15 अगस्त, 2019

‘आड्यां अळूझी जूण’ / महेन्द्र मोदी

पोथी - आड्यां अळूझी जूण (संस्मरण) लेखक- महेन्द्र मोदी, प्रकाशक- बोधि प्रकाशन, जयपुर , संस्करण : 2019 ; पृष्ठ- 324 ; मूल्य- 350/-
  ब सूं पैली तो ‘आड्यां अळूझी जूण’ पोथी खातर लेखक महेन्द्र मोदी जी नैं मोकळी बधाई अर मंगळकामनावां। राजस्थानी में संस्मरण लिखणियां गिणती रा है- मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, शिवराज छंगाणी, नेमनारायण जोशी, सूर्यशंकर पारीक, सत्येन जोशी, कमला कमलेश, तारालक्ष्मण गहलोत, अस्तअलीखां मलकांण, बैजनाथ पंवार, देवकिशन राजपुरोहित, जितेन्द्र निर्मोही, अनुश्री राठौड़, महेन्द्र मोदी, हरिचरण अहरवाल आद। महेन्द्र मोदी री नवी पोथी बाबत बात करां उण सूं पैली आपां जाणा कै आ जातरा अधजागी रातां : अधसूता दिन’ 2017 में पैलै खंड सूं चालू हुई। लेखक मुजब आ पोथी तीजै खंड मांय पूरी हुवैला। दोनूं पोथ्यां नैं देख’र लेखक री हिम्मत री सरावणा करूं कै अस्सी का सौ पानां री पोथ्यां रै दौर में आप कीं खेचळ बेसी करी हो।
            पोथी री बात करां तो आपां साम्हीं लेखक महेन्द्र मोदी रेडियो री आपारी नौकरी अर जूण-जातरा री लांठी अनुभव गांठड़ी नैं खोलर राखण री हिम्मत करी है। बै लिखती बगत किणी बात री सोच-फिकर दर ई कोनी करै। अठै साफ सबदां में कैयो जावणो चाइजै कै सरकारी काम-काज सूं छुट्टी लियां पछै, बै जाणै आपरै पूरै मैकमै री छुट्टी करण मांय लाग्योड़ा है। छुट्टी इण अरथ मांय कै मोदी जी अफसर हा अर मैकमै री पोल-पट्टी अबै खोलण लाग रैया है तो केई नांवां नैं बदळ ई दिया है जिण सूं किणी माथै आंच नीं आवै।
            पैली पोथी में इक्कतीस अर दूजी पोथी में अठाइस संस्मरण राख्यां पछै ई अजेस ठाह नीं कित्तो कांई लिखैला, का कैवां लिखज चुक्यो है। कैयो जाय सकै कै जियां-जियां मिनख री उमर बधै उण मांय धीरज बापरतो जावै अर फेर मोदियां रो तो सुभाव ई घणो मीठो हुया करै, बै इसा मीठा बोलै कै ठाह ई कोनी पड़ण देवै कै कद जादू कर देवै। इण पोथी मांय मोदी जी घणै धीरज सूं आपरी जूण री चोखी-माडी घणी सारी बातां नैं अेकठ करण रो जतन करियो है। सरकारी जादतिया अर काण-कायदा रै आंटै बै घणै आकरै सुर मांय केई जागा आपरै सुभाव नै बिसरावतां बोलता ई दीसै, पण इत्तो बेगो कोई फैसलो आपां नैं नीं करणो चाइजै क्यूं कै हाल तीसरी पोथी आवणी बाकी है। 
          असल मांय मोदी जी आपरै लांबै अनुभव रै पाण किणी बात नै रेडियो माथै किण ढाळै कैवणी चाइजै रो आंटो जाण चुक्या अर उणी आंटै रै कारणै बै आपरै सुणणियां अर बांचणियां नैं प्रभावित करै। ओळूं-गांठड़ी मांय सूं छांट-छांट’र या कैवां टाळ-टाळ’र केई छोटी-छोटी अर लांबी बातां किणी बातपोस दांई जाणै दोनूं पोथ्यां मांय पुरसी हुवै। हरेक संस्मरण खुद मांय पूरो हुवतां थकां ई आगलै-लारलै संस्मरणां सूं जुड़’र पोथी किणी आत्मकथात्मक उपन्यास दांई आगै बधती जावै। इण पोथी नैं संस्मरणां री पोथियां रै क्रम री दूजी पोथी कैयो गयो है, पण म्हारो मानणो है कै महेन्द्र मोदी री आत्मकथा रो ओ दूजो भाग है।
            पैली पोथी री हर करां तो जूथिका रॉय रो गाणो अर उण री मीरा सूं तुलना रै प्रसंग में महादेवी वर्मा नै ई लेखक रो याद करणो, पण उण बाबत पूरो प्रसंग स्यात पोथी रै तीजै भाग मांय आवैला। दूजी पोथी मांय लेखक रो खुद आपरी पैली पोथी रै संस्मरण नै चेतै कराणो अर दुसरावणो ई अठै देख सकां। गळी री ओळूं नै चितरता दोनूं पोथी मांय भंवरी रो प्रसंग किणी उपन्यास दांई ठेठ तांई परोटण सूं कड़ियां आपसरी मांय जुड़ती जावै।
            लारली पोथी बाबत म्हारो मानणो हो कै पोथी आपां री दीठ सूं उळझ्योड़ै अर लगोलग उळझतै बगत नैं अरथावण रो काम करै। उण विगत सूं आगै पोथी- ‘आड्यां अळूझी जूण’ मांय महेन्द्र मोदी री जूण-जातरा सैकंड ईयर रै परीक्षा रै बगत सूं चालू हुवै अर बै घर-परिवार, मित्रां भेळै आकाशवाणी री नौकरी बाबत घणो कीं चेतो करता-करावतां सेवट आपरै बेटै-पोतै भेळै बीकानेर मांय मौज रा दिनां री हर करै। पोथी सूं एक दाखलो देखां-
            “जिकी धरती नै लोक धोरां री धरती रै नांव सूं पिछाणता हा, हम्मै तो उण बीकानेर रै आसै-पासै धोरां रो नांव निशाण ई कोनी। लारलै दिना जद म्हारै पोतै टाइगर धोरा देखण री इन्छ्या जताई तो म्हे कार ले’र बोळा आगा निकळ ग्या पण धोरां जै’ड़ा धोरां म्हांनै निजर नई आया जदकै कोई जमानो हौ जणा धोरा उड उड’र म्हारै आंगणै में आ बिराजता। घणी पैली री बात क्यां करां टाइगर अर उण रै डैडी यानि म्हारै बेटै वैभव रै बिचाळै एक पीढी रौ ई तो फासलो है, वैभव छोटो हौ जणा रस्तै में ई धोरा मिल जांवता। वैभव खासी ताळ वां धोरां में रमतो रैंवतो। एक ई पीढी में म्हे लोकां सोनै जै’ड़ै चिलचिलातै धोरां नै पाधरा कर’र उण री ठौड़ पॉलीथीन रौ कचरो खिंडा दियो।” (आड्यां अळूझी जूण, पेज-293)
            आपां आगै कीं बात करां उण सूं पैली एक दखलो भळै लेवणो ठीक रैसी- “अब तो बीकानेर के आस पास बालू के टीलों का कहीं नाम निशान भी नहीं है, पिछले दिनों जब हम लोग बीकानेर गए हुए थे, मेरे पोते ने बालू के उन टीलों को, जिन्हें हम बचपन से धोरों के नाम से पहचानते आये हैं, देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो हम कार लेकर जाने कितने किलोमीटर चारों ओर घूम आये, हमें कहीं धोरों के दर्शन नहीं हुए जबकि किसी ज़माने में ये धोरे आँधियों में उड़ उड़ कर हमारे घरों में आ जाया करते थे. वैभव जब छोटा था तब तक धोरे हमसे इतनी दूर नहीं हुए थे. अक्सर जब शाम को मैं खाली होता था, उसे स्कूटर पर आगे खड़ा करके गंगाशहर की तरफ निकल जाता था, रास्ते में ही धोरे मिल जाया करते थे और वैभव उन धोरों में देर तक खेलता रहता था. वैसे बहोत मुश्किल वक़्त था वो. पानी के लिए भिश्तियों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो चमड़े की पखालों और मशकों में भर कर पानी लाते थे. नाप तौल कर पानी काम में लेना पडता था.” (दी लल्लनटॉप,  जब चारों तरफ बिच्छू जैसी फितरत वाले लोग हो गए थे, 06 अगस्त, 2018)
            इण लारली ओळी नैं कीं पलेथन लगा’र लेखक इण ढाळै लिखै- ‘बियां उण बगत जिनगी में च्यारूं मेर दोरप ई दोरप ही। स्सोरो कीं कोनी हौ। पाणी का तो रतनसागर कूऐ सूं भर’र लाओ अर का फेर भिश्तियां सूं नखवाओ। कूऐ माथै 10-12 नळका लाग्या थका हा, आधा हिंदुआं सारू आधा मुसळमानां सारू। बिच में एक मोटी सी लकीर खैन्चीज्योड़ी ही। एक पासै लिख्योड़ो हौ हिन्दू अर दूजै पासै मुसळमान। म्हांरै घरां री लुगायां पाणी भरण खातर घड़ो ले’र कूऐ पर नईं जांवती। म्हे भिश्तियां सूं पाणी नखवाया करता जिका चमड़ै री मशाक या पखाल में पाणी भर’र लांवता अर म्हारै घर की कूंडियां नै भर देंवता। पाणी सोनै ज्यूं नाप जोख’र काम में लेवणो पड़तो।’
            पोथी रो नांव है- ‘आड्यां अळूझी जूण’ पण म्हारै साम्हीं आ आडी अळूझगी कै हिंदी री रचनावां नै राजस्थानी मांय खुद लेखक अनुवाद का दूसर सिरजै तो इण लारै कांई कारण रैया हुवैला? राजस्थानी में कीं पण लिखणो रचणो गीरबै अर हूंस री बात है अर उम्मीद करां कै बै राजस्थानी में मौलिक सिरजण कर’र उण रो हिंदी अनुवाद, अनुवाद रूप पाठकां साम्हीं राखैला तो घणी रूपाळी बात हुवैला।      
            लारली पोथी मांय लेखक म्हारी बातमांय भासा-पख पेटै लिख्यो- भाषा रा विद्वान म्हनै अेक बात सारू माफी देवै, ओ म्हारो निवेदन है। इण किताब में जिकी भाषा म्हैं लिखी है बा राजस्थान में किणी अेक ठौड़ री भाषा नईं है। म्हैं मारवाड़ में पैदा हुयो, पण थोड़ै थोड़ै बखत छेड़ै न्यारी-न्यारी जिग्यां तबादला हूवण रै कारणै म्हारी भाषा में स्यात राजस्थान री केई जिग्यावां री भाषावां रळगी।
            लेखक री आं ओळ्यां पेटै भळै म्हारो ओ ई कैवणो है पोथी मांय भासा अर बोलियां रै रूपाळै मेळ भेळै जे मानक रूप परोटण माथै गौर करैला तो बात सांतरी बणैला।
०००००
डॉ. नीरज दइया
--
राजस्थानी में संस्मरण लिखणियां-
मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, शिवराज छंगाणी, नेमनारायण जोशी, सूर्यशंकर पारीक, सत्येन जोशी, कमला कमलेश, तारा लक्ष्मण गहलोत, अस्तअली खां मलकांण, बैजनाथ पंवार, देवकिशन राजपुरोहित, जितेन्द्र निर्मोही, अनुश्री राठौड़, महेन्द्र मोदी, हरिचरण अहरवाल...
--------

राजस्थानी की पहली कहानी

सत्तरहवीं शताब्दी से राजस्थानी भाषा में वार्ताओं के रूप में कहानी का आरंभिक रूप मिलता है, जिनको ‘वात’ अथवा ‘बात’ नाम से पहचाना जाता है। यद्यपि आधुनिक राजस्थानी कहानी की शुरूआत बीसवीं सदी के आरंभ में हुई है। बांग्ला, मराठी, हिंदी, अंग्रेजी आदि साहित्य की प्रेरणा से भारतीय भाषाओं में कहानी की जमीन तलाश की गई। राजस्थानी में पहली कहानी का श्रेय अधिकांश विद्वान श्री शिवचन्द भरतिया की ‘विश्रांत प्रवासी’ (1904) को देते हैं। यह हिन्दी मासिक ‘वैश्योपकारक’ (कोलकत्ता) में प्रकाशित हुई थी, जो पूर्ण नहीं है। हिंदी में जैसे भारतेन्दु जी को मान-सम्मान मिला वैसा ही मान-सम्मान और स्थान राजस्थानी में राजस्थान के प्रवासी साहित्यकार शिवचंद भरतिया को प्राप्त हुआ है। आपका राजस्थानी उपन्यास और नाटक के क्षेत्र में भी अद्वितीय योगदान रहा है।
आपका जन्म कन्नड़ (हैदराबाद) में चैत्र शुक्ला सप्तमी, विक्रम सम्वत् 1910 (ई.स. 1853) में हुआ। आपके दादा गंगाराम जोधपुर रियासत के डीडवाणा गांव के वैश्य अग्रवाल कुल के थे। आपके पिता का नाम बलदेव था।
शिवचन्द भरतिया का निधन 12 फरवरी, 1915 को इंदौर में हुआ।

राजस्थानी भाषा में आपकी कृतियां हैं-
·         कनक सुन्दर (नवल कथा)
·         केसर विलास (नाटक)
·         फाटका जंजाल (नाटक)
·         बोध-दर्पण
·         मोत्यां की कंठी (दूहा-संग्रह)
·         विश्रांत प्रवासी (कहानी)
·         वैष्यप्रबोध
·         संगीत मानकुंवर (नाटक)

विश्रांत प्रवासी

            हवा की लहरें ऊपर की ओर आ रही थी। आठ बज रहे थे। धीरे-धीरे लोग बिखरने लगे। आस-पास भीड़ कम हो गई। मेरे प्रवासी शरीर को अब कुछ शति मिली और विचार-शक्ति बढ़ी। प्रेम का उदय होने से हृदय भीतर ही भीतर फड़फड़ाया। मानो नींद से जगकर आदमी आलस्य तोड़ता जम्हाई लेता है। बार-बार जम्हाई लेते हुए मन ही मन कहा-हे परमेश्वर, तुम्हारी यह कैसी लीला है, ब्रह्मदिक भी पार नहीं पा सके। तुम्हारी विचित्र माया है। कहां मेरी मातृभूमि, कहां मेरा देश और घर-संसार? घर छोड़ते समय ऐसा चित्र मेरे हृदय पटल पर अंकित हुआ कि उसका विस्मरण मेरी मृत्यु के साथ ही होगा। प्रिय राधवल्लभ का बार-बार समझाकर नहीं जाने का हठ, क्रोधावेश और प्रेममय संभाषण अब भी मेरे कानों में गूंज रहा है। माताजी की आशीर्वाद युक्त दृष्टि और जल्दी वापसी की आज्ञा मुझे घर की तरफ खींच रही है। हाय, मेरी प्रिया के प्रेमिल टप-टप-टप अश्रुपात से मेरा प्रवासी मन अब तक मुग्ध है, भ्रांतियों से धिरा मैं विचार-शून्य होकर बेंच के हत्थे पर सिर रखकर सो गया।
            निंद्रा नहीं थी। वह मोह भरी भ्रांति ही थी। नहीं, नहीं प्रेम की मूर्छा थी। थोड़ी देर बाद मेरी आंख खुली। आंख खुलते ही अश्रुधारा निकल पड़ी। दिल ने कहा-मैं बहुत दिनों से घर छोड़ने का विचार कर रहा था, परंतु कभी प्राणप्रिया से कह नहीं सका। मैं अच्छी तरह जानता था कि अगर पहले बता दूंगा तो परदेश जाना कभी संभव नहीं होगा। प्रेम-बंधन विचित्र होता है। बड़ी-बड़ी लकड़ी बेधने वालों! भ्रमर जरा से कमल में बंधकर अंदर ही अंदर मर जाता है, पर कमल के दांत नहीं लगा सकता।
            माधुर्य बिना अनुभव जाना नहीं जाता। उसकी माधुरी पता मधुपान किए बिना नहीं चलता। जिससे अनिर्वचीय आंनद प्राप्त होता है, जिससे हृदय खिंचता है, जिसके लिए प्रबल इच्छा उत्पन्न होती है और जिसके लाभ से हृदय स्नेह से परिपूर्ण होता है, वहीं प्रेम है। यह भाव हृदय को परस्पर खींचता है। बिजली के तार की भांति झटके जैसे एक दूसरे हृदय पर आघात करता है। प्रेम का भाव, प्रेम का भावुक मन और प्रेम की भावना में से किसी का भी लोप हो जाए तो दूसरा नहीं रहता। वह भावमयी मूर्ति पांव से जमीन पर भाव लिखती, अश्रुधारा से लेख बहाती, हृदय को कंपित करती, दृष्टि को तिरोहित करती, सुख को आच्छादित करती, कटाक्ष बाणों से रास्ता रोकती, मन का हरण करती, मधुर, आनंदहीन, चांचल, उदास, गलित-वेदना, प्रत्यक्ष करुण रस की नदी मेरे निःसहाय हृदय को बहा रही है, डूबो रही है और प्राणों को व्याकुल कर रही है।
                                                                                              
(अनुवाद- डॉ. नीरज दइया)
-----------
डॉ. नीरज दइया (1968) हिंदी और राजस्थानी में विगत तीन दशकों से निरंतर सृजनरत हैं। आप कविता, व्यंग्य, आलोचना, अनुवाद और संपादन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखते हैं। अब तक आपकी दो दर्जन से अधिक कृतियां विविध विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा में मुख्य पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. दइया को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार समेत अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. नीरज दइया की प्रमुख कृतियां हैं- आलोचना रै आंगणै, बिना हासलपाई, जादू रो पेन, कागला अर काळो पाणी, मंडाण, पाछो कुण आसी (राजस्थानी), राजस्थानी कहानी का वर्तमान, उचटी हुई नींद, पंच काका के जेबी बच्चे, टांट टांय फिस्स, आधुनिक लघुकथाएं, कागद की कविताई (हिंदी) आदि।
वर्तमान में आप केंद्रीय विद्यालय, क्रमांक-1, बीकानेर में पी.जी.टी. (हिंदी) के पद पर सेवारत हैं।
- डॉ. नीरज दइया
सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी,
बीकानेर- 334003 (राज.)
मो. : 9461375668
-मेल : drneerajdaiya@gmail.com

06 जुलाई, 2018

शब्द संस्थान सूरतगढ़ द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘कागद की कविताई'

साहित्यकार बोले- राजस्थानी भाषा के लिए कवि कागद के प्रयासों से युवा वर्ग ले प्रेरणा

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन...

सूरतगढ़| ओमपुरोहित कागद राजस्थानी व हिंदी जगत के लोकप्रिय रचनाकार थे। उन्होंने नवोदित रचनाकारों के प्रोत्साहन के लिए किया गया ‘थार सप्तक’ का संपादन राजस्थानी साहित्य के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य है। यह बात वरिष्ठ समालोचक डॉ. नीरज दैया ने गुरुवार को ग्रामोत्थान स्कूल प्रांगण में कागद जयंती समारोह में बोलते हुए कही। उन्होंने कहा कागद की कविताएं शीर्षक से पांडुलिपि तैयार की है, जो जल्द ही पाठकों तक पहुंचेगी। समारोह में संभाग के वरिष्ठ रचनाकार शामिल हुए। साहित्यकार मोहन आलोक की अध्यक्षता में हुए समारोह में कागद की धर्मप|ी भगवती पुरोहित अतिथि के रूप में मौजूद थीं। डॉ. हरिमोहन सारस्वत ने कागद की राजस्थानी व हिंदी रचनाओं का वाचन किया। महेंद्रसिंह शेखावत ने स्मृति में रचित कविता पढ़ी। वक्ताओं ने कागद के रचनाकर्म के साथ उनके व्यक्तित्व पर संस्मरण सांझा किए। पत्रकार करणीदानसिंह राजपूत, संदेश त्यागी, डॉ. मदनगोपाल लड्ढा, राजूराम बिजारणियां, नवनीत पांडे, हरीश हैरी, सतीश छींपा, नरेश मेहन ने कागद के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू संस्मरण के माध्यम से बताए। साहित्यकार मोहन आलोक ने कहा कि राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए कागद ने अनूठे प्रयास किए थे, जिनसे प्ररेणा लें। भगवती पुरोहित ने आयोजन के लिए आभार जताते हुए कागद की स्मृति में रचित कविताएं प्रस्तुत की। कागद पुत्री भारती व अंकिता पुरोहित भी समारोह में मौजूद थीं। समारोह में डॉ. अरूण सहरिया, सुरेंद्र सुंदरम, विनोद वर्मा, प्रहलादराय पारीक, आशा शर्मा, सुमन शेखावत, जयश्री सारस्वत, दिनेश चंद्र शर्मा, लाजपतराय भाटिया, नरेश रिणवा, नरेश वर्मा, अनिल धानुका, रमेश माथुर शामिल हुए। संचालन आकाशवाणी के वरिष्ठ उदघोषक राजेश चड्ढा ने किया। गोपीराम गोदारा ने आभार जताया।

05 जुलाई, 2018

कागद हो तो हर कोई बांचे / डॉ. नीरज दइया

    कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ (05 जुलाई, 1957 - 12 अगस्त, 2016) के ब्लॉग का नाम है- ‘कागद हो तो हर कोई बांचे’। यह आज से करीब दस वर्ष पहले 2009 में जब बनाया था, तब उनके साथ मैं था। चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे की तर्ज पर रखे इस शीर्षक में ‘भाग ना बांच्या जाय’ की व्यंजना आज अधिक व्यापक रूप में समझ आती है। कागदजी भाग्य बांचना भी जानते थे, लेकिन उन्होंने सदा कर्म पर ही विश्वास किया। वे एक आदर्श शिक्षक के रूप में अपना सामाजिक दायित्व निभाते हुए समाज में रचनाकार के रूप में भाषा, साहित्य और संस्कृति की अलख जगाते रहे। वे गीता के ज्ञान को आत्मसात किए निरंतर कर्मशील रहते हुए साहित्य-समाज में खोए रहे। राजस्थान शिक्षा विभाग में उन्होंने एक चित्रकला-शिक्षक के रूप में सेवाएं देते हुए, शैक्षिक प्रकोष्ठ अधिकारी पद तक का सफर किया।
    दो अवधारणाएं परस्पर विरोधी हैं। एक कहती है कि इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति कवि होता है। हरेक के पास कवि-मन है। ऐसा मन जिसका परिष्कार संभव है। दूसरी अवधारणा के अनुसार कवि जन्मजात होते हैं। वे बनाएं नहीं जाते। कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा को साहित्य-शास्त्र में अपने ढंग से समझाया गया है। कागद हो तो हर कोई बांचे में जो पठनीयता का भाव है वह सपाट बयानी किंतु संवेदनशीलता से पोषित है। बहुधा ऐसा भी होता है कि किसी एक कवि का चेहरा दूसरा कवि धारण कर लेता है। कहीं अंशिक साम्य और विरोधाभाव के साथ कविता-यात्रा के आरंभ में प्रत्येक कवि का संघर्ष खुद का व्यक्तिगत चेहरा निर्मित करता रहता है।
    कविता के क्षेत्र में कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ एक ऐसा चेहरा है, जिन्होंने तीस  वर्षों की सतत साधाना से अपना व्यक्तिगत चेहरा निर्मित किया है। यह ऐसी निर्मिति है जिसे हर कोई धारण नहीं कर सकता। चार हिंदी और आठ राजस्थानी कविता-संग्रह ओम पुरोहित ‘कागज’ के प्रकाशित हुए हैं। अनेक कविताएं अब भी अप्रकाशित हैं। सही अर्थों में बड़ा कवि वही होता है जो अपनी विशिष्टताओं का दंभ नहीं पालता। ऐसे अनेक कवियों के बीच कागद जी हमें बराबर अहसास कराते रहे हैं कि वे कवि तो हैं पर किसी दूसरे लोक के प्राणी नहीं हैं। उनका जीवन इतना सहज और सरल रहा कि उनकी सहजता-सरलता के रहते बहुत बार वे कवि-रूप में अस्वीकार किए गए थे। किंतु कवि कागद को भी जैसे कवि होने से जरूरी नेक आदमी होना ही सदा मंजूर रहा।
    हम सब के बीच कागद जी एक सामान्य इंसान की भांति सखा भाव में रहते रहे। कभी उन्हें उग्र या प्रतिरोध की मुद्रा में आक्रोशित होते हुए नहीं देखा गया। उनके भीतर स्वाभाविक रूप से एक कवि  था, जो बेहद विनम्र, सौम्य, शांत, सरल था। ये वे गुण थे जिनसे वे हर किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। वे सदा संयमित होकर जीवन-राग की बातें किया करते थे। बहुत बार मैंने पाया कि वे बहुत कुछ भीतर छिपा कर भी बाहर सर्वानुकूल और सहजता धारण किए रहते थे।
    ओम पुरोहित ‘कागद’ के समग्र साहित्य का अवलोकन करें तो वे भाषाओं के बंधनों से परे ऐसे भारतीय कवि के रूप में लगते हैें। हिंदी और राजस्थानी भाषा महज एक माध्यम है। वे हमारे मनोभावों और अनुभूतियों को वाणी देने वाले प्रमुख कवि हैं। अकाल और कालीबंगा पर आधारित कविताओं को क्या किसी भाषा के बंधनों में बांधा जा सकता है! यह शब्दों के माध्यम से रंगों और रेखाओं की ऐसी धरोहर है जिसे किसी सीमा में बांधना उचित नहीं है।
    हिंदी और राजस्थानी के साथ साथ आपको पंजाबी भाषा में भी समान गति प्राप्त थी। आपने कुछ काविताएं पंजाबी में भी लिखी हैं। भाषाओं का क्षेत्र इतना व्यापक और विशाल है कि भारत की किस भाषा में कहां क्या हो रहा है, यह सहजता से जानना कठिन है। अपने राजकोट प्रवास के दौरान कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ की अकाल से संबंधित कुछ कविताओं का गुजराती अनुवाद मैंने प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका ‘कविता’ में देखे। मैं बहुत खुश हुआ और कवि को बधाई का फोन लगाया। जब बात हुई तो पता चला कि उन्हें इसकी खबर तक नहीं है! यह अनुवादक और संपादक की गलत परंपरा है। ऐसा भी संभव है कि उन्हें सूचना दी गई हो और मिली नहीं हो। किंतु अनुवाद बिना कवि की अनुमति के प्रकाशित नहीं होना चाहिए।
    यहां एक बात जरूर स्पष्ट होती है कि समय, समाज, संस्कृति और देश-काल से जुड़ी रचनात्मकता किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती। उसकी महक दूर-दूर तक किसी न किसी रूप में किसी माध्यम से पहुंच ही जाती है। प्रत्येक क्षेत्र और आंख की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, इन सीमाओं का अतिक्रमण करने वाली रचनात्मकता को मैं प्रणाम करता हूं। निसंदेह कागदजी व्यापक जन-सरोकारों के कवि हैं। ‘कागद की कविताई’ उनकी कविता के साथ उनके कवि-मन और अंतर्संबंधों को देखने-दिखाने का एक छोटा सा प्रयास है। 
    बचपन से ही ओम पुरोहित को कागज इकट्ठा कर उसे जेब में रखने का शौक था। यही कारण था कि उन्हें उनके नाना श्री तेजमाल बोहरा ‘कागदिया’ कह कर बुलाया करते थे। ‘कागज’ को राजस्थानी में ‘कागद’ कहते हैं। लोक में प्रसिद्ध है- ‘हीमत कीमत होय, विन हिमत कीमत नही। / करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया॥’ नाना जी का स्नेहिल ‘कागदिया’ जैसे इसी सोरठे से प्रेरणा ग्रहण कर हमारी पूरी पीढ़ी के आदरणीय बन गए। उनको दिशा देने वाला घर-परिवार और विद्यालय मिला।
    जन्म जिस घर परिवार में हुआ वहां घर-आंगन में कविता खेला करती थी। पिता श्री रिद्धकरण पुरोहित साहित्यिक रुचि से सुसम्पन्न लोक साहित्य के मर्मज्ञ थे। पिताजी कविता के इस कदर रसिक थे कि कविता सुनना-सुनाना और पढऩा-पढ़ाना उनकी दैनिक दिनचर्या में था। अनेक लोककथाएं, लोकगीत और लोक कहावतों के मर्म पर गंभीरता से चर्चा करते थे। उन्होंने न केवल राजस्थानी वरन हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों को घर में सहेज रखा था। वे मीरा, कबीर, बिहारी, तुलसी से अमीर खुसरो की बातों में खो जाते थे। ढोला मारू रा दूहा, वीर सतसई उनकी प्रिय पुस्तकें थी। अनेक चारण कवि मित्रों की रचनाएं उन्हें कंठस्थ थी। इस साहित्यिक विरासरत में बालक ओम पुरोहित को कविताई सिखाई जाने लगी।
    वर्ष 1970 में ज्ञान ज्योति उच्च माध्यमिक विद्यालय, श्रीकरनपुर (श्रीगंगानगर) ने प्रवेश लिया और वहां प्रिंसिपल प्रख्यात कवि जनकराज पारीक का मिलना संयोग बना। आखिर एक दिन वह आया जब स्कूल में पारीकजी को लगा बालक ओम में काव्य-प्रतिभा है। वैसे ओम पुरोहित ने 9 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था। मराठी के प्रख्यात लेखक आनंद यादव के आत्मकथात्मक उपनयास ‘जूझ’ में जिस भांति बालक आनंद का कविता प्रेम स्कूल में जाग्रत होता है, कुछ वैसे ही भविष्य के एक कवि ओम पुरोहित ने भी अपने गुरु की भांति कविताएं गाने का प्रयास किया। उसे बहुत जल्द ही पता चल गया कि गुरुजी की भांति कविताएं, गीत-गायन उसके बस की बात नहीं है।
    ओम पुरोहित बताते थे कि उन पर सुरीले कंठ के धनी उनके गुरु जनकराज जी पारीक का कवि-रूप छाया रहता था। उनकी आरंभिक रचनाओं में कोरा आदर्शवाद था। वर्ष भर के अंतराल के बाद उनकी रुचि व्यंग्य-कविता की दिशा में बढ़ी। उनकी हास्य-व्यंग्य की कविताएं 1975-76 में लोकप्रिय होने लगी। इन्हीं दिनों श्रीगंगानगर के कवि और डांखला विधा के प्रेरक कवि मोहन आलोक से उनकी मुलाकात हुई। मोहन आलोक के सान्निध्य ने ओम पुरोहित के कवि को दिशा दी। कागद जी का जीवन पर्यंत मानना रहा कि इस आपाधापी और अपसंस्कृति के दौर में मनुष्य का कोई साथी नहीं है, केवल कविता ही एक हथियार है जो हमें संवेदनशील बनाती है।
    विचित्र संयोग यह है कवि ओम पुरोहित ‘कागद’ के कवि को पहले पहल पहचानने वाले उनके गुरुजी जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की कोई किताब वर्षों तक नहीं आई और अपने गुरुजी की अप्रकाशित कविताओं को उनके शिष्य ‘कागद’ ने ‘थार सप्तक-5’ में प्रकाशित किया। बाद में जनकराज पारीक की राजस्थानी कविताओं की स्वतंत्रत पुस्तक प्रकाशित हुई।
    मान-सम्मान और पुरस्कारों की बात करें तो ओम पुरोहित ‘कागद’ को कविता संग्रह ‘आदमी नहीं है’ पर राजस्थान साहित्य अकादमी का ‘सुधीन्द्र पुरस्कार’, राजस्थानी कविता संग्रह ‘बात तो ही’ पर राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से काव्य विधा का गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पुरस्कार अर्पित किया गया। उन्हें भारतीय कला साहित्य परिषद, भादरा का कवि गोपी कृष्ण ‘दादा’ राजस्थानी पुरस्कार मिला, सरस्वती साहित्यिक संस्था (परलीका) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़, कन्हैयाला सेठिया सम्मान, छोटीखाटू आदि द्वारा सम्मानित किया गया।  सन् 1989 में राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित ‘राजस्थान के कवि’ शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पाँव’ (संपादक-नंद भारद्वाज) में उनकी कविताएं संकलित की गई हैं।
    कागदजी का मानना था कि हमारे यहां राजस्थानी आलोचना विधा में पर्याप्त कार्य होना शेष है। संभवत: यही कारण था कि जब मेरी पहली आलोचनात्मक कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुई तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि मेरे ऐसे कार्यों से आलोचना का सूनापन दूर होगा। वे कहते थे कि कवि कुं.चंद्रसिंह बिरकाळी से लेकर पारस अरोड़ा तक और कहानीकार नृसिंह राजपुरोहित से लेकर सांवर दइया तक की यात्रा में आधुनिक राजस्थानी गद्य-पद्य साहित्य का पर्याप्त विकास हुआ है किंतु राजस्थानी आलोचना ठहरी हुई है। उनका मानना था कि डा.किरण नाहटा के शोधग्रंथ से वह आगे नहीं बढ़ी और यदि बी.एल. माळी के हाथों विकसित हुई तो नंद भारद्वाज के हाथों उसे सजने-संवरने का उसे किंचित अवसर मिला। अनेक कार्यों को लेकर कुछ सहमतियों-असहमतियों के विषय में भी हमारी चर्चा खुल कर होती थी। उनका मत था कि कुंदन माळी, डा. अर्जुनदेव चारण, डा.रमेश मयंक, श्यामसुन्दर भारती ने भी आलोचना की दिशा में कार्य किया है, किंतु केवल आलोचक के रूप में किसी की ख्याति नहीं बनी है। मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए। मैं कहता- ऐसा सोच कर कुछ करने के पक्ष में मैं नहीं हूं। किंतु यह सच है कि आधुनिक साहित्य और खासकर आजादी के बाद के साहित्य का विकास और समृद्धि का परचम आलोचना के अभाव में पूरा लहराने से वंचित है।
    राजस्थानी के आधुनिक साहित्य की भारतीय भाषाओं तक पहुंच जरूरी है और इसके लिए हमें आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में बहुत कार्य करना होगा। फु टकर आलोचनाओं से ना वे संतुष्ट थे और ना मैं। पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न आलेखों और साहित्यिक कार्यक्रमों में पढ़े जाने वाले पत्रवाचनों में एक बंधे बंधाए प्रारूप और कुछ विशेष रचनाकारों को ही केंद्र में रखे जाने पर वे असहमत थे। धड़ैबंध आलोचना उनको रास नहीं आती थी। वे कहते थे कि यदि कोई आलोचक आलोचना के नाम पर केवल वाह-वाह बटोरने के लिए तारीफ ही तारीफ लिखे और सबको संतुष्ट रखने का प्रयास करे तो उसे सात सलाम। यह आलोचक और आलोचना का धर्म नहीं है। आलोचना में तो रचना के पाठ से मुठभेड़ होनी चाहिए। हमारे साहित्यकार भी कितने भोले और मासूम हैं कि वे ऐसे आलेखों में अपने नाम जुड़े होने से मुंह के ताले रखते हैं। कागदजी राजस्थानी साहित्य के वैज्ञानिक काल विभाजन, विधागत बदलाव-विकास-दशा-दिशा, प्रवृत्तियां, सरोकारों और बदलते प्रतिमानों की स्थापनाओं पर गंभीरता से कार्य किए जाने की सलाह देते थे।
    उन्हें स्मरण कराया कि ‘सबद गळगळा’ पर युगपक्ष में 1995 में और ‘बात तो ही’ पर जागती जोत में 2003 में मैंने उनकी समीक्षाएं लिखी। ‘बात तो ही पण बैठी कोनी’ समीक्षा से वे कुछ असहमत भी हुए, किंतु उन्होंने स्वीकार किया कि वे कविता में सजग हुए हैं। आलोचना की सजगता ही रचनाकार को सजगता की दिशा देती है। आलोचना का अभिप्राय केवल कमियां निकालना नहीं वरन प्रेरणा और प्रोत्साहन भी होता है। कुछ संभावनाओं को देखकर ही आलोचना में कुछ निर्णय अग्रिम रूप से भी प्रस्तावित करने होते हैं। मुझे हर्ष है कि मैंने ‘राजस्थली’ त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका के 100वें अंक के लिए जो आलेख ‘राजस्थानी कविता रा साठ बरस’ लिखा, उसमें उन्हें मैंने दस महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल किया था। ओम पुरोहित ‘कागद’ के साहित्यिक अवदान पर बहुत कम लिखा गया है किंतु कागदजी पर विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने लघु-शोध लिखें हैं- ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संचेतना (2008), ओम पुरोहित ‘कागद’ द्वारा रचित ‘थिरकती है तृष्णा’ में अकाल की विभीषिका (2008-09), कवि ओम पुरोहित का हिंदी-काव्य : एक मूल्यांकन (2008-09), ओम पुरोहित ‘कागद’ के काव्य की संवेदना और शिल्प (2011-12) आदि।
ओम पुरोहित ‘कागद’ ने अनुवाद के रूप में अनेक रचनाओं का राजस्थानी, पंजाबी और हिंदी में परस्पर अनुवाद किए। अनूदित पुस्तक अभी कोई प्रकाशित नहीं हुई है किंतु कवि मायामृग के हिंदी कविता-संग्रह का उन्होंने राजस्थानी अनुवाद ‘कै जीवण कठैई ठैर नीं जावै’ नाम से किया है। उनकी अनेक रचनाओं का इतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद होने के अनेक उदाहरण है, किंतु किसी संपूर्ण कृति के अनुवाद का प्रकाशन नहीं हुआ है। कुछ राजस्थानी कविता-संग्रह अंकिता पुरोहित ‘कागदांश’ द्वारा अनुवाद किए गए हैं जो ‘कविता कोश’ अंतरजाल पृष्ठों पर देखे जा सकते हैं।  
    ओम पुरोहित ‘कागद’ राजस्थानी-हिंदी कविता में एक मुकाम पर पहुंचने के बाद भी अंत तक कविता और रचना-प्रक्रिया को लेकर बहुत विनीत रहे। छोटा होते हुए भी मुझे बहुत स्नेह और मान देते थे। इतना मान दिया कि मुझे लगता है कि उनकी मुझे लेकर जो आशाएं-संभावनाएं थीं उन्हें जिम्मेदारी से पूरित करना है। उनका कहना था कि मेरी आलोचना पुस्तक ‘आलोचना रै आंगणै’ को यश मिलेगा क्यों कि इस कृति के माध्यम से मैंने साहित्य आलोचना के पर्याप्त दरवाजों को खोलने का प्रयास किया है। यह सच भी हुआ कि मुझे आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का सर्वोच्च पुरस्कार अर्पित किया गया। उनके नहीं रहने पर ‘कागद सम्मान’ का मिलना भी मेरे लिए बहुत बड़ा सम्मान है। वैसे उन्होंने अपने जीवन काल में ही मुझे और मेरी कृति को बहुत बड़ा सम्मान दे दिया था। उन्होंने राजस्थानी साहित्य को एक अलग दिशा देने वाली कृति ‘आलोचना रै आंगणै’ के पक्ष में अपनी सार्वजिक टिप्पणी में लिखा था- ‘आ पोथी आगै री आलोचना सारू च्यानणो करसी, जकै री खासा दरकार ही। नीरज री इण पोथी में कमियां हो सकै पण नीत में खोट नीं। कोई सडयंतर नीं! आज तक घणकरी राजस्थानी आलोचना में नीत रै खोट री बात होंवती ही, अब ईमानदारी री बात चालसी! आज ताईं थरपीज्यैड़ै कूड़ रै टूटण रा चरड़का भी सुणीजसी!’
००००