10 दिसंबर, 2017

नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)

 कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’
    आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 

     डॉ. नीरज दइया

08 दिसंबर, 2017

खर, दूषण का भाई प्रदूषण

सच में मैं ड्रामा नहीं कर रहा। मेरी आंखें जल रही है। देखिए जलते जलते लाल हो गई है। मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं पॉल्यूशन मास्क पहन लिया है फिर भी मुझे तकलीफ हो रही है। पूरा शरीर ढक कर रखता हूं सन स्ट्रोक से मुझे खतरा है। सन रेज आजकल कितनी खतरनाक है कि स्किन का सत्यानाश हो जाता है। कुछ लोग समझते हैं यह फैशन है। कुछ भी समझे मेरी बला से, मुझे क्या फर्क पड़ता है। पानी भी साथ लेकर चलता हूं। बाहर का पानी नहीं पी सकते। मिनरल वाटर की कंपनियां भी ऐसी है कि हम कोई भरोसा नहीं कर सकते हैं। सुबह सुबह ही उबाल कर दो-तीन बोलत भर लेता हूं। मजबूरी है कि बाहर निकलना पड़ता है। नहीं तो घर से सेफ जगह भला कौनसी है। बाहर निकलते ही पहला डर तो यही कि कोई किडनेप ना कर ले। गली गली में चोर उच्चके घूमते हैं। किसी का क्या भरोसा कि क्या कुछ कर जाए। बड़ा संभल कर रहना पड़ता है। जनाब यह जिंदगी की खर खर है। जीवन की गाड़ी कभी भी जबाब दे सकती है। इसका कोई भरोसा नहीं। ऐसी जिंदगी से मौत भली यह जिंदगी नहीं है। छोड़ो यह सब, इतनी सावधानियों की जरूरत ही नहीं है। अरे भैया, जिंदगी हंसने-गाने का नाम है।
इन सब स्थितियों को देखते हुए हंसते-गाते हुए हमने भारत को स्वच्छ करने का प्रयास जोर-शोर से आरंभ कर दिया हैं। भगवान श्री राम ने खर और दूषण का वध किया था और हम सब को मिलकर उनके बड़े भाई प्रदूषण का वध जरूर करेंगे। पर हमारे समाने समस्या यह है कि वध कैसे करेंगे? रामजी के पास तो तीर-कमान था, अब आप और हम मिलकर कौनसा तीर चलाएंगे? भला हो सरकार का कि सरकार ने इवन-ओड का चक्कर चलाने का प्रयास किया पर उसमें भी घोचेवाजी और मीन-मेख बहुत हुई हैं। समझते नहीं कि हमारे पूरे देश ही नहीं दुनिया भर में रावण के भैया पधार चुके हैं और स्थिति यह है कि अभी रामजी का अता-पता नहीं है। यह पक्का है कि वे भी जरूर आएंगे। पर फिलहाल उनका इंतजार कर रहे हम क्या करें। हमें भी तो कुछ करना चाहिए कि खाली इंतजार ही करते रहें। दिल्ली में प्रदूषण है इसका सब को पता है और पहले से ही पता था कि हां भाई दिल्ली में प्रदूषण है। पर यह फिरोज़ शाह कोटला स्टेडियम में टेस्ट मैच में श्रीलंकाई खिलाड़ी पॉल्यूशन मास्क पहन अपना मुंह छिपा रहे हैं कि प्रदूषण भैया कहीं हमें देख ना ले। अरे देख भी लेगा तो क्या कर लेगा प्रदूषण। हम सब खड़े हैं ना सीना ताने। यह बेवजह मुद्दे को भड़का रहे हो भैया। लंकाधिपति के देश से पधारे खिलाड़ियों तुम्हें सलाम! जीत-हार तो खेल में होती ही रहती है, पर इतना ड्रामा।
पंच काका कहते हैं कि दिल्ली में रविवार का एयर क्वालिटी इंडेक्स चारों ओर से समंदर के घिरे श्रीलंका में प्रदूषण के स्तर से काफी कम था। पूछना यह है कि भैया यह ड्रामा हार के डर का नतीजा है या फिर सच में खर-दूषण के बड़े भैया प्रदूषण से आपने सांकेतिक घूंघट रखने का नया रिवाज निकाला है।
 नीरज दइया
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06 दिसंबर, 2017

टांय टांय फिस्स / नीरज दइया

   बड़े-बूढ़ों के साथ रहना सच में बहुत बड़ी मुसिबत का काम है। वे बात बात पर हमारी कमियां निकालते रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे भगवान ने उनके हाथ में परमानेंट कोई आइना दे दिया हो और वे बात-बात पर हमें आइना दिखाते रहते हैं। हम अपनी असलियत को स्वीकारते हुए सकुचाते हैं। अब देखिए मैं जो कुछ भी जैसा भी लिखता हूं, वह एकदम नया और मौलिक होता है। पंच काका को क्या पड़ी है कि वे कमियां निकालते रहते हैं। हर बार हर रचना पर वे मुझे टोकते हैं! कहते हैं- बात बनी नहीं।
    हमारी किसी बात पर हमें कोई पराया ऐसा-वैसा कहे तो उतना बुरा नहीं लगता, जितना अपना कोई सागा कहे तो लगता है। आप समझ रहे हैं ना, मैं क्या कहना चाहता हूं। पूरा उल्टा हिसाब है, पूरी दुनिया जिसे वाह-वाह करती है वह घर के जोगी जोगना हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि काका की नजर ही कमजोर नहीं हुई साहित्य को समझने की समझ ही कमजोर हो गई है। ऐसा कहने में यदि आपत्ति है तो इसको घुमाकर कहा जा सकता है- काका की साहित्यिक समझ इतनी विकसित हो गई है कि उन्हें अच्छी से अच्छी रचना जमती नहीं।
    अगर मेरी हर रचना का विषय पुराना यानी बासी है तो ताजा कहां से लाना है। माना कि आप बड़े हैं, अनुभवी है और आपको कहने का हक है। जब ऐसा कुछ कहते हो तो इसका इलाज भी तो बताओ। आप जिसे नया और उम्दा मानते हैं उसके बारे में कोई संकेत तो कीजिए। यह क्या हुआ कि मैं हिम्मत रखते हुए फिर-फिर प्रयास करता हूं। यकीन कीजिए मैं दुगने जोश-होश से प्रयास करता हूं। मैं हर बार सोचता हूं अबकी विषय नया और निर्वाहन नया है, काका दाद देंगे पर उनके आगे हमेशा मेरी टांय टांय फिस्स। इस टांय टांय फिस्स से टकरा-टकरा कर मेरे लेखन की गति सुस्ता गई है।
    पंच काका कहते हैं- जीवन की गाड़ी जब तक चल रही है चल रही है, ना जाने किस दिन टांय टांय फिस्स हो जाए। इस जीवन का परम सत्य टांय टांय फिस्स है।
    कोई बात जब नई नई होती है तो अच्छी लगती है। एक ही बात बीस बार सुनते हैं तो बोरियत होने लगती है। काका ने जैसे टांय टांय फिस्स को तकिया कलाम बना लिया है। कोई बात कहो-करो वे कहीं न कहीं से जैसे तैसे इस फिस्स तक पहुंच ही जाते हैं। कबीर दासजी ने कहा था- ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’ मेरे लिए पहला पाट पंच काका है अर दूसरा टांय टांय फिस्स। लगता है काका और उस तकिया कलाम से जल्दी ही मेरी टांय टांय फिस्स होने वाली है।
    मैंने एक प्रयोग किया। जब काका को मेरे लिखे में खोट ही खोट दिखाई देता है तो उनकी पारखी नजर की परख भी हो जाएगी और हो सकता है कि कोई रास्ता ही मिल जाए। मैं काका के सामने प्रेमचंदजी की कहानी कफन मेरी बना कर ले गया।
    बोला- काका कहानी लिखी है। नाम रखा है- ‘कफन’।
    काका बोले रख दे मैं पढ़ कर बात करूंगा। मैं कहानी छोड़ कर आ गया। काका ने जैसे ही कहानी को पूरा किया तो मुझे आवाज लगाई। मैं गया और मन ही मन डर रहा था कि कहीं यह ना कह दे कि कहानी चुरा कर लाया है। पूरी की पूरी चोरी हुई कहानी देकर मुझे मूर्ख बनाता है। पर नहीं, काका शायद पकड़ नहीं पाए थे। पकड़ने वाले होते तो कहानी का नाम ‘कफन’ सुनते ही उनके दिमाग की बत्ती जलती और प्रेमचंद का नाम क्लिक होता। नए कहानीकारों की बात तो अलग यहां तो बड़े बड़े कहानीकारों को अभी तक लोगों ने पढ़ा नहीं। काकाजी के पढ़ने में जब प्रेमचंद सरीखे रचनाकार का यह हाल है, तो दूसरे रचनाकार की तो बात ही क्या करें!
    काका कहने लगे कि तेरी यह कहानी ठीक से जमी नहीं। मैं मन ही मन बोला- जमी नहीं, अरे इस कहानी से प्रेमचंदजी की दुकान अब तक जमी हुई है और आप कहते हैं कि जमी नहीं। काका ने उलटे सवाल किया- तूने कफन के चंदे से बाप-बेटे को शराब पीते दिखाया सो तो ठीक है पर वे क्या जंगल में रहते थे। यदि नहीं तो गांव में आस-पास या दूर दराज कोई औरतें नहीं थी क्या? एक स्त्री को ऐसे तड़फता दिखाय है। जापे में तो स्त्रियां एक दूसरे का सहयोग करने दूर दूर से चली आती हैं। यह कोई त्वरित घटना तो होती नहीं फिर और ऐसे काम में तो अनजान भी मदद करते हैं। किसी भी घर का दरवाजा बजाने की देर थी उन्हें मदद मिल जाती।
    काका के श्रीमुख से इतनी बातें सुनकर मेरे पैर कच्चे पड़ गए और मेरा खेल टांय टांय फिस्स। मैंने कह दिया- यह कहानी तो प्रेमचंदजी ने लिखी थी। आपको भूलवश मेरी कहानी की जगह उनकी दे दी थी।
    काका ने हंसते हुए कहा- मुझे क्या मूर्ख समझ रखा है। मैं जानता था कि तुम ऐसा करोगे । तुम इतनी महान और बारीक कहानी जिंदगी भर लिखोगे तब भी नहीं लिख सकोगे। लेखकों में फर्क बस इतना ही है कि प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। कहानी या कोई भी रचना हो मुंह बोलनी चाहिए। तुम्हारे यहां तो दो लाइन पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स। रचना का उठाव अच्छा होना चाहिए। अब देखो यह कहानी प्रेमचंदजी की। इसमें माना कि कुछ छोटी मोटी कमियां है पर उठाव जबरदस्त है। एकदम पठनीय और सधी हुई भाषा। मैं समझता हूं कि इस कहानी में जो कमजोरियां मैंने बताई है वे ही इस कहानी का नयापन है। नया यानी जो जैसा हम नहीं जानते वही तो मौलिक हुआ। कफन से स्त्रियों को प्रेरणा मिलेगी कि ऐसी विकट स्थितियों में वे उनके पास रहे। अरे माना कि धीसू और माधव ने नहीं बुलाया तो क्या यह उनका धर्म नहीं था।
    बे बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ऐसी टांय टांय सुनना सच, बड़ी मुसिबत है! फिस्स....। और कमरा दुर्गंधमय हो गया।
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02 दिसंबर, 2017

अंगुली की अमरकथा


वे दिन लद गए जब एक हाथ से ताली नहीं बजा करती थी। अरे भैया, अब इन पुराने जमाने की बातों को भूल जाओ, एक हाथ और दो हाथ को छोड़ कर बस एक अंगुली को सलामत रखो। अब तो बस एक बटन दबाओ और जितनी चाहो तालियां रिमोट से बज सकती है। एक अंगुली की महिमा निराली है। सच्चाई तो यह है कि आजकल सारी करामात बस एक अंगुली की है। सुनते हैं कि बड़े-बड़े देशों ने ऐसे-ऐसे हथियार बना रखें है कि एक बटन दबाओ और दुश्मन देश तबाह हो सकता है। अंगुली के इशारे से काम करने और कराने वालों की बड़ी पूछ है। सब को काम ऐसा चाहिए कि उस पर कोई अंगुली नहीं उठा सके। जो अंगुली के रहस्य को समझते हैं वे जानते हैं कि कोई काम सीधी अंगुली नहीं करवाया जा सकता है उसके लिए अंगुली टेढ़ी करते कितनी देर लगती है।
अंगुलियां समझदारी में सबसे आगे हैं। देखिए किसी की तरफ एक अंगुली करते ही तीन अंगुलियां खुद हमारे समाने हो जाती है। अर्थात हम अधिक सजग और जागरूक हो जाते हैं। खुद अपने भीतर तीन सवालों के जबाब लेकर चलने वाला किसी से एक सवाल करेगा तो कभी मात थोड़े खाएगा। हाथ में लकीरें होती हैं तो अंगुलियों पर पर्वत होते हैं। हाथ तो केवल दो होते हैं और अंगुलियां दस होती है। फिर पैरों की अंगुलियां शामिल करें तो बीस का आकाड़ा काफी होता है। पैर की अंगुलियां तो अंगुलियां ही कहलाती है और पैरों को तो हम हाथ मान नहीं सकते हैं। कुदरत का खेल किसी के इक्कीस और बाईस तक अंगुलियां होती है। सबसे बड़ी बात अंगुलियों की प्रजाति में अंगूठा भी होता है जो बड़े काम का होता है। अंगूठे के काम उम्र के मुताबिक बदलते रहते हैं।
रिश्ता कोई भी हो उसमें एक बंधन होता है। बंधन है किसी डोर अथवा धागे की कल्पना भी होती है। ऐसे में डोर और धागे कभी टूट जाते हैं या उलझने लगते हैं तो रिश्ते टूटे उससे पहले उन्हें सुलझाने का काम तेज तर्राट अंगुलियों के बस की बात है। अपने दो हाथ ताली बजा सकते हैं तो दो अलग अलग हाथ रिश्तों के बंधनों में बंधते हैं तब भी अंगुलियां ही हाथ मजबूती से उन्हें पकड़ और कसावट देने में सहायक सिद्ध होती हैं। सास कहती हैं कि बहू बेटे को अंगुलियों पर नचवा रही हैं और बहू कहती है कि सास ने बेटे को अंगुली पकड़ा कर अभी तक बच्चा बना रखा है। मां की अंगुली पकड़ कर बेटा आखिर कब तक चलेगा? ऐसे ताने सुन सुन कर बेटा मां की अंगुली छोड़ कर अपनी पत्नी की अंगुली पकड़ लेता है। बच्चों और पुरुषों का स्वभाव है कि वे अंगुली पकड़ कर ही बांह पकड़ते हैं। अंगुली के महत्त्व की प्राचीनतम कथा अंगुलीमाल की है। उसे एक शनक थी कि लोगों को लूटता था और उन्हें मार कर उसकी एक ऊंगली काट कर अपनी माला में पिरोता था। गुरु द्रोण ने मोटी अंगुली यानी अंगूठे को मांग कर अपना प्रेम प्रगट किया था। लोग भोले थे जो लूटते थे और अंगुली-अंगूठा दे देते थे, अब भी लोग भोले हैं। अंगुलीमालों और द्रोणाचार्यों ने रणनीतियां बदल ली हैं। शब्दों के जादू से वे लोगों को पहले बहलाते-फुसलाते हैं फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर अंगुली का खेल करवा कर सब कुछ अपने नाम करवा लेते हैं।
डॉ. नीरज दइया 
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29 नवंबर, 2017

समस्या-समाधन गीता

 आज देश में समस्याएं बहुत सारी है। यहां मैं समस्याएं गिनाने लगूं तो गिनाते-गिनाते रात हो जाएगी। इतना समय ना आपके पास है और ना मेरे पास। आपका बस थोड़ा सा समय लूंगा। अधिक कुछ कहने या सुनने की यह बात भी नहीं है। बात बस इतनी सी है जो मैं कहना चाहता हूं कि अगर आज ढेरों समस्याएं है तो उनके लिए ढेरों समाधान ढूंढ़ने की जरूरत ही नहीं है। आप कहेंगे ऐसा कैसे? तो भाइयों और बहनों ऐसा ही है। इतनी सारी समस्याओं जब भगवान ने इस संसार में बनाई है तो वे अंतर्यामी हैं। उन्होंने इन सब का समाधन पहले बनाया है। आज पढ़े-लिखे लोग धर्म से कटते जा रहे हैं। अरे मनुष्य है तो उसका अपना धर्म भी है। बिना धर्म के कोई आदमी हो ही नहीं सकता। धर्म की बात करते ही विपक्ष वाले शोर करते हैं, कुछ लोग इसे धार्मिक कट्टरता कहते हैं। मेरा कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम सब भाई-भाई है। यह देश हम सब भाइयों का है तब अगर किसी को यहां रहना है तो वे भाई बनकर रहें। अगर यह बात भी जिनके गले नहीं उतरती वे गद्दार है। छोड़िए इन सब बातों को फिर कभी.... अभी तो मैं मुद्दे की बात बता रहा हूं। मुद्दा यह है कि हमारी सारी समस्याएं एक तरफ और एक तरफ गीता। आज के दौर में हमें बचना है या कहें संभलना है तो बस एक समाधान है गीता। हमारा हाथ थामने या हमें बचाने के लिए कोई बाहर से नहीं आएगा। हमें बस गीता ही बचा सकती है। और पूरा पांडाल करतल ध्वनी से गूंज उठा।
माननीय नेता जी फिर गीता-रहस्य समझाने लगे। मैं कहना चाहता हूं- आप और हम गीता को भूलाकर कभी आगे बढ़ ही नहीं सकते। हमें आगे बढ़ना है और देश को आगे बढ़ना है तो गीता ही हल है। प्रगति का पथ है गीता। आपको और हमको किसी दूसरे तीसरे की तरफ झांकने या मुंह करने की जरूरत नहीं है। क्या समझे, हमारी सारी समस्याएं सारे झगड़े और जो भी कुछ है उन सब का समाधान है गीता। कुछ लोग फिर इसे राजनीति का रंग देंगे। भाइयों और बहनों इसमें कोई राजनीति नहीं है। इसमें दूर दूर तक राजनीति नहीं है। पर यह सारी राजनीति का भी समाधान है। जिन समस्याओं की बात हम कर रहे हैं उनमें राजनीति भी एक समस्या है। अब समय आ गया है कि हमें खुल कर बोलना होगा। मैं आप सब के भले की बात कर रहा हूं। अपना भला ही देश का भला होता है। यह स्वार्थ नहीं है। भैया जब यहां का आम आदमी तरक्की करेगा तभी तो देश तरक्की करेगा। आम आदमी की सारी समस्याओं का हल है गीता। चलिए आप में से कोई आदमी खड़ा हो जाए और वह कोई एक समस्या यहां रखें तो अभी हल हो जाता है।
आम आदमी एक खड़ा होकर हाथ जोड़ते हुए बोला- ब्लू व्हेल.... उसका इतना कहना था कि पांडाल तालियों से गूंज उठा। नेताजी के चेहरे पर चिर मुस्कान कुछ अधिक ही फैलने लगी। वे बनावटी हंसी के साथ फिर कहने लगे- ब्लू व्हेल जैसे खेल के विनाश से गीता ही बचा सकती है।... बच्चे और बड़े-बूढ़े सब अपनी अपनी समस्या का समधान गीता में खोज सकते हैं। कहीं आने-जाने या फिर किसी से कहने-सुनने की जरूरत नहीं है।...भाषण जारी था, यह समाधान रहस्य लिए लौट आया। अब समस्याओं के समाधन गीता में खोज रहा हूं।
० डॉ. नीरज दइया