03 फ़रवरी, 2018

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

पुस्तक पर आलेख
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राजस्थानी और हिन्दी साहित्य में डॉ. नीरज दइया एक जाना-पहचाना नाम है। राजस्थानी कविता और आलोचना के क्षेत्र में तो उन्होंने विशेष कार्य किया ही है, अनुवाद, संपादन और व्यंग्य साहित्य में भी इनका योगदान उल्लेखनीय है। डॉ. दइया की अब तक दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पिछले दिनों उनकी आलोचनात्मक कृति ‘बिना हासलपाई’ को साहित्य अकादेमी मुख्य पुरस्कार (राजस्थानी) 2017 दिये जाने की घोषणा हुई है। यहां हम उक्त पुरस्कृत पुस्तक पर आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।
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भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
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आलोचना बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है।
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पुस्तक का नाम- बिना हासलपाई (2014)
लेखक- डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक - सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर- 334003
पृष्ठ- 160
कीमत - रुपये 240/-
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 आभार : ‘दुनिया इन दिनों’ प्रधान संपादक- श्री सुधीर सक्सेना

बुलाकी शर्मा के सृजन सरोकार

इस पुस्तक में राजस्थान के परिचित कथाकार व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यक्तित्व तथा कृतित्व को केंद्र में रखकर नीरज दइया ने अपना समीक्षात्मक आकलन प्रस्तुत किया है। इस आकलन में उनके परस्पर संबंधों तथा निजी जीवन के अनुभवों के साथ ही संस्मरणपरक छवियां भी अंकित की गई है। व्यक्ति के समाज, समय, संस्कृति तथा परिवेश से जुड़ाव की बदौलत ही उसके सर्जनात्मक व्यक्तित्त्व तथा कृतित्त्व की भूमिका निश्चित होती है। इससे यह भी पता चलता है कि कोई भी व्यक्ति बतौर एक रचनाकार हमेशा अपने भीतर सतत आत्म-संघर्ष तथा आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है। रचनाकार के तौर पर बुलाकी शर्मा को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक का महत्त्व स्पष्ट है। व्यंग्यकार तथा कथाकार के रूप में बुलाकी अपने विचार खुलकर प्रकट करते हैं और उनके रचनाकार का यह अकुंठित रूप से उन्हें सार्थक रचनाकार के तौर पर स्थापित करता है।
- मधुमती टीम ( राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर)

29 जनवरी, 2018

आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं : डॉ. दइया

साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत राजस्थानी कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया से संवाद ० नवनीत पाण्डे
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• आपको साहित्य अकादेमी के सर्वोच्च सम्मान के साथ-साथ पिछले साल मिले दर्जन भर पुरस्कारों, वे भी इतनी कम उम्र में, आपको बहुत- बहुत बधाई! इतने पुरस्कार-सम्मान कैसे मिल गए?
• पता नहीं। प्रत्येक पुरस्कार की अपनी एक प्रक्रिया होती है। साहित्य अकादेमी में तो पुरस्कारों के लिए आवेदन भी मांगे नहीं जाते हैं। उनकी एक गोपनीय प्रक्रिया है। कभी-कभार प्रकाशक सूचना दे देते हैं कि किस किस किताब को साहित्य अकादेमी ने खरीदा है। इससे एक संभावना बनती है कि पुरस्कार के अंतिम दौर में कौन-सी किताबें पहुंची है। अनेक किताबों के बीच से किसी एक किताब को चयनित करना सरल काम नहीं है। यह निर्णायकों का सामूहिक निर्णय होता है। ऐसे में जिसका चयन होता है उसे लगता है कि निर्णय ठीक हुआ है, और जो वंचित रह जाते हैं उनको लगता है यह गलत हो गया। मेरा मानना है कि अगर कोई ढंग का लिखता है तो उसे पुरस्कार मिलेगा, हां कभी देर हो सकती है पर यहां अंधेर नहीं है। उम्र के आधे मुकाम पर मैं पहुंच चुका हूं और आपको 50 की उम्र कम लगती है... खैर आपकी बधाई के लिए आभारी हूं।
• आप के लेखन को देख कर आप ही की तरह बहुमुखी विलक्षण प्रतिभा असमय हमें छोड़ गए आपके पिता कवि-कथाकार सांवर दइया याद आते हैं, उन्हें 35 वर्ष की उम्र में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, उनके बाद आपको अब 50 की उम्र में... कैसा लग रहा है?
• कोई भी बेटा कभी अपने बाप की बराबरी नहीं कर सकता है। कम से कम किसी एक जीवन में तो हर्गिज नहीं। अपने पिता सांवर दइया जितना बड़ा लेखक मैं नहीं हूं। वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे और यह उनका आशीर्वाद है कि मैं लेखन के क्षेत्र में कुछ करने का प्रयास करता हूं। वे 44 वर्ष ही लेकर आए पर वह उनके जाने की उम्र नहीं थी। वे होते तो आज तुम से सवाल करते कि नवनीत तुम्हें भी तो पुरस्कार मिले हैं फिर तुम पुरस्कारों के खिलाफ क्यों हो?
• मैं पुरस्कारों के खिलाफ नहीं हूँ, अगर कोई लेखक ईमानदारी से काम करता है, उसे स्वीकृति-सराहना, सम्मान मिलना चाहिए लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि आज पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचायी जा रही है।
• हम जिस दौर में पहुंच चुके हैं उसमें शब्द अपने अर्थ खोते चले जा रहे हैं या कहें कि शब्द खोखले, बेजान और अर्थहीन हो चुके हैं। ऐसे में हमें उनकी गरिमा के कार्य करना है। मैं मानता हूं कि साहित्य और समाज का दायित्व आज पहले से अधिक हो गया है। पुरस्कारों-सम्मानों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कुछ स्वार्थी किस्म के लोग हमारे बीच हैं, जो अपने लाभ के लिए ऐसा कुछ करते हैं कि पूरे साहित्य-समाज की प्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है। किंतु पुरस्कार और सम्मान की गरिमा बनी रहनी चाहिए।
• पुरस्कारों के लिए मारामारी, लॉबिंग करना हद दर्जे तक घटियापन पर उतर आना भी तो होता है?
• आज हमारे चारों तरफ बाजार का बोलबाला है। हम सब नए बाजारीकरण के दौर में हैं। ऐसे में सभी तरह के रंग रूप यहां देखने को मिलते हैं तो हमें इसे सहजता से स्वीकारना चाहिए। पुरस्कार किसी की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं है। यह महज एक बार समाज का ध्यान खींचता है। इसे सामाजिक स्वीकृति कह सकते हैं। साहित्य का इतिहास गवाह है कि वह पुरस्कार को एक ब्यौरे की भांति दर्ज करता है जब कि रचनाओं का उसमें विधिवत उल्लेख होता है। चर्चा किसी पुरस्कार की बजाय रचना पर होनी चाहिए।
• साहित्य अकादेमी राजस्थानी पुरस्कारों के इतिहास में राजस्थानी की बात करें तो डॉ कुंदन माली के बाद केवल आपने आलोचना में यह पुरस्कार पाया है। डॉ. माली पुरस्कार मिलने के बाद से लेखन से नदारद हैं, तो क्या अब आप भी...?
• ऐसा नहीं है। डॉ. कुंदन माली लिखते रहे हैं और मैं भी इस पुरस्कार के बाद लिखता रहूंगा। कोई पुरस्कार किसी लेखक की मंजिल नहीं होता है। हम जो कुछ कहते हैं हमारी जानकारी के आधार पर कहते हैं और उसमें सदैव संभवानाओं को बनाए रखना चाहिए।
• पुरस्कारों के सिलसिले में यह देखा गया है कि पुरस्कार का अभिप्राय लेखक की संभावनाओं का अंत। ऐसा क्यों हो रहा है?
• पुरस्कार तो संभावनाओं का सम्मान है उसे अंत नहीं मानना चाहिए। आपके संकेत कुछ मामलों में सही भी हैं किंतु कुछ अपवाद रूप छोड़ दें तो पाएंगे कि सम्मान और पुरस्कार ने नई ऊर्जा का संचार किया है। वैसे संभावनाओं के अंत पर भी अनेक संभावनाएं शेष होती है। साहित्य में अंत जैसा कुछ नहीं होता, वह तो स्वयं अनंत है।
• राजस्थानी में आपने पुरस्कारों और लेखक का एक रिकार्ड बनाया है। पुरस्कारों के बारे में अक्सर आरोप लगते हैं कि इनके देने-लेने के पीछे साहित्येत्तर कारण होते हैं। वास्तव में ऐसा होता है?
• आपके सवाल में ही जबाब छिपा है। पुरस्कारों के देने लेने में यदि साहित्येत्तर कारण होते भी होंगे तो क्या हर बार यह संभव होता होगा। अगर हर बार यह संभव नहीं होता तो फिर पुरस्कारों और लेखन का रिकार्ड कैसे बन सकता है? आरोप हमेशा लगने के होते हैं और सच्चाई किसी आरोप की परवाह नहीं करती। अगर कोई किसी पर आरोप लगता है और आरोप सच्चा है तो उसे साबित किया जाना चाहिए। लेखक का काम ही सच्चाई को सामने लाने का होता है।
• क्या आपको इस बार साहित्य अकादेमी से इस निर्णय की उम्मीद थी?
• एकदम नहीं थी। इस वर्ष के लिए तो बिल्कुल नहीं थी। मैंने इस विषय में सोचा भी नहीं था। जब यह सूचना मिली तो मुझे आश्चर्य हुआ और खुशी भी हुई।
• अकादेमी इतिहास में क्षेत्रीय भाषा में शायद यह पहला ही उदाहरण है कि एक शहर में लगातार तीन वर्षों से पुरस्कार आ रहे हैं, सवाल उठने, उठाने स्वाभाविक हैं, आप क्या कहते हैं?
• लगातार चार वर्ष और पांच वर्ष भी हो सकते हैं। क्यों कि साहित्य अकादेमी यह पुरस्कार किसी शहर को नहीं देती है। मैं नहीं जानता कि आपको पता है या नहीं, पर साहित्य अकादेमी केवल किताब और लेखक के नाम के साथ अपना सर्वेक्षण करती है। एक शहर का यह संयोग बना है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’, बुलाकी शर्मा और नीरज दइया बीकानेर में रहते हैं।
• राजस्थानी में बीकानेर और जोधपुर संभाग में अधिक लेखन हो रहा है, प्रांत के बाकी हिस्सों में बहुत कम... ऐसा क्यों है?
• राजस्थानी में अधिक से अधिक लेखन की आवश्यकता है और राजस्थान के प्रत्येक शहर में लेखन हो रहा है। आज सूचना तंत्र और मीडिया के विकास के कारण छोटे छोटे गांवों-कस्बों से लेखक आ रहे हैं। तुलनात्मक रूप से बीकानेर-जोधपुर संभाग आगे हो सकते हैं किंतु वह दिन दूर नहीं जब अन्य संभागों के लेखक भी अधिक सक्रिय होंगे।
• आलोचना की अक्सर निंदा होती है, आलोचकों को प्रतिष्ठा और पुरस्कार कम मिलते हैं। ऐसा क्यों?
• आलोचना सहन करने की क्षमता लेखकों में नहीं है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आलोचकों में भी भय रहता है कि संबंध खराब हो जाएंगे। आलोचक और लेखक सभी सामाजिक प्राणी ही तो है। समाज में अपना-पराया सब होता है। द्वंद्व यह है कि आलोचना में अपना-पराया सब व्यर्थ की बातें हैं। ऐसे में आलोचना की निंदा होना स्वभाविक है।
• आपकी आलोचना में आलोच्य लेखकों और कृतियों के चयन को लेकर कुछ लेखकों की असहमति रही है और सवाल उठाए गए हैं, इसका क्या कारण है?
• सहमति और असहमति एक ही सिक्के के दो पक्ष है। आलोचना में ऐसा होना भी चाहिए अन्यथा सब ठीक है तो फिर आलोचना होगी किस की। साहित्य में प्रत्येक आलोचक अपने दृष्टिकोण से सही कार्य करने का प्रयास करता है। हरेक का अपना नजरिया होता है। कोई भी चयन कभी भी निरपेक्ष हो नहीं सकता है। मैं आप से ही कहता हूं कि अगर आप मुझे कोई चयन देंगे तो क्या उस पर सभी की सहमति संभव है क्या? आरोप लगाने से पहले हमें यह सब सोचना-विचारना चाहिए। हवा में बातें कहने वाले बहुत मिलते हैं पर आलोचना में जमीन पर खड़े होकर यर्थाथ को देखना होता है।
• आलोचना के लिए आप किस आधार पर लेखक अथवा कृति का चयन करते हैं?
• आरंभ में तो मैंने संपादकों और मित्रों के आग्रह पर आलोचनात्मक आलेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। एक लंबी यात्रा से कुछ आलेखों का चयन मेरी किताब ‘आलोचना रै आंगणै’ में आप देख सकते हैं। ‘बिना हासलपाई’ के लिए कार्य करते हुए आदरणीय नंद भारद्वाज से लंबा संवाद रहा और इस किताब की रूपरेखा पहली से भिन्न बनी। राजस्थानी में आधुनिक कहानी को लेकर अनेक अंतर्विरोध और द्वंद्व की स्थितियां रही है। इस यात्रा में अनेक कहानीकारों का समायानुकूल सम्यक मूल्यांकन भी नहीं हुआ। ऐसे में यह प्रयास किया गया कि कहानी विधा पर एक विविध आयामों को लेकर बात हो, जिसका परिणाम आप देख रहे हैं। मैं किसी लेखक अथवा कृति के प्रति कोई पूर्वाग्रह लेकर नहीं चलता हूं, ‘आंगळी-सीध’ कृति में आप पाएंगे कि राजस्थानी उपन्यास की समग्र यात्रा को देखने-दिखाने और समझने का मेरा प्रयास है। इस से आप या अन्य कोई कितना सहमत अथवा असहमत होता है यह उसकी अपनी स्वतंत्रता है।
• आपने ‘नेगचार’ पत्रिका निकाली और वह खूब चर्चित हुई, फिर अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का भी संपादन किया। राजस्थानी में अब भी पत्रिकाएं कम है ऐसे में ‘नेगचार’ को फिर से आरंभ क्यों नहीं करते?
• पत्रिका निकालना अथवा संपादन का कार्य करना बहुत कठिन है। ‘नेगचार’ के संपादन की अपनी परिस्थितियां थीं। संपादन और सक्रिय लेखन दो भिन्न-भिन्न कार्य-क्षेत्र है। जो दोनों को साधते हैं वे निसंदेह महान हैं। क्योंकि इन दोनों में बहुत समय की आवश्यकता होती है। दिन-रात एक करना पड़ता है। किसी भी संपादक का महत्त्व किसी लेखक से कम नहीं आंका जाना चाहिए। संपादक यदि संपादन के नाम पर केवल प्राप्त रचनाओं को एकत्रित कर पत्रिका प्रकाशित कराएं तो मैं इसे अनुचित मानता हूं। संपादक में एक दृष्टि की अनिवार्यता होती है। उसे अनेक बार बहुत चयन और आग्रह करने होते हैं। संपादक ही दूरदर्शी होता है जो भविष्य के साहित्य का निर्माण को दिशा देता है। उदाहरण के लिए संपादक तय करता है कि किस कृति की समीक्षा होनी है और किस से होनी है। राजस्थानी की बात करें तो भाषागत अनेक समस्याओं और समरूपता के लिए विवेकवान संपादकों से उम्मीद है।
• आपने अनुवाद के क्षेत्र में भी बहुत काम किया है। किसी कृति अथवा रचना को अनुवाद के लिए चयन करने का क्या आधार रहता है?
• चयन का आधार मेरी आलोचनात्मक दृष्टि ही कही जा सकती है। हमारी यह अभिलाषा है कि अनुवाद के क्षेत्र में सभी भारतीय भाषाओं का आस्वाद राजस्थानी में आए। समकालीन भारतीय साहित्य की चर्चा हम ऐसे अनेक कार्यों को देखते हुए ही कर सकते हैं। अनुवाद से ही राजस्थानी की साहित्यिक महानता को हम भारतीय साहित्य में सिद्ध कर सकेंगे। अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, मोहन आलोक, नंदकिशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना आदि अनेक ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपने अपने क्षेत्र में अद्वितीय कार्य किया है। मैंने साहित्य अकादेमी के लिए भी अनुवाद किए हैं किंतु मैं किसी रचना का अनुवाद के लिए अनुवाद करने की तुलना में अपने तर्कों और इच्छा के आधार पर रचना लेता हूं। तकनीकी अनुवाद के पक्ष में मैं अनुवाद की मशीन नहीं बनता हूं।
• मैं तुम्हारी रचना का अनुवाद करता हूं तुम मेरी करो, क्या अनुवाद में यह टेक एंड गिव का सिद्धांत काम करता है?
• आप खुद अनुवाद करते हैं और सब स्थितियों से परिचित हैं। इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह किसी से छिपा नहीं है। मैं इसे भाषा के लिए हितकर भी मानता हूं कि ऐसे में कुछ आदान-प्रदान ही होता है। अगर दो लेखकों में ऐसा अनुवंध होता है तो यकीन कीजिए कि कुछ काम ही सामने आता है। आपके इस टेक एंड गिव को एक साहित्यिक अनुष्ठान समझा जाना चाहिए जहां दो रचनाकार अपनी अपनी भाषा के लिए कुछ रचनात्मक काम ही करते हैं। परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से ऐसे सभी कार्य भाषा की क्षमता को और लेखकों की सक्रियता को बढ़ाते हैं।
• पढ़ने-लिखने की बजाय लेखक पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करते दिखायी देते हैं, वे भाषा की मान्यता के लिए भी खुल कर आगे क्यों नहीं आते हैं?
• बहुत से लेखकों का मत है कि सभी पुरस्कार बंद हो जाने चाहिए। पुरस्कार विजेता ही ऐसी घोषणाएं करते हैं। जिन्हें पुरस्कार कभी नहीं मिला उन से पूछेंगे तो पुरस्कार का महत्त्व समझ में आएगा। पुरस्कार बटोरने का जुगाड़ करने वाले किसी एक पुरस्कार के लिए अपना जुगाड़ कितनी बार करेंगे, बाद में वह बिना जुगाड़ वालों को मिलने हैं। साहित्य के क्षेत्र में और खासकर राजस्थानी अथवा हिंदी के क्षेत्र में लेखन से किसी लेखक ने आज तक अपने लिए महल नहीं बनाएं है। साहित्य थेंकलेस जोब है। बहुत बार मैं खुद से सवला करता हूं कि मैं क्यों लिखता हूं, मैं लिखता हूं कि बिना लिखे रह नहीं सकता हूं। अनेक लेखक भाषा के लिए खुल कर आगे आएं हैं, आप क्या चाहते हैं? भाषा मान्यता के लिए शर्म बेचकर नंगे हो जाएं! भाषा मान्यता का मुद्दा केवल हम लेखकों का नहीं राजस्थान के आम नागरिक का भी है।
• हमारे प्रदेश के आम नागरिकों में भी राजस्थानी भाषा-साहित्य और संस्कृति के प्रति क्या अनुराग दिखाई देता है?
• अनुराग है और उसी अनुराग को बनाए रखने लिए हम सभी सक्रिय हैं। आप गांव-गांव ढाणी-ढाणी जा कर देख सकते हैं कि लोगों को अपनी भाषा से अथाह प्यार है। राजस्थानी उनके लिए जीवन का सवाल है। बहुत से लोगों को तो हिंदी-अंग्रेजी आती ही नहीं। ऐसे में राजस्थान के जन जन से यह हनुमान जी की भांति अपेक्षा करना कि अपना हृदय चीर कर दिखाए कि भाषाई अनुराग है मेरी दृष्टि में बेमानी है। राजस्थान सरकार ने केंद्र को व्यापक समर्थक से प्रस्ताव भेज रखा है और आशा है केंद्र सरकार द्वारा जल्दी ही स्वीकृति मिल जाएगी।
• राजस्थान में रोजगार की भाषा हिंदी है फिर राजस्थानी में लिखना-पढ़ना जरूरी क्यों मानते हैं?
• आप और हम आने मां-बाप और पूर्वजों को क्यों याद करते हैं? मेरी कविता में मैंने लिखा है- राजस्थानी म्हारी रगत रळियोड़ी भाषा है। जो भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। जिस भाषा को मैं अपने भीतर दौड़ता हूं पाता हूं और जिससे होने से ही मुझे लगता है मेरा होना है। उसके लिए आप ऐसा सवाल करते हैं तो मुझे यह ठीक नहीं लगता है। हिंदी से मेरा शरीर बेशक पोषित होता है किंतु मेरी आत्मा का पोषण करने वाली मेरी मातृभाषा मेरा स्वाभिमान है। राजस्थानी को हम सभी ने आत्मिक रूप से स्वीकार किया है और हिंदी में जो भी काम-काज करते हैं अथवा किया है उसमें घुलने में हमें बहुत समय लगा है। बहुत बार अनेक राजस्थानी शब्दों के हिंदी पर्याय ही नहीं मिलते थे। आप राजस्थान के आम आदमी की हिंदी देखेंगे तो उसमें राजस्थानी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देगा। प्राथमिक स्तर के स्कूल में जा कर देखें कि भाषा की समस्या से हमारे शिक्षक कैसे जूझ रहे हैं। आप या कोई भी सत्ता सरकर बालकों के मन की भाषा को मसोस नहीं सकते हैं।
• कुछ का कहना है कि राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा ही नहीं है, यह तो बस कुछ बोलियां है?
• जो ऐसा कहते हैं उनकी अज्ञानता है। किसी भी मूर्ख को कभी लगता ही नहीं कि वह मूर्खता कर रहा है। भाषा विज्ञान का पूरा अपना आधार राजस्थानी के पक्ष में है। सदियों पुरानी बात है कि राजस्थानी की बोलियों को हिंदी की बोलियों के रूप में वर्णित किया गया। इक्कीसवीं शताब्दी में आप अगर अठारहवीं शताब्दी की जानकारी रखेंगे तो यह मूर्खता नहीं तो भला क्या है? और अगर राजस्थानी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है तो साहित्य अकादेमी और अनेक विश्वविद्यालयों ने इसे मान्यता क्यों दी है। राजस्थान सरकार ने भी राजस्थानी की मान्यता के लिए जो प्रस्ताव एक मत से भेजा है क्या वह भी गलत है? राजस्थानी ने सदा हिंदी को बल दिया है और राजस्थानी की मान्यता से हिंदी अधिक बलशाली होगी। हम राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते हैं इसके बाद भी हम हिंदी के विरोधी कैसे हो गए...!
• अब तक राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता नहीं मिलने का प्रमुख कारण क्या है?
• राजस्थानी भाषा मान्यता के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जा चुका है। राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का निर्णय जल्द ही माननीय प्रधानमंत्री जी करेंगे। प्रदेश में राजस्थानी को अब तक लागू नहीं करने का सबसे बड़ा कारण राजनीति में हमारे नेताओं की इच्छा-शक्ति की कमी माना जा सकता है। राज्य सरकार चाहे तो राजस्थानी को दूसरी राजभाषा घोषित कर काम काज के लिए अनुमति दे सकती है।
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 आभार : भाई राजेश चड्ढ़ा जी & डॉ.हरिमोहन सारस्वत 'रूंख' जी

28 जनवरी, 2018

नीरज दइया की कविताएं

(डॉ. नीरज दइया का जन्म 22 सितम्बर,1968 को रतनगढ़ (चूरू) राजस्थान में हुआ। कवि, आलोचक, व्यंग्यकार, अनुवादक और संपादक के रूप में राजस्थानी और हिंदी साहित्य में उनकी पहचान है। साख, देसूंटो और पाछो कुण आसी जैसी काव्य कृतियों के अलावा उनकी आलोचना रै आंगणै और बिना हासलपाई कृति चर्चित हुई हैं। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से उन्हें पुरस्कृत किया है। उनकी कुछ कविताएं यहां प्रस्तुत है, संपर्क 09461375668)  
तुम को संबोधित
कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !

हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।

तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

मुझे क्या ?
इस पृथ्वी पर
कुछ भी हो जाए कहीं
मेरे आस-पास या दूर कहीं
मुझे क्या ?

मैं खैरियत में हूं
बस अपना काम करूंगा-
खाना-पीना और सोना
इस के अलावा
नहीं है जीवन....

यह जीवन भी
बस एक सपना है-
मैं सुख में हूं
खाता हूं, पीता हूं,
भर नींद सोता हूं....
मेरा सपना टूटेगा
गुजते दिनों में
किसी दिन गुजर जाऊंगा
मुझे क्या इस पृथ्वी से!

कहीं भी कुछ भी हो जाए
मेरे आस-पास या दूर कहीं
इस पृथ्वी पर
मैं बस धीरे-धीरे गुजर रहा हूं....
००००

सीधा खड़ा
इतना झुका हूं
सब कुछ मानते हुए
सब कुछ जानते हुए
सहज स्वीकारते हुए
होना चाहता रहा- एक

तुम ऐंठते रहे
नहीं मिलना चाहते
इतने इंतजार के बाद
लेना है एक फैसला

भाई ! तुम ऐंठे रहो
ऐसे ही ऐंठे रहो
और ऐंठते चले जाओ
अगर कुछ गलत रहा मैं
पूरे सही तो तुम भी कहां !
अब मैं हो गया हूं सीधा खड़ा
देखता हुआ आगे-पीछे के रास्तों को
चलूंगा आगे बिना तुम्हारे

रोना और गिड़गिड़ाना भी
नहीं होगा मुझसे
मैं निर्दोष
क्यों दूं तुम्हें दोष
नहीं होता दोष किसी का
दोष प्रारब्ध का
कर्मों की रेखाओं का

कैसी भी बने सूरत
नहीं दूंगा दोष 
अब हर सूरत
मिलूंगा मैं 
सीधा खड़ा....
००००

भाड़
मैं अकेला चना
सोचता हूं-
किसलिए बना ?

सोचते-सोचते मैं चला
पहुंचा झुंड के पास...

अरे, अब मैं
अकेला कहां!
हम चनों का है-
एक संसार....

तुम हां तुम
क्यों खड़े हो वहां
आ जाओ यहां
मिलकर हम चलेंगे 
भाड़ के पास....
००००

जानना चाहिए जितना !
नहीं-नहीं, मैं नहीं जानता
मैं कुछ भी नहीं जानता
सिवाय मेरे

और कहां जानता हूं मैं
अपने को भी पूरा
या कि जानना चाहिए जितना !
००००

कोई कवि है मेरे भीतर

हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता
वैसे बता दूं-
मैं नहीं लिखता कविता
कोई कवि है मेरे भीतर
जो कविता लिखने की सोचता है,
मैं तो अक्सर सोचता हूं-
क्या होगा लिखने से कविता !

इस खतरनाक समय में
मैं बचना चाहता हूं
कविता ही नहीं
किसी भी झमेले से
अब जब कुछ भी करना-कहना
नहीं है खतरे से खाली
फिर से कुछ होता है मेरे भीतर

होती है कोई कविता
क्या मैं ही उसे जाल में ले लेता हूं
नहीं मैं तो आजाद रहना चाहता हूं
और भीतर का कवि समझाता है-
यही है आजादी...

मैं उससे पूछता हूं-
कविता लिखना और कविता होना क्या है?
बस कुछ शब्दों से सजी
पंक्तियों की जालसाजी है कविता !
मैं भयभीत हूं
मेरे भीतर है कोई कवि
जो समय के सामने खड़ा होता है
लाता है कुछ शब्दों के संगठित समूह
उन्हें कर देता है नियंत्रित
कुछ इधर करता है कुछ उधर करता है
कुछ पंक्तियों को करीने से रखता है
और बन जाती है कविता !

मैं गौर से देखता हूं-
अपने कंप्यूटर का की-पेड, कभी मोनिटर
नहीं मिलता किसी कविता का सूराग
मैं अपने हाथों को आंखों के सामने ले जाता हूं
मेरे खाली कागज और कलम के करीब जाता हूं
कहीं मिलती कोई कविता
कोई है मेरे भीतर जो देखता है कविता।
कवि, तुम्हारी मर्जी नहीं चलेगी
मैं भी देखना चाहता हूं कविता।
हो गया हूं तैयार....
लिखूंगा एक कविता !
००००

16 जनवरी, 2018

राजस्थानी कविताएं / नीरज दइया / अनुवाद: मदन गोपाल लढ़ा

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माँ के लिए कविता
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एक शब्द लिखता हूँ
कागज पर- माँ
                 और आगे कुछ नहीं लिखा जाता।
किसी पंक्ति के बीच
जब कभी किसी शब्द के साथ आ जाता है माँ
तब अटक जाती है पंक्ति, आगे कुछ नहीं लिखा जाता।


माँ शब्द से जो यात्रा शुरू होती है
वह यात्रा वहीं हो जाती है संपूर्ण।
जीवन में जैसे सब कुछ परोट लेती है
ठीक वैसे ही कविता-
                    माँ के आगे कुछ नहीं...।
बस टाबर के लीक-लकोळिया
माँ के लिए कविता होते हैं।
००००

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रक्त में मिली हुई भाषा
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राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में मिली हुई है
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
                                              तो कोई बात नहीं है...
कविता से ज्यादा जरूरी होती है भाषा की संभाल
भाषा की हेमाणी लेकर खड़ा हूँ मैं...

आपके मुख से फूल बरसे-
‘मर गई है राजस्थानी भाषा, जला दिया राज ने उसे सालों पहले
नहीं है राजकीय मान्यता।’

कोई बात नहीं है-
जब मर गई है मेरी भाषा
फूल चुगने के लिए दूसरा कौन आएगा
यह पक्का है कि आप अपनी जीवंत भाषा से उतने नहीं जुड़े
                                                         जितना मैं अपनी भाषा से।

यदि यह बात नहीं होती सच
तो ऐसी विकट घड़ी में
फूल बरसाने से बचते आप।
यह पंक्ति आपको कविता की पंक्ति नहीं लगे
तो कोई बात नहीं है...
राजस्थानी भाषा राजस्थानियों के रक्त में घुली हुई है।
००००

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घर
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तुमने और मैंने पाला
हजार-हजार रंगो का
एक सपना।

तुम्हारी और मेरी निगाहों का
तुम्हारे और मेरे ख्वाबों का
एक घर हो
जो अब धरती पर
नहीं बनेगा कभी।

मां कहती है-
बेवकूफी है
घर होते बियावान में भटकना।
आग लगा दो-
ऐसे नुगरे सपनों को
जो थका डालते हैं
और करवाते हैं
व्यर्थ यात्रा।
००००
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रचाव के रंग

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रचाव के रंग
खतम नहीं हुए हैं अभी।

अभी तक बाकी है आनी
दुनिया की
कई कालजयी
कविताएँ।

यह छोडो
कि कौन लिखेगा
उनको।
मगर भरोसा रखो
कि अभी तक लिखी जानी है
दुनिया की
कुछ और कविताएँ।

कवियों के इर्द-गिर्द
घूम रही है
उनकी आत्माएँ।

अवश्य देंगी वे
रचाव को
नई राग
नए रंग।
क्योंकि वे
आज भी हैं मुक्त
जीवन और मरण से।
००००
(वागर्थ, जनवरी 2018)