10 जुलाई, 2017

कच्चे कान : पक्के कान

ठीक-ठीक इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कान पकड़ने की परंपरा का आरंभ कब हुआ और किसने किया। आदिकाल से कान दो प्रकार के पाए जाते रहे है। सजीव कान और निर्जीव कान। सभी सजीवों के कान सजीव कहलाते हैं, किंतु निर्जीव कान प्रायः दीवारों के होने के समाचार है। दीवारों के कान होते होंगे, पर आज तक किसी ने देखे नहीं। अनेक प्रमाणों के आधार पर पुष्ट होता है कि दीवारों के कान होते हैं।
    आधुनिक काल में कान को ठोक-बजाकर देखें तो कान की दो किस्में हैं- कच्चे कान और पक्के कान। कहते हैं कि अफसर के कान कच्चे होते हैं। वे किसी भी बात पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। खासकर अपने मेल स्पूनों और फीमेल स्पूनों द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बातों को वे आंखें मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। कर्मचारी के विषय में शोध के परिणाम आए हैं कि उनके कान पक्के होते हैं अथवा पक्के हो जाते हैं। कर्मचारी जब कर्मचारी के रूप में सेवा आरंभ करते हैं तब उनके कान अधपक्के होते हैं। जैसे ही प्रोबेशन पूरा होता है वे पक्के हो जाते हैं। अफसर के श्रीमुख से आरंभ में कर्मचारी इतना कुछ सुन चुका होता है कि उसके कान पकने लाजमी है। अफसर का काम होता है- कहना और कर्मचारी का बंधा-बंधाया काम है- सुनना। जब अफसर जब बार-बार कहता है तो समझ लिजिए कि साहब के कान कुछ ज्यादा ही कच्चे हो गए हैं।
    अफसर चाहता है कि वह कर्मचारियों के कानों को पकड़ कर रखे। अफिस के कर्मचारी भी भला कहां कम होते हैं, वे भी अफसर से भिन्न विचार नहीं रखते हैं। जब सभी के विचार अफसरी-विचार हो जाते हैं तो कान पकड़म-पकडाई का खेल आरंभ होता है। कौन मूर्ख सीधा सीधा कान पकड़ता है। इस खेल का असूल है कि कान पकड़ा तो जाए पर उसे जरा घुमाकर पकड़ा जाए। प्रत्यक्ष में सीधा-सीधा यह नहीं लगना चाहिए कि कान पकड़ा गया है।
    सीधा कान पकड़ना निगाहों में आ जाता है, घूमाकर पकड़ा हुआ कान निगाहों में नहीं आता। सुनते हैं कि सरकार सभी नौकरीपेशा कर्मचारियों को खूब पगार देती थी और तिस पर सातवां वेतन आयोग भी दे दिया गया है। जनता का मानना है कि सरकारी दामादों के तो व्यारे-न्यारे हो गए। पर कर्मचारियों के श्रीमुख से सुना जा रहा है कि क्या दिया, कुछ नहीं! इधर दिया, उधर ले लिया। वृद्धि के नाम पर बढ़ी हुई पगार देने के साथ ही भरपाई के लिए कर यानी टेक्स से सरकार ने सभी के कान पकड़ लिए हैं। 
    पंच काका कहते हैं कि जब किसी का कान सीधा-सीधा पकड़ना संभव नहीं हो तो दूसरे-तीसरे अथवा चौथे विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहिए। देखिए ना पहले हमारे जमाने में गुरुजी का साप्ताहिक कार्यक्रम होता था- बच्चों के दो-च्यार बार कान पकड़ना और कान के नीचे हाथ जमाना। कभी कभी उनकी मरजी होती तो वे कान घुमाने का प्रयास भी किया करते थे। कान घूमने में सीमा यह थी कि शिष्य की आंखें छल-छला आए और गुरुजी की मुस्कान- जा बैठ बेटा! अब गुरुजी कान पकड़ने और कान के नीचे दो च्यार हाथ जमाने के सपने भी नहीं देख सकते। ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों को आचार-संहिता का पालन करना चाहिए। यह जान लें कि भलाई इसी में है कि ये कान-कान खेल बंद ही कर दिया जाए।     
० नीरज दइया

 

02 जुलाई, 2017

राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई : बुलाकी शर्मा / डॉ. नीरज दइया

डॉ. नीरज दइया प्रख्यात व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के साथ
राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी का परसाई है। इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। मित्रों के बीच यह कथन चर्चा में रहा है। यह अभिधा में की गई कोई टिप्पणी है अथवा व्यंजना में? प्रश्न यहां यह भी किया जाना चाहिए कि क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ (1987) और ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) यानी 32 व्यंग्य के आधार पर उन्हें परसाई कहना उचित है? माना कि बहुत रचनाएं उनकी प्रकाशित हुई हैं जो संग्रह के रूप में नहीं आ सकी है अथवा अनेक अप्रकाशित राजस्थानी व्यंग्य हैं फिर क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता है?
संभवत: यहां अतिशयोक्ति इसलिए नहीं है कि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं व्यक्त हुआ है वरन इस क्षेत्र में उनके निष्ठा से सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले से यह कह रहा हूं कि राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई बुलाकी शर्मा हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ के समर्पण में लिखा है- ‘राजस्थानी गद्य में व्यंग्य विधा नै ठावी ठौड़ दिरावणिया सांवर दइया री ओळूं नै’। यहां यह उल्लेखनीय है कि सांवर दइया और बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया किंतु दइया के असामयिक निधन से उनकी व्यंग्य-यात्रा ‘इक्यावन व्यंग्य’ पुस्तक पर संपूर्ण हो गई।
राजस्थानी व्यंग्य विधा में बुलाकी शर्मा से बहुत अपेक्षाएं और उम्मीदें इसलिए भी हैं कि वे हिंदी के भी प्रमुख व्यंग्यकार हैं अत: निश्चय ही उनकी राजस्थानी व्यंग्य-यात्रा बहुत दूर तक जाने वाली है। जिस भांति परसाई ने व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित किया वैसे ही राजस्थानी में व्यंग्य विधा में गंभीरता से कार्य करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है।
बुलाकी शर्मा और अन्य व्यंग्यकारों में अंतर है कि शर्मा व्यंग्य की व्यापक प्रवृत्ति और भाषा से परिचित इसलिए रहे कि उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन-चिंतन किया है। वे व्यंग्य अथवा व्यंग्य कहानी में प्रयोग करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने कई सफल प्रयोग शिल्प और भाषा के स्तर पर किए भी हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता की दिशा को अपनाया। स्थानीयता और लौकिक सत्यों के साथ वे स्थिति के अनुसार कभी पाठक के पक्ष में और कभी विपक्ष में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। उन्होंने अपनी स्थिति सदैव एक जैसी अथवा पूर्वनिर्धारित कभी नहीं रखी। उनमें जीवन के प्रति आकर्षण का भाव है। वे बचपन से लेकर बुढापे तक के जीवन में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में सक्षम हैं। ऐसी अनेक विशेषताओं के रहते उन्हें राजस्थानी व्यंग्य के लिहाज से परसाई कहा जा सकता है। वे हिंदी में भी लिखते हैं किंतु हिंदी के संदर्भ में यह उक्ति विचारणीय नहीं है, हिंदी व्यंग्य का क्षेत्र व्यापक है और उसमें एक परसाई हुए हैं। वहां बुलाकी शर्मा को बस बुलाकी शर्मा ही होना है और वे हिंदी व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं भी।
व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किए। राजनीति हो अथवा समाज-व्यवस्था उन्हें जहां कहीं गड़बड़-घोटाला नजर आया वे अपनी बात कहने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य में उनके अनुभवों का आकर्षण उनकी भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। उन के व्यंग्य में शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक हम उसमें इतने आगे निकल आए होते हैं कि पिछली सारी बातें किसी कथा-स्मृति जैसे हमें नए अर्थों और अभिप्रायों की तरफ संकेत करती हुई नजर आती है। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
‘कवि, कविता अर घरआळी’ शीर्षक व्यंग्य में कथात्मकता है तो संवादों का आनंद भी। यहां घर-समाज में कविता के अवमूल्यन की स्थितियां और विरोधाभास की व्यंजना प्रमुखता से देखी जा सकती है। साहित्य और खासकर कविता को लेकर कवियों के जीवन पर करारा प्रहार है। बुलाकी शर्मा इस सत्य को स्थापित करने में सफल हुए हैं कि कोई व्यक्ति हर समय कवि नहीं हो सकता है अथवा उसे हर समय कवि नहीं होना चाहिए। कवियों के कविताओं को लेकर किए जाने वाले जुल्म पर आपने हिंदी में भी कई रचनाएं दी हैंै।
उनके हिंदी व्यंग्य की बात चली है तो यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी कुछ रचनाएं राजस्थानी से हिंदी और कुछ हिंदी से राजस्थानी में मौलिक रचनाओं के रूप में प्रस्तुत हुई है। जैसे इसी संग्रह की रचना ‘संकट टळग्यो’ को ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ नाम से दस वर्ष बाद इसी नाम से प्रकाशित व्यंग्य संग्रह में संकलित किया गया है। इसी भांति इस संग्रह का ‘ज्योतिष रो चक्कर’ व्यंग्य हिंदी में ‘अंकज्योतिष का चक्कर’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी विषय को लेकर उनके राजस्थानी व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ का शीर्षक व्यंग्य अखबार के राशिफल का रहस्य उद्घाटित करता है। वे अंधविश्वासों पर प्रहार करते हैं तो उसे कथात्मक उदाहरणों द्वारा पोषित करते हैं।
बुलाकी शर्मा अपने निजी जीवन में सरकारी नौकरी के तौर पर कार्यालयों से जुड़े रहे। अत: उनकी रचनाओं में दफ्तर के अनेक चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। ‘दफ्तर’ नामक व्यंग्य में नए अफसर को काबू में करने की एक कहानी है तो ‘दफ्तर-गाथा’ में चार लघुकथाओं के माध्यम से चार चित्रों की बानगी कार्यालय में होने वाली अनियमितताओं की तरफ संकेत करती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में समय, समाज और देश छोटी-छोटी घटनाओं-प्रसंगों के माध्यम से अपने बदलते रूप में हमारे सामने आता है। वे बदलते समाज को जैसे शब्दों में बांधते हुए अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संकेत करते हैं।
‘नेतागिरी रो महातम’ में बदलती राजनीति और राजनीति से पोषित होते छोटे-बड़े नेताओं को लक्षित किया है तो ‘मिलावटिया जिंदाबाद’ में जैसा कि व्यंग्य के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि मिलावट पर व्यंग्य किया है। यहां मिलावट पर व्यंग्य लिखते हुए उन्होंने जिस पाचक घी को लक्षित किया है उससे भी सधे हुए शिल्प में उन्होंने हिंदी में एक व्यंग्य लिखते हुए पाचक दूध को लेते हुए मिलावट और बदलते समय पर करारा प्रहार किया है।
बुलाकी शर्मा को आरंभिक प्रसिद्धि व्यंग्य ‘बजरंगबली की डायरी’ से मिली जो उनके हिंदी व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’(1997) में संकलित है। इसी व्यंग्य का परिवर्तित-परिवद्र्धित रूप उनके व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) में भी देखा जा सकता है। इसी क्रम में यहां उल्लेखनीय है कि उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य-कथा ‘प्रेम प्रकरण पत्रावली’ व्यंग्य और कहानी दोनों रूपों में संकलित है। दो विधाएं हैं तो इनके दोनों के अपने अपने अनुशासन भी हैं किंतु बुलाकी शर्मा इन दोनों के मध्य के यात्री हैं। वे अक्सर कहानी में व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में कहानी। इस का अनुपम उदाहरण उनका व्यंग्य ‘पूंगी’ है। वे आरंभ तो इसे निबंध के रूप में करते हैं-‘साब अर सांप री रासी एक है, बियां ई दोनां री तासीर ई एकसरीखी हुवै।’ किंतु बहुत जल्द वे इसे साहब और उनके चापलूस कर्मचारी की कहानी में बदल देते हैं। अत: कहना चाहिए कि कहानी उनके अनुभव में है और व्यंग्य उनके विचार में है। उनका यह रूप किसी पाठक को नहीं अखरता। जब उन्हें विधाओं के खानों में स्थिर करने का प्रयास किया जाता है तब भी वे वहां स्थिर नहीं किए जा सकते हैं। कहानी उनसे व्यंग्य-निबंध के प्रभाव से मुक्त होने की अभिलाषा रखती है और व्यंग्य की यह अपेक्षा है कि वे कथात्मकता से मुक्त होकर निबंध में हाथ आजमाएं। फिलहाल वे इन दोनों ही स्थितियों से परे स्वयं को कहानी और व्यंग्य के साझा क्षेत्र में स्वयं को पाते हैं।
कहानीकार मालचंद तिवाड़ी ने लिखा है- ‘पूंगी अपने समग्र प्रभाव में एक बेधक और मारक व्यंग्य होते हुए भी अपनी रोचकता आख्यानात्मकता के बल पर कहानी के शिल्प में बुलाकी शर्मा की गहरी पकड़ का साक्ष्य है। बुलाकी शर्मा की राजस्थानी रचनाएं पढ़ते हुए रूसी कथाशिल्पी अंतोन चेखव और हिंदी के कालजयी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई याद आते हैं तो उसका कारण यही है कि विडम्बना या ‘आयरनी’ की पहचान और उसके रचाव का प्रत्यक्ष विकास बुलाकी शर्मा छोटे-छोटे आख्यानों के जरिये सामने रखते हैं।’
‘इज्जत में इजाफो’ में राजस्थानी भाषा, साहित्य और साहित्यकारों पर व्यंग्य लिखे गए हैं। बुलाकी शर्मा के लेखन-संसार में किसी को कोई माफी नहीं है वह भले वे खुद हों या अन्य कोई। ‘थे चिंता करो’ में राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मसले को लेखक ने तटस्थता से देखा है और जहां कमियां और न्यूनताएं हैं उन पर बेबाकी से जैसे अपना मत भी प्रस्तुत किया है। यह सारी चिंता और चिंतन व्यंग्य के स्तर पर उनका अपनी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम ही है। ‘सियाळो अर साहित्यकार’, ‘गुपतज्ञान’, ‘टाळवीं रचना भेजूं !’ अथवा ‘साहित्य सूं सरोकार’ व्यंग्य हों, वे अपने और समकालीन लेखकों की प्रवृत्तियों को जिस भाषा में एक एक कर उधेडऩा आरंभ करते हैं, वह देखते ही बनता है। व्यंग्य ‘सियाळो अर साहित्यकार’ की इस पंक्ति को देखें- ‘अबकी तो थांरी लाऊ-झाऊ टक्कर में है।  लागै बाजी मार लेसी।’ एक लेखक दूजै रै काळजै रो ऑपरेशन करर साची बात काढण सारू मिठास री सूंघणी सुंघावै।
यहां बुलाकी शर्मा का भाषिक चमत्कार है कि वे पुस्तक का नाम लाऊ-झाऊ और फिर आगे पांगळी जैसे प्रस्तुत करते हुए प्रवृत्ति की सांकेतिकता को जोड़ देते हैं। एक लेखक ने दूसरे लेखक के कलेजे से सच निकालने के लिए मिठास की सूंघनी और ऑपरेशन जैसे घटक व्यंग्य की मूल व्यंजना को जैसे द्विगुणित कर देते हैं। उनकी अन्य व्यंग्य रचनाओं में गुरु-टीचर, पुरातन-नवीन संस्कार, भक्ति-दर्शन-पुराण आदि के साथ बुद्धिजीवियों का चिंतन भी केंद्र में रहा है।
संपादक-कवि नागराज शर्मा सच ही कहते है- बुलाकी शर्मा व्यंग्य विधा के महारथी, राजस्थानी के सारथी और मानव-मनोविज्ञान के पारखी हैं।
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26 जून, 2017

राजस्थानी भाषा और उसका समकालीन साहित्य

डॉ. नीरज दइया
    भविष्यवक्ता भले आने वाले कल के बारे में सकारात्मक अथवा नकारात्मक बातें करते रहें। लोग उन्हें सच-झूठ मानते रहें। किंतु यह सत्य है कि भविष्य में जो भी घटित होता है, वह हमारे वर्तमान का परिणाम होता है। वैसे हमारा वर्तमान भी हमारे बीते कल का परिणाम है। हम भूतकाल से सबक सीखते हुए अपने वर्तमान को गढ़ते हुए भविष्य को संवरते हैं। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य के बारे में बात करते हुए हमें इतिहास के कई पन्ने पलटने होंगे। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य आज जिस मुकाम पर है उस पर चर्चा होनी चाहिए। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी भाषा और साहित्य को साहित्यिक मान्यता वर्ष 1974 में प्रदान हो चुकी। आज राजस्थानी भाषा और साहित्य विषय के रूप में उच्च माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जा रहा है। राजस्थानी साहित्य के विषय में पहले हिंदी माध्यम से शोध किए जाते थे अब राजस्थानी माध्यम भी स्वीकृत किया जा चुका।
    देश के सभी शिक्षाविद और ‘हिंद स्वराज’ भी नई तालीम बच्चों को उनकी मातृभाषा में दिए जाने पर बल देती है। ‘इंडियन ओपिनियन’ पत्रिका में 19-8-1910 अंक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रकाशित लेख ‘शिक्षा का माध्यम क्या हो?’ में लिखा गया है– ‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृति पाई जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता, अर्थात परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धान्त को भूल जाने का खतरा मोल ले रहे हैं।’ मातृभाषा के महत्त्व को लेकर वे अनेक स्थलों पर हमें जागृत करते रहे। मसलन फरवरी, 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा– ‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। ….. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा। हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझ से यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्त किए ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार से उठ जाना ही अच्छा है। …… यदि पिछले पचास वर्षों में हमें देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती, तो आज हम किस स्थिति में होते! हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’
    समकालीन साहित्य के रचनाकारों की शिक्षा गांधीजी ने जो संकेत दिया ‘देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती’ यानी राजस्थानी में दी गई होती तो विकास की दूसरी तश्वीर सामने होती। यह साधारण बात नहीं है कि ‘राजस्थानी’ भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं है, और यहां की बड़ी त्रासदी यह भी है कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिंदी-अंग्रेजी है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति की जड़ों से कटते इस समाज की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है। जब कि राजस्थानी समाज का ऋण पूरे हिंदी भाषा-साहित्य और देश के निर्माण में सर्वविदित है। हमारा हिंदी साहित्य राजस्थानी भाषा-साहित्य की नींव पर व्यवस्थित हुआ है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं कि बिना राजस्थानी के हिंदी आधी-अधूरी है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को जिन रचनाओं के आधार पर वीरगाथाकाल नाम दिया, वे अधिकांश राजस्थानी की हैं। हम शेष रचनाओं को यदि छोड़ भी दें तो एकमात्र ‘पृथ्वीराज रासो’ के बल पर राजस्थानी भाषा-साहित्य की प्राचीनता, विशालता और विविधता के विषय में कोई संशय नहीं होना चाहिए है। भक्ति काल में मीरा पदावली और वेलि क्रिसन रूकमणी भी राजस्थानी भाषा-साहित्य के पक्ष में अकाट्य प्रमाण है। इसके अतिरिक्त भी अनेक अप्रकाशित, प्रकाशित रचनाएं इस संदर्भ में उल्लेखित की जा सकती है।
    डिंगळ की श्रेष्ठ रचनाओं में पृथ्वीराज राठौड़ जिन्हें पीथळ कहा जाता था की कृति ‘वेलि क्रिसन रूकमणी री’ के प्रसंग की चर्चा में ‘मुंहणोत नैणसी की ख्यात’ में भी उल्लेख मिलता है। पीथळ और अकबर के संबंधों को इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘पीथल सूं मजलिस गई, तानसेन सूं राग,/ रीझ बोल हंस खेलबो, गयो बीरबल साथ।’ डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा-साहित्य के विषय में बहुत कार्य किया वह और प्राचीन पांडुलिपियां यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि राजस्थानी भाषा-साहित्य का गौरवमयी अतीत रहा है। जैन साहित्य और विभिन्न संप्रदायों के साहित्य का आकलन भी राजस्थानी के पक्ष में जाता है। राजस्थानी के एक विद्वान ने आदि राजस्थानी की संकल्पना को वैदिक साहित्य से जोड़ते हुए अनेक प्रमाणों का उल्लेख किया है। इतना सब कुछ होने के बाद भी राजस्थानी को हम हिंदी की उपभाषा और बोली के रूप में पढ़ते आए हैं।
    आज राजस्थानी एक संपूर्ण भाषा है। अपनी भाषाई मान्यता के विषय में राजस्थानी के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भाषा वैज्ञानिक आधार पर इसे मान्यता मिलनी चाहिए। देश हित और हिंदी हित की बात करते हुए जिन्हें हिन्दी के चिन्दी-चिन्दी होने की चिंता है, उन्हें इसके इतिहास को भी जानना चाहिए। हिंदी प्रदेशों की हिंदी बोलियों के विषय में मतभेद हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि राजस्थान के एकीकरण के समय राजस्थानी ने देश हित में हिंदी के पक्ष में अपना बलिदान दिया है। आज हिंदी इतनी मजबूत और वैश्विक भाषा है कि प्रत्येक राजस्थानी इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हुए भी अगर राजस्थानी मातृभाषा की मांग जायज नहीं है, तो हिंदी समर्थकों को सभी मातृभाषाओं का विरोध करना चाहिए। संविधान में जिन भाषाओं को पूर्व में आठवीं अनुसूचि में शामिल किया गया है वे मानक यदि आज भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाएं पूरे करती हैं तो उन्हें भी जोड़ा जाना तर्कसंगत होगा अन्यथा पूर्व में जोड़ी गई भाषाओं को भी हिंदी के हित के मुद्दे पर पृथक कर दिया जाना न्याय संगत होगा?
    रवीन्द्रनाथ टैगोर, पं. मदन मोहन मालवीय, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, डॉ. एल.पी. टैसीटोरी, डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्जी, राहुल सांकृत्यायन, झवेरचंद मेघाणी, काका कालेलकर से लेकर कन्हैयालाल सेठिया जैसे विद्वान राजस्थानी को एक स्वतंत्र तथा बड़े समुदाय की समृद्ध भाषा मानते रहे हैं। राजस्थानी की अपनी खुद की बोलियां हैं। किसी भी भाषा का शृंगार बोलिया हुआ करती हैं। अंगेजी राज के विरूद्ध आवाज उठाने वाला कवि राजस्थान का राजस्थानी भाषा का है। याद करें 1857 के जन विद्रोह को जिस पर राजस्थानी कवि बांकीदास की पंक्तियां- ‘आयौं इंगरेज मूलक रै ऊपर, आहंस खेंची लीधां उरां...’ ऐसे अनेक प्रमाण है जिससे राजस्थानी भाषा के रूप प्रतिष्ठित होती है। राजस्थानी भाषा की मान्यता का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास राजस्थान सरकार द्वारा वर्षों हुए भिजवाया जा चुका है।
    राष्ट्रीय भावना में अपनी आन, बान और शान के लिए विख्यात राजस्थान का यह अद्भुत साहस और धैर्य है कि वह राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत है। राजस्थानी को गांधी जैसा कोई सपूत नहीं मिला जिसने अपनी मातृभाषा गुजराती को एक संबल दिया और आज गुजराती देश की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। राजस्थानी की लिपि देवनागरी होने की बात करने वाले वाले मराठी और नेपाली अथवा संस्कृत के विषय में कोई संदेह क्यों नहीं करते हैं। दूसरी तरफ यह भी त्रासदी है कि यदि राजस्थानी का अपना स्वतंत्र अस्थित्व नहीं है तो हिंदी के समानांतर इसे प्रयुक्त किए जाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है।
    समकालीन राजस्थानी के विषय में कहा जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में राजस्थानी को पृथक कर यदि साहित्य की बात की जाएगी तो हमें बहुत सी विशेषताओं से वंचित होना पड़ेगा। राजस्थानी के समृद्ध लोक साहित्य और सांस्कृतिक वैभव से लकदक आधुनिक साहित्य की इस पूरी यात्रा में अनेक मुकाम है। यहां यह भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि बिना राजकीय संरक्षण केवल लेखकीय उत्साह और मातृभाषा के प्रति अपरिमित प्रेम का यह उदाहरण है कि राजस्थानी का समकालीन साहित्य ध्यानाकर्षण का विषय है। यहां कुछ विधाओं पर संक्षेप में चर्चा करने से पूर्व स्पष्ट करना होगा कि इस आकलन में अनेक रचनाएं और रचनाकार स्थानाभाव और तत्काल स्मरण में नहीं आ पाने से रह जाते हैं तो उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता। उनका अपना महत्त्व और अवदान भी उल्लेखनीय है और रहेगा।
    राजस्थानी का प्राचीन गद्य साहित्य ही भारतीय भाषाओं में गद्य साहित्य का प्राचीनतम प्रमाण है। आधुनिक काल में गद्य का पहला प्रारूप सूर्यमल्ल मीसण की रचना ‘वंश भास्कर’ में देखा जा सकता है। साहित्य अकादेमी ने इस विशालकाय ग्रंथ का प्रकाशन भी किया है। कुछ गद्य की विधाओं और कविता की चर्चा यहां अपेक्षित है।   

उपन्यास
गद्य साहित्य की विधाओं में उपन्यास का महत्त्व सर्वविदित है। शिवचंद्र भरतिया के ‘कनक-सुंदर’ (1903) से आरंभ हुई इस यात्रा में श्रीनारायण अग्रवाल का ‘चम्पा’ (1925) और श्रीलाल नथमल जोशी का ‘आभै पटकी’ (1956) उपन्यास के आरंभिक रूप को दर्शाते हैं। अब तक सौ से अधिक उपन्यासों का प्रकाशन राजस्थानी में हो चुका है। मेवै रा रूंख (अन्नाराम ‘सुदामा’), उड जा रे सुआ (शांति भारद्वाज ‘राकेश’), घराणो (अब्दुल वहीद ‘कमल’), सांम्ही खुलतौ मारग (नंद भारद्वाज), जूण–जातरा (अतुल कनक), गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) आदि अनेक अनेक उपन्यास चर्चित रहे हैं। नंद भारद्वाज, अन्नाराम सुदामा और यादवेंद्र शर्मा आदि के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। अन्नाराम सुदामा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, बी. एल. माली ‘अशांत’, पारस अरोड़ा, करणीदान बारहठ, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, मधु आचार्य ‘आशावादी’ और नवनीत पाण्डे आदि अनेक राजस्थानी के चर्चित उपन्यासकार हैं।

कहानी
आधुनिक राजस्थानी कहानी भारतीय भाषाओं में अपना विशेष स्थान रखती है। लोककथा और बात से आरंभ हुई आधुनिक कहानी के विकास की बात करें तो शिवचंद्र भरतिया राजस्थानी के पहले आधुनिक कहानीकार कहे जाते हैं। आपकी कहानी ‘विश्रांत प्रवासी’ (1904) से आरंभ हुई इस यात्रा में गुलाबचंद नागौरी, मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’, नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, बैजनाथ पंवार, रामेश्वरदयाल श्रीमाली, अन्नाराम सुदामा,  सांवर दइया अर यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ तक पहुंचते पहुंचते कहानी ने भारतीय भाषाओं में अपना विशिष्ठ स्थान बना लिया है। विजयदान देथा ने जन जन में बिखरी लोककथाओं के लिपिवद्ध कर संकलित किया वहीं आगे चलकर लोककथाओं को अपने शिल्प में ढालते हुए साहित्यिक स्वरूप भी दिया। उल्लेखनीय है कि बिज्जी की ख्याति लोककथाओं के लिए है। चश्मदीठ गवाह (मूलचंद ‘प्राणेश’), जमारो (यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’), अधूरा सुपना (नृसिंह राजपुरोहित), एक दुनिया म्हारी (सांवर दइया), माटी री महक (करणीदान बारहठ), मरदजात अर दूजी कहाणियां (बुलाकी शर्मा) और सुन्दर नैण सुधा (रामपाल सिंह राजपुरोहित) जैसे कहानी संग्रहों से कहानी का विकास देखा जा सकता है। कहानी के इस विकास में रामेश्वरदयाल श्रीमाली, मनोहरसिंह राठौड़, भंवरलाल भ्रमर, मोहन आलोक, मदन सैनी, सत्यनारायण सोनी, रामस्वरूप किसान, दिनेश पांचाल, मीठेश निर्मोही, देवकिशन राजपुरोहित, माधव नागदा, नंद भारद्वाज, मंगत बादल, मधु आचार्य ‘आशावादी’, मनोज स्वामी, कन्हैयालाल भाटी, निशांत, नवनीत पाण्डे, मदनगोपाल लढ़ा, राजेन्द्र जोशी आदि अनेक कहानीकारों का भी योगदान रहा है। महिला कहाणीकारों में लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, आनंदकौर व्यास, प्रकाश अमरावत, पुष्पलता कश्यप, कुसुम मेघवाळ और डॉ. जेबा रसीद आदि के नाम उल्लेखनीय है। पच्चीस राजस्थानी कहानीकारों की कहानी कला के हवाले से समकालीन राजस्थानी कहानी की दशा-दिशा को आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ (नीरज दइया) से देखा-समझा जा सकता है।

नाटक
राजस्थानी के आधुनिक नाटकों की जड़े लोकनाट्यां से पोषित हुई है। आधुनिक उपन्यास-कहानी की भांति नाटक के आरंभ का भी श्रेय शिवचंद्र भरतिया के नाटक ‘केसर विलास’ को है। भगवती प्रसाद दारूका और नारायण अग्रवाल आदि ने भी इस कालखंड में अनेक नाटक लिखे। भरत व्यास, सूर्यकरण पारीक, आज्ञाचंद्र भंडारी, गिरधारी लाल शास्त्री, बद्रीप्रसाद पंचोली, अर्जुनदेव चारण, निर्मोही व्यास, लक्ष्मीनारायण रंगा और ज्योतिपुंज आदि राजस्थानी के चर्चित नाटककार हैं। ‘धरमजुद्ध’ (अर्जुनदेव चारण) और ‘कंकू कबंध’ (ज्योतिपुंज) जैसे नाटक अपने रंगप्रयोग द्वारा सराहनीय माने जाते हैं।

कविता

राजस्थानी कविता के आधुनिक काल में समकालीन कविता तक कविता के पहुंचने के अनेक पड़ाव देखे जा सकते हैं। जागरण काल के कवियों में सूर्यमल्ल मीसण, बांकीदास, शंकरदान सामौर, ऊमरदान लाळस, महाराज चतुरसिंह अर केसरीसिंह बारहठ आदि प्रमुख कवि हुए, जिन्होंने अपनी कविता को जन-जागरण का हथियार बनाया। आजादी की अलख जगाने वाले कवियों में सूर्यमल्ल मीसण की ‘वीर सतसई’ का यह दोहा मातृभूमि पर कुर्बान होने का संदेश आज भी देता है- ‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। / पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’ यह वीर भूमि राजस्थान के सांस्कृति गौरव का प्रमाण है कि अनेक वीरों ने मातृभूमि के लिए यहां प्राण होम दिए तो स्त्रियों की अस्मिता का जोहर भी इसी धरा पर हुआ।
    आजादी के बाद कवि गणेशलाल व्यास ‘उस्ताद’, सत्यप्रकाश जोशी, कन्हैयालाल सेठिया, गिरधारी सिंह पड़िहार, चंद्रसिंह बिरकाळी, मेघराज ‘मुकुल’, रेवतदान चारण आदि अनेक कवियों की कविताओं में शिल्प और कथ्य की नवीनता मिलती है। ‘लोग कैवै सोने रो सूरज ऊग्यो, पण कठै गयो प्रकाश’ जैसी पंक्तियां लिखने वाले गणेशीलाल व्यास की कविता यात्रा में आजादी से पूर्व और पश्चात की मनःस्थितियों को देखा जा सकता है। राजस्थानी में प्रकृति काव्य के अंतर्गत मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंधों की अभिव्यंजना विविध रूपों में कवि चंद्रसिंह बिरकाली ने ‘बादळी’ और ‘लू’ के माध्यम से की, जिसे पर्याप्त ख्याति मिली है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ तक ने बिरकाली की रचनात्मकता की सराहना की। उदाहरण के लिए यह दोहा देखें- ‘नहीं नदी नाळा अठै, नहीं सरवर सरसाय। / अेक आसरो बादळी, मरु सूकी मत जाय॥’ कवि ने ‘लू’ में यहां की प्राकृतिक विड़रूपता को वाणी दी- ‘काची कूंपळ, फूल-फळ, फूटी सा वणराय। / वाड़ी भरी वसंत री, लूटी लूवां आय॥’ प्रकृति काव्य धारा में नानूराम संस्कर्ता की ‘कळायण’, नारायणसिंह भाटी की ‘सांझ’, सुमेरसिंह शेखावत की ‘मेघमाळ’, उदयवीर शर्मा की ‘सूंटो’ और कल्याणसिंह राजावत की ‘परभाती’ आदि रचनाओं का विशेष महत्त्व है। कवि कन्हैयालाल सेठिया, रेंवतदान चारण आदि अनेक कवियों ने आधुनिक काल में प्रकृति के विविध रूपों को अपनी कविताओं में चित्रित किया। विख्यात कवि कन्हैयालाल सेठिया जीवन पर्यंत राजस्थानी भाषा की मान्यता का स्वर लिए कविता में सक्रिय रहे। आपकी कविताओं में गहन चिंतन और दर्शनिकता राजस्थानी कविता की थाती है। कविता के विषय में सेठियाजी ने लिखा- ‘भाषा री खिमता नै / तोलणै री ताकड़ी है कविता / सबदां रै भारै में / चन्नण री लाकड़ी है कविता।’
    राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अंतर्गत मंचीय कविता और सुरीले गीतों का योगदान रहा। मेघराज मुकुल की ‘सेनाणी’ को हिंदी कविता के बीच राजस्थानी कविता के रूप में पर्याप्त ख्याति मिली। वहीं कन्हैयालाल सेठिया की- ‘आ धरती गोरा धोरां री, / आ धरती मीठा मोरां री। / ईं धरती रो रुतबो ऊंचो, / आ बात कवै कूंचो-कूंचो॥’ ने राजस्थान के गौरव का गुणगान किया। इस धारा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में रेवतदान चारण, नारायणसिंह भाटी, रघुराजसिंह हाड़ा, गिरधारीसिंह पडिहार, भीम पांडिया, कल्याणसिंह राजावत, मोहम्मद सदीक, कानदान कल्पित, ताऊ शेखावाटी, भागीरथसिंह भाग्य आदि अनेक कवियों के नाम जुड़ते गए।
    ऐतिहासिक मिथकों को कविता में प्रयुक्त कर समकालीन व्यंजनाओं के लिए ‘बोल भारमली’ (सत्यप्रकाश जोशी) चर्चित कृति रही तो नवगीत के लिए ‘ग–गीत’ (मोहन आलोक) को विशेष ख्याति मिली। कवि मोहन आलोक ने राजस्थानी में लिकरिक छंद के अतिरिक्त सॉनेट भी लिखें जिन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। सांवर दइया हाईकू और गजल में प्रयोग के साथ अपनी लघु कविताओं के लिए याद किए जाते हैं। कवि अर्जुनदेव चारण ने पौराणिक चरित्रों को लेकर लंबी कविताएं लिखी हैं, जिनमें स्त्रियों के चरित्र में नई व्यंजनाओं की पड़ताल करने का उल्लेखनीय कार्य हुआ है। म्हारी कवितावां (प्रेमजी प्रेम), म्हारो गांव (रामेश्वर दयाल श्रीमाली), अणहद नाद (भगवतीलाल व्यास), आंख हींयै रा हरियल सपना (आईदान सिंह भाटी), आंथ्‍योई नहीं दिन हाल (अम्बिकादत्‍त), मीरां (मंगत बादल) आदि अनेक कविता संग्रह राजस्थानी कविता यात्रा के विविध स्वरों को विकसित करते हुए भारतीय कविता के प्रंगाण में राजस्थानी कविता के लिए पर्याप्त स्थान के अधिकारी हैं। आधुनिक कविता परंपरा में अनेक कवियों और स्वरों का योगदान रहा है जिससे समकालीन कविता की जमीन निर्मित हुई। 
     यहां संक्षेप में कुछ ही विधाओं पर चर्चा हुई है। राजस्थानी साहित्य में अन्य विधाओं में भी खूब कार्य हुआ है एवं अनुवाद के अंतर्गत कई विधाओं की अनेक रचनाओं के परस्पर अनुवाद से भारतीय साहित्य का एक व्यापक वितान सामने आता है। गर्व से कहा जा सकता है कि राजस्थानी साहित्य भारतीय साहित्य परंपरा में अपना अलहदा स्थान रखता है। इस छोटी सी साहित्यिक झांकी में अनेक विधाओं और रचनाकारों का उल्लेख समाहित नहीं है। यहां केवल राजस्थानी भाषा और साहित्य के विषय में इस प्रस्तावना से यह विश्वास है कि राजस्थानी भाषा को मान देने के हमारे आग्रह पर आपकी सहमति साथ जुड़ेगी। आप सभी साहित्य के गुणीजनों से यह अपेक्षा है कि हिंदी के विकास और उत्थान में राजस्थानी भाषा को मान्यता प्रदान की जाती है तो इसके अनेक पक्ष प्रकाश में आ सकेंगे। इन सभी पक्षों से अंततः भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य का विकास होगा। समकालीन साहित्य में युवा पीढ़ी को मान्यता के लिए संघर्ष करना नहीं पड़ेगा तो ऊर्जा सृजन में लगेगी और निश्चय ही भारतीय साहित्य में युवा साहित्य के अंतर्गत अन्य भाषाओं के साथ राजस्थानी का विशिष्ट अवदान रेखांकित किया जा सकेगा। समकालीन युवा साहित्य के पोषण से भविष्य के साहित्य का निर्माण संभव है।
००००

हेलमेट पर निबंध

    कल नासिक महाराष्ट्र से फन्नेखांजी का फोन आया। दुआ-सलाम के बाद उन्होंने अपनी समस्या रखी- एक अच्छा-सा निबंध हेलमेट पर लिख दूं। मैं उनकी इस अदनी सी फरमाइस से हैरान हुआ। पहले तो भाषा का गणित समझा कि वे हेलमेट पर निबंध लिखवाना चाहते हैं, या विषय हेलमेट निबंध का रखा गया है। जिज्ञास मनुष्य की सहजता को छीन लेती है। मेरी जिज्ञासा के रहते मैंने उनसे सवाल-जबाब किए। पूछा- क्या कोई निबंध प्रतियोगिता है? कहां है? कौन करवा रहा है? यह भी कि क्या बोगस सा विषय है, किसने दिया है। ऐसे सारे सवालों के जबाब जानकर पूरी कहानी समझ आई।
    नासिक पुलिस ने ‘हेलमेट’ न पहनने वाले लोगों से सड़क सुरक्षा सप्ताह में एक प्रयोग आरंभ किया। वहां के पुलिस आयुक्त ने टैफिक पुलिस और आर.टी.ओ. के साथ मिलकर एक अनोखी कार्रवाही अंजाम दी। जिसकी वजह से मुंबई के लोग हेलमेट निबंध का गीत गले में लटकाए घूम रहे हैं। बिना हेलमेट के बाइक सवारों को रोक कर कागज, पेन देकर और सीट पर बैठा दिया जाता है। उन की भाषा में निबंध ज्ञान टंटोला जाता है। जिनको निबंध लिखने अथवा बैठ कर इस परीक्षा में हेलमेट पर विचार प्रस्तुत करने में आपत्ति है, उनके लिए पांच सौ रुपए का फाइन रखा गया है।
    हेलमेट पर निबंध लिखने से पांच सौ रुपए बच सकते हैं। इस अनोखी प्रणाली का परिणाम फन्नेखांजी ने बताया कि करीब सवा हजार लोगों ने अपने जरूरी काम को दरकिनार कर निबंध लिखना स्वीकार किया। पांच सौ रुपये से अरुचि भी रुचि बन जाए तो क्या हर्ज है? वहीं कुछ लोग अचंभे में और कई हंसी-खुशी में पुलिस द्वारा उपलब्ध कार्रवाही हेतु कुर्सी-टेबल पर बैठ गए। सवा हजार में से केवल दर्जनभर लोग ऐसे मिले जिन्हें यह कार्रवाही बेकारी लगी।
    आखिरी विकल्प के रूप में चालान काटने को इतेमाल करने वाला यह तरीका वर्तमान परिस्थितों में एकदम माकू ल है। लोगों को भविष्यफल की पर्चियां भी दी जा रही है, जिसमें कुल मिलाकर हेलमेट लगाने की प्रेरणा ही आधार है। हमारे फन्नेखांजी की समस्या यह है कि वे तो अब से हेलमेट लगा कर सफर करेंगे, पर उनके साहेबजादे हेलमेल लगना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि हेयर-स्टाइल बिगड़ जाता है। ऐसे में जाहिर है कि उन्हें जब पकड़ा जाएगा, तो उन्हें फाइन भरना पड़ेगा अथवा निबंध लिखना पड़ेगा। दोनों ही स्थितियां उनके लिए दुखद है। एक तो जेब में रुपए नहीं हो तो क्या करें! फाइन क्या हर रोज भरा करेंगे! रोज रोज फाइन भी कहां से लाएंगे! वे निबंध लेखन में भी जरा तंग हाथ रखते है, लिखने बैठेंगे तो सोचते-सोचते शाम कर देंगे। इसलिए निबंध की नकल जेब में पहले से रख दी जाएगी। ऐसे बात बन सकती है। ऐसे में इस जनसेवा का इतना महत्त्वपूर्ण कार्य मुझे सौंपा गया।
    मैं निबंध लिखने बैठा तो सोचाने लगा- क्या लिखूं, कैसे लिखूं? यह विषय पहले से किसी किताब या गाइड में नहीं मिला, तो मेरी समस्या बढ़ गई। पंच काका की सलाह सदा कारगार होती है। मैंने काका को पूरी स्टोरी खुल कर सुना दी, तो पंच काका बोले- ‘हमारे समय के आठवी पास लड़के-लड़कियां आज के बी.ए.-एम.ए. पास लड़के-लड़कियों से अधिक होशियार होते थे। यहां असल समस्या निबंध लिखने की नहीं, नियम मानने-मनवाने की है। उन्हें बोलो- निबंध के चोंचलों को छोड़ कर, हेलमेल पहन कर सफर सुरक्षित करें।’   
० नीरज दइया

24 जून, 2017

राजस्थानी कविता / अर्जुनदेव चारण / अनुवाद : नीरज दइया

अर्जुनदेव चारण
उमादे  

मारवाड़ में रूठी रानी नाम से विख्यात उमादे जैसलमेर के राजा की पुत्री थी- उसका विवाह जोधपुर के राजा मालदेव से हुआ। विवाह के समय ही जैसलमेर के राजा मालदेव को मारने का षड्यंत्र किया, किंतु मालदेव को पहले ही षड्यंत्र की भनक लग जाती है और वह अपनी चतुराई से बच जाता है। विवाहोपरांत जब पहली रात मालदेव रानी उमादे से मिलने उसके महल पहुंचता है तब वह शृंगार कर रही होती है। राजा को आया देख उमादे अपनी सखी भारमल को कहती है कि मैं जितने तैयार हो कर आती हूं तुम राजाजी की खातरदारी करना। भारमली राजा मालदेव की आवभगत करती है- वह उनको शराब देती है। मालदेव शराब पीते-पीते भारमल को अपनी गोद में बिठा कर शराब पिलाने लगता है। ऐसे समय में उमादे वहां पहुंचती है- वह दृश्य देख उमादे क्रोधित हो जाती है और दीपक को ठोकर से बुझा कर वहां से वापस चली जाती है। उसके बाद वह जब तक जिंदा रही मालदेव से अनबन रखी और रूठी रानी के नाम से विख्यात हुई। वह मालदेव की पहली रानी से उत्पन पुत्र राम को गोद लेती है और जिंदा रही तब तक उसके साथ रही। अपने पहले पुत्र राम को मालदेव ने जोधपुर से निष्कासित कर दिया तो उसके ससुराल वाले उसे “कीरवै” की जागीर दे देते हैं। ताजिंदगी अपने पति से संवादहीनता के उपरांत उमादे को जब मालदेव की मृत्यु का समाचार मिलता है तब वह सती होती है। सती होने से पूर्व दुनिया के समक्ष अपनी पीड़ा प्रकट करती है- “औरतों अपने पति से अधिक समय रूठना मत और दूसरे के पैदा किए को गोद मत लेना, वह अपना कभी नहीं होता।“ प्रीत को तरसती रानी की पीड़ा को प्रकट करती हैं ये कविताएं-
 
(1)

 
जिंदगी के आह्वान में
अक्षरों का महत्त्व नहीं है उमादे
महत्त्व है मात्रा का
जिसके बल पर
सृष्टि रचती है
शब्दों का आवरण
और शब्दों के हिस्से में है-
उनका लघु या गुरु होना।
वह मात्रा ही होती है उमादे
जो ‘ना’र’ (नाहर) को ‘नार’ (नारी) बना कर 

                  
छीन लेती है नाखून और दांत।
किंतु इसमें भी
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है
वह आधी मात्रा
जो सभी अक्षरों के अर्थ
कर देती है परिवर्तित
और उसी के बल पर
बदल जाते हैं-
अपनी जिंदगी के अर्थ।

तुम
सभी वर्णों को कर वशीभूत
करती रही जद्दोजहद
जिंदगी जीने की
परंतु वह आधी मात्रा
सदैव तुम्हारी पकड़ से बाहर
कोसों दूर खड़ी हंसती रही।
‘पीव’ और ‘प्रीत’ में
सिर्फ आधी मात्रा का ही
होता है अंतराल उमादे 


छंद तो इस आधी मात्रा को
बोलते समय अस्तित्वहीन मान नकार देता है
परंतु मनुष्य जीवन में
यह नाकुछ आधी मात्रा
मनों भार लिए स्थिर रहती है।
बड़े-बड़े गढ़पतियों की औकात
दिल्लगी में बिखरा जाती है
यही नाकुछ आधी मात्रा।

‘रीस’ (क्रोध) और ‘रूस’ (रूठना) का
वजन तो बराबर ही होता है
मात्राएं भी होती हैं एक जैसी
लघु-गुरु-लघु
तो फिर
क्यों है इतना अंतर?
रीस मनुष्य को सदैव
लघु से लघूत्तर बना
खड़ी रहती है अकेली,
रूठने के संग
हमेशा दिखाई देती है- मनुहार
छुप्पम-छुपा का खेल खेलती
झुकने को प्रयासरत
करती हुई स्वयं की ही
मान मर्दना/यह आधी मात्रा
अपनी पूरी जिंदगी में
सातों रंगों को
पकड़ने में प्रयासरत रहती।

रीस तो
सिर्फ एक रंग ई जानती है
दूसरों को
स्वयं के पैरो में झुका कर
होती है खुश,
अपने बड़प्पन का
गर्व पोषित करता
यह लाल रंग
कब गहरा हो कर
बन जाता है किरमिचिया
और अंततः
अंधकार से सूत्र जोड़ता
हो जाता है अदृश्य।
फिर ऐसी आंखें
तुमने तुम्हारे चेहरे पर
क्यों चिपका ली?

झुकने का अर्थ
हार नहीं होता है उमादे!


इस आधी मात्रा के समक्ष
समर्पण
हमें सौंप देता है-
संपूर्ण दुनिया का साम्राज्य।
भारमली तुम्हारी सखी
जानती थी यह तथ्य
उसके पास था
इस आधी मात्रा का
अनमोल खजाना।
तुम्हारे ही तो
संग रहती थी वह।
तो फिर क्यों था
इतना फर्क।
वह प्रीत नगर की
नामचीन अमीर बनी
और तुम?
तुम सिर्फ एक मोती की आशा लिए
जीती रही जिंदगी
जिसकी चमक
समय-सागर में
अंततः उतर ही जानी थी।
तुम्हारे हिस्से तो
प्रीत-खजाने से
एक कण भी नहीं आया उमादे,
रानी होने का मद
तुझे ताजिंदगी
प्रीत की सीढ़ियां
चढ़ने से रोकता रहा।

बड़ा होने के लिए
लघुता का भेद जानना
जरूरी होता है जिंदगी में,
जो लघु होने की
जानता है कला
वही हो सकता है विराट
किंतु जब हम
दो लघुओं के मध्य बैठे गुरु को
दे देते हैं उतना सम्मान
तो यही गुरु
हमें लघु से भी लघूत्तर बना कर छोड़ता है।
इतिहास
काफी बार
इसी तरह से
मजाक करता है
मानवता से।
आने वाली पीढ़ियां
जब इस मजाक का
रहस्य समझ लेती हैं
तभी अक्षरों के बाजार में
उन ढाई अक्षरों का
मूल्यांकन हो सकता है।
समर्पण तो
समान अर्पण है
दोनों पक्षों का
इसलिए
दोनों ही पक्ष
आनंद के अंदर
झुके दिखाई देते हैं
तुम इतनी ऐंठ गई
कि झुकना ही भूल गई उमादे।
अपने अंतिम दिनों
तुम्हारे समक्ष खुला
इस आधी मात्रा का अर्थ
औरतों अपने पति से
अधिक समय रूठना मत
चिता चढ़ने से पहले
यही थे तुम्हारे अंतिम शब्द
यह था पूरे जीवन का सार
कि तुम्हें दिखाई दिए
आगामी सातों संसार
और तुम
जाग्रत करना चाहती थी
आने वाली पीढ़ियों को।
तुमने
अनावृत्त कर दिया
दुनिया की आधी आबादी के समक्ष
झूठ के कठोर दरवाजों में बंद
सच का
अनदेखा अक्श
कि यह आधी मात्रा ही
दुनिया की
पूरी आबादी का
मान वर्धन करेगी।
०००

(2)

 
क्या प्रीत से पगी देह
हो जाती है अबोली?
तो फिर
यह रस
रूठने में
और रूठना क्रोध में
क्यों और कैसे हो जाता है परिवर्तित
तुम्हें पहचानते हुए
मैं पहचानना चाहता हूं उमादे।

प्रीत की जबान
किस प्रकार बंद कर देती है द्वार
कि सिर्फ रूठना ही दिखाई देता है
दिखाई देता है क्रोध
परंतु बहुत दूर
छिपी हुई प्रीत
दुनिया को दिखाई क्यों नहीं देती।
क्या हर बार
ऐसे ही
प्रीत को प्रगट करने के लिए
जाग्रत करनी होगी अग्नि
लपटों का रंग तो
प्रीत के रंग से
बेहद अलहदा होता है उमादे
तो फिर
स्वय़ं को पहचान के लिए
तुमने यह रंग क्यों स्वीकारा?
युगों-युग
आने वाली पीढ़ियों को
सुनाने के लिए एक कहानी?
शायद पीढ़ियां
इसी को इसी बहाने
प्रेम-कथा कहकर पहचानेगी?
छल
सिर्फ छलावा है तुम्हारा जीवन उमादे,
पिता का
पति का
सखी का
और गोद लिए
किसी दूसरे के पुत्र का।
प्रीत को स्वीकारने
खड़े होने की जिद
और ऐसी कठोर सजा?

तुम कितनी बार मरती रही
उसी एक जीवन में
बचाए रखने को
अपनी प्रीत को स्वच्छ
तो फिर
छल करने वाली इस दुनिया में
तुमने प्रीत रचने के स्वप्न क्यों देखे?
प्रीत कहां बसती है
संबंधों के उन तंतुओं के मध्य?
किस प्रकार पहुंचती है वह
अपने उस दूसरे स्वरूप तक?
उन तंतुओं को
अपने से दूर
 

विकसित होने की कल्पना करने वाला
हर बार क्यों मारा जाता है बेमौत?
क्या प्रीत इसी प्रकार फैलती है
एक देही से दूसरी देही तक?
वह स्पर्श
उष्मित होता है या राख कर देने वाला?
या कि होता है
हिमालय से भी बड़ा?
इस विशालता को
चेतनावान बनाने के प्रयास करती जिंदगी
प्रीत की अग्नि को
संपूर्ण सृष्टि को
प्रकाशवान करने का स्वप्न देखती है।

फिर ऐसा क्यों हुआ
कि वह विशालता ले बैठी
तुम्हारे अधर
क्यों उसने पकड़ ली
तुम्हारी गर्दन
क्यों उतर आई गहरे
तुम्हारे अंतस तक
अब यह रहस्य
कौन बताएगा?
भारमली?
या कि मालदेव?
पूछें उस दरवाजे से
कि पूछंे उस दीपक से
जिसे तुमने
पैर की ठोकर से बुझाया और
तुम वापस लौट गई।
उस ठोकर की धमक
यह संसार
आज तक सुन रहा है उमादे
तुमने किसकी जिंदगी में
किया अंधेरा?
मालदेव के महलों तो
उसके बाद भी
सदा-सदा रही
जगमगाहट,
जगमगाती ही रही
भारमली
बिना किसी कांकण-डोर
बिना चंवरी-फेरों के भी
वह राज करने को बैठी
गढ़ जोधांण,
और तुम
‘कीरवा’ की सीमाओं में खड़ी
सहलाती रही अपना मान।
घर तो तुम्हारा था उमादे
परन्तु उस एक ठोकर के बल
बिखर गया वह घर।
उस रात्रि
कपाट रंग-महल के
तुम्हीं ने बंद किए थे
परंतु तुम्हारे भाग्य-कपाट के
हमेशा-हमेशा के लिए
लग गए हांे जैसे ताले
जिनकी चाबियां
न मालूम किस अबूझ कुएं में
ले जाकर गिराई उस रात ने
जो तुम्हारी बैरन बन
आई थी।

‘कीरवा’ की सीमाओं से
जोधपुर बहुत दूर था उमादे
परंतु वह हमेशा
तुम्हारे अपनापे
तुम्हारे भरोसे को
ठोकरें मारता हुआ
करता रहा लहूलुहान।

तुम जब कभी
करती थी याद उस रात को
जो छौंकती रही
तुम्हारे क्रोध को
और अबोलेपन की
वह घुलगांठ
अधिक मुश्किल में घिर जाती।
‘कीरवा’ के छोर पर ही तो
बैठा था चारभुजाधारी
प्रीत को मान देने वाला
राधा का, मीरा का
और लाखों लाख अनाथों का नाथ
तो फिर तुम्हें
वह क्यों याद नहीं आया उमादे?
तुम्हारी यादों में तो
बसता था फकत मालदेव
तुमने उसे
जितना खुद से दूर किया
वह उतना ही
बींधता रहा कलेजा तुम्हारा।
प्रीत में
मान-अपमान कहां होता है उमादे?
यदि होता है मान
तो फिर कहां रहती है प्रीत?
प्रीत की सीढ़ियां चढ़ने की
पहली शर्त है
मान को बिठाए रखना
कभी पूछना राधा से
या फिर मीरा से
आभल को पूछ लेती
या फिर पूछती नागवंती को
‘‘सोए खूंटी तान,
बतलाएं, बोलते नहीं।
कभी पड़ेगा काम,
मनुहार करोगे नागजी।’’
प्रीत के पास तो सिर्फ मन होता है
आंखें कहां होती हैं?
वह तो हमेशा जिंदा रहती है
कबंध-शरीर
शायद इसी लिए अंधी कहलाती है।
तुम्हारी जिंदगी की कामना
सहेजना चाहती थी
प्रीत के पुहुपों की
पहली-पहल सुवास
परंतु तुम्हारे हिस्से
किसने डाल दी
कांटों भरी भारी
यदि नहीं होती भारमली
तो कोई दूसरी होती
तुम्हारे जीवन में
दूसरी का योग
ताजिंदगी बना रहता।

अपने क्रोध में
तुम भूल बैठी
कि तुमने ही तो भेजा था उसे
करने खातरदारी अपने पति की,
एक दासी
कैसे करे खातरदारी राजा की?
रानियों का मान
यह बात
क्या नहीं जानती थी?
क्या तुमने जानी कभी
भारमल की पीड़ा?

अपनी पीड़ा का पर्वत
बड़ा और बड़ा करती रही तुम
और सारा दोषारोपण
भारमल के हिस्से मंड दिया।

तुम दोनों छली गईं
अपनी-अपनी जगह
तुम दोनों को तो
मिल कर करना था प्रतिकार
बचाने के लिए खुद की अस्मिता
अपनी पहचान।
शायद इसी से बच जाता
तुम्हारा और उसका
दोनों का मान
और उस मान के खूंटे
तुम बांध देती
भोग की गंदगी में कुलबुलाते
वहां खड़े उस जीव को
जिसने झूठा हाथी बना कर
खड़ा कर दिया था
आसानंद ने तुम्हारी तुलना में।
‘‘मान रखे तो पीव तज,
पीव रखे तज मान।
दो हाथी बंधते नहीं,
एक ही खूंटे-ठान।।’’
झूठा था कवि
पीव और मान
दोनों को हमेशा चाहिए
एक पहनावा
जिसको पहन कर वे धारण करते हैं
अपना-अपना स्वरूप
पिता-भाई-पति
इनके पास होता है
सिर्फ अपने पैरों में
झुकाने का आदेश
इनके हाथों में होती है
नियमों की ताजा बैंत
परंतु
प्रीत कोई नियम नहीं मानती उमादे।
सड़ाक-सड़ाक-सड़ाक के सरड़ाटे
पड़ते रहते कमर पर
वह जमी हुई लील
उन मानधारियों का यश गाती है
तुमने वहां
मान रखने की जिद क्यों की?
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