25 दिसंबर, 2021
‘म्हारो काळजो’ संग्रै
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मिनखाजूण री अणथक जातरा नै अरथावण-बिड़दावण अर लगोलग बधावण री कवितावां है। कवि आपरै आसै-पासै अर मांयली दुनिया मांय हुय रैया बदळावां कानी ध्यान करण री बात करै। जीवण रो खरो साच सेवट मरण मानीजै पण मरण नै मंगळ मानण वाळी कविता परंपरा मांय अबै पैली दांई रणखेत मांय जुध नीं हुय’र नितूकै अंतस मांय जुध चालै। कवि जूण-खेत मांय बेफिकरी सूं आगै बधण अर भरोसो राखण रो संदेस देवै। कवि बदळतै बगत मांय छूटतै संस्कारां अर मिनखाजूण मांय खूटतै मिनखपणै नै समझण-समझावण अर चेतावण री बात करै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां जाण्यै-अणजाण्यै साच नै फेर फेर जाणकारी मांय लावण री कवितावां है। ‘कठै सूं चाल/ कठै तांई पूगणो है/ कुण जाणै’ जैड़ी ओळ्यां इण बात री साख भरै। कवि जूण रै हरेक साच रो मन सूं स्वागत करण री बात करै। आं कवितावां री खासियत नवी बुणगट रै साथै कवि री आपरी भासा अर भावां है जिण रै पाण कविता बांचणियां रा मन मोवै।
‘म्हारो काळजो’ री कवितावां मांय युवा कवि री मनगत भेळै प्रौढ हुवतै कवि-मन री चिंतावां ई आपां देख सकां। जूण रा साच सूं ओ काळजो आकळ-बाकळ हुयोड़ो है। अठै अंतस रै लूण नै बचावण री बात भेळी अंतस सूं जुड़ी केई बातां है जिण मांय भासा अर जुबान री खास बात मिलैला। आं कवितावां नै बांचणो आपरै जुगबोध सूं अरू-भरू हुवणो है। आस करां कै कवि भेळै आखो मानखो ई आपरी भासा, साहित्य अर संस्कारां री हेमाणी नै बचावण खातर संभैला। जूण मांय बिसरता मूल्यां नै बचावण री साची अर खरी आफळ खतार कवि नै मोकळी बधाई रै साथै मंगळकामनावां कै कवि री काव्य-जातरा अणथक आगै आगै बधैला।
- डॉ. नीरज दइया
18 दिसंबर, 2021
सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि : तिवाड़ी
हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि सुधीर सक्सेना मानवीय चेतना के कवि हैं।
उनके मन में जीव मात्र के प्रति प्रेम और करुणा है और वे किसी को दुःखी
नहीं देख सकते। विषम स्थितियाँ उन्हें ईश्वर से प्रश्न करने को विवश करती
रही है। इसी प्रश्नाकुलता में कवि की गहरी मानवीय आस्तिकता को हम देख सकते
हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार मालचंद तिवाड़ी ने
सुधीर सक्सेना के कविता संग्रह 'ईश्वर : हाँ, नहीं.. तो' पर वरिष्ठ
साहित्यकार बुलाकी शर्मा के सम्पादन में प्रकाशित विमर्श-पुस्तक तथा
सुपरिचित कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया की राजस्थानी अनुवाद पुस्तक का लोकार्पण
करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में ये उद्गार व्यक्त किए।
होटल जोशी में
मुक्ति संस्था की ओर से आयोजित इस समारोह में मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि
ईश्वर से प्रश्न करती ये कविताएं हिंदी के साथ अन्य भाषा के सुधि पाठकों को
ही नहीं, साहित्य के आलोचकों को भी विमर्श के लिए विवश कर रही हैं। इस
विमर्श पर बुलाकी शर्मा के सम्पादन में पुस्तक का आना और नीरज दइया द्वारा
इसका राजस्थानी में अनुवाद किया जाना इसकी सार्थकता का प्रमाण है।
कवि सुधीर सक्सेना ने कहा कि ईश्वर के अस्तित्व को सकारने के पक्ष में जितने तर्क हो सकते हैं, उससे कहीं अधिक उसे नकारने के पक्ष में भी हो सकते हैं। लेकिन हम तर्क के विपरीत भावनाओं में जीते हैं। सत्य को ईश्वर मानकर ही हम सत्यशोधक और सत्याग्रही हो सकते हैं। ऐसे सत्याग्राही जिसके लिए असत्य, घृणा, वैमनस्य, हिंसा, वैर-विरोध कोई अर्थ नहीं रखते। उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि मेरी इन कविताओं को समालोचकों ने गम्भीरता से लेते हुए इन पर विमर्श करना आवश्यक माना।
डॉ नीरज दइया ने कहा कि सुधीर सक्सेना के ईश्वर में राम-रहीम, वाहे गुरु, यीशु आदि सबकी उपस्थिति है। कवि के ईश्वर से प्रश्न हमारे अपने प्रश्न हैं जिनसे हम रोजमर्रा के जीवन में रूबरू होते हैं। साकार-निराकार सत्ताओं के बीच कवि उस ईश्वर से हमारा साक्षात कराते हैं, हमारा हमारा है। इन तरह की कविताएं राजस्थानी में कम हैं इसलिए इन्हें राजस्थानी पाठकों तक पहुंचाना मैंने अपना दायित्व माना।
समारोह अध्यक्ष वरिष्ठ कवि-कथाकार नवनीत पांडे ने कहा कि सुधीर सक्सेना यायावर हैं। देश-विदेश में घूमते हुए वे स्वयं को पूरी दुनिया का मानते हैं और उनके सरोकार आम जन से हैं। ईश्वर से सवाल करने वाले सुधीर सक्सेना सत्ता और व्यवस्था से सवाल करने में भी अग्रणी रहे हैं। वे हमारी मरुधरा बीकानेर आते हैं तो यहां की माटी और यहां की तासीर उनसे कविता रचवा लेती है।
साहित्यकार रामप्रकाश जोशी मन्नू, श्रीप्रकाश जोशी, राजेंद्र जोशी समेत कई साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों ने अपने विचाररखे। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ चित्रकार प्रफुल्ल पळसुलेदेसाई ने किया।
17 दिसंबर, 2021
रजनी छाबड़ा के कविता संग्रह ‘आस की कूंची से’ का लोकार्पण
01 दिसंबर, 2021
श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी खातर मोकळी मोकळी बधाई
आदरजोग
श्री जितेंद्र निर्मोही अर श्याम शर्मा जी काल बीकानेर पधारिया तो बां सूं
मानजोग श्री बुलाकी शर्मा, श्री राजेंद्र जोशी अर डॉ. प्रशांत बिस्सा जी
रै भेळप मांय लांबी हथाई रो जोग बण्यो। साहित्यिक चरचा पछै जितेंद्र जी अर
श्यामा जी नै ‘सांवर दइया की चयनित राजस्थानी कविताएं’ अर ‘अंतरंग’ पत्रिका
रो राजस्थानी कहाणी विशेषांक भेंट करियो। यादगार मुलाकात-चरचा, भळै-भळै
निर्मोही जी नै श्री नानूराम संस्कर्ता सम्मान खातर मोकळी मोकळी बधाई अर मंगळकामनावां। 
महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष जी का बीकानेर में नेगचार संस्था द्वारा स्वागत-सम्मान....
हिंदी दलित साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवि डॉ. असंगघोष का नेगचार संस्था द्वारा सम्मान किया गया। भोपाल से पधारे कवि का सम्मान शॉल ओढाकर एवं पुस्तकें भेंट कर किया गया। लालगढ़ पैलेस में आज आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के अध्यक्ष साहित्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि असंगघोष कवि के रूप में जाना पहचाना नाम है और इनकी कविताओं में दलित समाज के साथ बदलते भारतीय समाज के सुंदर चित्र देखे जा सकते हैं। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के लंबे सफर में अपनी व्यस्तताओं में भी कविता और कला माध्यमों के लिए उन्होंने अपनी संवेदनाओं को बचाए रखा है।
मुख्य अतिथि कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया कहा कि असंगघोष जी की कविताओं में जिस सहजता-सरलता के साथ मन को छूने वाली संवेदनाओं का वर्णन मिलता है वह दलित कविता धारा में ही नहीं वरन समकालीन कविता में महत्त्वपूर्ण है। आपके कविता संग्रह- खामोश नहीं हूँ मैं, हम गवाही देंगे, मैं दूँगा माकूल जवाब, समय को इतिहास लिखने दो, ईश्वर की मौत, हत्यारे फिर आएँगे आदि की चयनित कविताओं का संचयन-संपादन सुधीर सक्सेना द्वारा किया गया है, जिसे पढ़कर उनको समग्रता में जाना जा सकता है। दइया ने बताया कि असंगघोष का जन्म मध्य प्रदेश के जावद नामक छोटे से कस्बे में दलित परिवार में हुआ था किंतु लंबे संघर्ष के बाद आपने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। दलित साहित्य को साहित्य की मुख्य धारा के रूप में चर्चा में लाने का श्रेय जिन कवियों को दिया जाता है उनमें उनका नाम प्रमुख है।
कॉलेज प्राचार्य एवं प्रकाशक डॉ. प्रशांत बिस्सा ने कहा कि असंगघोष प्रशासनिक सेवा में रहते हुए भी साहित्य के प्रति समर्पित हैं। कवि के साथ साथ वे बेहतरीन फोटोग्राफर और पर्यावरण चिंतक हैं । । पक्षियों के प्रति उनका विशेष मोह है और वे देश के विभिन्न अंचलों में घूमकर उनके संरक्षण के लिए सतत सक्रिय हैं । पक्षी विषयक आपका शोध कार्य जल्द ही प्रकाश में आएगा तो इस क्षेत्र को एक नई दिशा मिलेगी।
मरुनगरी में सम्मानित करने के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए कवि असंगघोष ने कहा कि वे मालवा के निवासी हैं और मालवा और राजस्थानी दोनों भाषाएं बहुत करीब की भाषाएं है । इनमें साझा संस्कृति के साथ विपुल शब्द भंडार की परंपरा है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति के विकास के लिए सरकारों को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कुछ चुनिंदा कविताओं का भी प्रभावी पाठ किया। श्रीमती असंगघोष ने आभार व्यक्त किया।










