05 जून, 2018

नहाना-धोना / डॉ. नीरज दइया

पको जानकर बिल्कुल हैरानी नहीं होगी कि हमारे जीवन का सार बस ‘नहाना-धोना’ ही है। आप तो मुझे ऐसे देखने लगे हैं, जैसे आपको हैरानी हो रही है। चलिए मुझे अपनी बात को बदल कर कहना चाहिए- आपको जानकर बहुत हैरानी होगी कि हमारे जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ है। कमाल हो गया साहब, जब मैं कहता हूं कि हैरानी नहीं होगी तब हैरान होते हैं और जब हैरानी होगी कहता हूं तो हैरान होना छोड़ देते हैं! आप तो यह भी नहीं जानते कि कब हैरान होना है और कब नहीं होना है। बेशक आप जानते होंगे पर मैं तो यही कहूंगा कि नहीं जानते हैं। किसी के जानने या नहीं जानने या फिर होने या ना होने से भी ज्यादा जरूरी मेरा कहना है। जब मैं खुद ही मेरे कुछ कहने को जरूरी नहीं मानूंगा तो दूसरे भला क्यों मानेंगे? क्यों मैं ठीक कर रहा हूं ना?
    पहले आप मन में अच्छे से यह फैसला करें कि आपको हैरानी है अथवा नहीं है। अरे यह बात भी भूल गए, मैं पूछ रहा हूं कि नहाने-धोने की बात पर आपको हैरानी है अथवा नहीं है? वैसे आपके हैरान होने अथवा नहीं होने के अतिरिक्त भी एक तीसरी स्थिति है आपकी संवेदनहीनता। यानी आपको कुछ पता चल रहा है अथवा नहीं चल रहा इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। आप ही से मैं पूछ रहा हूं- क्या आप अब भी जिंदा है? यह कोई बेहूदा सवाल नहीं है। जीवन और मृत्यु के विषय में अब भी बहुत सारी भ्रांतियां हैं। इसका कारण हमारा होना और नहीं होना दोनों का बहुत पास-पास होना है। इतना पास-पास कि क्षण भर में और कहें उससे भी कम समय में हम कभी भी इधर से उधर जा सकते हैं। ‘गीता’ कहती है कि जीवन बार-बार वस्त्र बदलता है। अभिप्राय यही है कि जीवन का सार ‘नहाना-धोना’ ही है। कुछ को नहाने-धोने की जल्दी लगी रहती है। जब फिर फिर नहाना-धोना है तो डरना कैसा!
    कुछ लोग चिंतन करते हैं कि जीवन इतने वर्षों से चल आ रहा है और चलता जा रहा है। यहां इतने लोग जन्में और मरे, पर नतीजा क्या निकला? सभी इधर से उधर और उधर से इधर चले आ रहे हैं। यह कोई निरा उपदेश नहीं है भैया। मैं आपसे बतियाने के चक्कर में पंच काका के बारे में बताना ही भूल गया। अगला-पिछला जीवन तो याद नहीं पर इस जीवन को तो याद रखना है। मैं घर में हूं और मेरे काका-काकी मुझे बहुत प्यार करते हैं। काका आज सवेरे से ही गार्डन में खोए हैं। मैंने सोचा लौट आएंगे पर बहुत देर लगा दी तो मुझे चिंता होनी चाहिए कि नहीं। मैं उन्हें देखने पहुंचा तो वे घास-फूस में कुछ ढूंढ रहे थे।
    मैंने पूछा- काका, यहां क्या खोजने लगे हो? उन्होंने गर्दन उठाई और बोले- कोई जड़ी-बूंटी खोज रहा हूं। तुझे बताया था ना कि तेरी काकी को जवान करूंगा और फिर हनीमून। इतने में भीतर से काकी चिल्लाई- अरे इतनी देर कर दी, आज नहाना-धोना नहीं है क्या?
    देखिए आप को फिर से थोड़ी हैरानी हुई है। नहीं हुई तो आप ठीक से खुद को समझ नहीं पा रहे हैं। आप को पता ही नहीं चलता कि आपके भीतर-बाहर क्या हो रहा है। आप वही है जो मैंने कहा- संवेदनहीन। आपको संवेदनहीन कहने से आपकी संवेदनाएं जाग गई है और मुझ पर गुस्सा होने लगे हैं। अपना गुस्सा कंट्रोल कीजिए। सेहत के लिए गुस्सा अच्छा नहीं होता है। पता नहीं कितनी-कितनी बीमारियों ने आपको घेर रखा है। ऐसे गर्दन हिलाने से कुछ नहीं होगा। आप बीमार हैं या नहीं, आपको कहां पता है। आपके कहने से कुछ नहीं होता। पांच सौ रुपये देकर चैक-अप कराओ। देखिए कितनी कितनी बीमारियां हैं आपको। पांच हजार के कुछ टेस्ट कराने की फीस बड़ी है या आपका जीवन? पैसा तो क्या है, आपके हाथ का मैल ही है। आप तो जानते हैं- मैल बीमारी की जड़ है। इसी जड़ को हम खत्म करना चाहते हैं। नहाना-धोना भी असल में मैल-मुक्ति है और हमारी काकी जी इसके लिए चिल्ला रही हैं। अब आप मुस्कुराने लगे...... तो क्या आप सही में संवेदनहीन नहीं है? आपमें संवेदनाएं बची हुई है। अरे वाह, आप अब भी जिंदा है!
    अब तो मेरा आपको बस यह बताना शेष है कि पंच काका पागल है। उनसे यह कहना नहीं कि मैंने उन्हें पागल कहा है। लोग क्या बस इधर-उधर ही करते रहते हैं। वे सोचते हैं जीवन का असली आनंद इधर-उधर करने में है। यहां सब कुछ देखा-भाला है और पुरानी चीजों को नए-नए ब्रांड के रूप में बेचते हैं। नया कुछ भी नहीं है। आप और हम सभी, नहा-धो कर फिर से फिर फिर कर आएं हैं। यह जो गार्डन में जड़ी-बूटी ढूंढ़ने का नाटक कर रहे हैं, बहुत पहुंचे हुए आदमी है। कहते हैं कि जवान करने का नुस्का ढूंढ़ रहा हूं, तेरी काकी को जवान करूंगा... ठीक कहा था ना इन्हें मैंने पागल, अरे अगर काकी जवान हो गई तो लोग कहेंगे- बूढ़ा घोड़ा लाल लगाम। नहीं कहेंगे क्या? और हां, मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आप संवेदनशील हैं।
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20 अप्रैल, 2018

नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया

    साहब के आगे बाबू ने एक पत्र किया और बोला- इसका क्या करना है.... साहब ने इस आग्रह पर गौर फरमाते हुए पत्र पर एक सरसरी दृष्टि डाली और बोले- अरे ! मैंने तो इसे पढ़ा नहीं, तुम्हीं बताओ क्या है? बाबू ने साहब को बताया- हेड ऑफिस में इसी महीने आठ तारीख को अधिकारियों की एक कार्यशाला होनी है। जिस में आपको ‘नाक का बांका बाल’ विषय पर व्याख्यान देना है। साहब सोच में पड़ गए। यह भी क्या अजीब सा विषय दिया। प्रत्यक्ष में बोले- हां तो तुम डीएफए तैयार करो। बाबू ने अपनी सीमाओं को उल्लेखित किया तो साहब ने तत्काल अर्जेट मिटिंग रख दी और बाहर चपरासी को बता दिया किसी को अंदर नहीं आने दिया जाए।
    ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
    साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
    वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।  
    साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
    ‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्‍ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे। 
    लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में  बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
    फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
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15 अप्रैल, 2018

हर समस्या का समाधान है नई समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सभी जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बात बिल्कुल छोटी सी है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह एक बेहतर स्थिति है। इससे आप भी मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र रहा है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं।
    हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो हमने दिया और हम पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। हमें प्रर्दशन बिल्कुल पसंद नहीं है और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में जरा कंजूस-सा हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ स्थानांतरित हो जाएगी। अस्तु आप थोड़े में संतोष करें। संतोषी सदा सुखी होते हैं। मैं मेरी समझ का शेष पूरा भाग मेरे पास रखना अपना अधिकार मानता हूं। देखिए ना बाज वक्त मेरी यह समझ मेरे और आपके काम आनी है। हां, तो जैसा कि मैंने कहा लोहा लोहे को काटता है, यह हमारा आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में बहुत से लोग हरदम रोते ही रहते हैं।
    अब बेरोजगारी की समस्या की ही बात करते हैं। असल में हमें हमारी मूल समस्या का पता नहीं है और हमारे नेता यह अच्छे से जानते हैं कि जैसे लोहा लोहे को काटता है ठीक वैसे ही समस्या समस्या को काटती है। बस हमने हमारी एक समस्या को काटने के लिए दूसरी और दूसरी को काटने के लिए तीसरी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमारे यहां समस्याओं का एक अम्बार बन गया है। समस्या समस्या को काटती है की तर्ज पर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। अब चुनाव की बात करें तो पार्टी पार्टी को काटती है।
    वैसे हमारी हर समस्या से भी देश में खुशहाली बढ़ी है। सुनने में तो बेरोजगारी की समस्या बड़ी लगती है पर इसी की बदौलत कितने ही लोग रोजगार पा रहे हैं। इसी बेरोजगारी से तो हमारी सरकार भी माला माल हो रही है। चार पोस्ट निकालती है और उसके लिए फार्म और फीस के नाम पर वारे न्यारे हैं। अब फार्मों के अंबार की समस्या जब आई तो सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जिनके लिए यह ऑन लाइन समस्या है उनके लिए भी हम किसी दूसरी समस्या का इजाद करेंगे। अब सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। इससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी अंत हुआ कि नहीं हुआ? बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल गर्दन नहीं हिलानी है। झूठ और सच में अंतर करना सीखो भाई। अब समय आ गया है कि सच को सच कहें और झूठ को झूठ।
    चलिए जो मन में है उसे कहना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं। जब वे कुछ छुपा कर नहीं रखते तो हम और तुम यानी आम आदमियों की औकात ही क्या है। सच में अब सभी को अपने अपने मन की बात कहनी चाहिए। समस्या यह है कि मन की बात कहना कठिन है।
    पंच काका का तो मानना है कि गोपियों की भांति हमारे मन को कोई कृष्ण ले गया है। हम बिना मन वाले भला मन की कोई बात कह ही कैसे सकते हैं। याद रखना किसी झूठ पर गर्दन हिलाने से पहले नेक-प्रोब्लम और बाद में नोज-प्रोब्लम हो सकती है।
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21 मार्च, 2018

बाल मनोविज्ञान के जादूगर / डॉ. नीरज दइया

बाल साहित्य को गंभीरता से अंगीकार कर विकसित करने का बड़ा कार्य करने वाले लेखकों में दीनदयाल शर्मा का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाता है। दीनदयालजी ने बाल साहित्य की अलग अलग विधाओं में सतत रूप से हिंदी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में रचनाएं दी हैं। लेखन के साथ संपादन का कार्य भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। लंकेश्वर, महाप्रयाग, दिनेश्वर, दीद आदि अनेक उपनामों से भी आपने निरंतर लेखन किया है। शर्मा के लेखक का मिलनसार अर स्नेहिल स्वभाव का होना अतिरिक्त विशेषता कही जा सकती है।     आपका जन्म 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के गांव जसाना में हुआ। राजस्थानी बाल साहित्य की पुस्तकों की बात करें तो अब तक आपकी चन्दर री चतराई (1992), टाबर टोळी (1994), शंखेसर रा सींग (1997),तूं कांईं बणसी (1999), म्हारा गुरुजी (1999), बात रा दाम (2003) और बाळपणै री बातां (2009) आदि पुस्तकें निरंतर सृजन की साक्षी है। पाक्षिक समाचार पत्र टाबर टोल़ी का संपादन का श्रेय भी आपको ही है। सुणो के स्याणो, घणी स्याणप, डुक पच्चीसी, गिदगिदी आदि पुस्तकों की राजस्थानी में हास्य व्यंग्य के खाते बहुत कीर्ति है। 
    राजस्थानी में बच्चों के लिखते लिखते दीनदायल शर्मा ने कुछ आधुनिक कविताएं भी लिख कर व्यस्क लेखक होने का प्रयास किया है। आपकी नई कविताओं का प्रथम संग्रह ‘रीत अर प्रीत’ राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ है। इन की कविताओं में हम कवि का व्यक्तिगत जीवन अनेक प्रसंगों से जुड़ी उनकी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति देख सकते हैं। वर्ष 1975 से आरंभ हुई आपकी लेखन यात्रा से भरोसा होता है कि राजस्थानी बाल साहित्य और दीनदयाल शर्मा एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं।
    कहा जा सकता है कि राजस्थानी बाल साहित्य की बात आरंभ करते ही पहला जो चेहरा स्मृति पटल पर कौंधता है वह दीनदयाल शर्मा का होता है। अपना सम्पूर्ण जीवन बाल साहित्य को समर्पित करने वाले शर्मा बाल मनोविज्ञान के जादूगर है। शिक्षा विभाग की नौकरी और बाल साहित्य सृजन में अपना मन रमने वाले शर्मा सदैव बच्चों के प्रिय शिक्षक और लेखक रहे हैं। साहित्य की यही लगन ऐसी है कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को साहित्य से जोड़ कर एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया है। राजस्थानी भाषा-साहित्य के लिए परलीका तो एक साहित्यिक गांव है और दीनदयाल जी का पूरा -घर-परिवार साहित्यिक है, अस्तु उनका घर भी एक साहित्यिक तीर्थ है। 
    केन्द्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का बाल साहित्य पुरस्कार वर्ष 2012 का पुस्तक ‘बाळपणै री बातां’ के लिए अर्पित किया जाना पुरस्कार का सम्मान है। राजस्थानी संस्मरण लेखन के लिहाज से यह पुस्तक अब तक प्रकाशित पुस्तकों में अपना विशेष स्थान रखती है। युगबोध और विषयगत बदलाव के मानदंड से यह कृति महत्त्वपूर्ण है। इस पुरस्कृत पुस्तक में 47 आलेख हैं, जो अपनी सहज सरल भाषा और आत्मीय घटना प्रसंगों से जिस शिल्प में प्रस्तुत की गई है वह अनेक स्थलों पर बेहद मार्मिक है।
    बाल साहित्य लेखन के लिए पहली शर्त है कि बाल मन रचनाकार का होना चाहिए। वैसा बाल मन दीनदयाल शर्मा के पास वर्षों से है। बचपना इतना है कि ‘बाळपणै री बातां’ की भूमिका में मन की बातें वे इतनी लंबी खींचते हैं कि भूमिका ही किसी बाल-पुस्तक जैसी है। परिवार के बच्चों के बीच एक लेखक का खेलना-कूदना ‘बाळपणै री बातां’ में सांगोपांग उजागर हुआ है। इनके घर-परिवार के प्रतीक में हम समय के साथ बदलते अनेक बदलाव संकेत रूप में देख-समझ सकते हैं। बाल नाटकों में दीनदयाल शर्मा बेहद सावधानी से रचना करते हैं कि कम कालावधि और अनुकूल साज-सज्जा से आधुनिक नाटक खेले जा सकते हैं। ‘म्हारा गुरुजी’ बाल नाटक अपने व्यंग्य के कारण, ‘बात रा दाम’ चतराई की बात और ‘तूं कांईं बणसी’ अपनी शिक्षा के कारण स्मरणीय है। हिन्दी में भी आपरी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। जैसे- सारी खुदाई एक तरफ..., मैं उल्लू हूं (व्यंग्य) चिंटू-पिंटू की सूझ, पापा झूठ नहीं बोलते, चमत्कारी चूर्ण, बड़ों के बचपन की कहानियां, सूरज एक सितारा है, सपने, कर दो बस्ता हल्का, फैसला, फैसला बदल गया (बाल साहित्य) आदि।        
    देश और प्रांतीय अकादमियों से बाल साहित्य के अनेक पुरस्कारों से सम्मानित दीनदयाल जी को अनेक संस्थाओं ने भी सम्मानित किया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से अनेक प्रसारण हुए हैं। अंतरजाल देखें तो केई ब्लोग, फेसबुक और यू-ट्यूब के आंगन में अपनी पूरी ऊर्जा और लगन के साथ दीनदयाल शर्मा का बहुत व्यापक मित्र और समार्थक परिवार देखा जा सकता है। दुनियाभर के अनेक कामों के बीच अब भी वे बहुत आराम से बात करते हुए राजस्थानी बाल साहित्य की समृद्धि का सपना संजोए हैं। बाल साहित्य के विकास हेतु त्रैमासिक पत्रिका पारसमणि का प्रकाशन उनके इसी सपने का परिणाम है। टाबर टोल़ी पाक्षिक का नियमित प्रकाशन हो रहा है और अनेक संभावनाएं अभी भविष्य के गर्भ में है। देखें आने वाले समय में 60 वर्षीय युवा दीनदयाल शर्मा व्यस्क कवि के रूप में साहित्य में नजर आएंगे या फिर प्रेमचंद जी की उक्ति बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है को सिद्ध करते हुए बच्चों के लिए सृजन करते रहेंगे। वैसे वे दोनों काम एक साथ करने में भी समर्थ है। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं।
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18 मार्च, 2018

मेरे लिए हर रचना अपनी ही तलाश है : डॉ. नीरज दइया

डॉ.नीरज दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत
(मेरे लिए हर नयी रचना स्वयं की तलाश है, यह कहते हैं, कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में जाने माने नाम डॉ. नीरज दइया। आपने “निर्मल वर्मा के कथा साहित्य में आधुनिकता बोध” विषय पर शोध किया है। आपकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें राजस्थानी और हिंदी में प्रकाशित हुई है। डॉ. दइया को साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार एवं बाल साहित्य पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं सस्कृति अकादेमी, बीकानेर के अनुवाद पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों मान-सम्मानों से नवाजा जा चुका है। डॉ. दइया से डॉ. मदन गोपाल लढ़ा की बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं)

'बिना हासलपाई' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (राजस्थानी) की घोषणा से कैसा अनुभव कर रहे हैं?

पुरस्कार किसे अच्छा नहीं लगता, जाहिर है मुझे भी अच्छा लगा किंतु बहुत आश्चर्य हुआ कि गत वर्ष कहानीकार बुलाकी शर्मा और उनसे पूर्व उपन्यासकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को यह पुरस्कार मिला था। संयोग से दोनों कथाकार बीकानेर के हैं। इस बार बीकानेर में यह तीसरा पुरस्कार प्रमाणित करता है कि अकादेमी और निर्णायकों के मूल्यांनक में पुस्तक ही सर्वोपरि होती है। लेखक के लिए कोई भी पुरस्कार सामाजिक प्रतिष्ठा के अतिरिक्त कुछ महत्त्व नहीं रखता है। बतौर लेखक यह पुरस्कार मेरे लिए नई जिम्मेदारियां लाया है।
राजस्थानी के समकालीन परिदृश्य को किस रूप में देखते हैं?
‘बिना हासलपाई’ आधुनिक राजस्थानी कहानी पर केंद्रित पुस्तक है। भारतीय कहानी अथवा साहित्य का चेहरा हिंदी के साथ प्रादेशिक भाषाओं से निर्मित होता है। राजस्थानी भाषा के समकालीन साहित्य को हिंदी और अन्य भाषाओं के साहित्य से कदम मिलाकर चलने के साथ ही उसका लौकिक स्वरूप और माटी की सौंधी महक को भी संजोए रखना चाहिए।
हिंदी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में कई विधाओं को एक साथ कैसे साध पाते हैं?
मेरे लिए जीना और लिखना पर्याय है। वैसे लेखन के संस्कार मुझे मेरे दिवंगत लेखक पिता सांवर दइया से मिले हैं। मैं केवल लिखने के नहीं लिखता हूं, मेरा मानना है कि मेरे भीतर एक बेचैन लेखक रहता है। वही मुझे लेखन के लिए बाध्य करता है। उसे प्रतिदिन लिखने के लिए अवकाश देना मेरी नियति है। राजभाषा हिंदी व मातृभाषा राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखने को मैं देशभक्ति और मातृभक्ति से रूप में देखता हूं। शरीर को हिंदी और आत्मा को राजस्थानी पोषित करती है। विधाओं का चयन परिस्थितियां और सम-सापेक्ष है।
कभी ऐसा लगा कि आलोचना की राह में बहुत कांटे हैं?
बिल्कुल, ऐसे कांटें हैं जिन को चाह कर भी कोई बुहार नहीं सकता है। किसी रचना अथवा रचनाकार की आलोचना एक अंगुली से संकेत करने जैसा है। जब हम किसी दिशा में एक अंगुली करते है तो तीन अंगुलियां हमारी तरफ स्वतः मुड़ जाती है। खुद से मैं तीन सवाल करने के बाद ही प्रतिपक्ष से सवाल किए जाने के पक्ष में हूं। आलोचन में अनेकानेक सवालों से मुठभेड़ होती है। कृति और कृतिकार की दिशा से मैं चीजों को देखने-समझने का प्रयास करता हूं। किसी रचना के प्रति पूर्वधारणाओं की बजाए नए आयुधों की तलाश में रहता हूं। परंपरा और आधुनिक विकास-यात्रा में रचना के मर्म को जानना-समझना और मूल्यांकन करना हमारे पाठ के आनंद को छिन्न-भिन्न कर देता है। इसलिए सच्ची, खरी और बेलाग आलोचना तो सदा हमारे पाठक ही किया करते हैं।
आपने अनुवाद के क्षेत्र में खूब काम किया है। अनुवाद के लिए रचना का चयन कैसे करते हैं?
अनुवाद को मैं अनुसृजन मानता हूं। किन्हीं दो भाषाओं के बीच पुल बनाने का काम अनुवाद से संभव होता है। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना जैसे अनेक रचनाकारों से भारतीय साहित्य का चेहरा बनता है। इनको अपनी भाषा में लाकर मैंने भाषा के सामर्थ्य को प्रमाणित करने का प्रयास किया है। अनुवाद का चयन रचना और रचनाकार की गुणवत्ता से स्वयं प्रभावित होकर करता हूं। भारतीय कविता की एक झांकी देखने दिखाने के लिए ‘सबद-नाद’ में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की कविताएं राजस्थानी में देख सकते हैं।
अन्य भाषाओं से राजस्थानी में हुए अनुवाद की तुलना में राजस्थानी से अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत कम हुए हैं?
राजस्थानी भाषा की रचनाओं को अधिक मात्रा में हमें हिंदी और अंग्रेजी में लाना होगा। माध्यम भाषा से फिर आगे अनुवाद होने संभव हो सकेंगे। मोहन आलोक की काव्य-कृति ‘ग-गीत’ का मेरा हिंदी अनुवाद साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। अब मधु आचार्य ‘आशावादी’ के उपन्यास ‘गवाड़’ का हिंदी अनुवाद आने वाला है।
खुद को मूल रूप से क्या मानते हैं- कवि, आलोचक, बाल साहित्यकार, व्यंग्यकार, अनुवादक या संपादक?
मैं मूल रूप से तो इन सब का एक आवास-स्थल हूं। मेरे भीतर का लेखक ही हर बार यह चयनित करता है कि वह क्या करने वाला है। मैं लेखक के रूप में लिखने की कोई मशीन नहीं हूं, रचना के समय ही सब कुछ निर्धारित होता है। बादल आते हैं तब यह कहां तय होता है कि वे बरसने वाले हैं। कभी कभी किसी विधा का एक दौर चलता है जैसे बरसात की झड़ी लगती है।
आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता क्या है?
मैं अपने भीतर के लेखक को कभी दायरों में कैद करने के पक्ष में नहीं हूं। कुछ मित्र मेरे लेखन के आधार पर मुझे वाद अथवा धाराओं में बांधते हैं और मैं उनकी घोषणाओं पर सहमति प्रकट करता हूं किंतु मैं हमेशा के लिए यहीं स्थिर रहूंगा यह वादा नहीं कर सकता। मेरी आस्था विचार के स्तर पर सही के पक्ष में खड़ा रहने की मेरी आस्था है और रहेगी।
आप किन लेखकों से प्रभावित हुए?
मेरा सौभाग्य यह रहा कि मैं लेखक सांवर दइया के घर जन्मा और मेरे अनेक गुरुजन साहित्य-लेखन से जुड़े थे। दिखावा नहीं करता कि फलां-फलां को पढ़ा और प्रभावित हुआ। अनेक देशी-विदेशी लेखकों से सीखने का प्रयास किया है। जब भी कोई नई रचना लिखता हूं तो मेरा पूर्व अध्ययन अथवा लेखन-कौशल काम नहीं आता। मैं हर बार खुद को खाली हाथ पाता हूं और अनुभूति के महासागर से रचना में कुछ नया लेकर लौटने का प्रयास करता हूं। मेरे लिए रचना स्वयं की तलाश है। मैं प्रयास करूंगा कि अपने लेखन की योजनाओं को फलीभूत कर सकूं।
राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से क्या हिंदी कमजोर हो जाएगी?
यह कुछ मूढ़ों ने भ्रम फैलाया है कि हिंदी कमजोर हो जाएगी। आदिकाल से हिंदी को राजस्थानी पोषित करती रही है। पृथ्वीराज रासो से मीरा तक की यात्रा के बाद आधुनिक काल में तो हिंदी के हित में राजस्थानी ने अपना बलिदान दिया। राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी उऋण ही होगी।
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