15 मार्च, 2018

रंग-भंग यानी रंग में भंग

डॉ. नीरज दइया
    पंच काका कुछ उदास और खोए-खोए से लग रहे हैं। उनकी यह हालत देखकर पूछा- काका, क्या बात है? तबियत तो ठीक है ना? वे बोले- तबियत को क्या हुआ है, और अब हो भी क्या सकता है? अब तो उसके घर से बुलावा आना बाकी है, देखते हैं कब बुलाता है। ऐसी वीत-राग सुनकर मैंने उन्हें टोका- काका! ऐसा क्यों सोचते हो, अभी तो बहुत काम बाकी है। माना कि आपने एक उम्र गुजार दी पर अभी इतने बूढ़े भी नहीं हुए हैं। काका असहज हो गए और बोले- बूढ़ा तो उसी दिन हो गया जिस दिन तेरी काकी इस संसार से गई, वह अब मुझे बुला रही है। मैंने मजाक में कहा- काका अब तो होली आने वाली है, उसके बाद ऐसी बातें करना। ऐसा मजाक मत करो जो सहन नहीं हो। अभी तो कुछ रंग-भंग की बातें कीजिए। मैंने सोचा कि काका कहेंगे- जा बेटा, भांग ले कर आ, पर हुआ उल्टा ही। काका हंसे और बोले- एकदम ठीक, जीवन से यह मेरा रंग-भंग ही तो गया है। तेरी काकी गई भगवान के पास और अब मुझे वहां से आवाजें दे रही है। बार-बार कहती है कि कब आओगे। अब आना-जाना मेरे हाथ में तो नहीं है।
    मैंने अब साफ-साफ कहना ठीक जाना- काका, भांग लेकर आता हूं। आज हो जाए कुछ... । काका ने फिर टोक दिया- नहीं अब काहे का भांग-धतूरा। ये मोदी जी ने सारे देश के रंग में भंग डाल दिया रे। पूछ मुझसे कि कैसे? मैंने पूछा- कैसे? उन्होंने चिंतन की मुद्रा बनाते हुए कहा- मैं बताता हूं, पहले नोटबंदी फिर होंठबंदी और अब ऊपर से ये जीएसटी। कर दी ना चौपट सारी होली। मैं होली को ऐसे कैसे चौपट होने देता, तुरंत बोला- इसमें भला क्या तुक है? ऐसे-कैसे चौपट हो गई होली? होली तो होगी और खूब जोरदार होगी देखना।
    काका जरा तेश में आ गए- बोले बेटा, कैसे होगी होली... मैं भी देखता हूं। अगर होली होगी तो स्वच्छा अभियान को क्या बोलेगे। अब तो है तुक, बोलो। हर बात में तुक खोजते हो, भला जीवन कोई पुरानी कविता है कि हर बंध में कोई न कोई तुक होगा ही होगा। बेतुके लोग और तुक की उम्मीद करते हो। चलो मिला दिया हमने तुक। होली में तुम पानी को बर्बाद करोगे और चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़ कर दोगे, फिर यह कौनसा अभियान हुआ? भैया बताना जरा! और हां, रंग खेलोगे तो क्या गंदगी नहीं होगी? मैंने माथे पर सलवटे डाल ली और बोला- रंग में कौनसी गंदगी हुई, रंग तो खुद ही स्वच्छता है काका। काका कब हार मानने वाले थे, बोले- तो फिर आर टी आई लगा के खुद मोदी बाबा से ही पूछ लेता हूं कि होली में गंदगी होगी या फिर स्वच्छ होगी। अगर स्वच्छा ही होती है तो फिर भैया रोज खेलो होली और कर लो पूरा देश स्वच्छ। ये दो तरह की बातें नहीं चलेगी। होली पर क्या स्वच्छा अभियान को ऑफ कर दोगे एक-दो दिन के लिए या फिर मदिरा की दुकानों जैसे होली का भी कुछ सरकारी टाइमिंग कर दोगे। अब तुम कहोगे- मैं कौन होता हूं टाइमिंग करने वाला या फिर ऑन-ऑफ वाला। तो मितरों देश ऐसे नहीं चलता...
    मैं एकदम फेड-अप हो गया। एक छोटी सी बात को ये बुढ़ऊ काका कहां से कहां ले गए। काकी जब से स्वर्गवासी हुई जरा सठिया गए हैं। हम सोचते हैं कि बड़े-बूढ़े हैं और उनसे बात करनी चाहिए पर यह तो जैसे हर बात में मोदी जी को लेकर आ जाते हैं, जैसे हम मोदी जी सगे-संबंधी है और इनकी बात उन तक पहुंचा देंगे। समझ नहीं आता- अब काका जी से आगे क्या बात करूं । कोई बहाना बना कर मैं तो खिसकता हूं। आप में बहुत हिम्मत हो तो कर लो काका जी से होली की राम-राम। पहले से कह देता हूं- जरा टाइम निकाल कर आना, फिर ना कहना कि ऐसा तो कहा नहीं था।  
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10 मार्च, 2018

नाक का बांका बाल / डॉ. नीरज दइया

    साहब के आगे बाबू ने एक पत्र किया और बोला- इसका क्या करना है.... साहब ने इस आग्रह पर गौर फरमाते हुए पत्र पर एक सरसरी दृष्टि डाली और बोले- अरे ! मैंने तो इसे पढ़ा नहीं, तुम्हीं बताओ क्या है? बाबू ने साहब को बताया- हेड ऑफिस में इसी महीने आठ तारीख को अधिकारियों की एक कार्यशाला होनी है। जिस में आपको ‘नाक का बांका बाल’ विषय पर व्याख्यान देना है। साहब सोच में पड़ गए। यह भी क्या अजीब सा विषय दिया। प्रत्यक्ष में बोले- हां तो तुम डीएफए तैयार करो। बाबू ने अपनी सीमाओं को उल्लेखित किया तो साहब ने तत्काल अर्जेट मिटिंग रख दी और बाहर चपरासी को बता दिया किसी को अंदर नहीं आने दिया जाए।
    ऑफिस के खास खास कर्मचारी मंत्रणा के लिए साहब के कमरे में पहुंच गए और बाहर पहरेदार चपरासी ने रटा-रटाया हुआ जुमला- ‘साहब बीजी है, अर्जेंट मिटिंग ले रहे हैं।’ मुंह में दबा लिया, जिससे कोई भी आए या पूछे तो तुरंत जबाब दिया जा सके। साहब बड़े नेकदिल और नियम पसंद आदमी है इसलिए ऑफिस बड़े ढंग से चलता है। ऐसे साहब अगर हरेक ऑफिस में हो जाए तो देश ढंग से चलने लग जाए। मिटिंग में देश के ढंग से नहीं चलने के सबूत पर चर्चा हो रही थी। बड़े बाबू कह रहे थे कि देश अगर ढंग से चलता तो यह गलत विषय साहब तक नहीं आता। विषय में बदलाव बिना हेड ऑफिस की मंजूरी के हो नहीं सकता और अगर विषय केवल ‘नाक का बाल’ होता तो सरलता रहती। अब समस्या यह है कि नाक का बाल बांका है, जिसके बांकपन से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं। हिंदी अधिकारी अपना ज्ञान दे रहा था कि सर, जरूर कुछ मिस्टेक हुआ है। यह कोई दूसरा विषय होगा- ‘बाल तक बांका न होना’ उसमें से यह बांका सब इधर सिफ्ट हो गया है। जैसे हम समस्या से परेशान हो रहे हैं वैसे ही कोई दूसरा ऑफिस भी समस्या में होगा। जाहिर है उन्हें विषय मिला होगा- ‘बाल तक न होना’। सर आप अपने जानकारों को फोन पर बात कर पूछिए कि उन्हें क्या क्या विषय मिला है।
    साहब जरा बिदक गए- इसमें दूसरों को फोन करने वाली कौनसी बात है। जिसे जो मिला है उसे उसी पर काम करना होता है। आप लोग यहां मेरे सामने इतना बोल लेते हैं, आपको खबर होनी चाहिए कि हम हमारे उच्चाधिकारियों से ऐसे चपर-चपर थोड़ी कर सकते हैं। ‘बाल तक न होना’ की तुलना में ‘नाक का बांक बाल’ विषय जरा टेढ़ा है। बाल तक न होना तो सीधा-साधा है कि गंजेपन के बारे में बात करनी है। साहब में डबल एओ साहब की तरफ देखा जो नाक में अंगुली डाले ना जाने किस कार्य में व्यस्त थे।
    वे स्थिति को भांपते हुए जरा चौंक कर बोले- यह सब आपके बस का रोग नहीं है छोटे बाबू। अगर होता तो खुद ही कुछ ना कर लिए होते। साहब ने हाथ के संकेत से उन्हें रोका तो वे कहने लगे- साहब आप पहले चाय-नाश्ते का बोलो, तभी कुछ दिमाग चलेगा। भूखे भजन ना होत गोपाला। साहब कैसे भी हो एकाउंट वाले उन्हें अज्ञाकारी बना ही लेते हैं। डबल एओ साहब का मान रखते हुए साहब ने झटपट व्यवस्था के लिए आदेश जारी किए। फिर मिटिंग में जोश आना ही था। डबल एओ साहब बोले- सर इसके लिए एक पैनल बना देते हैं जो कुछ खोज खबर करेगा फिर जो रिपोर्ट आएगी उसको नोटसीट पर ले लेंगे और हमारा काम बन जाएगा। कोई भी काम हो उसे विधिसम्मत करने से बाद में परेशानी नहीं आती। नहीं तो बाद में यह मुद्दा बनेगा कि हमने तो नाक के दाहिने भाग बाले बांके बाल का लिखा था और अपने बाएं भाग वाले बाल की चर्चा कर दी है। ऐसे ओब्जेक्शन में यह भी ध्यान रखें कि बाल कितना बांका है यह इस पत्र में स्पष्ट नहीं लिखा है। सर, एक बात गौर की आपने.... देखिए इस लेटर में बाल की लेंथ के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया है।  
    साहब चहकते हुए बोले- यही तो मैं कहता हूं कि हेड ऑफिस में सारे मूर्ख भरे पड़े हैं। क्या करते हैं और क्या नहीं करते हैं कुछ मालूम नहीं चलता। देश में वैसे ही इतनी अफरा-तफरी है ऐसे में नाक जैसे संवेदनशील मुद्दे को टच ही क्यों किया जाए। देखना ये नाक बड़ा इश्यू बन जाएगा। स्टेनो जो अब तक चुप चाप बैठी थी ने हस्तक्षेप किया और बोली- सर, मेरे ध्यान में हमारे शहर में एक लेखक है जो लिखता-पढ़ता है। आप कहें तो उन से बात करें। अच्छा रहेगा कि उनसे ही लिखवा लें।
    ‘गुड, वेरी गुड।’ और साहब ने कहा- ‘ओके, काम बन गया। ऐसा करो पैनल में ये जो है लेखक उसका नाम डाल कर फाइल पुट अप कीजिए। साथ ही एक मिटिंग भी प्रपोज कर देना।’ सब कुछ साहब के आदेशानुसार हुआ। लेखक महाश्य पधारे और अपने विशद ज्ञानी होने का प्रमाण भी उन्होंने प्रस्तुत कर दिया। अफिस के सभी कर्मचारी तो कर्मचारी साहब भी उनके ज्ञान का लोहा मान गए। लेखक महाश्य ने बताया कि नाक के बाल अगर बांके नहीं हो तो नाक के रास्‍ते से धूल और दूसरी गंदगी सीधे फेंफड़ों तक पहुंच जाती है। ऐसे में सीधी बालों की तुलना में बालों को बांका रखा जाना चाहिए। यह विषय बड़ा सोच-समझ कर दिया गया है। कोई रचनात्मक रुचि सम्पन्न अधिकारी रहा होगा जिसने यह विषय रखा है। बांका बाल सौंदर्य-शास्त्र का विषय है। वैसे दूसरा पक्ष भी देखिए अगर बाल बांके होंगे तो वे नाक में एडजेस्ट हो जाएंगे और बढ़ने पर भी आपको या फिर हमको शर्मिंदा नहीं करेंगे। 
    लेखक महाश्य ने नाक के बालों की ट्रिमिंग के अनेक तरीकों को आजमाने की सलाह भी नोट करवा दी। हैरत तो साहब को तब हुई जब लेखक महाश्य ने बताया कि 'हेयरी नोज़' नामक एक फिल्म चीन में  बनी है जो वायु प्रदूषण के मुद्दे को उठाती हुई शहरी चीनियों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर रही है। साहब ने माना कि सरकारी लोग बस सरकारी होते हैं। ये लेखक किस्म के गैर सरकारी लोग ही सही सूचनाएं रखते हैं। अब देखिए ना इतनी बड़ी सूचना हमें नहीं थी। लेखक महाश्य अगर नहीं बताते तो हमें मालूम ही नहीं चलता कि पिछले साल 'नेचर' पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें चीन में प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या 13 लाख बताई गई थी।
    फिर क्या था साहब के लिए ‘नाक का बांका बाल’ एक नियत मानदेय पर तैयार हो गया। साहब ने अपने बड़े साहब को यह ब्रीफ बताने का विचार किया। उन्होंने सोचा कि मैं बताता हूं कि ‘हेयरी नोज’ फिल्म में बहुत सारे स्टाइलिश चीनी लोगों और एक कुत्ते को दिखाया गया है। जिन्होंने 'बदबूदार, दमघोंटू हवा और कभी ख़त्म न होने वाली धुंध' के बीच जीने का तरीका नाक के लंबे बालों के जरिए ढूंढ़ निकाला है। तो बड़े साहब को झटका लगेगा। साहब मन ही मन में मुदित होते सोचने लगे इस बार तो उन्हें बोलना ही पड़ेगा- कमाल कर दिया है तुमने। रियली यू आर ग्रेट। ये ‘नाक का बांका बाल’ बस तुम्हीं सीधा कर पाए हो। दूसरों को देखो, नोनसेंस। इतनें में बाबू आया और उत्साह के साथ बोला- सर, आठ तारीख वाली कार्यशाला केंसिल हो गई है।... साहब ने उसके हाथ से कागज लिया और यह देखा तो उनका उत्साह ठंडा हो गया।
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डॉ. नीरज दइया

समस्या का समाधान समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सब जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बिल्कुल छोटी सी बात है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह भी हो सकता है कि आप मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं। हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि हम जो नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो दिया और एक बार पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। प्रर्दशन हमें बुल्कुल पसंद नहीं है। और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में थोड़ा कंजूस हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ चली जाएगी। इसलिए थोड़े में संतोष करें, और मेरी समझ का शेष भाग मेरे पास तो है ही। बाज वक्त मेरे और आपके वही काम आना है। हां, तो मैं बता रहा था लोहा लोहे को काटता है यह आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में मूर्खों की कमी नहीं है, जो हरदम रोते रहते हैं। कहते हैं कि बेरोजगारी की समस्या है। अजी अब कौन समझाएं कि समस्या ही समस्या को काटती है। असल में समस्या तो कोई है ही नहीं, बस हमने समस्या को काटने के लिए समस्याओं का अम्बार बनाया है। नहीं समझें, वही लोहा लोहे को काटता है और समस्या समस्या को काटती है।
    हमारी बड़ी समस्या बेरोजगारी है पर इसी बेरोजगारी ने कितनों को रोजगार दिया है। भैया बेरोजगारी से तो सरकार को भी रोजगार मिल रहा है। देखते नहीं चार कोई पोस्ट निकालो और फीस के साथ थोक के भाव में फार्मों का अंबार लग जाता था। अब फीस और फार्मों के अंबार की समस्या भी हल हो गई। सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। देखा हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जनता के सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी इससे अंत हुआ कि नहीं, बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल झूठी गर्दन नहीं हिलानी है। सच को सच बोलना सीखो। चलिए जो मन में है उसे बोलना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए प्रधानमंत्रीजी भी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं ना। जब वे कुछ छुपा के नहीं रखते तो तुम और हम आम आदमी की क्या औकात है। सच में आपको और हमको यानी सब को मन की बात कहनी ही कहनी चाहिए। या गोपियों की भांति हमारे भी मन कोई कृष्ण ले गया है और अब हम बिना मन वाले मन की बात कह ही नहीं सकते हैं।
    पंच काका कहते हैं कि झूठे गर्दन हिलाने से नेक-प्रोब्लम हो सकती है। हर समस्या का समाधान समस्या ही है। कोई भी समस्या हो तो सभी यही करते हैं कि किसी दूसरी समस्या की तरफ ध्यान बांट देते हैं। यही राइट चोइस है बेबी, यानी यही उचित उपचार है।
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23 फ़रवरी, 2018

साहित्य अकादेमी पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 नीरज दइया 13-02-2018

   खम्मा-घणी सा, राम-राम। आज अणमाप हरख री वेळा जीसा नीं है, पण म्हारो मन कैवै- बै अठै ई बिराजै। बां री आसीस अर ओळूं हरदम साथै रैवै। म्हनै तो इयां पण लखावै जाणै म्हैं बां री आंगळी पकड़्या ई अठै लग पूग्यो हूं। साहित्य अकादेमी पुरस्कार रै मौकै बां मान्यता री मांग राखी ही, अर म्हैं ई सागण बात कैय रैयो हूं- राजस्थानी भासा म्हारै रगत रळियोड़ी है... अबै हिंदी में म्हैं म्हारी बात राखणी चावूं।
    सभागार में उपस्थित भारतीय भाषाओं के सभी सुधीजनों और सम्मानित मंच को मैं प्रणाम करता हूं। अध्यक्ष महोदय, मैं अपनी बात कहने से पूर्व साहित्य अकादेमी परिवार, राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल, पुरस्कार चयन समिति और भाषा-संयोजक वरिष्ठ कवि-आलोचक-नाटककार डॉ. अर्जुनदेव चारण का आभार ज्ञापित करता हूं। मेरे लिए यह अपरिमित हर्ष का विषय है कि मेरे पिता सांवर दइया को वर्ष 1985 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार उनके कहानी संग्रह ‘एक दुनिया म्हारी’ के लिए अर्पित किया गया और मुझे राजस्थानी कहानी आलोचना की पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ के लिए।
    आज अगर मेरे पिता संसार में होते तो इस पुरस्कार की सर्वाधिक खुशी उन्हें होती। पढ़े लिखे दिमाग की त्रासदी यह है कि उसे मन की सभी बातों पर यकीन नहीं होता। सच जो भी हो पर मुझे लगता है कि वे इस संसार में नहीं होकर भी यहीं मेरी दुनिया में है। मेरी पहचान बचपन में उनकी दुनिया से हुई, मुझे साहित्यिक वातावरण मिला। उनके मित्रों और घर में मिली अनेक पुस्तकों ने इस दुनिया के प्रति मेरे आकर्षण को बढ़ावा दिया। समान परिस्थितियों में हम दो भाई साथ रहे, किंतु साहित्यिक दुनिया का ऐसा असर मुझ पर हुआ कि आज सोचता हूं- मैंने अपने लिए साहित्य को चुना या साहित्य ने मुझे चुना? पिता के रहते मेरा एक लघुकथा संग्रह प्रकाश में आया था। पत्र-पत्रिकाओं में कुछ कविताएं भी छपी थी। लेखन के आरंभिक दौर में मैंने राजस्थानी के साथ देशी-विदेशी साहित्य को जानने-समझने का प्रयास किया। अनेक विषयों पर हमारी चर्चाएं और हमारा विमर्श होता था। वर्ष 1992 में मेरे पिता का असामयिक निधन 44 वर्ष की अवस्था में हो गया और 24 वर्ष के पुत्र यानी मुझे घर-परिवार की जिम्मेदारियां दे गए। मैंने मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनके अप्रकाशित साहित्य को प्रकाश में लाना था और लगभग पांच वर्षों तक इसी कार्य में लगा रहा। इसी दौरान ‘नेगचार’ पत्रिका संपादन और पुस्तक-प्रकाशन कार्य आरंभ किया। पुस्तक प्रकाशन राजस्थानी में अब भी एक समस्या है। हमारे रचनाकारों का अपनी भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण ही है कि वे बिना संवैधानिक मान्यता की मातृभाषा के सभी मोर्चों पर संघर्षरत हैं।
    ‘बिना हासलपाई’ एक गणितीय क्रिया-पद है, जिसका राजस्थानी लोक में अभिप्राय बिना लाग-लपेट के तथ्यपरक कहन से जुड़ता है। आलोचना से हम जिस वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा करते हैं, उसे बिना हासलपाई यानी बिना लाग लपेट मैंने विश्लेषित करने का प्रयास किया है। मेरा मत है कि महानताओं के छद्म आवरण आलोचना से ही उजागर होते हैं। रचना की निरपेक्ष परख ही आलोचना का धर्म है। मैं आलोचना के नाम पर रचना का केवल सारांश लिखने का पक्षधर नहीं हूं। हमारी कोशिश रचनाशीलता के आयामों को मर्म के साथ उद्घाटित करने की होनी चाहिए। यदि प्रत्येक रचना एक नया अविष्कार है, तो उसके लिए आलोचना में भी नए-नए आयुधों का आविष्कार जरूरी है। हमें साहित्य के उतरोत्तर विकास के लिए परस्पर विचार-विमर्श को खुले मन से ग्रहण करना चाहिए, किंतु राजस्थानी में ऐसा बहुत कम है।
    लेखकीय प्रवृत्ति की बात करें तो हम जानते हैं कि अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करने वाले आलोचना को महत्त्व नहीं देते हैं। आलोचना का अभिप्राय निंदा नहीं है, फिर भी बहुधा इसे इसी भाव में ग्रहण करने वाले साथी इसे समालोचना कहना पसंद करते हैं। समालोचना में भी रचना को सम्यक भाव से देखना जरूरी है। मैं रचना को रचनाकार के नाम से मुक्त कर उसे उसके मूल-पाठ में देखने की अभिलाषा रखता हूं। ऐसा नहीं है कि किसी रचना को पढ़ते ही मैं आलोचना को प्रवृत होता हूं। मेरा अध्ययन, मनन और चिंतन ही मुझे ऐसी स्थिति में पहुंचता है कि मेरे द्वारा आलोचना लिखी जाती है। यांत्रिक आलोचना मैं चाह कर भी नहीं लिख पाता।
    आलोचना पर भरोसा करने वालों का विश्वास बचाना मेरी पहली प्राथमिकता है। मेरा मानना है- प्रत्येक रचना में आलोचना के तंतु विद्यमान होते हैं। इसका कारण मैं रचनाकार में रचना-दृष्टि को मानता हूं, जिसमें प्रथम आलोचना अंतर्निहित है। अस्तु प्रत्येक रचना का पहला आलोचक स्वयं रचनाकार है। रचना को हम शरीर और आलोचना को उसकी छाया कहें तो समय, देश-काल और परिस्थितियों से उस छाया अर्थात आलोचना का प्रारूप निर्धारित होता रहता है। रचना और आलोचना के सत्य युगानुरूप परिवर्तित-परिवर्द्धित होते हैं। रचना के मर्म तक पहुंचने का प्रयास आलोचक और अनुवादक दोनों करते हैं। अनुवाद जहां दो भाषाओं के मध्य सेतु निर्माण है, वहीं आलोचना मूल लेखक और पाठक के बीच पसरी पगडंडियों का यात्रा-विकल्प है। मेरी रुचि आलोचना के अतिरिक्त कविता और अनुवाद आदि में भी रही है। साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त 24 भाषाओं से चयनित कवियों का अनुवाद राजस्थानी में संग्रह ‘सबद-नाद’ के लिए करते हुए मैंने अपने कवि और आलोचक मन को विस्तारित होते पाया है।
    आधुनिक राजस्थानी कहानी का प्रस्थान बिंदु वर्ष 1956 में प्रकाशित मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ के संग्रह वर्षगांठ को मानते हुए मैंने इस यात्रा को 15-15 वर्षों के चार कालखंड़ों में देखने का प्रयास किया है। दशक के रूढ़ विभाजन से इतर इस विभाजन के मेरे अपने तर्क हैं जिन्हें मैंने ‘बिना हासलपाई’ में विस्तार दिया है। अनेक कहानीकारों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हुआ अथवा जिन पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया, मैंने अधिक उन्हें लिया है। मुझे कुछ ऐसे कहानीकार भी नजर आए जिन्होंने काम तो बहुत कम किया है, किंतु व्यक्तिगत प्रयासों से ‘पेड न्यूज’ की भांति ‘पेड रिव्यूज’ प्रकाशित-प्रसारित कर खुद को स्थापित और चर्चित करने में सफल रहे हैं।
    आलोचना रचनाकार को मोहभंग से बचाती है, तो कभी मोहभंग का कारण भी बनती है। रचनाकारों का समय पर सम्यक मूल्यांकन नहीं होने से उनकी सतत ऊर्जा का ह्रास और मोहभंग होना स्वाभाविक है। एक उदाहरण हमारे कहानीकार  भंवरलाल ‘भ्रमर’ के संदर्भ से देना चाहूंगा कि उन्होंने एक कहानी ‘बातां’ बहुत पहले लिखी, जिस पर चर्चा नहीं हुई.... किंतु बहुत बाद में वही कहानी बेहद चर्चित रही। समय रहते अगर किसी रचनाकार की मेधा का सम्मान आलोचना नहीं करती है, तो अनेक श्रेष्ठ रचनाओं के मार्ग अवरूद्ध हो जाते हैं। किसी महान रचना को लेकर आलोचना अन्य रचनाकारों को प्रेरित-प्रोत्साहित करती है, वहीं किसी निम्न कोटि की रचना पर रचनाकारों को सजग और सचेत करती है।
    मैंने विभिन्न अवसरों पर विभिन्न आलोचनात्मक आलेख लिखे। पहला संकलन वर्ष 2011 में ‘आलोचना रै आंगणै’ प्रकाशित हुआ। कहानी विधा पर समग्रता से मेरा कार्य ‘बिना हासलपाई’ है। मेरा मानना है कि प्रांतीय भाषाओं के साहित्य की आलोचना हिंदी और अंग्रेजी में भी होनी चाहिए। जिससे हमारे रचनाकारों का परिचय अधिक से अधिक लेखकों, पाठकों और शोधार्थियों तक पहुंच सके। हमें व्यक्ति केंद्रित आलोचना में अपने समकालीनों भी को लेना चाहिए। फिलहाल मैंने ऐसा प्रयास दो रचनाकारों बुलाकी शर्मा और मधु आचार्य ‘आशावादी’ के सृजन-सरोकारों को लेकर किया है। यह भी संयोग है कि ये दोनों रचनाकार बीकानेर के हैं और साहित्य अकादेमी द्वारा विगत वर्षों में पुरस्कृत हुए हैं।
    मेरी आलोचना दृष्टि से किसी की सहमति-असहमति हो सकती है, यह उनका अधिकार है। मैं अपनी आलोचना के विषय में बताना चाहता हूं- यदि मैं अपने स्वर्गीय कहानीकार पिता  सांवर दइया की कहानियों पर लिखने का मन बनाता हूं तो उनके स्नेह-संबंधों को भूलाकार उन्हें केवल एक कहानीकार के रूप में देखता हूं। मेरा आलोचक मुझे यह अधिकार नहीं देता कि राजस्थानी कहानी के संदर्भ में अपने पिता को प्रेमचंद अथवा गुलेरी साबित करने की अनाधिकृत चेष्टा करूं। वे जैसे हैं और जैसा मैं उन्हें अपने मूल्यांकन में पाता हूं मैंने वैसा ही उद्धाटित किया है। उदाहरण के रूप में कहूं तो मैंने अपने पिता की कहानियों पर चर्चा करते हुए प्रयोग के नाम पर विषय-शैली के प्रति उनकी रूढ़ता को उजागर किया है। इसी भांति उनके द्वारा संपादित कहानी-संग्रह ‘उकरास’ की आलोचना करते हुए लिखा है कि उन्होंने कहानीकारों के क्रम में उम्र को महत्त्व दिया है, जबकि कहानीकारों की रचनात्मकता और कहानी-लेखन ग्राफ को क्रम-निर्धारित का आधार बनाना था। परंपरा से आधुनिकता की यात्रा एक क्रमबद्धता का नाम है, जिसमें रचनाकारों के स्थान-निर्धारण का कार्य आलोचना करती है। ऐसा ही कुछ मैंने ‘बिना हासलपाई’ में प्रयास किया है।
    हमारे यहां लोककथाओं की समृद्ध परंपरा रही है। विजयदान देथा, लक्ष्मीकुमारी चूड़ावत, नानूराम संस्कर्ता, मूलचंद प्रणेश जैसे अनेक रचनाकारों ने राजस्थानी लोककथाओं को लिपिबद्ध कर भाषा और लोक साहित्य को समृद्ध किया है। वर्ष 1970-71 में आधुनिक कहानी के आरंभिक बिंदु को खोजते हुए मैंने एक संदर्भ में लिखा है कि आधुनिक कहानी का आरंभ विजयदान देथा से नहीं कर के हमें नृसिंह राजपुरोहित से करना चाहिए, क्यों कि बिज्जी वर्षों लोककथाएं लिखते रहे हैं। उन्होंने सिर्फ दो-चार मौलिक कहानियां लिखी हैं, इस कारण उन्हें हम गुलेरी तो मान सकते हैं, किंतु राजस्थानी कहानी के प्रेमचंद नृसिंह राजपुरोहित माने जाएंगे। इसमें किसी रचनाकार के कार्यों की अवमानना अथवा अवहेला नहीं है।
    यहां यह उल्लेख भी जरूरी है कि मैं कहानी आलोचना का विधिवत आरंभ वर्ष 1998 में आलोचक डॉ. अर्जुनदेव चारण की पुस्तक ‘राजस्थानी काहणी : परंपरा विकास’ से मानता हूं। उन्होंने आधुनिक कहानी की विशद चर्चा करते हुए अपने अध्ययन को पांच कहानीकारों पर केंद्रित किया था। वर्षों तक इस दिशा में व्यवस्थित कोई कार्य प्रकाश में नहीं आया। इस बीच आधुनिक कहानियां भारतीय कहानी में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति लगातार दर्ज करवा रही थी, जिसे विस्तार से रेखांकित करते हुए मैंने अपने अध्ययन का मुख्य आधार 25 कहानीकारों को बनाया। आलोचना के लिए किसी रचना को आधार बनाए बिना कुछ कहना अथवा मान्यताओं को देशी-विदेशी उदाहरणों से पुष्ट करने की तुलना में मुझे अपनी भाषा के रचनाकारों को लेना अधिक उचित जान पड़ता है। ‘बिना हासलपाई’ मेरा एक विनम्र प्रयास रहा है, जिसे अकादेमी ने सम्मान देकर मुझे भविष्य में आलोचना के क्षेत्र में काम करने का हौसला, हिम्मत और समर्थन दिया है। कहानी की भांति राजस्थानी उपन्यास विधा में भी उल्लेखनीय कार्य हुआ है। कहानी की तुलना में उपन्यास का कैनवास विशद और व्यापक होता है। ऐसे में आलोचना कुछ संकेत यानी कुछ दिशाओं की तरफ देखने का आग्रह करती है। इसी भावबोध से जुड़ी मेरी आगामी पुस्तक का नाम है- ‘आंगळी-सीध’।
    इस अवसर पर मुझे प्रेरित-प्रोत्साहित करने वाले अनेक नाम स्मरण में आ रहे हैं। जैसे मोहन आलोक, भंवरलाल ‘भ्रमर’, नंद भारद्वाज, कन्हैयालाल भाटी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य ‘आशावादी’, नवनीत पाण्डे, मदन सैनी, मीठेश निर्मोही, मंगत बादल, राजेन्द्र जोशी और डॉ. मदनगोपाल लढ़ा आदि ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने समय-समय पर अपने सकारात्मक सुझाव दिए। इन सभी और ऐसे अनेक मित्रों-पाठकों के प्रति मैं हृदय की अतल गहराई से आभार ज्ञापित करता हूं। आभार के इस क्रम में मैं अपनी जीवन-संगिनी वर्षा दइया, दोनों पुत्रियां रौनक, प्रांजल और पुत्र रचित को भी यहां याद करता हूं, हालांकि मैं जानता हूं कि मुझ से आभार-ज्ञापन की अपेक्षा उन्हें कभी नहीं रही है। मुझे लगता है कि मेरे भीतर के लेखक ने अगर कुछ भी बेहतर किया है तो वह इन कारकों-उत्प्रेरकों ने संभव बनाया है।
    अंत में एक बेहद जरूरी मुद्दा साझा करना चाहता हूं। भारतीय भाषाओं के इस विशाल प्रांगण में राजस्थानी का सतत अवदान रहा है। राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है...। आज जब पूरा विश्व मातृभाषाओं के पक्ष में है, तो ऐसा कोई कारण नजर नहीं आता कि मेरी अथवा किसी अन्य मातृभाषा के साथ अन्याय हो। भारत की तमाम भाषाओं के साथ हिंदी का भरपूर सम्मान करते हुए इस मंच से मैं अपनी मातृभाषा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता प्रदान करने की गुजारिश करता हूं। मेरा यह सम्मान सही अर्थों में तभी पूरा सम्मान होगा जव संवैधानिक मान्यता के लिए वर्षों पहले राजस्थान विधान सभा के पारित प्रस्ताव को केंद्र सरकार अविलंब मंजूर करें।
जय राजस्थान। जय राजस्थानी। जय हिंद। जय हिंदी।
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21 फ़रवरी, 2018

जाग, जाग! ओ धोरां वाला देश जाग / नीरज दइया

    विश्व प्रसिद्ध देशनोक की धरा के कवि मनुज देपावत ने वर्षों पहले एक गीत लिखा था- ’ओ धोरां वाला देश जाग.....’ किंतु छाती पर पड़े उस ‘पेणै नाग’ ने हमारी अनगिनत सांसें पी ली और अभी भी वह सांसें पीए जा रहा है। बिना भाषा, साहित्य और संस्कृति के मनुष्य पशु समान कहा गया है। यह हमारी पशुता नहीं तो भला क्या है कि हम हमारी मृत्य का समय भी नहीं पहचान पा रहे हैं। जो राजस्थानी भाषा हमारे रक्त में घुली हुई है, जिस भाषा के होने का अहसास हमारी सांस के हर स्वर में है। उसी भाषा के दुर्दिन हैं कि उसे संवैधानिक मान्यता देने में अब भी कोताही बरती जा रही है। क्या यह विचित्र बात नहीं है कि पूरे देश में ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ 2005 और ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ 2009 को लागू किए जाने के उपरांत भी राजस्थान के बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इस सत्य से भला कौन मुंह मोड़ सकता है कि यह बच्चों का अधिकार है, उनकी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। फिर क्यों राजस्थान के बच्चों को उनके इस अधिकार से अब तक वंचित रखा गया है? उन्हें अपनी मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से दिया ही जाना चाहिए। हमारा जागना इस संदर्भ में बेहद जरूरी है, नहीं तो आने वाला समय हमें कभी माफ नहीं करेगा। ‘यूनेस्को’ द्वारा पूरे विश्व में मातृभाषा दिवस मनाने का यही उद्देश्य है कि मातृभाषाएं फले-फूले और विकसित हों। बहुभाषाएं हमारी समृद्धि का प्रतीक है।
    हिंदी के हित में अपना उत्सर्ग करने वाली राजस्थानी जो राजस्थान में पटरानी थी उसे अब दासी बना दिया है, फिर भी हम धैर्य धारण किए हुए हैं। हमारे धीरज अथवा धैर्य यह अंतिम समय चल है, अब या तो हमारी भाषा को मान्यता मिलेगी नहीं तो हमें एक एक कर भाषा के लिए शहीद होना पड़ेगा। इसका आगाज राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित ने किया है। उनका ‘मरणो-धरणो’ को इसी अर्थ में लिया जाना चाहिए कि हमारी बात गंभीरता से नहीं सुनी जा रही है। विगत वर्षों का इतिहास देखें तो राजस्थानी मान्यता के अनेक स्तरों पर कार्य हुआ है और हमने हमारी बात को बहुत शालीनता के साथ प्रस्तुत भी किया है। उदाहरण के लिए राजस्थानी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘माणक’ के संपादक पदम मेहता ने केंद्र सरकार के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों से मान्यता के संबंध में अनुनय-पत्र और अनेक साक्ष्य समय समय पर प्रस्तुत किए हैं। यह तो महज एक उदाहरण है किंतु राजस्थान की विधान सभा तो पूरे राजस्थान खी जनता की तरफ से राजस्थानी के संबंध में निर्णय ले चुकी है। विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव पर भी केंद्र सरकार अब तक आंखें नहीं खोल रही है। देश के एक शिक्षत नागरिक और शिक्षक के रूप में मेरा सविनय अनुरोध है कि मातृभाषा की बात बच्चों के हित में हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। यह हमारी जन-भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं तो भला क्या है? आश्चर्य है कि सत्ता में बहुमत से राजनीति करने वाली सरकारें ही बहुमत का सम्मान नहीं करती। क्या ऐसी स्थितियों में भी धोरा वाले देश में जागरण-गीत नहीं सुना जाएगा।
    समय पर राजस्थानी को मान्यता नहीं देकर हमारी युवा पीढ़ी को उनकी जड़ों से कटने का कुचक्र है, जो लंबे समय से चल रहा है फिर भी हम सोए हुए हैं! हमारी मां की भाषा ही हमारी मातृभाषा है, किंतु अब जिस पीढ़ी को हम युवा पीढ़ी कहते है, उस युवा पीढ़ी की मां और उनकी भाषा के साथ तो अत्याचार हो चुका है। उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर हिंदी और अंग्रेजी को थोपा गया था। ऐसे में कुछ आधुनिकता के कुचक्र में आए और अपनी भाषा को ही छोड़ कर दिखावे की इस दुनिया में बहक गए। इस पूरे खेल का असर यह हुआ कि राजस्थानी समाज भी अपनी मातृभाषा राजस्थानी से कटता जा रहा है। क्या ऐसी रणनीति से हम हमारी मातृभाषा हिंदी को मानने लग जाएं तो दोष किसका है? यदि हमारे देश की आजादी का यही अर्थ है कि हमारी भाषा को जड़ों से ही उखाड़ दिया जाएगा फिर तो यह गुलाम बनाने की दोहरी नीति है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जानें कि हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति की वह विरासर है जिसे हम हमारी असली हेमाणी कह सकते हैं। इस का संरक्षण हमें ही करना है। इन सब का यह अर्थ अनजाने में भी नहीं लिया जाए कि हम हिंदी अथवा किसी अन्य भाषा के विरोध में है। हमारा बस इतना कहना है कि राजस्थानी हमारी मां है और हिंदी मौसी। हमारी मां राजस्थानी ने ही हमें ऐसे संस्कार दिए हैं कि हम हमारी मौसी अथवा अन्य किसी भी पारिवारिक भाषाओं का सदा सम्मान ही करेंगे। यह सर्वविदित सत्य है कि क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से हिंदी का पोषण होगा और वह समृद्ध होगी।
    हिंदी के कुछ विद्वान पढ़े-लिखे होकर भी अनपढ़ों सा व्यवहार करते हैं। भाषा विज्ञान के स्पष्ट प्रावधानों के उपरांत भी वे भाषा और बोली का विभेद नहीं समझ पा रहे हैं। सभी शर्तों को पूरा करने वाली राजस्थानी यदि अब भी बोली है और उसको मान्यता नहीं दी जा सकती है तब भी यह यक्ष प्रश्न है कि इसके विकास और हमारी धरोहर के संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं क्यों नहीं हुई है। रोड़े अटकाने वाले यह भी कहते हैं कि राजस्थानी में अनेक बोलियां है। भाषा की आंचलिकता तो प्रत्येक भाषा में विद्यमान है। राजस्थानी जितना विशाल शब्द-कोश अन्य भाषाओं में नहीं है। लोक व्यवहार में ऐसे-ऐसे शब्द और उक्तियां है कि उनका अनुवाद के माध्यम से भाव और अभिप्राय व्यंजित नहीं किया जा सकता है। राजस्थानी ने ही हिंदी को पृथ्वीराज रासो और मीरा पदावली जैसी अनेक अनुपम कृतियां प्रदान की है। राजस्थानी के आधुनिक साहित्य के बिना भारतीय साहित्य की चर्चा असंभव है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति का रंग हमारी भारतीयता से अलग करना असंभव है। इस रंग से ही सभी रंग सुशोभित हैं।
    इस धरा के वीरों का स्मरण कीजिए जो अपना सीस कट जाने के उपरांत भी युद्ध-भूमि में अपने शत्रुओं का नाश करने की क्षमता रखते थे। यहां की मिट्टी के कण-कण में इसकी गौरव गाथा अब भी धड़क रही है। जिस दिन यह मिट्टी आवाज लगाएगी, उसी दिन पूरा राजस्थान उठ खड़ा होगा। गांधी और अहिंसा के हम पुजारी हैं। यहां लूण यानी नमक की आन रखने वाले धरा के कोने-कोने में मिलेंगे, किंतु साथ ही प्रश्न यह है कि अपने बच्चों और परिवारों के लिए राणा प्रताप की भांति प्रधानमंत्री जी को पाति लिखने वाले हम राजस्थानी किसी कवि की प्रतीक्षा में हैं जो हमें जग जाने को कहे? कवि मनुज देपावत बहुत पहले कहता हुआ इस संसार से विदा हो चुका है, अब बस हमें हमारी आत्मा की आवाज सुननी है। देखिए आत्मा से क्या आवाज आ रही है? यदि भाव सुंदर शब्दों में प्रगट करना चाहें तो जनकवि कन्हैयालाल सेठिया के शब्द हैं- ‘खालीधड़ की कद हुवै चैरे बिना पिछाण, मायड़ भाषा रै बिना क्यां रो राजस्थान।’
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