनके दोस्तों के साथ कैसे-क्या बात होगी। भांग के भजिया से रंगीन काजू कतली और पान-सुपारी तक की सारी बातों को एक फुलस्कैप कागज पर सुंदर लिखावट के साथ सालियों द्वारा लिखी गई।

            काश! सुंदर सालियों की हसरतें पूरी हो पाती। जीजाजी का संदेश आ गया कि उनका रीट का पेपर बहुत अच्छा हुआ था पर पपेर लीक होने से बहुत उदास है। इसलिए इस बार होली नहीं खेलेंगे। आग लगे इस पेपर लीक को पिछले सालों होली को कोरोना खा गया इसबार यह लीकेज खा गया। इस स्टोरी की के असली सूत्रों का खुलासा करें तो सुंदर लिखावट के साथ पूरी योजना जिस पेपर पर लिखी गई थी उसे जीजाजी की एक प्रिय साली साहिबा ने उनको वाट्सएप कर दिया तो वे नाराज हो गए। उनको लगा कि पेपर लीक करने वाले भरे पड़े हैं। वे नहीं आए। उन्होंने सुगुन के तौर पर अपनी प्रिय सालियों को तिलक लगा अपना फोटो भेजकर होली की शुभकामनाएं देकर इतिश्री कर दी।

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