11 मार्च, 2023

पेपर लीक/ डॉ. नीरज दइया

‘पेपर लीक’ यह दो शब्द पढ़ते ही खलबली मच जाती है। विगत वर्षों से पेपर देदे कर लगातार असफल होने वाले बेरोजगारों के मुंह से भद्दी गालियों की रेलगाड़ी छूटती है। उनके पिताओं को पूरी सरकार और व्यवस्था नाकारा लगने लगती है। माताएं कहती हैं- ‘हमारे समय तो ऐसा नहीं होता था।’ दादा-दादी अपने आशीर्वाद को रिपेयर करते हुए कहते हैं- ‘कोई बात नहीं बेटा, फिर तैयारी कर। भगवान सब ठीक करेगा।’ सत्ता पक्ष वाले इन दो शब्दों से बेहद दुखी होते हैं तो विपक्ष वाले लड्डू बाँटने की तैयारी में लग जाते हैं। इन सब से अलग मेरे जैसा कोई लेखक इन शब्दों को चेलेंज देता हुआ इनके अर्थ में परिवर्तन कर ‘होली अंक’ के लिए रचना तैयार करने की सोचता है!

            पेपर का मतलब केवल परीक्षा का प्रश्न पत्र नहीं होता। प्यारे, जिसे प्रतिदिन आप पढ़ते हैं- अखबार वह न्यूज पेपर कहलता है और लोग उसे केवल पेपर कहते हैं। मैं जिस कागज पर लिख रहा हूं, उसे भी पेपर संज्ञा से सुशोभित किया जाता है। मैं यहां किसी अज्ञात पेपर की बात कर रहा हूं, जिसे होली में सालियों ने जीजाजी के लिए तैयार किया था। नए नए जीजाजी को अपनी नई नवेली सालियों के संग होली खेलने-खिलाने का आनंद रसगुल्लों के स्वाद से भी ज्यादा होता है। रंग और गाल तो वही होते हैं, जो पिछली होली में थे। किंतु इस बार के रंग को छूने वाले कोमल-कोमल हाथों से और एक दूसरे के गालों तक पहुंचने के लिए जो खुशी होती है वह निराली होती है। जैसे खुशी खुद मचलती-इठलाती दिखाई देती है। सालियों में उत्साह-उमंग की मात्रा चरम को पार करती देखी जा सकती है। जीजाजी के मन में लड्डू फूटते हैं कि कैसी कैसी कितनी सालियां मिलेंगी। दोनों पक्षों में बस विचारों की तेज आंधियां चलती है। जब मौका मिलेगा तो उनके साथ ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे और भी ना जाने कैसा-कैसा करेंगे।

            बडी, मझली और छोटी सालियों के संग आस-पड़ौस की लड़कियों और बहुओं ने भी जीजाजी की सालियों की संख्या में इजाफा कर दिया। अब जीजाजी के ठाठ हो गए। एक साली ने कहा- ‘जैसे ही जीजू गेट पर पहुंचेंगे, मैं छत से रंग की बालटी उन पर उडेल दूंगी।’ दूसरी बोली- ‘तेरे नंबर से पहले तो मेरा नंबर आएगा। मैं अपनी बॉलकनी से रंग के गुब्बारों से जीजाजी और उनके दोस्तों पर धावा बोल दूंगी और मेरा पिंटू अपनी पिचकारी से उन पर रंग बरसाएगा।’ फिर क्या था सब ने बारी बारी से अपने-अपने कामों को बड़े जोश के साथ वर्णित किया- ‘मैं दरवाजे के पीछे छिपी रहूंगी, जैसे ही भीतर आएंगे पीछे से उन पर जबरदस्त रंग डाल कर पूरा रंग दूंगी।’ एक के बाद एक रंगारंग कार्यक्रम फिक्स हुए। उनको क्या-क्या खियाला-पिलाया जाएगा। उनके दोस्तों के साथ कैसे-क्या बात होगी। भांग के भजिया से रंगीन काजू कतली और पान-सुपारी तक की सारी बातों को एक फुलस्कैप कागज पर सुंदर लिखावट के साथ सालियों द्वारा लिखी गई।

            काश! सुंदर सालियों की हसरतें पूरी हो पाती। जीजाजी का संदेश आ गया कि उनका रीट का पेपर बहुत अच्छा हुआ था पर पपेर लीक होने से बहुत उदास है। इसलिए इस बार होली नहीं खेलेंगे। आग लगे इस पेपर लीक को पिछले सालों होली को कोरोना खा गया इसबार यह लीकेज खा गया। इस स्टोरी की के असली सूत्रों का खुलासा करें तो सुंदर लिखावट के साथ पूरी योजना जिस पेपर पर लिखी गई थी उसे जीजाजी की एक प्रिय साली साहिबा ने उनको वाट्सएप कर दिया तो वे नाराज हो गए। उनको लगा कि पेपर लीक करने वाले भरे पड़े हैं। वे नहीं आए। उन्होंने सुगुन के तौर पर अपनी प्रिय सालियों को तिलक लगा अपना फोटो भेजकर होली की शुभकामनाएं देकर इतिश्री कर दी।

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28 दिसंबर, 2021

डॉ. शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा / डॉ. नीरज दइया

 डॉ. शक्तिदान कविया (1940-2021) शिक्षा, साहित्य, अनुवाद और संपादन आदि अनेक क्षेत्रों में अविस्मरणीय नाम है। आपके बड़े और व्यापक कार्य को किसी एक छोटे से आलेख में समाहित करना असंभव है। यहां बस अपने कुछ प्रसंगों-अनुभवों के माध्यम से अंतर्मन के कविया जी को आपके सामने प्रस्तुत करने का मेरा प्रयास रहेगा। मेरा मानना है कि बहुत बार हम बहुत कुछ जानकर भी काफी कुछ से वंचित होते हैं। जानने में भी अनेक घटक छूट जाते हैं। जनाना किसी सीमा में आबद्ध होता है। जानकारियों का सिलसिला हमें एक कड़ी से अनेक कड़ियों से जोड़ता हुआ कहीं का कहीं पहुंचा देता है। एक उदाहरण के हवाले से बात करें तो कविया जी को वर्ष 1993 का साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार अनूदित कृति ‘धरती घणी रूपाली’ (1991) के लिए अर्पित किया गया है। यह रामेश्वरलाल खंडेलवाल ‘तरुण’ के हिन्दी कविता–संकलन ‘तरुण काव्य–संचयन’ का राजस्थानी पद्यानुवाद है। भीलवाड़ा के महाकवि तरुण जी के काव्य-संसार से मेरा परिचय नहीं रहा, मैंने उन्हें इस अनुवाद के माध्यम से जाना-पहचाना है।
    कृति ‘धरती घणी रूपाली’ के अनुवाद के बारे में डॉ. आनंद प्रकाश दीक्षित ने लिखा- ‘तरुण की कुछ चुनी हुई कविताओं का राजस्थानी के सरस हृदय कवि डॉ. शक्तिदान कविया ने राजस्थानी में उन कविताओं की संपूर्ण गरिमा और अर्थ एवं भाव की रक्षा करते हुए सुघड अनुवाद प्रस्तुत करके बड़ा ही उपयोगी कार्य किया है। उनका अनुवाद मूल रचना के सन्निकट और उसके लिए सोने में सुगंध जैसा है।’ पचास कविताओं की इस कृति में प्रस्तावना विद्वान लेखक डॉ. मनोहर शर्मा ने लिखी और स्वयं अनुवादक ने भी अपनी बात भूमिका ‘अनुवादक रा आखर’ में विस्तार से रखी है। यही नहीं अंग्रेजी भाषा के कवि टॉमस ग्रे की ‘एलीजी’ का अनुवाद भी कविया जी ने किया जो बेहद चर्चित रहा है। इनकी भूमिकाओं के माध्यम से हम कविता और अनुवाद की अनेक बातें जान सकते हैं।
    दो बातें स्पष्ट है एक तो यह कि कविया जी कविता के अच्छे अनुवादक रहे हैं और दूसरी यह कि उनका अध्ययन व्यापक-विशद रहा है। वैसे उन्होंने स्वयं भी कविताएं लिखी है। एक कवि हृदय दूसरे कवि हृदय को बेहतर ढंग से समझ सकता है। परंपरागत डिंगळ शैली और छंदबद्ध काव्य-रचनाओं के लिए पहचाने जाने वाले कविया जी की सर्वाधिक जनप्रिय कविता को राजस्थानी भाषा की वंदना कह सकते हैं। ‘इणरौ इतिहास अनूठो है, इण मांय मुलक री आसा है।/ चहूंकूंटां चावी नै ठावी, आ राजस्थानी भासा है।’ जब-जब राजस्थानी भाषा और मंचीय कविता की बात होगी हमें इस अद्वितीय कविता का स्मरण करना होगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सपूता री धरती, दारू-दूषण, धरा सुरंगी धाट, धोरां री धरोहर जैसी काव्य-कृतियों के द्वारा कवि के रूप में अनेक छंदबद्ध रचनाएं देने वाले कविया जी ने आधुनिक कविता के क्षेत्र में भी किंचित योगदान दिया है, किंतु वे डिंगळ के छंदवद्ध कवि के रूप में ही ख्याति प्राप्त कर सके हैं। आधुनिक गद्य विधाओं खासकर उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि के विषय में उनका चिंतन लेखन मेरे अध्ययन में नहीं आया है किंतु वे महाविद्यालय में राजस्थानी विभागाध्यक्ष रहे तो निसंदेह इन सब पर भी उनका समान अधिकार रहा है।  
    कविता और अनुवाद की बात करते हुए प्रसंगवश हमें यहां यह भी विचार करना चाहिए कि किसी अनुवादक के द्बारा किसी रचना अथवा कृति को अनुवाद के लिए चयन करने का मूल आधार क्या होता है। इसमें सर्वाधिक अभिमत तो अनुवादक की अपनी पसंद है जो निसंदेह महत्त्व भी रखती है। कविया जी के साथ भी ऐसा ही रहा है। साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित कृति के अनुवाद का बीजारोपण अनुवादक कविया जी के मन में वर्ष 1958 में हुआ, जब वे कविवर तरुण की कविता ‘बटोही ठंडी सांस न ले’ रचना से बेहद प्रभावित हुए थे। वर्ष 1989 में महाकवि तरुण की ‘तरुण-काव्य ग्रंथावली’ का प्रकाशन हुआ और दिसंबर 1990 में उन्होंने उनकी चयनित लगभग पचास कविताओं का राजस्थानी रूपांतरण किया। यहां यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि किसी मूल कविता के मूल छंद को अनुवाद की भाषा में उसी छंद और भाव गरिमा के साथ साधना बेहद श्रमसाध्य होता है जो   उन्होंने इस अनुवाद में किया है।
    जब हम कविया जी के विशद कार्य को देखते हैं तो उनको किसी एक रूप अथवा विधा के बंधन में नहीं बांध सकते हैं। वे कवि और अनुवादक तो थे ही किंतु उससे भी अधिक उनका मान-सम्मान निबंध विधा में रहा है। उन्होंने एक बेजोड़ गद्यकार के रूप में जहां वचनिका शैली को साधने का प्रयास किया, वहीं विविध विषयों के व्यापक अध्ययन-मनन-चिंतन से पुष्ट उनके निवंध विषयगत आधरभूमि कहे जाते हैं। ‘संस्कृति री सोरम’ (1984) निबंध-संग्रह में दस निवंधों के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति के अनेक परिचित-अपरिचित पक्षों को कविया जी ने वाणी दी है। यहां परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय देखा जा सकता है। लोक-संस्कृति, लोक-परंपराओं, लोक-विश्वासों और लोक-साहित्य के व्यापक अध्यान को यहां शब्द-शब्द सुवास और लालित्यपूर्ण गद्य में देख सकते हैं।     
      यह देखकर आश्चर्य होता है कि उन्होंने जिस विद्वता से अनेक ग्रंथों की भूमिकाएं और प्रस्तावनाएं लिखी उनमें स्वतंत्र रचनाओं-विचारों के अनेक अंश मौजूद है। शायद यही कारण रहा होगा कि अनेक कृतियों की भूमिकाओं और प्रस्तावनाओं में से चयनित 24 को उन्होंने कृति ‘प्रस्तावना री पीलजोत’ (2009) में संकलित किया था। मेरा मानना है कि शक्तिदान कविया की स्वर्णिम आभा इन रचनाओं के अतिरिक्त अनेक ऐसे ग्रंथ संपादनों की भूमिकाओं में भी मिलती है। उदाहरण के लिए भारतीय विद्या मंदिर शोध प्रतिष्ठान से प्रकाशित राजस्थानी की चर्चित कृति ‘छन्द राउ जइतसी रउ’ (1991) का संपादन मूलचंद ‘प्राणेश’ ने किया जिसमें प्रस्तावना डॉ. शक्तिदान कविया की प्रकाशित हुई है। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान से प्रकाशित ‘सोढायण’ (1966) के संपादक के रूप में कविया जी ने 92 पृष्ठीय भूमिका में बहुत विस्तार से विविध आयामों को स्पर्श करते हुए जो कुछ लिखा है वह अपने आप में अद्वितीय मेधा का अनुपम उदाहरण है। कैसे एक व्यक्ति ने इतिहास, साहित्य और संस्कृति को एकमेक करते हुए अतीत के पन्नों को प्रामाणिकता के साथ उजागर किया है यह देखने-समझने की बात है। उनको कवि-अनुवाद के साथ निबंधकार और आलोचक के रूप में मानना समीचीन होगा।  
    हिंदी लेखक की बात करें तो उनके विपुल लेखन को संग्रहित किया जाना है। अब तक उनकी तीन कृतियां- राजस्थानी साहित्य का अनुशीलन, डिंगल के ऐतिहासिक प्रबंध काव्य और राजस्थानी काव्य में सांस्कृतिक गौरव हिंदी में प्रकाशित हुई है। उन्होंने राणी लक्ष्मी कुमार चूड़ावत पर विशेष कार्य किया है। राजस्थानी दूहा संग्रह, राजिया रा सोरठा और ऊमरदान ग्रंथावली जैसे अनेक ग्रंथों के संपादन के लिए उनकी अक्षय कीर्ति है। डॉ. शक्तिदान कविया के संपूर्ण कार्यों की प्रारंभिक जानकारी के लिए राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर द्बारा प्रकाशित राजस्थानी साहित्य रा अगीवाण शृंखला में डॉ. गजादान चारण द्वारा लिखित विनिबंध देख सकते हैं।
    डॉ. शक्तिदान कविया को यदि मैं गुरुओं का गुरु कहता हूं तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक रचनाकारों की संपादित कृति ‘फूल सारू पांखड़ी’ (1984) की भूमिका भी अनेक ऐसे बिंदुओं को उजागर किया है कि वे आज भी भाषाई दृष्टिकोण से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। ‘फूल सारू पांखड़ी’ में गहरी व्यंजना है जो गागर में सागर उक्ति से मिलती-जुलती है। गागर में सागर में अधिकता का भाव है, वहीं फूल सारू पांखड़ी में न्यूनता की अभिव्यक्ति है। बहुत अधिक के स्थान पर बस थोड़ा-सा अथवा उसका अंश मात्र अभिव्यक्त करना अथवा होना ‘फूल सारू पांखड़ी’ में समाहित है। आठ-दस पृष्ठों की भूमिका में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात भाषा के प्रति गंभीर और सजग होने की प्रेरणा गुरुजनों को देना है। उन्होंने अनेक उदाहरणों-उद्धरणों के द्वारा शिक्षक विभाग में सेवारत राजस्थानी लेखकों का आह्वान किया है कि यदि वे सजगता से कार्य करेंगे तो निकट भविष्य में भाषा मानकीकरण का कार्य बेहद सरल-सहज हो जाएगा। उनका मानना रहा कि राजस्थानी में ‘लेखक’ के लिए ‘लिखारौ’ शब्द उचित नहीं है। इसका कारण वे देते हैं कि ‘लेखक’ में ‘क’ कर्त्ता का बोधक है, जबकि ‘लिखारौ’ में अर्जीनवीस या प्रतिलिपिकार ही हो सकता है। निसंदेह यह उनका लेखन के लिए जिस सृजनात्मक क्षमता का अहसास समाहित करने की बात का उदाहरण है। इसी भांति उन्होंने राजस्थानी के लिए ‘पाठक’ या ‘पढ़णहार’ दोनों शब्दों को ‘पढ़ार’ की तुलना में अधिक उचित-बेहतर बताया है। यहां यह कहने का अभिप्राय है कि शिक्षकों को उनकी भाषा और वर्तनी की अनेक जानकारियों के साथ प्रेरित और प्रोत्साहित करने वाले कविया जी ने स्वयं एक रचनाकार के रूप में समरूपता का निर्वाहन करने का प्रयास जीवन पर्यंत किया है। इस लिहाज से वे भाषाविद अथवा भाषा वैज्ञानिक के रूप में भी पहचाने जा सकते हैं। ऐसे पुरोधा की स्मृति को नमन।  

25 दिसंबर, 2021

जूते का स्वाद / डॉ. नीरज दइया

 एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से कहा अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!
    आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई खाने की चीज और स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं उनकी पसंद तो बदलती रहती है!
    श्रीमान सुनिए बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” देखिए, आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका। उनमें से कुछ लेखक तो स्वगवासी थे किंतु जो इसी संसार के वासी थे उनको इसकी खबर तक नहीं लगी कि कोई नया लेखक उनको जूतों का प्रसाद दे रहा है। मुझे लगने लगा है कि अब तो आपके मुंह में भी कुछ कुछ स्वाद जूतों का आने लग गया है।
    वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है तो किसी को फैशनेबल जनाना। अपना ख्याल यहां तो हाई हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है। अकबर-बीरबल ने तो उसी जमाने में यह स्वाद रहस्य जान लिया था किंतु अब इस नई दुनिया का मानना है कि जूते का स्वाद गजब का होता है।
    जते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते और मानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। इसका स्वाद तो सभी जानते हैं और कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? दरसल जूता सदैव एक संभावनाशील विषय रहा है और हर युग में रहेगा। बीरबल ने जाना कि हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और जूते यानी खड़ाऊ को पूजते रहे। अब विचार कीजिए कि पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठा कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं, अस्तु इसके साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करना अधोषित अपराध है।
- डॉ. नीरज दइया

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एक दिन अकबर ने बीरबल से पूछा- “बीरबल, दुनिया में सब से बेहतर स्वाद किसका होता है?” बीरबल सोच में पड़ गया। वह जब भी सोच में पड़ता, अकबर से अदब से कहता- ‘‘जहांपनाह ! थोड़ा वक्त दीजिए।’’ इस बार भी उसने यही कहा, और उसे वक्त दे दिया गया। अब दिन-रात बीरबल को चिंता सताने लगी कि अगर किसी खाने-पीने या फल आदि का नाम लिया और बादशाह अकबर को वह पसंद नहीं आया तो क्या होगा? यहां तो उसकी हाजिर-जवाबी पर दाग लगने की नौबत आ पहुंची। वह यही सोच सोच कर परेशान रहने लगा- अगर उसकी और जहांपनाह की पसंद जुदा निकली तो क्या होगा! हो सकता है कि बूढ़े जहांपनाह बूढ़े होते बीरबल की अंतिम परीक्षा ले रहे हो और इसके बाद उसे सदा-सदा के लिए विदा कर दिया जाए। विदा क्या धक्के मार कर दरबार से बाहर कर दिया जाए... बीरबल की आंखों में आंसु आ गए। हाय अल्लाह! इतने सालों की वफादारी का यह ईनाम बख्सा जाएगा!

            आंसु तो मेरे भी आने वाले हैं, कारण यह कि मेरे पाठक आप श्रीमान तो शीर्षक देखकर यह विचार कर चुके हैं कि स्वादों में सबसे निराला स्वाद जूतों का ही बताया जाएगा। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अब मैं बीरबल बन कर आपसे थोड़ा समय लेकर बात को आगे बढ़ा रहा हूं कि कहीं कोई स्वाद जूतों से बेहतर आपको समझा सकूं। यह तो बेहद सरल था कि मैं बीरबल के श्रीमुख से अकबर को तपाक से उत्तर दिला देता- “जहांपनाह स्वादों में सबसे बेहतरीन स्वाद तो जूते का स्वाद होता है।” यों बात वहीं खत्म हो जाती। हो जाती तो ठीक ही थी, पर नहीं हुई और बिना कुछ किए कराए मुंह में जूते का स्वाद भर गया है। दुनिया में हजारों चीजे हैं जनाब, और जूता भी भला कोई स्वाद में आता है क्या? पर क्या करें सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है और ना मालूम बदशाह सलामत की पसंद क्या हो। और खुदा का खौफ नहीं, उनकी पसंद तो बदलती रहती है!

            श्रीमान सुनिए, बात यूं है कि यह कोई झूठा किस्सा या बनी बनाई झूठी कहानी नहीं है। बिल्कुल सच्ची घटना है कि एक लेखक अपने आस-पास अनेक लेखकों के चित्रों को अपने आस-पास बिखेर कर उन्हें जूते का स्वाद चखा रहा था- “दुष्टों, साहित्य का तुम सब ने मिलकर बेड़ा गर्क कर दिया है। मैं जब तक इस संसार में पैदा हुआ तुम सब ने मिलकर वह सब कुछ लिख डाला जो-जो मैं लिखने की सोच कर यहां आया था।” आजादी ने हमें बहुत सारी हिम्मत दे दी है। माना कि इस जूता प्रकरण में उसका स्वाद हमारे लेखक मित्रों तक नहीं पहुंच सका।    वैसे तो यह मेरी कल्पना ही थी कि जूते का स्वाद बेहतरीन होता है, किंतु अब यकीन हो चला है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन स्वाद जूते का ही है। उम्र के साथ उसका स्वाद बदलता जाता है। जूते की ऐड़ी और ऊंची ऐड़ी का स्वाद समान नहीं हो सकता। मित्र और हसीना के जूते का स्वाद तो भैया भिन्न-भिन्न होता ही है। आजकल जमाना बदल गया है किसी को मर्दाना जूते का स्वाद पसंद है, तो किसी को फैशनेबल जनाना जूतियां। अपना ख्याल यहां तो हाई-हील के जूते खाने के लिए दुनिया में ऐसे स्टोर भी खुल रहे हैं जहां ग्राहक बड़ी संख्या में आते हैं और उनकी लाइन लगती है। एक रेस्टोरेंट सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना कि वहां खाने में जूते परोसे जाते हैं। खाने वाले जूता, चॉकलेट से बना है।

            जूते का स्वाद ऐसा है कि सब जानते हैं। हो सकता है इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हो। कोई जीवन ऐसा नहीं जिसने इसका स्वाद ना जाना हो। किंतु सत्य यह भी है कि इस विषय में पूछे जाने पर हर कोई किन्नी काटता हैं। यह संकोच कैसा…? हमारे भरत जी जूते का स्वाद बखूबी जानते थे इसलिए तो रामजी के खड़ाऊ लेकर अयोध्या वापस लौट आए और खड़ाऊ पूजते रहे। पूरा भक्तिकाल भगवान के श्रीचरणों में बैठ कर कौन से स्वाद को लेकर साहित्य का स्वर्णयुग बन बैठा है। साहब को कभी मेम साहब के जूतों का स्वाद पूछ कर देखिए। ऐसे गोपनीय प्रकरण रसरंजन के बाद श्रीमुख की शोभा होते हैं। यकीन कीजिए जूतमपाक से बेहतरीन स्वाद इस संसार में दूसरा नहीं है और बीरबल को सारे स्वाद जान लेने के बाद यही उत्तर देना पड़ा। अकबर भी यह उत्तर जाकर ना जाने क्यों चुप रहे!