21 फ़रवरी, 2018

भविष्य का बड़ा सवाल - राजस्थानी ? / डॉ. नीरज दइया

 सर्वप्रथम यही विचार करें कि ‘राजस्थानी’ क्या है? इसका पहला जबाब तो यही कि मैं राजस्थानी हूं, क्योंकि मैं राजस्थान में रहता हूं। मैं राजस्थानी होकर भी भारतीय हूं, क्योंकि मेरा राजस्थान भारत में है। कोई व्यक्ति अपने आप में बड़ा अथवा छोटा नहीं होता। उसका बड़ा अथवा छोटा होना स्थिति सापेक्ष है। सत्य केवल यही है कि मैं जितना भी हूं, जैसा भी हूं, मेरा होना एक अस्थित्व है। मुझे वैश्विक-परिदृश्य में एक सूक्ष्म इकाई अथवा नगण्य के रूप में लिया जा सकता है। जाहिर है मैं यहां मेरी नगण्यता, लघुता अथवा सूक्ष्मता की बात नहीं कर रहा हूं। अभिप्राय है कि अखिल विश्व में व्यक्ति नगण्य होने के उपरांत भी स्रष्टि की मानव-जाति अथवा लेखक-समुदाय के अस्तित्त्व की एक अभिव्यक्ति तो है ही। किसी का होना अपने आप में एक चुनौतिपूर्ण है। अणु-परमाणु के भीतर विभिन्न कणों को स्वीकारते हम उनकी शक्तियों को प्रणाम करते हैं। यहां मुझे कवि गिरिजाकुमार माथुर का स्मरण आता है जिन्होंने कविता ‘आदमी का अनुपात’ में लिखा है- प्रदेश कई देश में / देश कई पृथ्‍वी पर / अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्‍वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही / सबको समेटे हैं / परिधि नभ गंगा की / लाखों ब्रह्मांडों में / अपना एक ब्रह्मांड / हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियां / कितनी ही भूमियां / कितनी ही सृष्टियां / यह है अनुपात / आदमी का विराट से....।
            माना कि आदमी एक कमरे में दो दुनिया रचाता है और रचनाकार एक कागज के पन्ने पर कितनी-कितनी दुनिया रचते हैं। बच्चन जी ने लिखा था- मैं और, और जग और, कहां का नाता, मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता; जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव, मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता! ऐसे में इसे रचना और रचनाकार की विराटता ही कहेंगे, जिसे वह अपनी भाषा में साकार करता है। कवि उमाशंकर जोशी ने अपनी कविता में जिसे रस का ‘अक्षय-पात्र’ कहा, वह भाषा से संभव है। कवि कुंवर नारायण ने तो भाषा को सहूलियत से बरतने का परामर्श भी दिया है। कहना यह है कि ऐसी सहूलियत मुझे मेरी भाषा राजस्थानी में है। मैं अपनी यह विरासत न केवल सहेजना चाहता हूं वरन भारतीय साहित्य में इसकी एक बानगी रखने का प्रयास कर रहा हूं। वैसे यह सर्वविदित है कि राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड समेत अनेक विश्वविद्यालयों ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में वर्षों पहले स्वीकार कर लिया है किंतु राजस्थान विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव केंद्र सरकार ने ठंडे बस्ते में रखा हुआ है। राजस्थान में कभी राज-काज की भाषा राजस्थानी थी, किंतु उसने हिंदी के हित में अपना बलिदान दिया, यह एक ऐतिहासिक सत्य है। बलिदान का प्रतिफल यह है कि अब भी राजस्थान के बच्चों को उनकी मातृभाषा में अध्ययन की व्यवस्था नहीं है। जबकि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 को पूरे देश में लागू किया गया है और राजस्थान में यह लंबित है।
            राजस्थान के भू-भाग और देश-विदेश में करोड़ों जन-जन की भाषा राजस्थानी को विदेशों में भी स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकारा गया है, किंतु राजभाषा हिंदी के विद्वान गुरुजन इसे अब भी एक बोली के रूप में पढ़ा रहे हैं। यह मिथ्या तथ्य अब भी प्रचलन में है, यह उनकी हठधर्मिता नहीं तो भला क्या है? ‘भाषा विज्ञान’ के स्पष्ट निर्देशों के उपरांत बोली और भाषा के बीच अंतर उन्हें समझ नहीं आता। नहीं तो क्या कारण है कि इस मुद्दे पर वे तर्क सम्मत जांचने-परखने ही हिम्मत नहीं करते हैं। बोली के भाषा बनने के समस्त मानकों को पूरा करने के बाद भी अगर राजस्थानी को बोली ही मानना है तो ऐसे गुरुओं के ज्ञान हेतु कबीर जी ने बहुत पहले लिखा था- गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अंतकाल पछिताना। मुद्दा यह भी बनता है कि सभी मतों, तथ्यों और तर्कों के आधर पर राजस्थानी एक समृद्ध भाषा सिद्ध होने के उपरांत भी अगर आपकी दृष्टि में राजस्थानी एक बोली है, तो आप इस बोली के विकास के लिए क्या कर रहे हैं?
            एक भ्रांति यह भी है कि राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी कमजोर होगी। क्या अन्य प्रांतीय भाषाओं की मान्यता से हिंदी कमजोर हुई है? फिर वह राजस्थानी जिसने सदा हिंदी को पुष्ट और पोषित किया है उससे भला कैसे कमजोर होगी। आदिकाल में पृथ्वीराज रासो और मध्यकाल में मीरा सबसे बड़ा प्रमाण है कि राजस्थानी ने हिंदी को सबल बनाया है। आधुनिक काल में अनेक राजस्थानी रचनाकार अपनी मातृभाषा के साथ समानांतर रूप से हिंदी में भी लेखन कर रहे हैं। हिंदी के पूरे समर्थन के साथ हमारी प्रवल आकांक्षा है कि राजस्थानी को जल्द ही संवैधानिक मान्यता मिले। राजस्थानी समाज यह भी कामना करता है कि हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में पूरे भारत में मान्यता और सम्मान मिले।
            विनम्रतापूर्वक यहां यह भी निवेदन है कि राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। मेरी मातृभाषा राजस्थानी के प्रति यहां के बड़े-बूढ़ों और बच्चों के हितों को देखते हुए संवैधानिक दर्जा मिले। हिंदी के सम्मान की सहमति के साथ ही आग्रह है कि क्षेत्रीय भाषाओं की अवमान नहीं होनी चाहिए। राजस्थानी भाषा को मान्यता मिले यही ‘अंतिम इंछा’ लिए महाकवि कन्हैयालाला सेठिया सहित अनेक रचनाकार इस संसार से विदा हो गए। आज भी अगर राजस्थानी के वरिष्ठ रचनाकारों से प्रश्न किया जाएगा कि उनकी अंतिम इंछा क्या है? वे समवेत स्वर में जबाब देंगे- हमारी भाषा की उसका सम्मान मिले। प्रत्येक व्यक्ति की अस्मिता का सवाल भाषा से जुड़ा है। हमारी भाषा में हमारी जड़े हैं और यदि कोई किसी की जड़ों को काटेगा तो कब तक चुप रहा जा सकेगा यह भविष्य का बड़ा सवाल है।
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अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2018

पांच पीढ़ियों की प्रतीक्षा / नीरज दइया









18 फ़रवरी, 2018

रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी / नीरज दइया

मायड़ भाषा से अनजान रहकर अंग्रेजी में गिटपिट करके खुद को बड़ा आदमी होने का दिखावा करने वाले चाहे कितनी भी उन्नति कर लें, वे सदैव हीन ही रहते हैं। भाषायी ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा की कीमत पर कतई नहीं।
भारत की संस्कृति में राजस्थानी का अपना अनूठा रंग है और इसके बिना सभी रंग फीके हैं। राजस्थानी भाषा का सांस्कृतिक रंग इतना अनूठा है कि किसी के आने और जाने दोनों क्रियाओं के लिए एक ही शब्द 'पधारो सा' को बोलने का अंदाज निराला है। 
दीया बुझता नहीं ‘बड़ा’ होता है
हमारे यहाँ दूकान को बंद नहीं मंगळ किया जाता है और दीपक को बुझाने के स्थान पर 'बड़ा करना' शब्द इसकी विशिष्टता दर्शाता  है। यहाँ मरण को भी मंगल माना गया है। किसी के निधन के लिए "सौ बरस" कहना अपने आप में हमारे यहां निराला है। लोक की यह धरोहर बची और बनी रहे। बिना राजस्थानी की आत्मा को समझे अनजाने में कुछ लोग भूल करते हैं। जैसे बढ़ना और बढ़ाना क्रिया-पद यहां हिंदी-अर्थ से इतर अर्थ के हैं। राजस्थानी में ये काटना क्रिया से संबधित है, जबकी इनके हिंदी-भाव को 'बधावां' शब्द प्रयुक्त होता है।
इसी भांति राजस्थानी भाषा की सामासिकता भी बेजोड़ है। उदाहरण के लिए 'बासी मूंढै' में जो अर्थ बिना कुछ खाए सुबह सुबह उठने के बाद की स्थति और मनोभावों की व्यंजना है वह हिंदी अथवा अन्य भाषा सहज सुलभ नहीं है। एक एक शब्द के अनेक पर्यायवाची और विभिन्न भावों   अर्थों के लिए विशाल शब्द भंडार भी राजस्थानी भाषा की एक अद्वितीय विशेषता है। 
कोस-कोस पर बदले वाणी
राजस्थानी भाषा की आंचलिकता उसकी बोलियों में समाहित है। 
कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी बदलने की बात राजस्थान के लिए हमेशा से कही जाती है, किंतु किंतु संप्रेषण की कहीं कोई समस्या यहाँ नहीं है। कुछ शब्दों और वर्तनी को लेकर जो भिन्नताएं हैं वे मान्यता मिलने और स्कूली शिक्षा में पूर्ण राजस्थानी के लागू होने पर स्वतः हल हो जाएंगी। 
युवा वर्ग का राजस्थानी से कटाव
राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं प्रदान किए जाने की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि युवा पीढ़ी की भाषाई जड़े ही कटती जा रही है। बढ़ती शिक्षा और बदलती संस्कृति से हमारी नई पीढ़ी एक ऐसे दौर में पहुंचा दी गई है जहां अब उनकी स्मृति में तो मातृभाषा है किंतु  वे लोक-व्यवहार में अंग्रेजी और हिंदी के अभ्यस्त होने लगे हैं। किसी भी भाषा में कोई खराबी या कमजोरी नहीं है किंतु बात हमारी मातृभाषा राजस्थानी की विशाल धरोहर को बचाने की है।
यूनेस्को द्वारा इसी उद्देश्य से  21 फरवरी को ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाना आरंभ किया गया, जो विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना प्राथमिकता मानता है। आवश्यकता बहुभाषिता को बढ़ावा देने की है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में लगभग 2500 भाषाएं ऐसी हैं, जो खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि लगभग 25% भाषाएं तो विश्व में ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम है। 
संपूर्ण और समृद्ध भाषा
सवाल यह है कि क्या राजस्थानी भाषा को लुप्त होने दिया जाए या इसे बचाया जाना जरूरी है। भाषा विज्ञान में बोलियों और भाषाओं के क्रमिक विकास पर व्यापक विवेचन मिलता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि कोई बोली भाषा कब, कैसे और क्यों बनती है। इसके साथ ही वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी विद्वानों ने नियत किए हैं। उन सभी आधारों पर खरी उतरने वाली राजस्थानी भाषा के विषय में अब भी भाषा-बोली को लेकर भ्रामक स्थिति फैलाई जा रही है। 
रिमिक्स के दौर में गुम होते शब्द
प्रत्येक भाषा में व्याकरण और भाषिक संदर्भ होते हैं जिनके अभाव में अनेक दोष लोक में धीरे धीरे व्याप्त होने लगते हैं। बदलते समय और समाज में राजस्थानी लोक-साहित्य और भाषा की समझ नहीं होने के अनेक प्रमाण हम देखते हैं। 
उदाहरण के लिए राजस्थानी में ‘ळ’ एक विशिष्ट ध्वनि है किंतु प्रत्येक ‘ल’ के लिए ‘ळ’ प्रयुक्त नहीं होता है। बल (ताकत) और बळ (जलना) इसके सहज उदाहरण हैं। अनेक लोकगीत ऐसे हैं जिनका स्वरूप बदलता जा रहा है। रिमिक्स और फ्यूजन के दौर में लोकधुनों की मीठास और परंपरागत कौशल धीरे-धीरे बिसरता जा रहा है। क्या अब भी हम ‘कान्या मान्या कुर्र, चलां जोधपुर...’ अथवा ‘आओ नीं पधारो म्हारे देस... ’ जैसे कर्णप्रिय गीत सुनकर भीतर तक रसविभोर नहीं होते हैं? 
जीवन से मरण तक के लोकगीत वाले हमारे समाज में अनेकानेक भावों से हम मुदित और हर्षित होते हुए हमारी इस थाती पर इतराते हैं किंतु संकट मंडराता साफ देखा जा सकता है। असंख्य पांडुलिपियां और ग्रंथ संग्रहालयों की विरासत क्या भविष्य में नष्ट हो जाएगी? ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिनके लिए राजस्थानी भाषा से युवा पीढ़ी और घर-परिवार से जोड़े रखना जरूरी है।  
मातृभाषा का ऋण उतारना होगा
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में मातृभाषा के पक्ष में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी राजस्थान के विद्यार्थियों को उनके मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना सर्वथा अनुचित और अनैतिक है। भाषा ही ऐसी जड़ें हैं जिससे हमारे भीतर संस्कार पोषित होते हैं और बालक-बालिकाओं को ऐसी त्रासद स्थिति में देखते हुए भी पूरा राजस्थानी समाज कब तक चुप्पी साधे रखेगा। हमारी भाषा को हमारे घर, परिवार और समाज ने हमें सौंपा है तो इस अपेक्षा के साथ कि इसे हम बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर मातृभाषा के ऋण से मुक्त होंगे। यह संयोग है कि मेरे रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी है, जो मुझे मेरी मां ने अपने स्तनपान के दिनों मुझे विरासत के रूप में दी थी। राजस्थानी मेरी आत्मा की भाषा है और हिंदी मेरे पेट का पोषण करती है। 

हिंदी को ॠणमुक्त करना है
अगर राजस्थान से एक आवाज राजस्थानी के लिए उठती है तो दुगने जोश और उत्साह के साथ राजस्थानी समाज हिंदी का भी समर्थन करता रहा है। क्या मेरा मकान यदि पक्का बनता है तो किसी पड़ौसी अथवा मकान जहां स्थित है वह मकान अथवा स्थान कमजोर होने का कोई अंदेशा है? यदि नहीं तो फिर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता से हिंदी भला कमजोर कैसे होगी? अगर इतिहास के पन्नों में जाएंगे तो मिलेगा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर हिंदी को ऋण-मुक्त करना है।
म्हारी जबान रो ताळो खोलो 
राजस्थानी मान्यता के इस संघर्ष में अनेक पीढ़ियों के अपना अपना योगदान दिया है। अब भी संघर्ष जारी है किंतु इसका रूप परिवर्तित होते नजर आने लगा है। युवा पीढ़ी के क्षोभ में यदि समय रहते यह मांग अब भी पूरित नहीं होती तो गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले राजस्थान की हवाओं में आंधी आने की संभवाना बनने लगी है। आज राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए घर-गली-कस्बों और गांव-गांव से एक ही आवाज आने लगी है- ‘म्हारी जबान रो ताळो खोलो। राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी भासा है।’ पर जब अपने ही लोग इसे बिसरा रहे हो तो मान्यता मिलने के बाद भी क्या राजस्थानी खुश हो पाएगी?
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मायड़ भाषा को युवा पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी नहीं होने से प्रदेश के बच्चों की जड़े काटती जा रही हैं, इसके अभाव में विकास की सारी संभवानाएं कुंठित होती जाती है। उन पर बहुत छोटी उम्र में ही हिंदी और अंग्रेजी का बोझ डाल कर उनके भाषाई संस्कार छिने जा रहे हैं। 
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देश और प्रांत के गठन के समय भाषा का संदर्भ महत्त्वपूर्ण माना गया है। पंजाब के लिए पंजाबी, गुजरात के लिए गुजराती और महाराष्ट्र के लिए मराठी फिर राजस्थान के लिए राजस्थानी क्यों नहीं?
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मातृभाषा से हर आदमी की एक खास पहचान बनती है, हमारी खास पहचान खान-पान से लेकर पहनावे तक में धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है।
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आज अंग्रेजी की पौ बारह पच्चीस है। लगने लगा है कि अंग्रेजी से जुड़ कर हम उच्च वर्ग में शामिल हो जाएंगे। हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है ऐसे में राजस्थानी दोहरी मार झेलने को विवश है।
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03 फ़रवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

पुस्तक पर आलेख
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राजस्थानी और हिन्दी साहित्य में डॉ. नीरज दइया एक जाना-पहचाना नाम है। राजस्थानी कविता और आलोचना के क्षेत्र में तो उन्होंने विशेष कार्य किया ही है, अनुवाद, संपादन और व्यंग्य साहित्य में भी इनका योगदान उल्लेखनीय है। डॉ. दइया की अब तक दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उनकी आलोचनात्मक कृति ‘बिना हासलपाई’ को साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 दिये जाने की घोषणा हुई है। यहां हम उक्त पुरस्कृत पुस्तक पर आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।
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भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
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आलोचना बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है।
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पुस्तक का नाम- बिना हासलपाई (2014)
लेखक- डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक - सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003
पृष्ठ- 160
कीमत - रुपये 240/-
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 आभार : ‘दुनिया इन दिनों’ प्रधान संपादक- श्री सुधीर सक्सेना

बुलाकी शर्मा के सृजन सरोकार

इस पुस्तक में राजस्थान के परिचित कथाकार व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को केंद्र में रखकर नीरज दइया ने अपना समीक्षात्मक आकलन प्रस्तुत किया है। इस आकलन में उनके परस्पर संबंधों तथा निजी जीवन के अनुभवों के साथ ही संस्मरणपरक छवियां भी अंकित की गई है। व्यक्ति के समाज, समय, संस्कृति तथा परिवेश से जुड़ाव की बदौलत ही उसके सर्जनात्मक व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व की भूमिका निश्चित होती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति बतौर एक रचनाकार हमेशा अपने भीतर सतत आत्म-संघर्ष तथा आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। रचनाकार के तौर पर बुलाकी शर्मा को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट है। व्यंग्यकार तथा कथाकार के रूप में बुलाकी अपने विचार खुलकर प्रकट करते हैं और उनके रचनाकार का यह अकुंठित रूप से उन्हें सार्थक रचनाकार के तौर पर स्थापित करता है।
- मधुमती टीम ( राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)