10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

09 सितंबर, 2017

हम सब बैलों की कथा

हले गायें और भैंसे बोलती नहीं थी। ऐसा नहीं कि पहले उनके मुंह में जुबान नहीं थी। जुबान तो थी पर कोई कानून ऐसा नहीं था कि वे बोलें। सामाजिक चेतना आने से धीरे-धीरे गायें-भैंसें मुख्य धारा में आने लगी। आजकल गायों-भैंसों का जमाना है। ऐसा कोई क्षेत्र बचा ही नहीं है जहां गायों-भैंसों ने एंट्री ना ले ली हो। जहां देखो वहां कोई न कोई गाय-भैंस नजर आ ही जाएगी। अब कहने वाले भले कहते रहें कि कुछ सिरफिरे गधों का ये सब किया धरा है। हो गया सो हो गया, अब क्या किया जाए?
घर के नमक-मिर्च और खाने के चक्कर बेचारा बंधा बैल में रहता है। कोल्हू के बैलों को समय ही नहीं कि वे इस बारे में सोचे। आजाद धूमते सांड भला इस विषय पर ध्यान क्यों देंगे? खुला सांड मंडी में आजादी से घूमता है, कहीं भी कुछ भी खाता है। वह जम कर पीता भी है। जो बहुत तगड़ा है वह दिनोंदिन तगड़ा होता जा रहा है। जो इस रेखा के नीचे हैं उसको तो रोने की आदत है। वह बस रोता रहेगा। वैसे रोने-धोने वाले बैलों के लिए आज खुशी का दिन है। वे बड़े खुश हो रहे है कि केंद्र सरकार ने अदालत में चल रहे 'मैरिटल रेप' के मामले में कह दिया है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। भला हो केंद्र सरकार कि उसने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी- मैरिटल रेप को अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर हो जाएगी और पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार मिल जाएगा।
हथियार किसी के पास हो वह काम के समय काम आए, तभी उसकी सार्थकता है। बैलों के पास सींग होते हैं पर वे भला खुले सांड जैसे उनका प्रयोग कहां कर सकते हैं। बैल जब कोल्हू में जोता जाता है तो उसके गले में घंटी बांध दी जाती है। आंखों के आगे गांधारी स्टाइल में पट्टी बांध दी जाती है। बेचारा खोल भी नहीं सकता। कहते हैं कि चूहे बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। यहां तो दर्द ही दूसरा कि ऐसे-ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि अब बैल चूं भी नहीं कर सकते। गनीमत केंद्र सरकार ने इस बार तो बचा लिया। कितने भले दिन थे जब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म में सुनहरे दिन दिखाए थे। बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कमल मुस्काते हैं। हाय री किस्मत, आज खुशियों के कमल ने बचा लिया। पर कहां गई खुशियां!
गायों और भैंसों से पीड़ित-प्रताड़ित बैलों ने अनेक संघ हैं। एक स्वर में वे गाते हैं- जाने कहाँ गये वे दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे। कुछ मजाक-मस्ती करते हैं। दुखी आत्माओं का यही तो सुख है कि थोड़ी मजाक-मस्ती से जी बहला लेते हैं। चूहा ने सारी विस्की पी कर एक बार बोला- कहाँ है बिल्ली। और फिर क्या था दुम दबा के बिल्ली भागी। उस दिन भले बिल्ली भागी हो पर आज तक किसी चूहे की फूटी किस्मत नहीं जागी। कोल्हू में बंधना एक रिस्की खेल होता है। इस बार बेड़ा पार हो गया, पर हलाल करने वाली तलवार अब भी लटक रही है।
पंच काका का कहना है कि इस युग का एक ही यथार्थ है- हैंडल विथ केयर। जिसकी लाठी उसकी भैंस भूल जाओ, अब तो जिसकी भैंस उसी की लाठी। जरा संभल कर काम लो इनसे। काका ने मुझे कहा कि मैं अपना उपनाम ‘चंडीदास’ रख लूं! 


डॉ. नीरज दइया

01 सितंबर, 2017

भोग और उपभोग में दर्शन

 डॉ. नीरज दइया
    जीवन बड़ा अनमोल है। बार बार नहीं मिलता। ना जाने कितने-कितने जन्म लगते हैं। कितने-कितने पुण्य करने पड़ते हैं। फिर कहीं जाकर यह जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन पूरी पुण्य-प्रक्रिया का प्रसाद है। योगी और भोगी दोनों मानते हैं- मनुष्य योनी बार बार नहीं मिलनी। मिली है तो भोग लो भैया! नहीं तो मन की मन में रह जानी है। मनुष्य की यही अवस्था श्रेष्ठ है।     इससे भी जरूरी और असली बात- कल किसने देखा? जो भी है बस यही इक पल है। किसी पल में जैसा-कैसा प्यार मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। पल चला जाता है फिर गाना गाते रहो- पल भल के लिए कोई हमें प्यार करले, झूठा ही सही। गाने-बजाने से कुछ नहीं होता।
    जीवन में सब कुछ करना पड़ता है। आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। भारतीय के पास तो जहां देखो दार्शनिकता भरी पड़ी है। वस उसे सच्चाई के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अपाने सुना होगा- कल हो ना हो। यह कोई नई और ताजा बात नहीं। इस नाम से फिल्म भी बनी पर कबीर ने तो वर्षों पहले लिखा छोड़ा था- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। यह गूढ़ रहस्य जान लेना चाहिए कि कवि सदा सच लिखते हैं और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखते हैं। या फिर ऐसे समझ लें कि वे जो भी लिखते हैं, सच हो जाता है। जैसे कवि प्रदीप ने लिखा था- राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते आज फ़रेब के फंदे। कितने ये मक्कर ये अंधे, देख लिये इनके भी धंधे। इन्हीं की काली करतूतों से बना ये मुल्क मशान। देखिए मिल गया ना सूत्र।
    सूत्र यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भोग को सीधे-सीधे ग्रहण करना खतरनाक है। भोग तो राम और रहीम सभी करते हैं। जो भोग बचा रहता है उसे उपभोग उनके चेले-चेलियां करते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि भोग पर पुण्य का आवरण अनिवार्य है। ऐसा कौन मूर्ख है जो यह नहीं मानता कि मनुष्य योनी भोग और उपभोग का समुच्चय है। यह बात अलग है कि बहुत बार भोग और उपभोग की श्रेणियां इतनी घुल-मिल जाती है कि उन्हें पृथक-पृथक नहीं कर सकते हैं। नेमी-धर्मी और ज्ञानी आदमी इन चक्करों में नहीं उलझता। वह तो वह ग्रहण करता है। कभी भोग को उपभोग बनाकर और कभी उपभोग को भोग बनाकर।
    पंच काका कहते हैं- जिंदगी चार दिन की है। रोज-रोज की किच-किच किस काम की। जीवन ठाठ भोग और उपभोग में है। बिना ठाठ-बाट के लोग आदमी को आदमी समझते नहीं। अनुभव की बात बता रहा हूं- कभी कभी तो आदमी भी खुद को आदमी नहीं समझता। यह कोई दर्शन नहीं हकीकत है- कभी कभी तो घर में घरवाली तक अपने आदमी को भेड़िया की संज्ञा दे डालती है। अगर घरवाली ऐसा कहेगी तो आदमी अपनी औकात पर आ जाता है। वह उसे कुतिया जैसे घटिया शब्द से विभूषित करता है, बदले में आदमी भेडिये से कुत्ते की श्रेणी में आ जाता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उन दोनों की यह दर्शनिकता है कि वे अलगा-पिछला सब कुछ देख लेते हैं। इतनी योनियां पार करते हुए अब मनुष्य जीवन मिला है तो क्या हुआ, कभी कुत्ते-कुतिया और भेडियों के संग रहे हैं। ऐसे में इस जीवन में उनके कुछ लक्षण तो अटके-भटके आ ही गए होंगे। तभी तो ऐसा है।

30 अगस्त, 2017

शाश्वत जीवन और छलांग

    कुछ चीजें जो हम पाना चाहते हैं, वे  कैसे मिल सकती है? कहते हैं कुछ चीजें सोचने से मिलती हैं। जो पाना है उसके बारे में सोचते रहो और वे एक दिन मिल जाएंगी। सोचने की अवधि के बारे में कुछ विवरण नहीं है। यह उस चीज और आपके सोचने की क्षमता पर निर्भर है। यह बड़ी गहरी बात है। एक दूसरी बात कि कुछ चीजों को पाने के लिए बिना सोचे-समझे छलांग लगानी पड़ती है। अगर आप कुछ चीज को पाने के लिए छलांग लगाते हैं और आपके हाथ-पैर या कुछ भी टूट-फूट होती है तो जिम्मेदार मैं नहीं हूं। यह ज्ञान मेरा नहीं है। यह गहन चिंतन-मनन भगवान ओशो का है। वे तो यहां तक कह गए हैं कि जिस किसी ने कहा होगा कि कोई भी छलांग लगाने के पहले हजार बार सोचना चाहिए, कहने वाला कोई कायर या कमजोर रहा होगा। बकौल ओशो- छलांग पहले लगा लो, सोचना कभी भी। शाश्वत जीवन पड़ा है, जब दिल आए सोच लेना, मगर छलांग तो लगा लो। ठीक बात है बाद में अस्पताल या घर में पड़े-पड़े आराम से सोचा जा सकता है। वैसे जेल सोचने के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। जेल में सोचने और सोचने के अनेक प्रमाण हम अनेक कृतियों के रूप में गिना सकते हैं, जो जेल में लिखी गई हैं। 
    बिना सोचे और कम सोचे छलांग लगाने वालों में युवा पीढ़ी बड़ों को भी पीछे छोड़ चुकी है। खेल खेल में वे छलांग लगा कर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी प्रेमी छलांग लगाता है कभी प्रेमिका। कभी खुशी में छलांग लगाई जाती है तो कभी गम में। कभी मिलन में छलांग का दृश्य आता है और कभी विरह में। छलांग के बारे में इसलिए ओशो ने कहा कि सोचना नहीं है। पीछे घरवालों के बारे में अपने परिवार और मित्रों के बारे में बिल्कुल सोचने नहीं है। क्यों कि सोचने वाला छलांग लगा ही नहीं सकता। कहते हैं कि जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ की बातें ऐसे लोगों पर लागू नहीं होती है। उनका मानना है कि पैर लंबे हैं तो क्या काट लें? हम तो खुल कर और जी भर के पैर फैलाएंगे। कर्ज लेकर चादर को लंबा-चौड़ा करेंगे, और बाद में छलांग लगाएंगे। ऐसी छलांग में देश से भाग जाने वालों के अनुपम उदाहरण हम जानते हैं। नीति और धर्म की बातें बताने वाले ही जब अलमस्त हो कर छलांगें लागने में व्यक्त है तो फिर रोकने वाला है कौन? समझाने वाला ही मूर्खताएं करें तो फिर किसे दोष ? 
    देश में ओशो को मानने वाले बहुत है। धर्मगुरु और बाबाओं ने भी ओशो के इस चिंतन पर ममन किया और कई छलांग लगा चुके हैं, कुछ तैयारी में है। बिना सोचे-समझे छलांग लगा कर सफलता हासिल करने का सुख तो उन्हें मिला ही किंतु बाद में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है वह बस नसीब की बातें है। पहुंचे हुए धर्मगुरु, साधु, संन्यासी जो कहते हैं करते हैं उनमें इतनी गूढ़ता होती है कि सामान्य व्यक्ति के समझने की बात होती ही नहीं। वे ईश्वर की भांति इस संसार में लीला करने आते हैं और कुछ की लीला गुप्त रहती है कुछ की जगजाहिर हो जाती है। बापू आशाराम से राम-रहीम की यात्रा में यही हुआ कि आम आदमी हैरान हो गया। सामान्य आदमी की तो औकात ही क्या, इस खेल को तो विशिष्ट आदमी भी देखते रह गए।
    पंच काका कहते हैं कि यह होना स्वभाविक था, क्योंकि छलांग शब्द को गंभीरता से देखें। इसमें अनेक ध्वनियां और अर्थ छुपे हैं। छलांग में जो ‘लांग’ है वह धोती की लांग का संकेत हैं। छ वर्ण असल में छह की ध्बनि देता है। वे तो यहां तक मानते हैं कि छलांग में मूल शब्द ‘छल’ है और उसमें ‘अंग’ जोड़ कर छलांग बना है। छल और अंग की व्याख्या ऐसे संतों ने अपने अपने ढंग से की है। 
     ० नीरज दइया

25 अगस्त, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना

डॉ. नीरज दइया
यह संयोग है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ का जन्म 27 मार्च, 1960 को विश्व रंगमंच दिवस के दिन हुआ। यह भी संयोग है कि विद्यासागर आचार्य के आंगन में हुआ जिन्होंने नाटक के लिए अपने दोनों बेटों को समर्पित कर दिया। संभवत: इसी कारण और अपनी लगन के बल पर मधु आचार्य ने नाटक, रंगमंच, पत्रकारिता और साहित्य में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिस पर देश और दुनिया की नजर है। कवि-कथाकार मित्र राजेन्द्र जोशी के शब्दों में कहें तो मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना और बीकानेर जैसे शहर में होना, अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीकानेर एक ऐसा शहर है जिसमें रचनात्मकता के ऐसे बीज हैं जो अपना पर्यावरण खुद निर्मित कर लेते हैं। यहां कला, साहित्य और संस्कृ ति की एक अखूट परंपरा रही है जो निरंतर प्रवाहशील होते हुए मधु आचार्य तक पहुंचती है। नाटक और साहिय के संस्कार अगर घर में मिल जाए तो किसी के कला माध्यम में कुछ खास करने की संभावनाएं बढ़ जाती है। आनंद वी. आचार्य और मधु आचार्य ‘आशावादी’ इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने अपने पिता की थाती को धरोहर की तरह न केवल संभाला, बल्कि उसे विकसित भी किया। मधु आचार्य के साथ एक संयोग चेतना आचार्य से विवाह के साथ जुड़ा। इसे संयोग इसलिए कह जाएगा कि पिता के साथ ससुर भी साहित्यिक परंपरा से जुड़े होने से पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि मधु आचार्य के साथ जुड़ती है और दूर तक चलती है। बीकानेर के जनकवि बुलाकी दास ‘बावरा’ ने अपने समय में मंचीय कवि के रूप में धूम मचा रखी थी। उनका आशीर्वाद आचार्य के साहित्यिक-संस्कारों को द्विगुणित करने वाला कहा जा सकता है।
बाल्यकाल से ही मधु आचार्य का अनेक विख्यात नामों के साथ पारिवारिक जुड़ाव रहा। शिक्षा और साहित्य के वातावरण में पले-बढ़े छात्र मधु ने जीवन में अनेक मुकाम पार करते हुए, राजनीति विज्ञान से एम. ए. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन के दौरान गुरु-मार्गदर्शक के रूप में भवानी शंकर शर्मा का सान्निध्य मिला। विभिन्न मंचों पर अनेक नाटकों में कलाकार और निर्देशक की भूमिकाओं का सफल निर्वाह करने वाले मधु आचार्य ने कभी किसी काम से गुरेज नहीं किया। उनके संस्कार ही ऐसे थे कि स्टेज पर और जीवन में भी किसी भी काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं समझा। वर्षों तक नाटक के लिए कुछ भी करने और करवाने का जुनून-जिद पालते रहे। इसी यात्रा में आपने 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। साहित्य सृजक के रूप में वर्ष 1990 से जुड़ाव हुआ। तब से अब तक विविध विधाओं मंन निरंतर लिख-पढ़ रहे हैं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध-कार्य भी किया है।
साहित्य-लेखन की यात्रा का आगाज राजस्थानी नाटक ‘अंतस उजास’ (1995) से हुआ। यह एक प्रयोग था कि किसी जन कवि की कविताओं को नाटक में प्रयुक्त किया जाए। मंच पर लोक-रंग को बिखेरने वाला यह नाटक जितनी बार मंचित हुआ सफल रहा। बाद में यह नाटक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी, बीकानेर की पांडुलिपि प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। पत्रकारिता से जुड़े मधु आचार्य ‘आशावादी’ के दैनिक राष्ट्रदूत से दैनिक भास्कर तक की यात्रा के अनेक मुकाम और पड़ाव हैं। रंगकर्मी-नाटककार और पत्रकार के रूप में अपना लौहा मनवा चुके आशावादी ने साहित्य में ‘गवाड़’ के माध्यम से जैसे दूसरी पारी का श्रीगणेश किया। इस बार साहित्य-प्रांगण में एक के बाद एक और कभी एकसाथ अनेक पुस्तकें और विधाओं में अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करते गए, जो अब भी जारी है। विशाल अनुभव लिए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साहित्यिक दुनिया को नवीन आभा देने का प्रेरणास्पद आगाज बीकानेर में किया है। प्रकाशन के बाद भव्य लोकार्पण अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर करने में वर्तमान समय और समाज में साहित्य की गरिमामय पुनस्र्थापना का लक्ष्य अंतर्निहित है।
अब तक राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’, ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (उपन्यास); ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’, ‘हेत रो हेलो’ (कहानी-संग्रह); ‘अमर उडीक’, ‘अेक पग आभै मांय’ (कविता-संग्रह)। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए ‘सबद साख’ (विविधा) पुस्तक का संपादन भी किया है। हिन्दी में भी विविध विधाओं में 26 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। यथा- ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘दलाल’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘चिड़िया मुंडेर पर’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’, ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’, ‘गुमान में खड़ा आकाश’, मौन में उसे देखना' (कविता-संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह) ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’, ‘खुद लिखें अपनी कहानी’, ‘सुनना, गुनना और चुनना’ (बाल साहित्य)।
बीकानेर में मधु आचार्य का होना एक संयोग है और मेरा उनकी इस साहित्यिक यात्रा को करीब से देखना भी संयोग है। साहित्य में पुरस्कारों के विषय में मानते हैं कि पुरस्कार संयोग होते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लेखन में पुरस्कारों के स्थान पर सतत लेखन को महत्त्व दिया है। संयोग है राजस्थानी उपन्यास ‘गवाड़’ पर उन्हें जहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ अर्पित किया गया और इसी कृ ति पर वर्ष 2015 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी अर्पित किया गया है।
अन्य पुरस्कार और सम्मान है- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्रकारिता पुरस्कार’, सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से ‘तैस्सितोरी अवार्ड’ एवं नगर विकास न्यास द्वारा भी पुरस्कृ त-सम्मानित। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के आप उपाध्यक्ष रहे तथा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय सहभागिता है। आपकी अनेक रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य भी हुआ है। प्रतिदिन लिखना-पढऩा केवल अनिवार्य मानते ही नहीं वरन मधु आचार्य ‘आशावादी’ प्रतिदिन करणीनगर स्थिति अपने निजी आवास में इतना पढ़ते-लिखते हैं कि लोगों को आश्चर्य होता है। इतना ही नहीं इस लिखने-पढऩे के बीच अपने मित्रों और परिजनों से मिलने जुलने के साथ ही जन-जन के चहेते मधु आचार्य अपनी व्यस्तताओं के बीच नित्य समय-प्रबंधन ऐसा करते हैं कि वे सभी जगह मौजूद मिलते हैं। आचार्यों के चौक स्थित अपने पैतृक आवास कलकत्तिया भवन में रहते हैं। नित्य बेहद सरल, सीधे मिलनसार आत्मीय मधु आचार्य अपने पत्रकारिता, साहित्यिक व्यक्तित्व के बिना किसी आवरण पाटों पर बैठे हथाई करते मिलते हैं। अपने सभी रूपों को विस्मृत कर वे संजीदा इंसान के रूप में मिलते हैं। कला माध्यम से जुड़े अथवा शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति का जीवन में एक योग्य इंसान होना ही उसका असल है। अपनी रचनाओं के माध्यम से निर्माण के नवीन विचार एक अच्छा इंसान ही बेहतर दे सकता है।
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मधु आचार्य का प्रकाशित साहित्य
• 1995 अतंस उजास (नाटक)
• 2012 ‘गवाड़’ (राजस्थानी उपन्यास)
• 2013 ‘हे मनु!’ (उपन्यास), ‘चेहरे से परे’ (कविता संग्रह) ‘सबद साख’ (संपादन)
• 2014 ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इंसानों की मंडी’ (उपन्यास), ‘अवधूत’, (राजस्थानी उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’(कहानी संग्रह), ‘उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’ (कविता संग्रह), ‘रास्ते हैं, चले तो सही’ (प्रेरक निबंध)
• 2015 ‘@24 घंटे’ (उपन्यास), ‘आडा-तिरछा लोग’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘सुन पगली’, (कहानी संग्रह), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं है जिंदगी’ (कविता संग्रह) ‘अमर उडीक’ (राजस्थानी कविता संग्रह)
• 2016 ‘अपने हिस्से का रिश्ता’(उपन्यास), ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’ (कहानी संग्रह), ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’ (कविता संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’ (बाल उपन्यास) ‘खुद लिखें अपनी कहानी’(बाल कथाएं) ‘सुनना, गुनना और चुनना’(बाल कविताएं)
• 2017 ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘हेत रो हेलो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘एक पग आभै मांय’ (राजस्थानी कविता संग्रह) दलाल (उपन्यास) मुंडेर पर चिड़िया (कहानी संग्रह) गुमान में खड़ा आकाश, मौन में उसे देखना (कविता संग्रह)
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