12 सितंबर, 2017

खुद घायल होने का हौसला और हुनर ० डॉ. नीरज दइया

० डॉ. नीरज दइया
    व्यंग्य विधा के परिदृश्य में राजस्थान के जिन गिने-चुने व्यंग्यकारों ने राष्ट्रीय फलक पर अपनी पहचान बनाई है उनमें एक अग्रणी और वरेण्य रचनाकार बुलाकी शर्मा है। उनके अब तक हिंदी में चार- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’, ‘रफूगिरी का मौसाम’, ‘चेखव की बंदूक’, ‘आप तो बस आप ही हैं’ और राजस्थानी भाषा में दो व्यंग्य संग्रह- ‘कवि कविता अर घरआळी’, ‘इज्जत में इजाफो’ प्रकाशित हो चुके हैं। वे अनेक व्यंग्य संग्रहों में संकलित व्यंग्यकार के रूप में शामिल रहे हैं साथ ही अनेक समाचार पत्रों में भी नियमित रूप से व्यंग्य लिख रहे हैं। उनके व्यंग्य लेखक की संपूर्ण छवि से हम भले परिचित नहीं हो सकें किंतु चार हिंदी व्यंग्य संग्रहों के माध्यम से उनके एवं समकालीन व्यंग्य के उतार-चढ़ाव देखे-समझे जा सकते हैं। उनकी यह यात्रा एक नवोदित व्यंग्यगार से वरिष्ठ व्यंग्यकार के विविध आयामों से भरी है। व्यंग्य लेखन पर पुरस्कारों की बात करें तो बुलाकी शर्मा सौभाग्यशाली रहे हैं कि उनके पहले ही व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 1998-99 का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार अर्पित किया गया। वे व्यंग्यकार के रूप में अनेक बार अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित हो चुके हैं।
    बुलाकी शर्मा की व्यंग्य लेखन यात्रा की चर्चा उनके एक एक व्यंग्य संग्रहों की चर्चा करते हुए की जा सकती है। ऐसे में हमें उनके उत्तरोत्तर विकास के विविध सौपान भी दिखाई देंगे और उनके मूल सरोकारों के विषय में भी सोचा जा सकेगा। कहना होगा कि उनके व्यंग्य लेखन का आरंभ मध्यवर्गीय जीवन की आकांक्षाओं और विद्रूपताओं से हुआ। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कथा-तत्वों के साथ घटनाओं में उनका ‘मैं’ पात्र आत्मकथात्मक भी प्रतीत होता है। ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ संग्रह के व्यंग्य ‘आम आदमी की खोज’ की आरंभिक पंक्तियां देखें- ‘और मैं एक दिन सारी लाज-शर्म खूंटी पर टांग कर उन नामी-गिरामी साहित्यकार के सामने हाजिर हो ही गया। बिना किसी औपचारिक भूमिका बांधे सीधा निवेदन किया- कोई रास्ता बताइये साब। रचनाएं दनादन वापिस आ रही है। अगर यही हाल रहा तो.....’ ‘तो’ के बाद मेरे द्वारा छोड़ी गहरी उदास उसांस उन्हें साफ, सैंट परसेंट अर्थालू लगी।’
    यहां पात्र ‘मैं’ का प्रश्न नए साहित्यकारों, पाठकों और उससे भी अधिक बुद्धिजीवियों का है। साथ ही यहां नामी-गिरामी साहित्यकार की भूमिका भी चिंता का विषय है। यह देश-काल का अतिक्रमण है, वहीं निजता का अहसास भी है जो गहरी उदास उसांसें चत्रित करती है। । व्यंग्यकार जिस ‘तो’ के बाद की स्थितियों को छोड़ रहा है वहीं से गंभीर व्यंग्य का आगाज होता है। यहां जो रिक्त स्थान है वह महत्त्वपूर्ण है। अकथनीय को बहुविकल्पी बना कर रह जाता है उसे व्यंग्य में कहा गया है। इस व्यंग्य रचना का सच है कि हर कोई अपने आप को खास आदमी समझता है और असल में जो ऐसा खास आदमी है वही बुलाकी शर्मा की व्यंग्य रचनाओं का आम आदमी है। एक अन्य व्यंग्य ‘पहचान का संकट’ में उन्होंने एक साहित्यकार के समाचार-पत्रों में छपे फोटो को बेहद प्रभावी ढंग से व्यंजित किया है।
    साहित्य और साहित्यकारों की दुनिया पर व्यंग्य लिखना यानी अपनी ही दुनिया पर चोट करना है। बुलाकी शर्मा के यहां उनकी ऐसी दुनिया के प्रति यह व्यवहार न केवल उनकी अपनी दुनिया वरन प्रकारांतर से पूरी दुनिया को बेदाग और सुंदर बनाने के सतत प्रयास हैं। उनका आत्मकेंद्रित पात्र ‘मैं’ इसी दुनिया का वासी है। वे निजी जीवन में रोजगार के सिलसिले में दफ्तर जाते हैं और दैनिक जीवन की विभिन्न क्रियाएं, गतिविधियां रचनाओं का आधार बनते हुए उन्हें नई दिशाएं देते हैं। उनके यहां अपने निजी जीवन और संसार की घटनाओं में निर्ममता का व्यवहार देखा जा सकता है। वे सामान्य प्रतीत होने वाली ऐसी असामान्य घटनाओं-स्थितियों का चयन कर हमें देखते-परखते और व्यंग्य को पकड़ लेने की दृष्टि देते हैं। यह हमारे देखे हुए और भोगे हुए यथार्थ में से चयनित दिखाने का उपक्रम ऐसा है कि अपने भाषिक और कहन अंदाज से उस यथार्थ को फिर फिर भोगने का विकल्प मिलता है।
    बुलाकी शर्मा के अधिकाशः व्यंग्य छोटे-छोटे आकार के सपनों सरीखे हैं, उनमें जैसी स्थितियां हैं उसे वे हू-ब-हू प्रस्तुत करते हुए बदलाव का कोई विकल्प या सिद्धांत बताने की बजाय हमारे भीतर कुछ बदलने के लिए वे जमीन तैयार करते हैं और कुछ बीज सौंपते हैं। उनके व्यंग्य असल में उनका अपना प्रतिरोध है। उनके यहां लोक-व्यवहार अपनी व्यंजना में अनेक क्षेत्रों को समाहित करता हुआ विशद विमर्श की प्रेरणा देता है।     अफसर की मां की शवयात्रा’ में हमारे बदलते और नित्य बदल रहे अंग्रेजियत रंग-ढंग को जबरदस्त तरीके से उठाते हैं। वे अपनी भाषा और अंदाज के कारण हमसे उफ्फ, आह और वाह जैसे भावों को जैसे जाग्रत करते हैं। आपका प्रतिक्रिया देना उन्हें पढ़ते हुए अनिवार्य हो जाता है। उनकी रचनाओं में हमारी भाषा, संस्कार और संस्कृति की गहरी उदास उसांसें हमें साफ-साफ सुनाई देती है। उदाहरण के लिए यह अंश देखें-
    अर्थी तैयार हो जाने पर परंपरानुसार पंडितजी ने उनसे अपनी मां को जोर से आवाज लगाने को कहा।
उन्होंने चारों तरफ देखा। सभी के लिए वे ही आकर्षण का केंद्र बने हुए थे। वे थोड़ा झुके। उनके साथ-साथ तीन-चार उनके अधीनस्थ भी झुके। उन्होंने प्रथानुसार मां की अर्थी को कंधा लगाया और तुरंत उन अधीनस्थों ने अपने कंधों पर अर्थी उठाली। गंभीरता के साथ वे बोले- ‘मदर, ... ओ मदर।’
पंडितजी सुनकर चौंके, बोले- ‘अजी महाशय, शास्त्र सम्मत बोलिए। माजी, ओ माजी कहिए।’
वे ठहरे बड़े अफसर। अड़ गए अपनी बात पर। बोले- ‘हम जेंटिल लोग अपनी भाषा में मां को मदर बोलते हैं। बात तो वो ही है फिर परेशानी कैसी?’
(दुर्घटना के इर्द-गिर्द, पृष्ठ-43)
    यहां अति तब होती है जब उनके अधीनस्थों द्वारा उकेरा जाता है- राम नेम.. इज ट्रुथ’ दूसरे जवाब देते हैं- ‘ट्रुथ गिव ...फ्रीडम ।’ तब ऐसा लगता है कि यह ऐसी फ्रीडम है जिससे हमारी आस्थाओं का राम नाम सत्य हो रहा है। बुलाकी शर्मा का यह और ऐसी अनेक व्यंग्य-रचनाएं हमें हमारे ऐसे सामाजिक सत्यों की आंतरिकता से परिचित कराती हैं। यह उनकी लेखनी का जादू है कि व्यंग्य पाठ के उपरांत जब भी किसी शव यात्रा में हम पहुंचेंगे तब हमारी स्मृति में उनका यह व्यंग्य निश्चय ही जाग्रत हो जाएगा।
    उनके दूसरे व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम’ की अधिकांश रचनाओं में फिर से साहित्य समाज और लेखन से जुड़े उसी लोक का वर्णन है किंतु यहां आते आते एक विशेष भाव जुड़ जाता है वह है- बदलते समय में सर्वाधिक जिम्मेदारियों के अहसास का है। यहां तक पहुंचते हुए उनका लेखक तबका अपनी सामाजिक भूमिका और उत्तरदायित्त्व के लिए आत्मनिर्भर होता नजर आता है। विभिन्न मानवीय संबंधों पर लिखते हुए बुलाकी शर्मा अलग अलग चरित्रों को परत-दर-परत हमारे सामने खोलते हुए यहां सूक्ष्म से अधिक सूक्ष्म होते हुए उन स्थितियों को खुल कर कहने के स्थान पर संकेत करते हैं। बेशक प्रत्यक्ष में लेखकों का यह संसार है किंतु यह हमारे से जुड़ता हुआ व्यापक होता जाता है।
    ‘रफूगीरी का मौसम’ में एक ऐसा मौसम है जिस में हम अनेक मुखौटे पहनते हुए अपना असली चेहरा भूल चुके हैं। या फिर असली चेहरा इतना कटा-फटा और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है कि हम बाहर से रंगीन दिखाई देते हुए भीतर एकदम बदरंग हो चुके हैं। बदरंग होना अथवा रंग विहीन होना एक दुख है जो अपने मूल रंगों को लुप्त होते हुए देख रहा है। ऐसे विकट समय और संकट में सहारा लेखक ही है। वही हमारे मूल स्वरूप की स्मृति लिए हुए जैसे हमारे मुखौटों को रफू कर सुधार रहा है। बुलाकी शर्मा अपने ‘मैं’ का मुखौटा पहने हुए अपनी इस कृति में जैसे हमें खुद के भीतर झांकते को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हैं। युक्ति के रूप में कभी वे श्रोतारामजी को हमारे बीच लाते हैं तो कभी सुखलालजी को। इस प्रकार उनका केवल और केवल एक लक्ष्य नजर आता है कि दुनिया की सुंदरता दुर्घटना के इर्द-गिर्द रहते हुए निरंतर चोटिल होते हुए इतनी चोटग्रस्त ना हो जाए कि रफूगीरी की जद से बाहर हो जाए।
    तीसरा और बहुचर्चित संकलन ‘चेखव की बंदूक’ के विषय में कवि कृष्ण कल्पित ने फेसबुक स्टेट्स में लिखा- ‘बुलाकी की बंदूक’। मेरा भी मानना है कि लगभग चालीस वर्षों की इस सतत व्यंग्य-साधना के साधक बुलाकी शर्मा की यह उदारता है कि अपने नाम के स्थान पर चेखक का नाम अटका दिया है। यह ब्रांड है जिसमें इक्यावन रचनाएं नवीन सफूर्ती के साथ चयनित की गई है। इन व्यंग्य रचनाओं में अनेक स्थलों पर कहानीपन का जायका चेखव का स्मरण करता है। इन रचनाओं में व्यंग्य का पैनापन, प्रस्तुति का चुटीलापन और भाषा का बांकपन सधा हुआ है, इसमें व्यंग्यकार की अधिक तटस्थता, निष्पक्षता और पारदर्शी दृष्टि को देख सकते हैं। कभी वे हंसाते-गुदगुदाते हैं तो कभी चपत भी जमा देते हैं। यहां तक पहुंचते पहुंचते शर्मा ने ऐसा व्यंग्य कौशल हासिल कर लिया है कि वे भीतर-ही-भीतर तिलमिलाने वाले व्यंग्य अधिक प्रखता से लिखने लगे हैं। यहां व्यष्टि से समष्टि की पहुंच अपनी व्यापकता से साथ देख सकते हैं।   
    ये रचनाएं अलग-अलग होते हुए भी जैसे किसी विशेष राग का सतत गीत है। जिसमें परस्पर समानता, समन्वय और सामंजस्य है। इनकी दुनिया में बेहद भोला और मासूस-सा सदाचारी जीव ‘मैं’ अभी भी विविध दृष्टिकोणों के साथ प्रयुक्त हुआ है। यह बेहद सहनशील है जो छोटे-बड़े आघात में निरंतर घायल होने के बाद भी अपनी मुस्कान को अक्षुण बनाए रखने की आदत से ग्रसित है। बड़ी खूबी यही है कि ‘मैं’ अपनी मुस्कान नहीं छोड़ता और दूषित मन को स्वच्छ करने का सक्रिय रहते हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कहा जाए कि ‘चेखव की बंदूक’ कोरी किताब जैसी किताब नहीं, वरन हमारे समय का आइना है। इसमें हम सभी अपना-अपना चेहरा देख सकते हैं। शीर्षक-व्यंग्य ‘चेखव की बंदूक’ का अंश देखिए-
    ‘मैं कथा उस्ताद चेखव से नहीं वरन् उन्हें जब तब ‘कोट’ करते रहने वाले अपने स्थानीय साहित्यिक उस्ताद से आतंकित रहता हूं। चेखव ने जो लिखा, उस पर चलूं अथवा नहीं चलूं, इसका निर्णय करने के लिए मैं स्वतंत्र हूं, क्योंकि चेखव बाध्य करने को उपस्थित नहीं हैं। किंतु स्थानीय उस्ताद की उपस्थिति हर जगह-हर समय रहती है और उनकी यही उपस्थिति मुझे आतंकित बनाए रखती है। उनका आतंक मुझ पर इस कदर हावी है कि नई रचना लिखते समय भी मुझे उनकी उपस्थिति का अहसास बना रहता है।’
    यहां भाषा की सहजता में उस्ताद की स्थानीयता पर जिस बल का प्रयोग हुआ है वह देखते ही बनता है। सूक्तवाक्य चेखव ने कहानी के लिए दिया तो उस वाक्य को सभी विधाओं पर लागू करने का द्वंद्व यहां है। हम अपनी आंखें खोलें और अपने भीतर के जमीर को जिंदा करें, यही व्यंग्यकार का उद्देश्य होता है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के हमारे जमीर को न केवल मांजते हैं, वरन उसे संवारने-सजाने का स्वप्न भी सौंपते हैं।
    हाल ही में प्रकाशित ‘आप तो बस आप ही हैं !’ व्यंग्य संग्रह में ‘आप’ के स्थान पर व्यंग्य विधा के अवदान को देखते हुए यदि यूं लिखा जाए ‘बुलाकी शर्मा तो बस बुलाकी शर्मा ही हैं!’ तो अधिक उपयुक्त होगा। किसी भी लेखक की मौलिकता उसकी निजता होती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अन्य व्यंग्यकारों की छवि दिखाई नहीं देती, वे सभी से सर्वथा पृथक हैं। वे व्यंग्य विधा में इतने भीतर पहुंच चुके हैं कि लंबे समत तक हमें सालते रहने की क्षमता उनमें है।  
    ‘आप तो बस आप ही हैं!’ शीर्षक व्यंग्य की बात करें। इस व्यंग्य में कुल तीन पात्र हैं। रविवार के दिन लेखक सुखलालजी के घर मिलने पहुंचता है तो तीसरा पात्र रामभरोसेजी वहां आता है। संवाद और मुलाकात की यह कहानी कब उधार लेने देने वालों के खेल में बदल जाती है हमें खबर भी नहीं होती है और वे अपने दो चरित्रों के माध्यम से खुद को घायल कर लेते हैं। उनका सुखलालजी और रामभरोसेजी के शब्दों से घायल होना तिलमिलाने वाला है। यहां लेखक की सहजता-सरलता और मौन भाषा पाठकों को बहुत कुछ कहते हुए सोचने को विवश कर देती है। छोटी सी कहानी के रूप में ऐसे अनेक व्यंग्य उन्होंने लिखे हैं जिन्हें प्रस्तुत करने का यही एक मात्र तरीका संभव है। उधार और झूठ पर लिखे गए अन्य व्यंग्य जहां लेखकीय ज्ञान से भरे हुए होते हैं वहीं यहां पाठक पर लेखक का भरोसा है कि वह मर्म को समझ लेगा। उन्हें अपने पाठक पर विश्वास है।
    ‘प्रतिरोध के कीटाणु’ व्यंग्य में वे अखबार में छपी एक खबर को आधार बनाते हुए हमें मध्यप्रदेश के स्थापना दिवस के कार्यक्रम और छिंदवाड़ा के सर्किट हाउस की सैर कराते हुए जनप्रतिनिधियों के असहिष्णु व्यवहार पर सोचने के लिए विवश कर देते हैं। व्यंग्य में उनकी शैली प्रत्यक्ष में अक्सर प्रतिपक्ष के पक्ष में होती है। वे हमारे पक्ष को इस प्रकार उभारते हैं कि खुद भी प्रतिपक्ष की पैरवी जैसी बातें करने लगते हैं। झूठ और गलत को सही और बराबर सिद्ध करने का उनका नजरिया हमें भीतर ही भीतर भड़काने वाला होता है। वे जैसे हमारे भीतर की चिंगानारी को ऐसा करते हुए बार बार हवा देते हैं कि हमारे भीतर आग जल उठे। यहां दुष्यंत को याद करें- ‘मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’ व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के सीने में व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों को लेकर जबरदस्त आग है और वे ऐसा व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठक के सीने में आग जलने लगती है। उनके व्यंग्य हमारी चेतना को झकझोरने वाले हैं।
    कोई व्यंग्यकार अपने व्यक्तिगत प्रसंगों और अनेक प्रकरणों से भी प्रेरणा पाता है और अपने भीतर की आग को व्यंग्य में व्यंजित करता है। उसके सुख-दुख, आशा-निराशा अथवा अवसाद की घटनाओं पर व्यंग्य विधा विरेचन का कार्य करती है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा व्यंग्य में जब खुद को गिराने लगते हैं तो उनका अंत नहीं होता जब तक पाठक अपने भीतर ही भीतर यह कबूल ना कर लें कि कहा तो ठीक ही जा रहा है। ऐसा होता है और मैं भी कुछ कुछ या पूरा अथवा इससे अधिक ऐसा ही हूं।
    उनके अनेक व्यंग्य अपने शहर बीकानेर के स्थानीय वातावरण से जुड़े हैं और ऐसा होने के बाद भी वे  किसी भी शहर के हो सकते हैं। बुलाकी शर्मा की रेंज में घर के आंगन में धीमे-धीमे वार्तालाप करती पुत्रवधू चेतना से लेकर इंडोनेशिया की मोहतरमा बीना लिया तक है। इस बीच अनेक पड़ाव और मुकाम हैं। अनेक दिशाएं और अनेक देश हैं जहां से वे व्यंग्य के सूत्र बटोर लाते हैं। 
    अंत में बुलाकी शर्मा के राजस्थानी भाषा में व्यंग्य अवदान पर भी संक्षेप में चर्चा होनी चाहिए। राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी के परसाई हैं। यह अभिधा की टिप्पणी है अथवा व्यंजना में कहा गया था? क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ और ‘इज्जत में इजाफो’ के आधार पर उन्हें परसाई कहना मानना उचित है? क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता? यह अतिशयोक्ति नहीं है क्योंकि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं वरन व्यंग्य विधा में निष्ठापूर्वक सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले भी कह रहा हूं कि वे राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई हैं।
    बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में शिल्प और भाषा के स्तर पर अनेक प्रयोग किए हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता को विकसित किया। वे पाठक के पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। समय की धारा के साथ चलने वाले व्यंग्यकार शर्मा की स्थिति सदा समान एकरेखिय अथवा पूर्वनिर्धारित नहीं रही। वे बचपन से लेकर बुढापे तक में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में माहिर हैं। व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में अनुभवों का आकर्षण भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
    बुलाकी शर्मा समकालीन लेखकों जिसमें वे स्वयं भी शामिल है, की प्रवृत्तियों को जिस मुलायम मुलायम जायकेदार भाषा में उधेडऩा आरंभ करते हैं वह उनका कौशल है। किसी व्यंग्य लेखक की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जा सकती है कि पाठक उसकी रचनाओं का इंतजार करे और पढ़ी हुई रचनाएं भी फिर फिर पाठ को आमंत्रित करती रहे। शर्मा ऐसे ही व्यंग्यकार है जिनके कॉलम का पाठकों को इंतजार रहता है। पाठकों के बीच उनकी किताबों की मांग भी बहुत है। वे अपनी सुदीर्घ यात्रा एवं व्यंग्य विधा के अवदान से वरिष्ठ व्यंग्यकारों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं।
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टॉलस्टॉय की टोपी

मैं लेखक हूं पर दिखता नहीं हूं। मुझे देखकर कोई भी लेखक नहीं कहता। देखने में मैं बिल्कुल आम आदमी जैसा हूं। जो भी मुझे से मिलता है यही कहता है कि मैं लेखक जैसा दिखता नहीं हूं। अपनी ऐसी तारीफ सुन-सुन कर कोई कब तक धीरज रखेगा। आखिरकार धीरज को जबाब देना था दे दिया। मुझे महसूस होने लगा कि जब मैं लेखक हूं तो लेखक जैसा दिखाई क्यों नहीं देता हूं। अगर लेखक जैसा दिखाई दूं तो हर्ज ही क्या है? सभी समकालीन लेखक तो लेखक जैसे दिखते हैं फिर मैं आम आदमी जैसा क्यों बना रहूं। वैसे यह गलत भी तो है कि कोई लेखक हो और वह देखने में लेखक जैसा दिखाई ही नहीं दे। इस गलती को मेरे अलावा कौन सुधार सकता है। अब मैं लेखक की तरह दिखना चाहता हूं।
    मुझे खुद के लिए कुछ भी करूंगा। मैं जो हूं वही तो दिखाई देना चाहिए। समस्या यह भी है कि इधर के आलोचक भी मुझे लेखक कम और आम आदमी अधिक मानते हैं। अब आप ही बताएं कि कोई इतने वर्षों से कोई लिख रहा हो और उसे लेखक नहीं माना जाए तो वह क्या करे! यह तो सरासर नाइंसाफी हुई ना। आपको और मुझे ही नहीं वैसे सबको पता है कि सबके अपने-अपने ग्रुप हैं। मैं उनके ग्रुप में नहीं हूं तो मेरा यह हाल है। वैसे मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर पड़ता भी है तो मैं प्रत्यक्ष में यही कहूंगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं लेखक हूं और किसी आलोचक के कुछ कहने-सुनने से आम आदमी नहीं हो जाऊंगा। ऐसी साहित्य विरोधी घटनाओं और गतिविधियों से आहत होकर मैं लिखना-पढ़ना बंद नहीं कर सकता। मैं तो यहां तक छाती ठोक कर कहता हूं कि कोई पाठक भी अगर मुझे रिजेक्ट करता है तो कर दे मेरी बला से। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी पाठक ने लेखक नहीं बनाया है। फिर यहां यह भी बता दूं जो पाठक मुझे लेखक नहीं मानते हैं, मैं उन्हें पाठक भी नहीं मानता हूं।
    भारतीय लेखकों को देखता हूं तो सब अलग-अलग मिजाज के दिखाई देते हैं। उनमें ऐसी कोई उभयनिष्ठ चीज है ही नहीं कि मैं अपना लूं। अब मेरी दूरदृष्टि का कमाल देखिए। लगभग सारे विदेशी लेखक हेट लगया करते थे और लगते हैं। मैंने भी हेट लगाने की सोच ली। तीन-चार नेहरू टोपी ले तो आया पर बात जमी नहीं। देशी टोपी की यही औकात है कि उन्हें लगाते ही लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या अबकी चुनाव में खड़े होने का इरादा है? कहलाना चाहता था लेखक और लोग कहने लगे नेताजी। लेखक को नेताजी कहें तो गाली जैसा लगता है।
    पंच काका की शरण में गया। उनसे सारी कथा कही। उन्होंने संदूक से एक टोपी निकाल कर मुझे देते हुए कहा- इसे पहन कर अब ठाठ से घूम। यह टॉलस्टॉय की टोपी है। कोई पूछे तो नाम बता देना। सबकी बोलती बंद हो जाएगी। फिर उन्होंने काम की बात बताई कि लेखक होने या दिखने से जरूरी है हमारा चिंतन-मनन। ईश्वर ने हम सब को पांच तत्त्वों से बनाया है पर कोई किसी के जैसा नहीं। ऐसी होती है रचना की मौलिकता। शब्द सभी के पास समान हैं पर उनको रचना में अपनी मौलिकता के साथ प्रयुक्त करना आना चाहिए। एक लेखक को अपनी भाषा गढ़नी और कमानी होती है, तभी वह लेखक कहलाता है।

नीरज दइया

10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

09 सितंबर, 2017

हम सब बैलों की कथा

हले गायें और भैंसे बोलती नहीं थी। ऐसा नहीं कि पहले उनके मुंह में जुबान नहीं थी। जुबान तो थी पर कोई कानून ऐसा नहीं था कि वे बोलें। सामाजिक चेतना आने से धीरे-धीरे गायें-भैंसें मुख्य धारा में आने लगी। आजकल गायों-भैंसों का जमाना है। ऐसा कोई क्षेत्र बचा ही नहीं है जहां गायों-भैंसों ने एंट्री ना ले ली हो। जहां देखो वहां कोई न कोई गाय-भैंस नजर आ ही जाएगी। अब कहने वाले भले कहते रहें कि कुछ सिरफिरे गधों का ये सब किया धरा है। हो गया सो हो गया, अब क्या किया जाए?
घर के नमक-मिर्च और खाने के चक्कर बेचारा बंधा बैल में रहता है। कोल्हू के बैलों को समय ही नहीं कि वे इस बारे में सोचे। आजाद धूमते सांड भला इस विषय पर ध्यान क्यों देंगे? खुला सांड मंडी में आजादी से घूमता है, कहीं भी कुछ भी खाता है। वह जम कर पीता भी है। जो बहुत तगड़ा है वह दिनोंदिन तगड़ा होता जा रहा है। जो इस रेखा के नीचे हैं उसको तो रोने की आदत है। वह बस रोता रहेगा। वैसे रोने-धोने वाले बैलों के लिए आज खुशी का दिन है। वे बड़े खुश हो रहे है कि केंद्र सरकार ने अदालत में चल रहे 'मैरिटल रेप' के मामले में कह दिया है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। भला हो केंद्र सरकार कि उसने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी- मैरिटल रेप को अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर हो जाएगी और पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार मिल जाएगा।
हथियार किसी के पास हो वह काम के समय काम आए, तभी उसकी सार्थकता है। बैलों के पास सींग होते हैं पर वे भला खुले सांड जैसे उनका प्रयोग कहां कर सकते हैं। बैल जब कोल्हू में जोता जाता है तो उसके गले में घंटी बांध दी जाती है। आंखों के आगे गांधारी स्टाइल में पट्टी बांध दी जाती है। बेचारा खोल भी नहीं सकता। कहते हैं कि चूहे बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। यहां तो दर्द ही दूसरा कि ऐसे-ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि अब बैल चूं भी नहीं कर सकते। गनीमत केंद्र सरकार ने इस बार तो बचा लिया। कितने भले दिन थे जब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म में सुनहरे दिन दिखाए थे। बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कमल मुस्काते हैं। हाय री किस्मत, आज खुशियों के कमल ने बचा लिया। पर कहां गई खुशियां!
गायों और भैंसों से पीड़ित-प्रताड़ित बैलों ने अनेक संघ हैं। एक स्वर में वे गाते हैं- जाने कहाँ गये वे दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे। कुछ मजाक-मस्ती करते हैं। दुखी आत्माओं का यही तो सुख है कि थोड़ी मजाक-मस्ती से जी बहला लेते हैं। चूहा ने सारी विस्की पी कर एक बार बोला- कहाँ है बिल्ली। और फिर क्या था दुम दबा के बिल्ली भागी। उस दिन भले बिल्ली भागी हो पर आज तक किसी चूहे की फूटी किस्मत नहीं जागी। कोल्हू में बंधना एक रिस्की खेल होता है। इस बार बेड़ा पार हो गया, पर हलाल करने वाली तलवार अब भी लटक रही है।
पंच काका का कहना है कि इस युग का एक ही यथार्थ है- हैंडल विथ केयर। जिसकी लाठी उसकी भैंस भूल जाओ, अब तो जिसकी भैंस उसी की लाठी। जरा संभल कर काम लो इनसे। काका ने मुझे कहा कि मैं अपना उपनाम ‘चंडीदास’ रख लूं! 


डॉ. नीरज दइया

01 सितंबर, 2017

भोग और उपभोग में दर्शन

 डॉ. नीरज दइया
    जीवन बड़ा अनमोल है। बार बार नहीं मिलता। ना जाने कितने-कितने जन्म लगते हैं। कितने-कितने पुण्य करने पड़ते हैं। फिर कहीं जाकर यह जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन पूरी पुण्य-प्रक्रिया का प्रसाद है। योगी और भोगी दोनों मानते हैं- मनुष्य योनी बार बार नहीं मिलनी। मिली है तो भोग लो भैया! नहीं तो मन की मन में रह जानी है। मनुष्य की यही अवस्था श्रेष्ठ है।     इससे भी जरूरी और असली बात- कल किसने देखा? जो भी है बस यही इक पल है। किसी पल में जैसा-कैसा प्यार मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। पल चला जाता है फिर गाना गाते रहो- पल भल के लिए कोई हमें प्यार करले, झूठा ही सही। गाने-बजाने से कुछ नहीं होता।
    जीवन में सब कुछ करना पड़ता है। आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। भारतीय के पास तो जहां देखो दार्शनिकता भरी पड़ी है। वस उसे सच्चाई के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अपाने सुना होगा- कल हो ना हो। यह कोई नई और ताजा बात नहीं। इस नाम से फिल्म भी बनी पर कबीर ने तो वर्षों पहले लिखा छोड़ा था- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। यह गूढ़ रहस्य जान लेना चाहिए कि कवि सदा सच लिखते हैं और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखते हैं। या फिर ऐसे समझ लें कि वे जो भी लिखते हैं, सच हो जाता है। जैसे कवि प्रदीप ने लिखा था- राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते आज फ़रेब के फंदे। कितने ये मक्कर ये अंधे, देख लिये इनके भी धंधे। इन्हीं की काली करतूतों से बना ये मुल्क मशान। देखिए मिल गया ना सूत्र।
    सूत्र यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भोग को सीधे-सीधे ग्रहण करना खतरनाक है। भोग तो राम और रहीम सभी करते हैं। जो भोग बचा रहता है उसे उपभोग उनके चेले-चेलियां करते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि भोग पर पुण्य का आवरण अनिवार्य है। ऐसा कौन मूर्ख है जो यह नहीं मानता कि मनुष्य योनी भोग और उपभोग का समुच्चय है। यह बात अलग है कि बहुत बार भोग और उपभोग की श्रेणियां इतनी घुल-मिल जाती है कि उन्हें पृथक-पृथक नहीं कर सकते हैं। नेमी-धर्मी और ज्ञानी आदमी इन चक्करों में नहीं उलझता। वह तो वह ग्रहण करता है। कभी भोग को उपभोग बनाकर और कभी उपभोग को भोग बनाकर।
    पंच काका कहते हैं- जिंदगी चार दिन की है। रोज-रोज की किच-किच किस काम की। जीवन ठाठ भोग और उपभोग में है। बिना ठाठ-बाट के लोग आदमी को आदमी समझते नहीं। अनुभव की बात बता रहा हूं- कभी कभी तो आदमी भी खुद को आदमी नहीं समझता। यह कोई दर्शन नहीं हकीकत है- कभी कभी तो घर में घरवाली तक अपने आदमी को भेड़िया की संज्ञा दे डालती है। अगर घरवाली ऐसा कहेगी तो आदमी अपनी औकात पर आ जाता है। वह उसे कुतिया जैसे घटिया शब्द से विभूषित करता है, बदले में आदमी भेडिये से कुत्ते की श्रेणी में आ जाता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उन दोनों की यह दर्शनिकता है कि वे अलगा-पिछला सब कुछ देख लेते हैं। इतनी योनियां पार करते हुए अब मनुष्य जीवन मिला है तो क्या हुआ, कभी कुत्ते-कुतिया और भेडियों के संग रहे हैं। ऐसे में इस जीवन में उनके कुछ लक्षण तो अटके-भटके आ ही गए होंगे। तभी तो ऐसा है।