23 जून, 2017

दाढ़ी रखूं या नहीं

पना निर्णय मैं खुद नहीं ले पाता। मैं जब छोटा था तब भी मेरा यही हाल था और अब जब मैं बड़ा हो गया हूं तब भी मेरा वही हाल है। जो भी मैं करता हूं या जो भी मेरे जीवन में होना होता है वह अपने-आप हो जाता है। मैं खुद कुछ नहीं करता, वैसे जो भी करना होता है, दोस्तों से पूछ लेता हूं। पर पूछना भी किसी समस्या का समाधान नहीं है। क्यों कि हरेक का अपना-अपना नजरिया होता है। लो अब कल की ही बात बताता हूं, मैंने फेसबुक पर मित्रों से पूछा- दाढ़ी रखूं या नहीं? इस छोटे से सवाल के अनेक जबाब आए। किसने क्या जबाब दिए, उन सब नामों को मैं हटा कर मैं आपके समक्ष कुछ मूल उत्तर ही रख देता हूं। एक जैसे उत्तरों को हटा कर यहां कुछ खास ज्ञानियों परम मित्रों के परामर्श को प्राथमिकता दी जा रही है, साथ ही यहां उल्लेखनीय है कि मजाक-मस्ती और स्माइली वगैरह हटा दिए हैं।
- रख लो बहुत सुंदर लगेगी, पर मूंछें भी रखना।
- किस ने कह दिया। ऐसे ही ठीक है।
- जिनको अपनी मर्दानगी पर शक होता है वे दाढ़ी-मूंछें रखते हैं। अब तुम ही सोच लो कि तुम्हें शक है क्या?
- इमरान खान जैसी मूंछे और हल्की दाढ़ी में क्या खूब जमोगे।
- बेवकूफ, तू कहना मान किसी एक्सपर्ट्स से बात कर।
- विटामिन ए, बी, सी और ई की रिच डाइट लें। सब ठीक हो जाएगा।
- फ्रेंच कट का कमाल देखना, सब मुरादें पूरी हो जाएगी।
- चेहरे पर रौबदार मूंछे और सजी संवरी दाढ़ी किसे अच्छी नहीं लगती? तुझे भी अच्छी लगेगी। रख ले, मैंने तो तुझे पहले एक बार बोला भी था।
- एक आम आदमी अपने जीवन के 3500 घंटे सिर्फ दाढ़ी बनाने में व्यतीत कर देता है? टाइम बचाना है तो यही मार्ग उत्तम है।
- केवल दाढ़ी रखना और मूंछे मूंडते रहना।
- सबसे लंबी दाढ़ी का रिकॉर्ड नार्वे के एक व्यक्ति का है। उसकी दाढ़ी 5 मीटर लंबी थी। रिकॉर्ड तोड़ना है क्या?
- ये भी कोई पूछने की बात है। घर की खेती है। जो मन करे कर पुतर।
- अबे यार, तुझे दाढ़ी की क्या जरूरत पड़ गई। अपने पेट को ढंग से देख, तेरे तो पेट में दाढ़ी है।
- दाढ़ी बढ़ाने की वजह से तुम दार्शनिक लग सकते हो। ऋषि-मुनि जैसा लुक मुझे अच्छा लगता है।
- विश्व दाढ़ी और मूंछ प्रतियोगिता में भाग लेने का विचार तो नहीं है तेरा?
- याद नहीं इंडियन एयरफोर्स के एक अधिकारी को सलाह दी गई कि अगर दाढ़ी नहीं रखने दी जाती है तो नौकरी छोड़ दें। क्या तुझे भी अल्लाह का फरमान आया है?
अब आपकी बारी है। आप ही बताएं कि क्या मैं दाढ़ी रखूं या नहीं? आप के मौन का मतलब ना है या ना। मैं अब सारे जबाब लेकर पंच काका के पास चला।
पंच काका ने कहा हैं कि इन सब बातों का एक ही मतलब है। किसी को कोई सवाल मत पूछो। तुम्हारे सवाल का जबाब किसी को नहीं पता है। फेसबुक की बस्ती में तो एक से बड़े एक धुरंधर सलाहकार बैठे हैं। एक चावल मांगोगे तो वे डफोल शंख पूरा ट्रक भर देंगे। बेटा, एक छोटे से सवाल के लिए इतनी माथा-पच्ची करोगे तो फिर जी लिए जिंदगी।
० नीरज दइया


16 जून, 2017

शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस

हने वाले झूठ कहते हैं कि संगत का असर होता है। जब बिहार के चूहों के साथ राजस्थान के चूहों की कोई संगत हुई ही नहीं, फिर बिहारी चूहों की तर्ज पर राजस्थानी चूहे शराब कैसे पीने लगे! काश कि राजस्थान का पड़ौस राज्य बिहार होता, तब संगत भी बात कुछ समझ आती। कोर्ट में वकीलों और न्याय के खेल, वहां के रंग-ढंग निराले है। हमारे सपनों में भी कुछ का कुछ उल्टा-पुल्टा होता रहता है। अभी कल की बात लो, मेरे सपने में मुझे चूहों की पार्टी देखने का सुख मिला। वे आपस में एक दूसरे को पीना-पिलाना कर रहे थे। पार्टी में मैंने देखा कि एक चूहा गीत गा रहा था। गीत भी कौनसा, फिल्म ‘लीडर’ का- ‘मुझे दुनिया वालों, शराबी ना समझो मैं पीता नहीं हूं, पिलाई गई है। जहां बेखुदी में कदम लडखडाए, वो ही राह मुझको दिखाई गई हैं।’ तो एक दूसरे चूहे ने ‘शराबी’ का फिल्म का गीत गाया। यह सच है कि नशा शराब में नहीं होता, अगर होता तो क्या बोलत नाचती नहीं? पीकर पीने वाले नाचते हैं और घरवालों को नचवाते हैं। बाहर पीते हैं तो बाहर वालों को नचवाते हैं।
बिहार में मुख्यमंत्रीजी ने पूर्ण शराबबंदी का फैसला किया तब लाखों लीटर शराब पुलिस ने जब्त की थी। कहते हैं कि करीब नौ लाख लीटर शराब मालखाने में जनता और इंसानों से तो बचा ली, पर कम्बखत इन चूहों का क्या करें.... जिन्होंने इतनी भारी मात्रा में शराब गटका ली। वहां पूरी की पूरी चूहों की बारात इस काम में लगी कि लगभग तेरह महीनों में सवा नौ लाख लीटर अल्कोहल, देशी और विदेशी शराब के क्राईम का माल हजम हो गया। कहने वाले कुछ भी कहें पर सच्चाई यही है कि शराबबंदी फैसले में सबसे अधिक फायदा बिहार के चूहों को हुआ और मुख्यमंत्रीजी ने चूहों के विषय में तो कोई फैसला किया नहीं था।
बात कोई कब तक छुपाएगा। चूहों ने शराब पी और पीकर दौड़े राजस्थान की दिशा में। राजस्थानी भाषा में तो पीने वालों के लिए जुम्ला है- ‘घोड़ै असवार।’ यानी पीया हुआ आदमी घोड़े पर सवार रहता है। वह किसी भी दिशा में गतिशील हो कुछ भी करने की क्षमता रखता है। यह मालला आठ साल पुराना है कि आबकारी निरोधक दल ने एक मकान से बड़ी मात्रा में अल्कोहल जबत की। शराब तस्करी के आरोपी को जब पता चला कि चूहे शराब पी रहे हैं तो उससे रहा नहीं गया, उसने अपने वकील से अदालत में सबूत पेश करने की गुहार की। यह न्याय की मंथर गति है कि जब तक शराब की बोतलें अदालत में पेश होती वे खाली हो चुकी थीं। लिहाजा अदालत के आदेश की पालना हुई और खाली बोतलें पेश की गई।
पुलिस कहीं की हो, यह बात तो पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि डरना उसका काम कभी नहीं रहा है। पुलिस ने सच्चाई जाहिर कर दी कि बोतलों से शराब चूहे पी गए। इसके अलावा शराब की कुछ मात्रा प्राकृतिक कारण से लुप्त हो गई। आबकारी जमादार ने बताया कि बारिश के मौसम में मालखाना में सीलन होने से शराब उड़ जाती है। अदालत ने इन बातों को रिकॉर्ड पर दर्ज कर लिया है।
पंच काका कहते हैं कि भारतीय पुलिस-भर्ती में कोई ऐसी तकनीक को अपनाया जाना चाहिए कि कानून व्यवस्था पुखता रहे और चूहे शराबी नहीं हो। भला चूहों को क्या गम हो गया, जिसे गलत करने के लिए उन्हें पीना-पिलाना पड़े। चूहे हमारी भाषा बोल नहीं सकते। जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे झूठ पकड़ा जा सके। झूठ बोलने वाले की नाक लम्बी होनी चाहिए। हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि नेताओं की नाक लंबी अधिक होती है या पुलिस-वकीलों की।
० नीरज दइया
 

09 जून, 2017

डुबाने और डूबने वाले

ह मेरी सज्जनता है कि वे घर आए तो मैंने उन्हें ससम्मान ड्राइंगरूम में बैठाया और चाय-पानी का ना केवल भी पूछा बल्कि अपनी सज्जानता को पूरा-पूरा बरकरार रखा। यह मेरी सज्जनता का दंड था कि मैं उनकी कविताई सुन रहा था। वे बोले- ‘रहीमन किताब राखिए, बिन किताब सब सुन। साहित्य गए ना ऊबरे, धोती-चोला-खून।’ मैंने सिर पकड़ लिया और मुस्कुरा कर बोला- ‘मैं तो व्यंग्य लिखता हूं। कविता की समझ जरा कम है। आप समझाएं मतलब क्या है?’ उनकी विजयी मुस्कान थी और मैं पराजित सा उनके यातना-शिविर में सिर झुकाएं सुन रहा था।
पहले तो वे मेरी समझ पर सकुचाए और फिर शर्म-संकोच छोड़ कर जैसे मैदान में उतर गए। वे बोले- ‘रहीम मेरा दोस्त है। यहां मैंने रहीम को संबोधित कर के हिंदु-मुस्लिम एकता को पहले ही शब्द में उजागर कर दिया है। रहीम को किताब रखने का कह रहा हूं क्यों कि रहीम मेरा दोस्त है। आप तो जानते ही हैं कि उनके परिवारों में साक्षरता दर कम है। इससे यह भी हो गया कि विकास के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। बिना किताब के सब कुछ सुना तो जा सकता है पर पढ़ना हो तो किताब को सुनना चाहिए। यहां लिखा तो सुन है पर इस सुन में सुना और सुनाओ का भाव भी भरा हुआ है। रहीम को किताब दो और वह किताब से पाठ याद कर के सुनाएगा। हम सब को यह पंक्ति संदेश देती है कि हम सब को रहीम का पाठ सुनना चाहिए। आगे की पंक्ति तो बहुत सरल है। आप जान ही चुके होंगे कि साहित्य में जो डूब गया समझो गया काम से। वह ऊबर नहीं सकता अर्थात साहित्य से कोई आज तक बाहर नहीं आया। अब देखिए मैं लिखने लगा तो लिखता ही गया हूं, क्या मेरा लिखना रुक सकता है। जो एक बार साहित्य का हाथ पकड़ लेता है तो आगे साहित्य ही उसका हाथ पकड़े रखता है।’
मैंने गर्दन हिला कर अपनी सहमति प्रकट की और ‘धोती-चोला-खून’ के विषय में जानने की जिज्ञासा प्रस्तुत की तब वे अपने आनंद को द्विगुणित करते बोले- यहां धोती गांधी का प्रतीक है। मैं खुद को ना तो संभाल सका और ना ही अपने मुख को रोक सका, बोल पड़ा- गांधीजी का प्रतीत यहां कैसे।
उन्होंने शंका का समाधान करते हुए कहा कि पहली बात तो गांधी जी भी चाहते थे कि राम रहीम पढ़े। एक साथ पढ़े। देश में अखंडता और एकता हो। यह धोती वाली बात साहित्य में डूबने वाले ही समझ सकते हैं। चोला और खून प्रतीक है हमारे देश की गरीबी और संघर्ष का। चोला शब्द के आते ही यहां धोती में ओ की मात्रा और चोला में ओ की मात्रा का सुंदर अनुप्रास देखिए और वैसे भी जब धोती है तो चोला भी जरूरी है। क्या कविता में बिना चोले के नग्नता मैं दिखा सकता हूं और वह भी रहीम के सामने! रहीम के घर पढ़ाई के संदेश में चोला हमारी सभ्तता की निशानी है। खून रहीम का और मेरा-आपका सबका एक है।
यह सब तो ठीक था और इतनी त्रासदी मैं झेल गया पर आगे की बात ने मेरे होश उड़ा दिए। वे महान कवि कह रहे थे कि उन्होंने इस रचना को फेसबुक स्टेट डाला और पंच काका ने लिखा- अच्छी कविता, सधि कविता। साधुवाद। आप कविता को बचाए रख रहे हैं, बाकी तो उसे डुबाने की जुगत में लगे हैं। वे सज्जन कह रहे थे कि उन्होंने वैसे तो फेसबुक पर काका का आभार प्रकट कर दिया फिर मन नहीं भरा तो उन्होंने सोचा कि व्यक्तिशः आभार दे दिया जाए और वे चले आए। मैंने उनका आभार लेकर रख लिया और कह दिया कि काका आएंगे तब दे दूंगा आभार। मेरी सज्जनता धोखा दे उससे पहले मैंने उन्हें विदा कर दिया। इस उच्च कोटी की कविता में मुझे डुबाने और डूबने वाले हे पंच काका! माफ करें, आपका व्यंग्य हर कोई समझ नहीं सकता।
० नीरज दइया

02 जून, 2017

वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत !

भूतकाल की कुछ घटनाएं ऐसी होती है कि वे वर्तमान में अपना स्थान भूत बनकर बनाएं रखती हैं। ये घटना भूलाए नहीं भूलती। ये बातें भूत बन कर हम में बसेरा करती है। हमारे और देश के वर्तमान पर छाई रहती है। ये वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत है। पहले के भूत तो बातों से भाग जाते थे। और कुछ भूत लातों से अपना रास्ता लेते थे। पर मैं जिन भूतों की बात बता रहा हूं, उसके लिए बातें और लाते दोनों तरीके विफल हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद टोप लेबल से माननीय मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा हुई। घोषणा के साथ ही उनके अतीत के पन्ने भी अखबारों ने प्रकाशित किए। अतीत के महत्त्वपूर्ण कार्यों में सर्वाधिक प्रभावशाली और उल्लेखनीय बात कि ये भी पहले चाय बेचते थे। चाय बेचना अब कोई सामान्य बात नहीं है। हमारे कुछ नेता जो पहले सब्जी बेचा करते थे और जो कुछ जूते बेचा करते थे, वे सभी अब अपना-अपना परिचय बदल चुके हैं। खासकर यह पंक्ति कि भूतकाल में वे सब्जी अथवा जूते बेचा करते थे। अब इन जैसे शब्दों के स्थान पर सभी ने लिख दिया है कि वे चाय बेचा करते थे। चाय बेचने को राष्ट्रीय कार्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। चाय ऐसा भूत बनकर देश पर छा गई है कि चाय का भूत उतर नहीं सकता है। प्रधान सेवक जी का इतना असर है कि उन्होंने गधे की तारीफ करवाई तो गधे को महत्त्वपूर्ण कर के छोड़ दिया। गधों को देखकर बेचारी जनता द्रवित हो गई है। द्रवित अवस्था होती ही ऐसी है कि उस समय कुछ का कुछ हो जाता है। कुछ खबर नहीं होती और सीधे ही बहुत बड़ी खबर आती है। जनता ने जनमत से सिद्ध कर दिया कि चाय बेचना और गधे की महानता के गीत गाना उसे लुभाता है। गधों का बुरा हाल हो गया है कि उन्हें भी भूत बन कर सब का पीछा पकड़ लेना है। गधे पहले भले प्यारे नहीं लगते थे पर अब तो हम सभी उन सभी को बेहद प्यार करते हैं। गधा छोटा हो या बड़ा, पतला हो या मोटा, गुजरात का हो या उत्तर-प्रदेश अथवा राजस्थान का हो सब के सब प्रमोशन पा गए हैं।
देश की आजादी का मतलब है कि सबको पूरी छूट है। शत प्रतिशत छूट। यानी सब कुछ फ्री। बातें फ्री। घातें फ्री। लातें फ्री। सब कुछ फ्री ही फ्री। शुल्क का तो कोई नाम ही मत लो। कीमती हो गए हैं तो बस चाय और गधे। चाय अब पहले वाली साधारण चाय नहीं रही। अन्य पेय पदार्थों को चाहने वाले और पीने वाले भी अब चाय पीना पसंद करने लगे हैं। ऊंटों और घोड़ों की सवारी करने वाले अब गधों की सवारी करने में अपनी शान समझने लगे हैं। समय समय की बात है। जब से चाय में चमत्कार आया है। लोग केवल चाय की नहीं उसे बेचने वालों की उससे भी अधिक इज्जत करने लगे हैं। कुत्तों से बातें और जी बहलाने वाले अब गधों से जी खोल कर बातें करते हैं। पंच काका कहते है कि भैया गधे का भूत इतना बड़ा बन गया है कि हमारे गांव तक पहुंच गया। पिछले दिनों एक शादी में दुल्हे ने घोड़ी पर बैठने से साफ इंकार कर दिया। कहा कि बैठना ही है तो गधी पर बैठूंगा। अगर गंधी नहीं मंगवा सकते तो मेरे लिए एक कप चाय मंगवा दो। मैं चाय पीकर पैदल चल सकता हूं। दुल्हे की बात भला कौन टालता, उसे चाय पिला कर गधी की सवारी स्वीकृत की गई।
- नीरज दइया
 

01 जून, 2017

वाह, क्या कहने !

“टांय टांय फिस्स” व्यंग्य संग्रह की भूमिका
          डॉ. नीरज दइया के पहले व्यंग्य-संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ को पढ़ते समय मेरे जेहन में जो पहला नाम आया वह आलोक पौराणिक का था। वह इसलिए कि आलोक पौराणिक ने अपने पहले ही व्यंग्य-संग्रह ‘नेकी कर कुएं में डाल’ से हिंदी व्यंग्य संसार में अपनी पुख्ता पहचान बनाली। जिस बात पर पाठकों का सर्वाधिक ध्यान गया वह थी उनके अनुभव की परिपक्वता और समकालीन समय के खुरदरेपन को बारीकी से पकडऩे की तथा उसके भीतरी खोखलेपन को उजागर करने की चकित कर देने वाली वैचारिक दृष्टि। स्पष्ट है कि संग्रह चाहे पहला, दूसरा या पांचवा हो, उसका उतना महत्त्व नहीं है, जितना इस बात का कि व्यंग्यकार कितना संवेदनशील, सजग, सूक्ष्म दृष्टि-सम्पन्न और विचारशील लेखक है तथा समय की विसंगतियों की दुखती रगों पर हाथ रखने में कितना सिद्धहस्त है। आलोक पौराणिक को पहले ही व्यंग्य-संग्रह में इतनी लोकप्रियता मिली, इसके लिए ये सभी आधारभूत कारण ही उत्तरदायी हैं।
          आगे बढऩे से पहले यह भी बता दें कि आलोक पौराणिक के उक्त संग्रह की आलोचना भी हुई थी। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर होने के कारण उनका अधिकांश व्यंग्य उदारीकरण, वैश्विक बाजार, उपभोक्तावाद, ब्रांड नामों के चलन, पेजर, सेल्यूलर, मैक्डोनाल्ड, सुंदरियों के उत्पादन पुरुष ब्यूटी पार्लर, नीम और हल्दी के पेटेंट जैसे विषयों पर ही केंद्रित रहा। इसलिए शेष भारत के विराट विद्रूप को देखने में तथा उसके लिए आवश्यक शैल्पिक सधाव में वे असमर्थ रहे। साथ ही उनमें दोहराव भी अधिक था।
          व्यंग्य के क्षेत्र में जो ताजातरीन नई पीढ़ी (एक प्रकार से चौथी पीढ़ी) सामने आई है, उसमें सुशील सिद्धार्थ, मधुसूदन पाटिल, श्याम हमराही, संतोष खरे, गिरिराज शरण अग्रवाल तथा रमाशंकर श्रीवास्तव आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ. नीरज दइया को मैं इसी चौथी पीढ़ी का एक अत्यंत सफल, सजग, सोद्देश्यपूर्ण और गुणवत्ता से युक्त व्यंग्यकार मानता हूं जिनके पास व्यंग्य की एक प्रखर आलोचना-दृष्टि तथा चिंतन की एक समाजशास्त्रीय विचारधारा है। वे जानते हैं कि व्यंग्य एक संस्कारवान तथा गंभीर लेखक के लिए जिम्मेदारी का काम है। उसमें चलताऊ फार्मूलेबाजी, कैरीकेचर या सामयिक अखबारी टिप्पणियों से काम नहीं चलता। उनका व्यंग्य स्वाभाविक है, गढ़ा हुआ नहीं। उसमें तराश है, तल्खी है और एक प्रकार की कौंध है। वे मात्र छींटाकशी करने या मन की भड़ास निकालने के लिए नहीं लिखते बल्कि जरूरत हो तो एक अच्छे व्यंग्य संग्रह के लिए इंतजार भी कर सकते हैं जैसा कि उन्होंने अब तक किया है। उनका लेखन-कर्म तो 1989 में ही प्रारंभ हो चुका था। कविता, कहानी, लघुकथा, अनुवाद, आलोचना और बाल-साहित्य खूब लिखा और जब देखा व्यंग्य लिखने के लिए उनके पास पर्याप्त कौशल, गंभीर चिंतन, सूक्ष्म-सर्वेक्षण, व्यंजना मूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि और विद्रूपताओं पर चोट करने का निर्भीक साहस है तभी इस अचूक हथियार को काम में लिया।
          डॉ. दइया के प्रस्तुत संग्रह में चालीस आलेख हैं। आलोक पौराणिक की तरह उनका लेखन कोरे अर्थतंत्र तक सीमित नहीं बल्कि उन्होंने इतने अधिक विषयों पर आधिकारिक रूप से व्यंग्य लिखें हैं कि किसी भी पाठक को आश्चर्य हो सकता है। इसके लिए सीमित नहीं, बल्कि एक चौतरफा व्यंग्य दृष्टि की जरूरत होती है। साहित्य से सीधा जुड़ाव होने के कारण साहित्यिक विसंगतियों पर लिखना स्वाभाविक है पर यह उनके व्यंग्य-लेखन का सिर्फ एक तिहाई भाग ही है। साहित्येतर विषयों में आहार (खान-पान), आयुर्वेदिक चिकित्सा, घरेलू उपचार, ई-युग की छाप (ई-होली का हुड़दंग), काला धन, कानून व न्याय, घरों में बेटों-बेटियों में भेद, चापलूसी, दफ्तरी जीवन, ठग विद्या, डिजिटिलाइजेशन, ढोंगी साधुओं के प्रपंच, दाम्पत्य जीवन, नेता, पुलिस व वकीलों का त्रिकोण, नोटबंदी, पर्यावरण, फिल्में, फैशन, बात में बात का समाप्त न होने वाला सिलसिला, बेरोजगारी, माफिया (खनन, भू व साहित्य क्षेत्र के माफिया) मन का मनचलापन, युवा जगत (कुंवारे-कुंवारियों की पसंद-नापसंद), राजनीति, लक्ष्मी की चकाचौंध, विश्वविद्यालयीय सर्वेक्षण, वीआईपी लोगों की भरमार व उनका नियति, शिक्षातंत्र, सामान्य जन की परेशानियां. सोशल मीडिया, साक्षात्कार तथा सेल्फी से सकारात्मक दृष्टि का प्रादुर्भाव आदि। फिर इन विषयों के उपविषय भी हैं। साहित्य से जुड़े एक तिहाई विषयों (कुल 13 व्यंग्य) और उनके भी उपविषयों को जोड़ लिया जाए तो लगभग 100 विषय सामने आते हैं। यह नीरज की मौलिकता और कलात्मक कसावट का ही परिणाम है कि इतने सारे बिंदुओं को उन्होंने जिस कुशलता, ताजगी व रोचकता, भाषा के सहज प्रवाह तथा पाठकों में निरंतर बढ़ती जाने वाली जिज्ञासा व उत्सुकता के साथ निभाया है, वह उन्हें आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों में विशेष प्रतिष्ठा का स्थान देती है।
          उनकी सफलता के ये कुछ निर्णायक बिंदु हैं- आलोचना से उनको सूक्ष्म दृष्टि व पर्यावलोकन, कविता से संवेदना, कहानी से रोचकता व रंजकता, अनुवाद कर्म से शैल्पिक सधाव, संपादन से चयन-दृष्टि तथा बाल-साहित्य से जिज्ञासा के जो भाव मिले, वे ही तो व्यंग्य-लेखन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। फिर उनको एक अतिरिक्त सौभाग्य भी मिला (जो प्रेम जनमेजय जैसे व्यंग्यकारों को भी नहीं मिल पाया था)। अपने जीवन के पहले 24 वर्ष उन्होंने राजस्थानी व हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकार तथा अपने पिता स्वर्गीय सांवर दइया की छत्रछाया में बिताए। व्यंग्य के बीजाणु तो तभी से उनके रक्त में प्रवाहित होने लगे थे। वंशानुक्रम और पारिस्थितिकी के ये बीजाणु जो 1992 में स्व. सांवर दइया के निधन तक आकार ग्रहण करने लगे थे, आज 24 वर्षों बाद यानी सन 2016 के अंत तक इतने पुष्पित और पल्लवित हो चुके हैं कि आज की पीढ़ी के कुछ व्यंग्यकार उनसे ईष्या कर सकते हैं।
          डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है। वे आज के कथित बड़े साहित्यकारों की तरह केवल स्वयं की पुस्तकों को ही नहीं पढ़ते। साहित्य की अनेक विधाओं में रचना करते समय उन्होंने देश-विदेश के लेखकों की पुस्तकें पढ़ी हैं. उन पर चर्चा की है तथा उनकी व्याख्याएं कर के समीक्षाएं लिखीं हैं। इससे उनका ज्ञान-क्षितिज आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों से कुछ अधिक विस्तृत व विश्वसनीय है।
          चालीस व्यंग्य आलेखों में जिन-जिन के उद्धरण, दृष्टांत या नामोल्लेख हैं, उनमें साहित्यकारों में सूर, तुलसी, कबीर, रहीम व मीरां के अलावा रवींद्रनाथ टेगोर, दुष्यंत, धूमिल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद व विजयदान देथा, सिद्धांतकारों में डार्विन, गीतकारों में साहिर लुधयानवी व आनंद बक्सी, फिल्म कलाकारों में राजेश खन्ना, शिल्पा शेट्टी व अभिषेक (कलाकार व निर्देशक उड़ता पंजाब), विदेशी लेखकों में केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के यू चेन, नेताओं में नरेंद्र मोदी व राहुल गांधी, खिलाडिय़ों में सचिन तेंदुलकर व विराट कोहली तो हैं ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध-सर्वेक्षण, स्पेन के शिक्षातंत्र तथा वैवाहिक साइट के सर्वेक्षण आदि उल्लेखनीय हैं।
          व्यंग्य के क्षेत्र में नीरज ने कई नवाचार किए हैं। इनमें से एक है पंच काका नाम के किरदार का सृजन। अन्य व्यंग्यकारों ने भी जरूरत के अनुसार कुछ किरदार खड़े किए पर वे उन्हें विषयानुसार बदलते रहे और कभी-कभी बिना स्थाई किरदार के भी काम चला लिया। ‘टांय टांय फिस्स’ के इस किरदार में बुद्धि-चातुर्य, आलोचना-दृष्टि तो है ही, कहीं-कहीं दुनियादारी से लेकर दुकानदारी तथा रसूकदारी से लेकर ईमानदारी तक के भाव हैं। पंच काका सही नसीहत देते हैं, समन्वय कराते हैं, अनुभव की बातें करते हैं, कभी-कभी मस्ती के मूड में आ जाते हैं तो जाम छलकाने की, चिढ़ जाएं तो ऊंचा उठाकर धड़ाम से नीचे पटकने की तथा खीझ जाएं तो टांय टांय फिस्स तक कर देने की कुव्वत रखते हैं यानी वे व्यंग्य की हर शाखा के प्रतिनिधि किरदार हैं। कुछ उद्धरण देना ठीक रहेगा।
(अ) सही नसीहत (1) ‘‘जुगाड़ू सम्मान में अपने नाम को जोड़कर क्यों खराब करते हो। जो कुछ तुम्हारी गरिमा है, उसे बचाये रखो।’’ (पृष्ठ- 36) (2) ‘‘सबकी देखो, सबकी सुनो पर करो अपने मन की।’’ (पृष्ठ- 52)
(आ) समन्वय (1) ‘‘भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये ‘वि’ का तमगा उतार कर सिम्पल ‘पक्ष’ बन जा। इससे तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा है ही।’’ (पृष्ठ- 24), (2) ‘‘दाम्पत्य जीवन के बारे में पंच काका की सलाह है- ‘ज्यादा भटकने, भटकाने से मन की शांति चली जाती है। तो हे भतीजों-भतीजियों काका की सलाह है- भटकना-भटकाना छोड़ कर कुछ ऐसा हो जो गरिमामय हो। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप हो।’’ (पृष्ठ- 46)
(इ) दुनियादारी (1) ‘‘मीठी आलोचना का मीठा फल। कभी चखा हो तो जानो।’’ (पृष्ठ- 22), (2) ‘‘हां, अब जब कोई दूसरा लेखक मिले, उसे उसके सामने बड़ा लेखक बताते रहना। तुम्हारी दुकानदारी चलती रहेगी। समझ गए न।’’ (पृष्ठ- 28)
(ई) व्यंग्य (1) ‘‘प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया तो परेशानी किसको है। अब शेर राजा भी घास खाएगा। मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा।’’ (पृष्ठ- 54), ‘‘साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची तो कभी मूंछें ऊंची।’’ (पृष्ठ- 69)
(उ) ऊंचा उठा कर धड़ाम से नीचे गिराना (1) पंच काका ने एक रद्दी कविता के लिए फेसबुक स्टेट पर लिखा- ‘अच्छी कविता, सधी कविता, साधुवाद।’ (पृष्ठ- 71) काका के इस व्यंग्य को समझना उस लेखक के बूते की बात नहीं थी।
(ऊ) टांय टांय फिस्स (1) ‘लेखकों में फर्क बस इतना ही है। प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। तुम्हारे यहां तो दो लाइनें पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स।’’ (पृष्ठ- 96)
          दूसरा नवाचार व्यंग्य आलेखों की संरचना का है। नीरज ने इस संरचना को त्रिआयामी बनाया है। पहले आयाम में खुद व्यंग्यकार विषमताओं का उद्घाटन, निरूपण और विश्लेषण करते हुए जहां जरूरत हो, चोट करता है। दूसरे आयाम में उस विषय से संबंधित विद्वानों, मनीषियों का या अन्य व्यक्तियों के दृष्टांत सामने रखता है और अंतिम आयाम में पंच काका के टिप्पणियां देकर एक सांगोपांग व्यंग्य रचना का सृजन करता है। रचनाओं का यह स्थाई भाव है। ऐसा अन्य रचनाकारों में कम मिलता है।
          तीसरा नवाचार नए-नए विषयों को उठा कर उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत करने का है। इनमें ‘ई-होली का हुड़दंग’, ‘सेल्फी लेने के नए आइडिया’, ‘शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस’, ‘वीआईपी की खान भारत’ तथा ‘याद नहीं अब कुछ’ आदि सम्मिलित है। जिस रोचक ढंग से इन विषयों का निर्वाह किया गया है वह नीरज दइया को श्रेष्ठ व्यंग्यकार बनाता है। दो तीन उदाहरण ही दूंगा, शेष तो रोचकता के कारण पाठक पढ़े विना नहीं छोड़ेंगे। (अ) ‘‘जब देश में सब कुछ ‘ई’ ही होता जा रहा है तो ये होलिया को ‘ई’ क्यूं नहीं किया जाए। इसमें हींग लगे ना फिटकरी और रंग आए चोखा वाली बात है। होली में आपको क्या चाहिए- रंग ही तो चाहिए ना। देखिए ना- रंग तो चोखा आ गया। अब क्या चाहिए। होली का ई-कार्ड, ई-गुलाल, ई-रंग, ई-डिस्को, ई-नाश्ता, ई-थाली, ई-साली, ई-घरवाली सब कुछ रेडी कर दिया है।’’ (पृष्ठ- 88-89) इसके आगे सात प्रकार की होलियों का वर्णन है। पढ़कर देखें मजा आ जाएगा। (आ) ‘‘नोटबंदी के बाद जिनके पास ढेर सारे पुराने नोट रह गए, उनकी निर्धनों से इस प्रकार की मनुहारें- ‘ले लो ना भैया, भाई साहब। आप ले लो। बहनजी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आपको लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम। हम नहीं मांगेंगे। आपको देकर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं कुछ।’’ (पृष्ठ- 79) जो विषय ऊपर गिनाएं हैं वे एक-एक से बढ़कर रोचक है। मैं तो बानगी देकर हट जाता हूं ताकि पाठक जिज्ञासा के साथ इस नए अनुभव-संसार से जुड़ सकें।
          अब दो उद्धरणों के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा। ये दोनों उद्धरण अपने-अपने प्रकार से महत्त्वपूर्ण हैं। (1) ‘‘पंच काका कहते हैं- ‘खग जाने खग की भाषा, ठग जाने ठग की भाषा। जीवन इस कदर रीतता जा रहा है कि कहीं कोई प्रतिरोध-प्रतिशोध नहीं। चंद सिक्कों की खनखनाहट और कुछ मरे हुए या जीवन से शून्यता की तरफ गति करते शब्दों की खडख़ड़ाहट सुनना ही भारतीयों के जीवन में शेष रहा है।’’ (ठग जाने ठग की भाषा, पृष्ठ- 32), (2) ‘‘काका का सुझाव है कि जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे सच-झूठ को पकड़ा जा सके। भूठ बोलने वाले की नाक लंबी होगी तो क्या? हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि किसकी नाक अधिक लंबी होती है- नेताओं की या पुलिस की या वकीलों की।’’ (शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस, पृष्ठ- 73)
          और अंत में खुद अपने बारे में। मैंने अब तक 100 से अधिक लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं हैं पर यह पहला अवसर है जब मुझे एक पिता और पुत्र की भूमिकाएं (बेशक अलग-अलग समय में) लिखने का श्रेय मिला है। नेगचार प्रकाशन द्वारा सन 1996 में प्रकाशित देश के अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यंग्यकार स्व. सांवर दइया की राजस्थानी पुस्तक ‘इक्यावन व्यंग्य’ की भूमिका मैंने ‘सिरजण री झणकार’ शीर्षक से लिखी थी। यह भूमिका लेखक के मरणोपरांत लिखी गई। बाद में देश के चर्चित व्यंग्यकारों में डॉ. मदन केवलिया व श्री बुलाकी शर्मा ने अपनी पुस्तकों पर भूमिकाएं लिखने का मुझे सौभाग्य दिया। आज जब व्यंग्य के क्षेत्र में अत्यंत सफल व सुयोग्य लेखक डॉ. नीरज दइया की पुस्तक ‘टांय टांय फिस्स’ की भूमिका लिख रहा हूं तो मैं तो आह्लादित हूं ही, मुझे विश्वास है कि पाठक और ज्यादा उत्सुक और आह्लादित होंगे तथा डॉ. दइया से निरंतर व्यंग्य संग्रह लिखते रहने की मांग करेंगे। इत्यलम्। वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
1-स-9, पवनपुरी, बीकानेर- 334003
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; ISBN : 818885857-9
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को सादर समर्पित