18 मार्च, 2017

कविता का पंजाबी अनुवाद / अमरजीत कौंके

कैनेडा से निकलने वाली पत्रिका ‘‘पंजाब टुडे” के नए अंक में `भाषांतर’ में श्री अमरजीत कौंके द्वारा किए कविताओं के अनुवाद मेरी कविता भी शामिल हुई है। साथ अन्य कवि हैं- श्री मंगलेश डबराल, डा.अनीता सिंह, अन्नू प्रिया, डा. ऋतू भनोट, डा. संतोष अलेक्स, आशा पांडेय ओझा और ज्योति आर्य।
शुक्रिया पंजाब टुडे टीम और कवि मित्र कौंके जी
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ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ / ਨੀਰਜ  ਦਈਆ

ਮੈਂ
ਸੰਭਾਲ ਕੇ
ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਤੇਰਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ
ਗੁਲਾਬ

ਜਦੋਂ
ਤੂੰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ
ਉਦੋਂ ਮੈਂ ਨਹੀਂ ਸੀ ਜਾਣਦਾ
ਉਸਨੂੰ ਲੈਣ ਦਾ
ਮਤਲਬ

ਨਹੀਂ ਜਾਣਦਾ ਸੀ
ਮੈਂ
ਕਿ ਕਿਸੇ ਨੂੰ
ਵੀ ਮਿਲ ਸਕਦਾ ਹੈ
ਚਾਹੇ ਅਣਚਾਹੇ
ਕੋਈ ਵੀ ਗੁਲਾਬ

ਹੁਣ ਤੂੰ
ਮੇਰੀ ਆਤਮਾ ਦੇ
ਵਿਹੜੇ ਵਿਚ
ਗੁਲਾਬ ਦੇ
ਫੁੱਲ ਦੇ ਨਾਲ
ਜਿਉਂਦੀ ਹੈਂ

ਤੇ ਮੇਰੇ
ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੀ ਨਦੀ ਵਿਚ
ਉਡੀਕ ਦੇ ਨਾਲ
ਵਗਦੀ ਹੈਂ......

हिंदी कविता 
शब्दों की नदी में

मैंने संभाल रखा है
तुम्हारा दिया हुआ-
गुलाब ।

जब तुमने दिया था
तब मैं नहीं जानता था
उसे लेने का अर्थ।

नहीं जानता था मैं
कि किसी को भी मिल सकता है
चाहे-अनचाहे अचानक
कोई भी गुलाब ।

अब तुम
मेरे अंतस के आंगन में
गुलाब के फूल के साथ जीती हो
और मेरे शब्दों की नदी में
इंतजार के साथ बहती हो ।
००००

17 मार्च, 2017

विकास का गणित

ह निर्विवादित सत्य कि है कि हर भी काम की तीन प्रतिक्रिया होती है। सिक्का उछालेंगे तो कभी अनिर्णय की स्थिति भी आ सकती है। सरल शब्दों में उदाहरण से बात करें तो जैसे मैं लिखता हूं, तो एक वर्ग कहेगा- क्या खूब लिखता है, दूसरा वर्ग कहेगा- बकवास लिखता है और तीसरा वर्ग ऐसा होगा जो कुछ नहीं कहेगा। जैसे उन्हें मेरे लिखने ना लिखने से कोई सरोकार नहीं हो। सकारात्मक और नकारात्मक के साथ यह जो मौन और निर्लिप्तता का भाव है, इसका हर जगह बड़े महत्त्व का है। राजनीति में तो कहना ही क्या! सत्ता सदैव वोटिंग पर चलती है। यहां एक पक्ष में बैठता है तो और दूसरा विपक्ष में। पक्ष किसी बात पर कहेगा- हां तो विपक्ष की मजबूरी है कि उसे कहना होगा- ना। और किसी काम के संदर्भ में विपक्ष कहेगा- हां तो पक्ष कहेगा- ना। दोनों एक साथ एक जैसा कुछ कह नहीं सकते हैं।
          सत्ता पक्ष कहेगा- देश विकास कर रहा है, तो विपक्ष का बयान आएगा- गर्त में जा रहा है। विकास और गर्त की अपनी-अपनी दिशाएं है। पर यह खेल जैसा है। क्यों कि कभी ऐसा नहीं हुआ है कि एक ने कुछ कहा और दूसरे ने सहमति में सिर हिलाया हो। लगता है कि हां और ना का कोई गणित है। जो सत्ता में होगा वह जो कुछ कहेगा, उसके विपरीत विपक्ष कहेगा। दोनों की यह त्रासदी है। जब से मैंने होश संभाला, देखा भारत प्रायः त्रासदी को झेलता रहा है। देश के विकास की गति कौन कैसे आंकता है? सबके अपने-अपने तर्क है। मैं भ्रम में हूं- कभी लगने लगता है कि सच में विकास हो रहा है। इसके साथ ही जब मैं दूसरे पक्ष की बात सुनता हूं तो मुझे वे भी ठीक लगते है कि देश गर्त में जा रहा है। मेरे अपने तर्क और पैमाने नहीं है। कभी-कभी मुझे ऐसा भी लगता है कि देश दो दिशाओं में गति कर रहा है। विकास की दिशा में गति पक्ष को दिखाई देती है, और गर्त की दिशा वाली गति दिखने के लिए विपक्ष है। इसका अभिप्राय यह अवश्य है कि देश गतिशील है। देश की गति पर तो संदेह दोनों को नहीं है।
          इनके बीच एक तीसरा पक्ष मौन है। यह पक्ष जानबूझ कर मौन धारण किए है। हिरणां मून साध वन चरणा को निमंत्रण का इंतजार है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही निर्दलयी को कहते हैं- आ जाओ, आ जाओ। हमारे साथ आ जाओ। हमारी पार्टी में आ जाओ। किसी चुप्पी के बाद की ‘हां’-‘ना’ महत्त्वपूर्ण होती है। हमारे पक्ष का क्या होगा जिसे जनता-जनार्दन कहा है। हमें निमंत्रण बस चुनाव के समय मिलता है। वोट नहीं देना लोकतंत्र का अपमान है, अपमान पढ़े-लिखे लोग करते नहीं। हमारी कामना है देश विकास करे, आगे बढ़े। विकास की दिशा में सभी जुट जाएं। पर वोट जिन्हें नहीं मिलता, वे नाराज हो जाते हैं। वे सदा गर्त की दिशा का आकलन करते हैं। सत्ता में तीसरा मौनी-पक्ष कभी पटला खा सकता है। आफत मेरी है कि मुझे सभी का सुनना पड़ता है। पंच काका कहते हैं- सबकी सुनो। सबकी देखो और करो अपने मन की। किसी का मन भला बुरा कैसे हो सकता है, वह तो विकास की दिशा देखता है। देखना चाहता है। देश के कर्णधार भारतीय मन को समझ कर विकास की राह चलते चलेंगे तो बात बनेगी।
० नीरज दइया 

16 मार्च, 2017

मंचस्थ अध्यक्ष का सुख-दुख

ध्यक्ष का पदनाम बहुत बड़ा है, इसलिए इस पर विराजित होना छोटे-मझले किस्म के लोगों के बस की बात नहीं। छोटे और मझले किस्म के लोग अध्यक्ष को आजीवन ताकते हुए सपना संजोते हैं कि हम भी कभी इस पद को पा सकेंगे। वैसे अध्यक्ष पद के दावेदार बहुत बड़े किस्म के खूब लोग होते हैं, परंतु केवल बड़ा होना ही अध्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती है। लोकसभा, विधानसभा से लेकर किसी भी पार्टी का अध्यक्ष होना अपने आप में महत्त्वपूर्ण होना है। अध्यक्ष में आकार-प्रकार और आयु के बंधन नहीं होते। अध्यक्ष का पद सभी बंधनों और सीमाओं से परे होता है। ममता, जयललिता, मुलामसिंह और सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद को इतनी गरिमा प्रदान कर दी है कि बस एक बार अध्यक्ष पद को पाते ही व्यक्ति उम्र भर के लिए विशिष्ट-जन की श्रेणी में शामिल हो जाता है। अध्यक्ष पर जब किसी छोटे अथवा मझले किस्म के व्यक्ति को पदस्त कर दिया जाता है, तब वह तत्काल बड़ा हो जाता है।
किसी सभा-गोष्ठी और पार्टी सभी में अध्यक्ष का आसन महत्त्वपूर्ण होता है। पार्टी के सदस्य या किसी सभा के श्रोता आप हैं तो जरूरी नहीं कि आपका फोटो अखबारों में छपे, पर अध्यक्ष होना इस बात की गारंटी देता है कि इसकी संभावनाएं बहुत है कि फोटो छपेगा। अध्यक्ष होने के अनेक सुखों में यह भी है कि प्रत्येक वक्ता और सदस्य आपका नाम जान जाता है। सभी अपनी बात आप को संबोधित करते हैं, कोई अनुमति चाहिए तो अध्यक्ष अनुमति देता है। अध्यक्ष बनते ही हल्का-पुलका आदमी भी धीर-गंभीर बन जाता है। बिना गंभीरता के कोई अध्यक्ष बहुत बार अध्यक्ष-सा लगाता ही नहीं। उसके साथियों के समझाना पड़ता है- आप अध्यक्ष है और गंभीर बने रहना अध्यक्षता के लिए जरूरी आभूषण है। जब कोई एक बार अध्यक्ष बन जाता है और कालांतर में अध्यक्ष पद नहीं रहता तब भी वह स्वयं को अध्यक्ष समझने की भूल अनेक बार करता है। इसी भूल के कारण वह परामर्शक की मुद्रा धारण कर यदा-कदा हर किसी को कुछ कहने-सुनने का अधिकार मान बैठता है। पर अध्यक्ष का सबसे बड़ा दुख होता है कि पद छूटता नहीं। एक बार अध्यक्ष का आसन मिल जाए तो उस पर बैठे रहने का मन करता है। अध्यक्ष पद मन को सबल और बलवान बनाता रहता है। जो जितना पुराना और उम्रदराज अध्यक्ष होता है, उसमें बैठे रहने की शक्ति बहुत होती है। मंचस्थ अध्यक्ष का दुख होता है कि उसके बोलने की बारी सबसे अंत में आती है। कुछ अध्यक्ष चालाक होते हैं, जो कोई न कोई बहाना बना कर कहते हैं कि जल्दी जाना है, और उन्हें बीच में ही संबोधन करने का सुख प्राप्त होता है। जो मचस्थ अध्यक्ष ऐसे बहाने नहीं बनाते अथवा जिन्हें बहाने बनाने की छूट नहीं होती है, उन्हें तो समारोह के अंत तक रूकना होता है।
पंच काका कहते हैं कि अध्यक्ष-पद सदा शंकाओं से धिरा रहता है। किस्म-किस्म की शंकाएं लोग करते हैं। अध्यक्ष को सब कुछ संभालना होता है। उसे अपनी शंका भूल, दूसरों को समाधान देना होता है। त्रासदी तब होती है जब स्वयं अध्यक्ष दीर्घ या लघु-शंका से ग्रसित हो जाता है। चालू संवाद में उसकी बेताबी में रूकना-रोकना सबसे बड़ा दुख है। कुछ शर्म और लिहाज, थोड़ा इंतजार करते कराते जब शंका बेकाबू होने की स्थिति में पहुंचने को होती है, तो वह मुस्कान के साथ उठता है और दुर्भाग्य सभी उसी को ताकते हैं।
० नीरज दइया

10 मार्च, 2017

कविताओं के बारे में कविताएं : पाछो कुण आसी

    ‘पाछो कुण आसी’ डा. नीरज दइया का तीसरा राजस्थानी कविता संग्रह है। इससे पूर्व उनके ‘साख’, ‘देसूंटो’ राजस्थानी में और ‘ऊचटी हुई नींद’ हिंदी में कविता संग्रह प्रकाशित हैं। वे अनुवाद से भी जुड़े हैं, और उन्हें हिंदी के साथ अनेक भारतीय कवियों की कविताओं के अनुवाद का लंबा अनुभव भी है। यह यहां रेखांकित करने का अभिप्राय कि नीरज दइया समकालीन भारतीय कविता के वर्तमान स्वर से पूर्ण परिचित है। संभवतः यही कारण है कि इस संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो उनके कवि रूप को पहले की तुलना में अधिक गंभीर और प्रमुखता से अवस्थित करता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वे जहां आरंभ में युवा मन की अनुभूतियां रचते थे, यहां तक पहुंचते हुए वे उम्र और अनुभव की आंच से कविता लोक का एक परिपक्व वितान रचते हैं। कहना होगा कि कवि नीरज दइया राजस्थानी के एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर के रूप में पहचाने जाने लगे हैं।
    संग्रह की कविताओं का पाठ बाहर से जितना सरल-सहज प्रस्तुत होता दिखता है, वह भीतर से उतना ही जटिल व गुंफित है। ‘पाछो कुछ आसी’ संग्रह की कविताएं अपने पाठ के पीछे जैसे कोई आक्रोश या कहें घनीभूत पीड़ा से प्रेरित है। यहां काव्यानुभूतिया का विस्तार भीतर से बाहर, व्यष्टि से समष्टि में होता हुआ चहुंदिश से हाहाकार करता उद्वेलित करता है। कुछ संकेतों को स्थूल अर्थों में लिया जाए तो यहां एक ओर निकटतम पारिवारिक रिश्तों की असल हकीकत, उनसे मिले नैराश्य-प्रताड़ना पर आत्ममंथन है तो दूसरी ओर सम्बन्धियों, मित्रो और व्यवस्था के दोगले चरित्र, व्यवहार का जीता-जागता लेखाजोखा भी है।
    “म्हारी वा मुळ्क/ मा री मुळ्क/ जिकी बिसरगी/ मुळकती- मुळकती/ म्हनै” एक अन्य कविता में- ”ठीक कोनी/ घणो सीधो सादो होवणो/ लोग मोको तकै” आज की कुछ ऐसी ही जीवंत स्थितियों की व्यंजनाएं हैं। ऐसी घनीभूत पीड़ादायी अनुभूतियों को कवि ने बहुत ही सहजता से अपनी कविताओं में अभिव्यक्त किया है। ‘दोस म्हारो नीं/ थारै स्वाद रो है’ के माध्यम से वह साफ कहता है कि अगर उसका कहा, लिखा अगर आपको नहीं रुचता तो यह उसका नहीं वरन आपके स्वाद का दोष है। ‘समझो नै/ सीखो, कठै कांई सबद बोलणा चाइजै/ कद किसो सबद बरतणो चाइजै...” जैसी उक्तियां इस बात का संकेत है कि हम शब्दों के प्रयोग के प्रति कितने लापरवाह हैं। पीड़ा और चेतावनी के ये वेदना युक्त स्वर ‘पाछो कुण आसी’ कविता-संग्रह का केंदीय भाव है।
    कवि स्पष्ट शब्दों में लिखता है- ‘आवणियै काल खातर ओ सवाल जरूरी है- काल अर आज में कांई फरक है।’ मुझे लगता है ‘पाछो कुछ आसी’ की कविताएं इन्हीं सवालों से जूझती है। सम्बन्धों के स्खलन को किस खूबसूरती से नीरज ने अभिव्यक्त किया है- ‘जिको कीं दियो जा सकतो हो/ सो कीं देय दियो/ संपत खातर/ बगतसर पल्लै राखी/ थोड़ी सी’क सरम/ थोड़ो क नेठाव..” यह जो थोड़ी-सी शर्म और धैर्य रखने की बात कवि अपनी इस कविता में कर रहा है, वह केवल ‘पाछो कुण आसी’ के कवि की ही नहीं, वरन सभी कला रूपों और कला माध्यमों से जुड़े समज की सामूहिक अभिलाषा है।
    कविताएं ऐसे ही नहीं लिखी जाती। कविता लिखने और रचने का अपना सुख, अनुभव और शिल्प है। कविता को हम किसी यांत्रिक तकनीक के तहत सांचे में नहीं ढाळ सकते हैं। इस संग्रह में कवि ने कुछ कविताएं कविता की रचना प्रक्रिया को लेकर भी लिखी हैं। उदाहरण के लिए इन पंक्तियों को देखा जा सकता है- “आंगणै आवै कविता बादळां दांई/ बरसै तो बरसै नीं बरसै तो करता रैवै टाळ बादळ/ बरसां बरस कोनी बरसै बरसणिया बादळ/ किण री मजाल/ कै एक छांट ई बरसा लेवै/ बिना मरजी” कविता सर्जन के बारे में यह सोच ही किसी कवि को एक अच्छा कवि बनाता है। यह प्रविधि और स्पष्टता ही कविता से अच्छी कविता उम्मीदें बधांता है। निसंदेह नीरज दइया इस कसौटी पर प्रमाणित और खरे उतरने वाले कवि हैं। उनकी कविता और राजस्थानी भाषा को लेकर संग्रह में कुछ उल्लेखनीय कविताओं को देखते हुए इस तथ्य दोहराया जा सकता है कि इन कविताओं में समकालीन कविता के बदलते रंग और रंगत की अनुगूंज साफ सुनाई देती है। इतना होने के उपरांत भी इस संग्रह में अंत में शामिल की गई गद्य कविताओं से मैं इत्तेफाक नहीं रखता। मुझे गद्य कविताओं में कविताएं कम और लघुकथाएं अधिक अनुभूत होती हैं।
    अच्छी छपाई के लिए सर्जना और सुंदर आवरण के लिए भाई रामकिशन अडिग को बधाई! और आखिर में डा. नीरज की कविताओं के बारे में डा. आईदान सिंह भाटी से सहमत होते हुए उन्हीं के शब्दों को दोहराना चाहता हूं- “नीरज दइया री ऐ कवितावां आज अर बीत्योड़ै काल री तो कवितावां है ईज, आवणाआळै काल रा पळका ई आं कवितावां में पड़ै।”
० नवनीत पाण्डे
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पुस्तक : पाछो कुण आसी 
विधा : काविता 
भाषा : राजस्थानी
कवि  : नीरज दइया 
प्रकाशक : सर्जना, बीकानेर
संस्करण : 2015 प्रथम 

पृष्ठ : 96 
मूल्य : 140/-

09 मार्च, 2017

पुस्तक संस्कृति को समर्पित एक शहर बीकानेर

डॉ. नीरज दइया
     देश के पटल पर बीकानेर पापड़-भुजिया और रसगुल्लों के कारण तो विख्यात है ही, साथ ही छोटी-काशी और हजार हवेलियों का यह शहर एक आश्चर्यजनक किंतु सत्य घटना को साहित्यिक अवदान के रूप में जोड़ता है कि यहां हजार से अधिक लेखक सक्रिय हैं। हजार लेखकों और पाठकों का होना हिंदी साहित्य के विकास क्रम में वर्तमान समय की कोई कल्पना नहीं, वरन सत्य घटना है। बीकानेर शहर के एक सौ पचास कहानीकार की रचनात्मकता का प्रमाण है ‘कथारंग-दो’। इसके पहले अंक में इसी शहर 75 कहानीकार शामिल हुए थे और इस बार यह संख्या दुगनी है। महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ‘कथारंग’ का अभिनव जन-अनावरण हुआ। कथारंग-दो की विशेष बात यह भी है कि कहानीकारों में 56 महिलाएं हैं। इस संग्रह में वर्ष 1931 से 1998 तक की अवधि में जन्मे कहानीकारों को शामिल किया गया है। किसी निर्धारित भौगोलिक सीमा में रहने वाले कहानीकारों का संभवतया देश में यह पहला संकलन है। जन-अनावरण के अंतर्गत शामिल होने वाले हर व्यक्ति ने किताब को आमंत्रण मूल्य 300/- में खरीदा और इस प्रक्रिया में शामिल हुआ। लगभग 300 लोगों का किताब को खरीद कर जन-अनावरण करना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
    ‘कथारंग’ के संपादक युवा नाटककार हरीश बी. शर्मा कहते हैं कि किताबें खरीदकर आमजन शामिल होकर यदि लोकार्पण की प्रक्रिया में शामिल हुए हैं तो यह उनका पुस्तक-संस्कृति के प्रति समर्पण है। जन-सामान्य को सोचने-समझने के लिए कथारंग के माध्यम से एक दृष्टिकोण मिलेगा। साथ ही निकट भविष्य में कहानी-लेखन कार्यशाला के आयोजन द्वारा बीकानेर में कहानी रचनात्मकता को अधिक गति प्रदान करेंगे। लोगों का मानना है कि मूल बात साहित्य को जन जन तक पहुंचने में सफल होना है। साहित्य में कहानी ही जन के अधिक करीब पहुंच सकती है इसलिए संभतः कहानी को लेकर ऐसा अभिनव आयोजन रखा गया है। बीकानेर के धरणीधर में साहित्य महोत्सव की भांति संपन्न इस जन-अनावरण के विषय में कहा गया है कि यह केवल इस वर्ष ही नहीं, प्रति वर्ष होगा। कहानी को आम जन तक पहुंचाना और कविता के आस्वादन के साथ-साथ दिन भर के इस कार्यक्रम में संकलित कहानीकारों का सम्मान भी किया गया। साथ मेहनत और लगन से व्यावसायिक ऊंचाइयां छूने वाले बीकानेर के लोगों के जीवन-संघर्ष पर आधारित कृति ‘हुनर और हौसले की कहानियां’ को भी जन-अनावरण में शामिल किया गया। 
    कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कविता कोश के संस्थापक ललित कुमार ने कहा कि आम व्यक्ति तक साहित्य पहुंचे, इससे बेहतर तो कोई बात हो ही नहीं सकती। पढ़ने की आदत जीवन में चामत्कारिक परिवर्तन कर सकती है। ललित कुमार ने बताया कि कविता कोश और गद्य कोश के माध्यम से वैश्विक स्तर पर साहित्य को प्रसारित करने का कार्य किया जा रहा है, इसी तरह से कथारंग का भी एक प्रयास है और इस तरह के प्रयासों से भाषा और साहित्य ही नहीं समाज का भी हित होगा। विशिष्ट अतिथि व्यवसायी कन्हैयालाल बोथरा ने अपने उद्वोधन में कहा कि साहित्य-कला के साथ-साथ बीकानेर व्यवसाय की दृष्टि से भी काफी उर्वर है और यही वजह हैं कि बीकानेर में व्यवसाय की अपार संभावनाएं  हैं। युवा पीढ़ी के लिए ‘हुनर और हौसले की कहानियां’ प्रेरक किताब साबित होगी। कार्यक्रम के अध्यक्ष समाजसेवी रामकिसन आचार्य ने कहा कि सृजन का प्रकाशन होना और देश-दुनिया के समाने आना ही उसकी सार्थकता होती है। ऐसे समय में बीकानेर के कथा-साहित्य के प्रकाशन में ‘कथारंग’ एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है।।
    स्वागताध्यक्ष साहित्यकार-पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कथारंग में दूसरी बार प्रकाशित कहानीकार इस बात के लिए आश्वस्त करते हैं कि उन्होंने कहानी विधा को पूरे मन से स्वीकार किया है। बीकानेर के कथारंग में संकलित रचनाकार हिंदी कहानी में आने वाले समय में बीकानेर का नाम करेंगे ऐसी आशा की जानी चाहिए।
    दूसरे सत्र में काव्य-जुगलबंदी का आयोजन किया गया जिसमें ओजस्वी कवि-शायर राजेश ‘विद्रोही’ और आनंद वि. आचार्य ने अपनी काव्य रचनाओं से शमा बांधा। समापन सत्र में 150 कहानीकारों का सम्मान किया गया। कहानीकारों को सम्मान स्वरूप प्रतीक चिह्न के साथ दिए जाने वाले साहित्य में ‘दुनिया इन दिनों’ का कहानी अंक भी भेंट किया गया। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि पंचायत राज मंत्री राजेंद्रसिंह राठौड़ ने कहा कि बीकानेर में 150 रचनाकारों की कहानियां का संग्रह अपने आप में अनूठा प्रयास है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि बीकानेर में इतनी बड़ी संख्या में साहित्यकार जुटे हैं, जिनकी कलम में सृजन है। अध्यक्षता बीकानेर विधायक (पश्चिम) डॉ.गोपाल जोशी ने कहा ‘कथारंग’ जैसे प्रयास सम-सामयिक हैं। इस तरह के आयोजनों से न सिर्फ नए लेखकों को अवसर मिलता है, बल्कि संवाद की भी एक प्रक्रिया शुरू होती है।  कोलायत विधायक भँवर सिंह भाटी एवं राजस्थान विधानसभा प्रतिपक्ष नेता रामेश्वर डूडी ने भी कार्यक्रम में उपस्थित होकर कथारंग को समर्थन दिया। 
    साहित्य अकादेमी से हाल ही में राजस्थानी कहानी के लिए सम्मानित बुलाकी शर्मा का मानना है कि कथारंग के समानांतर यदि राजस्थान और पूरे भारत में साहित्य के लिए ऐसी लगन जाग्रत कर दी जाए तो आने वाला समय बहुत सुंदर होगा। आज के दौर में मिटती संवेदनाओं को ऐसे आयोजन और विचार ही जिंदा रख सकते हैं। समालोचक डॉ. मदन सैनी कहते है कि बीकानेर जैसे एक ही शहर की तीन पीढ़ियों के एक सौ पचास कहानीकारों को कथारंग द्वारा पाठकों से रू-ब-रू कराना एक ऐतिहासिक घटना है और इसके लोकार्पण पर आयोज्य ‘बीकानेर साहित्य महोत्सव’ किसी भी ‘लिटरेरी फेस्टिवल’ की आधारभूमि सिद्ध हो सकता है।
    कवि नवनीत पाण्डे का मानना है कि ‘कथारंग’ में संकलित कहानियां बेशक हिंदी कहानी के मानदंडों को पूरा ना करती हो किंतु यदि इनके रचनाकार साहित्य से जुड़ कर पाठक और पुस्तक संस्कृति के विकास में सहयोगी बनेंगे तो बहुत बड़ी घटना के रूप में यह प्रयास चिह्नित किया जाएगा। कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी इसे जन जन का साहित्य के प्रति जुड़ाव मानते हुए कहते हैं कि साहित्य कभी मर नहीं सकता क्यों कि कहानी के संस्कार हमारे खून में है। दादी-नानी की कहानियां भले अब नहीं रही किंतु कहानी की संस्कृति के जीवित होने का यह आयोजन एक प्रमाण है।
    निकट भविष्य में संभव है बीकानेर में एक ऐसा आयोजन किसी पुस्तक के रूप में सामने आए कि जिसमें एक हजार रचनाकारों की रचनात्मकता का समेकित प्रणाम देश और दुनिया को देखने को मिले।