09 मार्च, 2017

गंभीरता की खोज

डॉ. नीरज दइया
    आज सुबह-सुबह एक अजीब बात हुई। जब मैं छत पर कपड़े सूखाने जा रहा था तो मेरा लड़का मेरे पीछे-पीछे लगभग दौड़ते हुए आया और बोला- ‘आप रहने दो। मैं कर लूंगा। आप ये सब क्यों करते हैं?’
    मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही, पहली बात तो आज वह इतना जल्दी कैसे उठ गया? दूसरा वह कपड़े सूखाने के लिए छत पर क्यों जा रहा है? मैं पूछे बिना नहीं रह सका- ‘माजरा क्या है?’
    वह तपाक से बोला- ‘आप समझते नहीं। लोग मजाक बनाते हैं।’
    दिन का आगाज ही कुछ अजीब सा हो रहा था, मेरा लड़का कह रहा है कि मैं समझता नहीं हूं। मैं इसका बाप हूं और इस सदी में जन्मा यह बेटा, मुझे मेरी ‘समझ’ के बारे में प्रमाण-पत्र जारी कर रहा है। मैं इस बात को किसी गम की तरह निगल गया और उससे पूछा- ‘लोग क्या मजाक बनाते है?’
    ‘अरे रहने दीजिए ना, आप कोई दूसरा काम देखिए। यह मैं कर दूंगा।’
    ‘नहीं, मुझे भी तो पता चले कि क्या मजाक बनाया जा रहा है?’
    ‘वे कहते हैं कि तम्हारे पापा कपड़े धोते हैं। हमने अपनी आंखों से उन्हें तुम्हारी मम्मी के कपड़े सूखाते देखा है।’
    ‘कौन कहते हैं ऐसा? वे ऐसा कहने वाले कौन होते हैं?’
    ‘अरे ऐसा मजाक होता है। मैंने कहा ना- आप छोड़िए और इसे भूल जाओ। अब से मैं जल्दी उठूंगा और कपड़े मैं सूखाने जाया करूंगा या फिर खुद मम्मी। आप हर्गिज नहीं जाएंगे। कपड़े सूखाने जाते आपको शर्म नहीं आती ?’
    ‘अरे इसमें शर्म कैसी? यह तो घर का काम है। मिल कर कर लेते हैं। तेरी मम्मी कपड़े धोती है और मैं छत पर उन्हें डालने चला जाता हूं। इसमें ऐसी कौनसी आफत आ जाती है। मिलजुल कर काम करना क्या बुरी बात है।’
    ‘आप भाषण मत दिया करो। मैं जैसा कहता हूं, वैसा कीजिए। वर्ना मेरी बहुत इंसल्ट होती है।’
    मैं मन ही मन इक्कीसवीं सदी की संतानों और उनके संस्कारों को लानत भेजता हूं। खुद को खुद ही कोसता हूं। कैसे नगीने पैदा किए हैं, जो अपने समझ पर शक करते हैं और नेक बातों को भाषण समझते हैं। सुबह-सुबह की जल्दबाजी में इस मुद्दे को छोड़ना ही ठीक था। वैसे किसे दोष दिया जाए। अपने लाडले को हमने अपने सिर पर खुद ही चढ़ाया है, और अब यह इतना ऊपर चढ़ चुका है कि कभी-कभी लगता है कि सिर पर बैठ कर जूते मार रहा है। मुझे लगा कि इसके साथी समझदार नहीं बेवकूफ हैं। यह भला क्या मजाक हुआ ! कौन अपने घर में क्या करता हूं और क्या नहीं, इन सब बातों से उन्हें क्या लेना-देना? अगर गली के पीछवाड़े अपनी पत्नी की साड़ी सूखाने में ऐसी आफत टूटती है, तो आगे से यह काम बंद। एक फिल्म आई थी- ‘नौकर बीबी का’ जिसमें गाना था जमाना तो है नौकर बीबी का...। मुझे लगा आज घर में फिल्म का नया संस्करण जारी हो गया है। मैं उसके दोस्तों के मजाक में मजाक बन कर रह गया हूं। 
    मैं अपने पुराने दिनों की यादों में खो गया। मजाक और होली का कितना पुराना संबंध रहा है। पर अब वे दिन कहां। अब तो होली हो या दीपावाली सब के सब ऐसे हो गए है कि पुरानी सब बातें तो भूलने में ही भला है। मन बार-बार बीते दिनों को याद करता है। वे भी क्या दिन थे। हम भी कभी मजाक किया करते थे और कोई हम से भी मजाक किया करता था। ससुराल और जीजा-साली की मजाक का आनंद अब किताबों की बातें बन कर रह गया है। जनसंख्या के कंटोल में जैसे वे सब मजाक भी कंटोल हो गए हैं। अब ससुरल जाओ तो सास मिलती है। सास से मजाक नहीं किया जा सकता है। मजाक तो घरवाली से भी कहां किया जा सकता है। दोस्तों से करें मजाक करे तो वे नाराज हो जाते हैं। लगता है कि लोग मजाक समझना ही भूल गए हैं। दूसरी तरफ यह नई पीढ़ी है जो मजाक बनाती है तो कैसे-कैसे। ऐसे मजाक के चलते मैं अपने घर में कपड़े सूखाने में बीबी की मदद भी नहीं कर सकता। यह विषय जरा गंभीर हो गया है। संपादक जी ने कहा कि कुछ हल्का-फुल्का व्यंग्य हो। संपादक जी का व्यंग्य है कि भारी व्यंग्य आजकल कोई समझता नहीं। सोचने की बात तो यह है कि क्या चारों तरफ गंभीरता का राज्य स्थापित हो गया है?  
    संयोग ऐसा बना कि ऑफिस पहुंचा तो वहां एक किस्सा हाथ लगा। मुझे लगा मजाक और गंभीरता दोनों की बातें फिकी पड़ गई हैं। हो ना हो अब गंभीरता की खोज करनी ही होगी। बॉस ने मिस्टर के. एल. राठौड़ को बुला कर कहा कि मिस्टर राठौड़ आप बिल्कुल सिरियस नहीं हैं।
    मि. राठौड़ बोले- ‘जी सर, मैं बिल्कुल सिरियस नहीं हूं। अगर सिरियस होता तो ऑफिस क्यों आता। होस्पिटल में जा कर एडमिट नहीं हो जाता।’ इतना कहना था कि बॉस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। भला ऐसा भी कोई कर्मचारी होता है जो साहब की जरा-सी बात नहीं समझे। यह तो बात का बतंगड़ बनाना हुआ। यूनियन लीडर बीच में बोल रहा था कि हरेक बॉस का पारा सातवें आसमान पर रहता है और वर्करस के पारे को तो जैसे पाला मार गया है। राठौड़ जैसे दो-चार हों तो कुछ बात बने। काम सभी करते हैं फिर भेद-भाव क्यों? मुझे यह सवाल गंभीर लगा।
    मैं गंभीर चिंतन में खो गया। विचार करने लगा कि पूरे सिस्टम में गंभीर कौन है? कौन है जो अपने काम की गंभीरता नहीं समझता, कौन है जो हर वक्त मजाक-मस्ती में खोया रहता है? काम के समय काम होना चाहिए और मजाक-मस्ती का भी अपना समय होना चाहिए। कुछ का मानना है कि मजाक-मस्ती में दिन-रात निकल जाए और जिंदगी गुजर जाए तो अच्छा है। कुछ मानते हैं कि मजाक-मस्ती से जरूरी काम को मानना चाहिए। जीवन में काम ही सब कुछ होना चाहिए। यहां फिर मजाक करना चाहिए। जीवन में अब केवल ‘काम’ ही रास आता है। यह सस्ता मजाक है। गंभीर लोगों का मजाक भी गंभीर होना चाहिए। ये क्या हुआ कि मजाक मस्ती करते रहें। ये तो कभी भी कर लेंगे। ‘काम’ का अपना समय होता है और अगर वह निकल जाए तो लौटकर नहीं आता। जिंदगी के इस गणित को समझते-समझते अब मैं तो मजाक मस्ती को जैसे भूल ही गया हूं। पूरी गंभीरता से घर में काम करता हूं और दफ्तर में भी काम करता हूं। मैं तो दिन-रात बस काम में ही खोया रहता हूं। यह माना कि बिना अपनी उम्र का लिहाज किए काम में खोए रहना ठीक नहीं। मेरे काम में खोए रहने और कड़ी मेहनत के बाद जब ग्रेड देनी की बारी आती है तो साहब लिखते हैं- ‘गुड’। तेल और मक्खन लगाने वाले चम्मच भले कोई भी काम में करें, उन्हें देखने कहने सुनने वाला कोई नहीं। आज ऐसे लोगों का ही बोलबाला है।
    हमारे समय की त्रासदी है कि हर कोई समझता है कि सिर्फ वह गंभीर है, बाकी सब तो यूं ही झख मार रहे हैं। बस गाड़ी चल रही है। मैं नहीं चला रहा, तुम नहीं चला रहे और वे भी कुछ कर नहीं रहे। फिर समझ में नहीं आता कि देश किस के भरोसे चल रहा है। सत्ता पार्टी को भ्रम है कि वे देश को चला रहे हैं, किंतु विपक्ष कहता है कि देश चल नहीं रहा, रुक गया है। सुनता हूं कि देश के कर्णधार गंभीर नहीं है। सोचता हूं कि विज्ञान ने इतनी प्रगति की है तो काश ऐसा संभव हो जाए कि कोई दवाई गंभीरता की इजाद कर ली जाए। फिर जो गंभीर नहीं लगे, उन्हें गंभीरता की दवा दे कर गंभीर बना दिया जाएगा और देश गतिशील हो जाएगा। अपने काम और व्यवहार के प्रति गंभीर होना ही देश की तरक्की का मूल-मंत्र है। जब हम सब गंभीर होंगे तो किसी घर के या पराए देश तक की हिम्मत नहीं हो सकती कि हमारे गंभीरता को जरा भी कम कर दे।
    मैंने पंच काका से बात की तो वे बोले- भारत में गंभीरता नाम की एक चिड़िया थी। जिसे सब लोग सोने की चिड़िया कहा करते थे। सोने की चिड़िया उड़ गई और गंभीरता हमारे देश से गायब हो गई। अब तो ऊपर से लेकर नीचे तक सारे मजाकिया लोग इक्कठे हो गए हैं। स्कूल में बच्चे पढ़ते नहीं। मास्टर पढ़ाते नहीं। शिक्षा और संस्कार चौपट। सभी सरकारी दफ्तरों का बुरा हाल है। अस्पतालों में मरीजों के लिए माकूल व्यवस्था नहीं है। पुलिस का हाल बेहाल है। सब खाने में लगे हैं। कोई काम के प्रति गंभीर नहीं है। काम हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक। बच्चे गंभीरता को खोजोगे तो खोजते रह जाओगे। अगर गलती से गंभीरता कहीं मिल भी जाए तो मुझे बताना। उसकी जांच करनी होगी कि असली गंभीरता है या कि ओढ़ी हुई छद्म गंभीरता है।


08 मार्च, 2017

पुत्र पैदा होने की गारंटी

ब भी कहीं थाली बजती है तो पास-पड़ौस को पता चलता है कि फलां के घर लॉटरी लगी है। हमारे देश के लोग भी कितने भले हैं। अपने सुख की सूचना गला फाड़-फाड़ कर देते हैं और दुख को भीतर ही भीतर दबा लेते हैं। बेटी जन्म पर रोनी-सी सूरत लिए घर के सब समवेत ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं कि लगता है जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा है। मातमी ऐसा भयावह दृश्य इक्कीसवीं सदी में भी वही का वही है। भले बेटियों ने कितने ही गढ़ जीत लिए हो, फिर भी उनके प्रति हमारे मन का मैल घुला नहीं। शिक्षा और आधुनिकता के पास भी कोई ऐसा साबुन नहीं है कि इस मैल को धो दे। पुत्र-रत्न की आमद पर छत चढ़ कर थाली बजने का रिवाज जिसने भी आरंभ किया होगा, बड़ा समझदार रहा होगा। बिना समझदारी के भला ऐसा और इतना फर्क कैसे हो पाता। ऐसे में कुछ सिरफिर हैं जो बेटी के जन्म पर भी थाली ले कर छत पर चढ़ जाते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं। बेटियों को बेटों का दर्जा देना और बेटों जैसे ठाठ-बाट से पालना कहां का इंसाफ है। वे पराई अमानत होती हैं और ऐसा करना तो उन से मोह करना हुआ। हमारी इतनी विशाल परंपरा है कि बेटियों के लिए मां-बाप निर्मोही रहे। उन्हें पराया धन समझें और जिसमें हिम्मत देखे, उसे सौंप कर गंगा नहा लें।
          यह सनातन चक्र है। बेटे या बेटी की शादी के बाद इंतजार करते हैं कि कब थाली बजाने का अवसर आए। यह अवसर अगर नियत समय पर हाथ लगने के आसार दिखाई देता है, तो चेहरों पर मुस्कान आती है- बड़ी जल्दी की। और इसके विपरीत देरी होने पर इस अवसर का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हुए कहते सुना जाता सकता है- कब होगा, या होगा ही नहीं। बड़ी देर कर दी। इसने साथ जिन-जिन की शादियां हुई थी, सबके घर थाली बज गई। हमारे घर कब बजेगी? ऐसे में बसंत के बीतने के बाद फिर से बसंत को लाने में कई बार वर्षों के वर्ष लग जाते हैं, और कई बार तो बादल बिन बरसे ही रूठे रहते हैं।
          निसंतान दंपति निराश होकर आशा करते हैं कि कुछ भी हो जाए, पर हो जाए। अभी भारत देश में कई सदियां लगेगी, बांझ को अथाह अपमान से इक्कीसवीं सदी भी नहीं बचा सकती है। खोट भले खुद के लड़के में हो पर गालियां तो बहू के हिस्से ही आएगी। परिवार नाम की इस मिली-जुली सरकार में सदैव महिलाएं ही प्रताड़ित होती है। आश्चर्य यह कि महिलाओं द्वारा इस क्रम जारी रखा जा रहा है। ऐसे झगड़ों में पाखंडी तांत्रिक और ढोंगी साधू बाबाओं की लॉटरी लग जाती है। कहा है- या तो रोगी ठगाता है, या भोगी। ये रोगी-भोगी बाकायदा ऐसे-ऐसे रास्ते निकालते हैं कि सब कुछ लुटा के होश में आते हैं। जब आंखें खुलती हैं, बहुत देर हो चुकी होती है। बेटे की उम्मीद में बेटियों की हर बार आमद वालों को पुत्र पैदा होने की गारंटी देकर उनकी जान भी मांग सकते हैं। यह बात जुदा है कि पुत्र की आशा रखने वालों का अंतिम धेय यही होता है कि मरने पर कोई तो मुखाग्नि देने वाला चाहिए। पंच काका कहते हैं कि पुत्र पैदा होने की गारंटी छोड़िए। इस संसार में मरने के बाद हम सभी की गति और दिशा एक ही होनी है।
 ० नीरज दइया 

06 मार्च, 2017

फन्नेखां पर क्यों लिखूं?

लेखक का किसी पर लिखना अथवा नहीं लिखना किसके हाथ में है? क्या खुद लेखक के हाथ में है, या कई दूसरे घटक काम करते हैं। लेखक लिखता अथवा टाइप अपने हाथों से जरूर करता है, पर यह सब उसके वश में नहीं होता। भीतर-बाहर की प्रेरणा और परिस्थितियों से लिखा जाता है। कोई रोजाना लिखता है। सुबह-दोपहर और शाम लिखता है। रात को सोता नहीं और लिखता है। पर कुछ ऐसे भी है जो सालों-साल नहीं लिखते हैं। लिखना तो सभी चाहते हैं, पर लिखा नहीं जाता। अधिक ज्ञानी लेखक लिख नहीं सकते। वे जब कुछ भी लिखते अथवा लिखने की सोचते हैं तो उसका ज्ञान हावी हो जाता है। उन्हें लगता है- यह श्रेष्ठ नहीं है। ज्ञानी लेखक केवल श्रेष्ठ लिखने की सोचता है, और लिख नहीं पाता। ज्ञानी जिसे अज्ञानी और सामान्य समझता है वह अपने लेखन में लिखते-लिखते अनेक श्रेष्ठ रचनाएं लिख लेता है। यह ज्ञान कुछ तो वास्तविक होता है, और कुछ को भ्रम हो जाता है कि इतने साल हो गए सो अब तो हम ज्ञानी हो ही चुके हैं। कुछ अपनी उम्र से और कुछ अनुभव से परमज्ञानी होने का भ्रम पाल लेते हैं। वे फिर परामर्शक बन जाते हैं। ऐसा ही भ्रम एक लेखक को हो गया कि मैं लिखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर ज्ञानी अथवा परमज्ञानी होने का भ्रम दूर रखता हूं। मैं लिखता जरूर हूं पर किसी के कहने पर लिखता नहीं हूं और किसी के कहने पर रुकता भी नहीं हूं। तो हुआ यूं कि एक लेखन महोदय ने अपनी किताब भेजी और लिखने का अनुरोध किया। उन्हें मैं किसी योग्य लगा तभी उन्होंने अनुरोध किया होगा। मैंने सहृदयतावश कह दिया- जी, मैं प्रयास करूंगा। यह कहना मेरा अपराध था। उनके साप्ताहिक फोन आने आरंभ हो गए। हर बार पूछते हैं- लिखा क्या? मेरी किताब पर लिखा क्या? कब तक लिख देंगे? किसी किताब पर लिखना कोई कठिन काम नहीं है। कोई भी लिख सकता है। किसी भी किताब पर लिख सकता है। कोई चाहे तो अपनी खुद की किताब पर खुद भी लिख सकता है। ऐसा हो सकता है कि खुद लिख कर अपने किसी मित्र का नाम अटका दिया जाए। कुछ लिखने वाले ऐसे भी हैं कि खुद आगे बढ़ कर अनुरोध करते हैं कि हम से लिखवा लो। हम लिख देते हैं। ऐसे बहुत से विकल्प हैं। फिर भी मैं उन मित्र पर नहीं लिख सका। मुझे किताब जमी नहीं कि उस पर कुछ लिखने का मन बना सकूं। किसी को सीधे-सीधे यह कहना भी अभद्रता है कि मुझे आपकी किताब ठीक नहीं लगी। माफ कीजिए, मैं नहीं लिख सकता। ऐसी अभ्रदता को बचाने के चक्कर में वे मेरा साप्ताहिक खून पीते रहे हैं और मैं अब तक पिलाता रहा हूं।
            एक दिन पंच काका मुझ से बोले- तुम, फन्नेखां पर क्यों नहीं लिखते? मैंने कहा- क्यों क्या हुआ? क्या बात है? क्या उन्होंने अपको भी फोन किया है? काका बोले- नहीं उसे छोड़, यह बता लिखने में तुझे समस्या क्या है? मैं क्या कहता, बस इतना ही कि आप कहेंगे तो लिख दूंगा। बहुत बार अनेक काम हम मन मार कर भी करते हैं। पर दूसरे ही पल सोचा- मैं फन्नेखां पर क्यों लिखूं? मेरा लिखना इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है, जिस के लिए फन्नेखां मरा जा रहा है। फोन पर फोन कर रहा था और अब काका तक पहुंच गया। आपने किताब लिखी, छपा ली और मुझे भेज कर प्रेम, मूर्खता अथवा आदर जो भी प्रगट करना था कर दिया। अब उन्हें भूल जाना चाहिए। मुझे अगर किताब अच्छी लगेगी अथवा मेरा मन करेगा तो उस पर लिखूंगा। यह कोई जवरदस्ती हुई कि लिखने के लिए मजबूर किया जाए। भाई फन्नेखां! बस करो यार। आगे से अब मुझे फोन मत करना। मेरे भीतर का भद्र इंसान अब अभद्र होने वाला है। वह अभ्रद कह देगा- दो कौड़ी का लेखन है तुम्हारा। जाओ मैं नहीं लिखता।
० नीरज दइया

05 मार्च, 2017

नियति के आगोश में

सुबह कितनी जल्दी हो जाती है पता ही नहीं चलता। लगा अभी थोड़ी देर पहले ही तो रात को सोए थे, और इतनी जल्दी कैसे पूरी रात गुजर गई। अभी मेरी आंखें पूरी खुली भी नहीं थी, खुलने को तैयार भी नहीं थी कि लगा कोई बाहर हमारा दरवाजा पीट रहा है। एक सपना अभी आंखों में अटका था, कुछ स्मृति में और कुछ विस्मृत होते हुए। किसी ने सपने की हत्या कर दी। मैं अपने सपने को भूल सोचने लगा कि कुछ लोग बेवकूफ होते हैं। वे किसी के घर का दरवाजा बजाना भी नहीं जानते, और वह भी सुबह-सुबह के वक्त। सोचते नहीं- अरे, कोई सो रहा होगा। क्यों किसी की नींद में खलल डाला जाए। कोई सपने न जाने कहां तक जाता कैसे पूरा होता। ऐसे लोगों को कौन समझाएं कि भैया किसी का दरवाजा बजाना सीखो। क्या यह नहीं होना चाहिए कि आहिस्ता से दरवाजे पर दस्तक करें और फिर इंतजार की मुद्रा में तकिन विश्राम। मानता हूं ऐसा थोड़ा-सा इंतजार भी बहुत बड़ा लगता है। पर यह भी तो सोचिए कि भीतर जो कोई भी है, उसे थोड़ा वक्त लगेगा या नहीं। क्या वह बस इसी इंतजार में है कि आप दरवाजा बजाएं और वह झट से खोल दें। ऐसा भी नहीं है कि आपने बटन दबाया और मेरे घर का दरवाजा किसी तिलस्म की तरह सिम-सिम पलक झपकते ही अपने आप खुल जाए।
      मैं झुंझलाते-झल्लाते हुए उठ कर नाराजगी लिए दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खोला। सूनी आंखों से निहारते दो अपरिचित-से चेहरे थे। उन के पीछे कुछ दूरी पर सामने वाली आंटी खड़ी थी, जो अपने हाथ से इशारा करते हुए मुझ से कहने लगी- ‘सामने वाले दादा जी गुजर गए हैं।’ मैं सामने के घर की दिशा में देखते हुए उन लड़कों को पहचानने की कोशिश करने लगा। लगा अरे ये तो यहीं के, सामने घर में ही रहते हैं। काफी बार इनको देखा है। जिन दादा जी की बात बताई जा रही थी, वे उनके पोते हैं। मैं अपने सपने को याद करता हुआ इस सच को पहचान नहीं सका। मेरा पहले का गुस्सा और खीज जा चुके थे। वे चले गए और मैं भीतर आ गया। पत्नी ने पूछा- ‘कौन थे।’ मैंने सारी कहानी एक पंक्ति में बता दी- ‘सामने घर में दादा जी गुजर गए हैं।’ मैंने पाया बिना किसी भाव के वह बोली- ‘ये तो होना ही था। अच्छा हुआ जीवन सुधर गया। मुक्त हो गए, अगर एक दिन पहले संसार छोड़ते तो बड़ा पुन्न रहता। आब तो वैशाख भी उतर गया।’ मैं जिरह करने के मूड में जरा भी नहीं था, किंतु अब वैशाख के उतरने ने मुझे गहरे तक हिला कर रख दिया- ‘क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से। ये बातें बस कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं। तुम तो जल्दी से चाय बनाओ।’ मेरे प्रतिवाद से वह कुछ झुंझला जरूर गई थी, किंतु मौत की खबर उस में किसी आश्चर्य या दुख के भाव को ला पाने में असमर्थ रही। मैं अपने सपने को जैसे पूरा भूल चुका था। मानो वह स्मृति कहीं चली गई थी और मैं उसका पीछा कर रहा था। अंततः मैं हार गया मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मौत एक जीवन ले जा चुकी थी और मेरा सपना भी बिना किसी मौत के मुझ से दूर चला गया।
      मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि यह जीवन भी एक सपना है और उसे एक दिन चले जाना है। जीवन के रंगमंच पर जैसे कोई नया नाटक आरंभ हो चुका था। कोई भी मौत कभी नाटक नहीं, सच्चाई होती है। मैं सोचने लगा कि कितनी सहजता से हम किसी के अंत पर ऐसी चर्चा कर लेते हैं। कुछ विमर्श बाहरी-भीतरी यहां बस चलते रहते हैं। पूरे संसार में कहना-सुनना और निरंतर विचार करना जारी था, संसार तो बहुत बड़ा था। उसका हृदय भी बड़ा था। वह ऐसे कितने ही गम वर्षों से झेलता आया था। पर गली तो छोटी थी। बेहद तंग तो नहीं पर इतनी बड़ी भी नहीं। इतने लोगों के कारण गली तंग लगने लगी थी। सभी बड़ी सहजता-सरलता से अपने विचारों में खोए थे और अंतिम यात्रा के लिए जरूरी काम जारी थे।
      जीवन का सत्य क्या है? किसी जीवन की सच्चाई क्या है? जो जीवन जा चुका है, वही तो जानता है- अपनी सच्चाई। कैसे वह इस संसार से चला गया। वह गया है या उसे कोई ले कर गया है। वह किसी के साथ अपनी इच्छा से या अनिच्छा से चला गया। वह इस संसार में अकेला आया था और गया भी अकेले। पर ऐसे अकेले कोई कैसे जा सकता है। इस आने जाने में किसी की इच्छा क्यों नहीं होती। ऐसे कोई कहीं आना-जाना नहीं चाहता। सब यहीं रहना चाहते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ना हमारा आना, ना हमारा जाना और ना ही हमारा ठहरना। यही जीवन की सच्चाई है।  जब जीवन हमारा है, तो इस पर हमारा अधिकार क्यों नहीं है। जीवन पर हमारा अधिकार होना ही चाहिए। यह क्या भला, जीवन हमारा और अधिकार हमारे नहीं। मैं सोचने लगा कि मौत भी जब आती है, तब वह जीवन का दरवाजा पीटती है, या फिर हल्के-से दस्तक देकर थोड़ा इंतजार करती है। नहीं मौत तो बिना किसी दरवाजे पर दस्तक दिए आती है, उसके लिए कोई दरवाजा बंद हो नहीं सकता। मैं भी क्या-क्या सोचने लगा। मैं अभी जरा जल्दी में हूं और ये गंभीर बातें तो हमें आराम से करनी चाहिए। ऐसा हम कभी सोचते भी नहीं। ऐसा कुछ सोचने के लिए जीवन में अवकाश नहीं। आज अवकाश है- रविवार। मैं सोच रहा हूं। आज का दिन ही मौत ने चुना, जब मौत पास के घर में आई और किसी जीवन को चुरा कर ले गई। आना उसकी नियती है। 
      उसके आ कर जाने से गली में स्त्रियों का विलाप अब किसी गीत की भांति रुक रुक कर फिर फिर जारी हो रहा था। इस रोने में दर्द तो था, किंतु बहुत ठहरी हुई सहजता भी थी। जैसे उन सब से सोच रखा था कि ऐसा होना नियति है। दादा जी ने अस्सी बरस ले लिए। अब उनको इस संसार से जाना ही था। वे बीमार भी रहने लगे थे। घर-परिवार के सभी काम तो उन्होंने कब के कर दिए। उनका अब कोई काम नहीं था। जैसे वे पिछले काफी वर्षों से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मैं भी इंतजार कर रहा था कि कब घर से बाहर निकलूं। मुझे भी उन लोगों में शामिल होना था। चाय-नाश्ते के बाद अब मैं भी घर के बाहर अंतिम-यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोगों के बीच पहुंच चुका था। मातम में पूरी गली जैसे मौन होकर विलाप सुन रही थी। वहां काफी लोग जमा थे, पर सभी मौन और भाव-शून्य बस शव-यात्रा की तैयारियों में व्यस्त थे। इन दिनों धूप अधिक होने लगी है, इसलिए सब कुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो अच्छा। इस जल्दबाजी में मैं भी शामिल था। यह तो अच्छा हुआ, आज रविवार है नहीं तो एक छुट्टी शहीद हो जाती।
      मौत को डरावनी कहा जाता है पर हम सब को देख कर कोई हमें डरे हुए नहीं कह सकता था। हम मौत से डरे हुए नहीं थे। यह मौत जो एक जीवन ले कर चली गई थी, बड़ी जानी-पहचानी थी। हम सब जैसे तैयार थे कि उसको आना है। जिस देह में एक जीवन था वह जीवन भी अब थक चुका था। वह जीवन जहां वर्षों रहा था, वह शरीर अब किसी काम का नहीं था। अंततः जीवन मुक्त हो गया। जैसे जीवन जाते जाते अपनी छांया यहीं छोड़ गया। देह उस जीवन की प्रतिलिपि थी और घर वाले उस प्रतिलिपि को घर से बाहर कर देना चाहते थे। जीवन से रहित देह को रखने का स्थान घर नहीं होता। यह कोई नयी बात नहीं है, सभी यहां ऐसा ही करते हैं। करते क्या है, हम सब को ऐसे करना होता है। बस एक बंदरिया को देखा है जो अपने मृत बच्चे को छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमती रहती है। हम ऐसा नहीं करते, ऐसा नहीं कर सकते। घर वालों के लिए खुशी की बात थी जो कोई किसी को कह नहीं रहा था पर उन सब ने स्वीकार कर लिया था कि दादा जी चले गए हैं तो घर में एक कमरा खाली हो जाएगा। यह उनका कमरा अब किसी और को मिल जाएगा। हमेशा के लिए नहीं। ठीक ऐसे ही जैसे दादा जी को कभी यह मिला था। उन के जाने से बाकी किसी दूसरे के हिस्से था। कहीं कुछ भी खाली नहीं हुआ था। कमरे के फिर से भर जाने की बात और सब कुछ भरा-भरा था। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।
      आज वह घर औरतों से भरा हुआ था और गली आदमियों से। औरतों को तो घर में ही रोने का काम करना था। और कुछ जानती थी कि उनको बस चुपचाप यहां काफी देर तक बैठना है। उन औरतों में जो बस अभी-अभी आईं थी, वे पूछ रही थी- ‘ऐसे कैसे हुआ?’ वे बस पूछने के लिए पूछ रही थी। उन सब को सब मालूम था। नहीं भी मालूम होता तो भी यह मालूम होना कोई बहुत जरूरी नहीं था। वे कुछ पूछने और बात करने का रिवाज निभा रहीं थीं। आदमियों में भी रिवाज निभाने वाले काफी थे।
      हम सब को शव-यात्रा के पीछे-पीछे जाना था। हमारी सब की अपनी अपनी समस्याएं थी। अलग-अलग समस्याओं थी पर मेरी कोई समस्या नहीं थी। आज रविवार जो था। मैं ऐसे लोगों में शामिल हूं जो हर रविवार को तो कम से कम समस्याओं की छुट्टी रखते हैं। मेरे पास बैठे सज्जन को रविवार के होते हुए भी दुख था कि नगर निगम को समय पर फोन कर के गाड़ी मंगावा लेते तो इतनी दूर पैदल नहीं चलता पड़ता। एक दूसरे सज्जन को समस्या थी कि हम नई पीढ़ी के लोग पुराने रस्मो-रिवाज भूलते जा रहे हैं। अब के लोगों को अर्थी तक बांधना नहीं आता। क्या हमें इन सब बातों को जानना नहीं चाहिए। कैसे-क्या संस्कार होने चाहिए यह तो सभी को ध्यान होना चाहिए। जो कुछ संस्कार जानते थे वे जो जानते थे वैसा कर रहे थे, उन करने वालों के कामों में भी कमियों का बखान कुछ अधिक जानने वाले लोगों में होने लगा। वे कर कुछ भी नहीं रहे थे। न रोका-टोकी बस एक दूसरे को बता रहे थे- ऐसे नहीं, हमारे तो ऐसा होता है।
      इतने में सुबह जो लड़का मुझे कहने आया था, वह आया और मेरे पास बैठे एक बुजुर्ग को पूछने लगा- ‘दादा जी, ये मोती और सोने का तुस कैसे करना है।’ दादा जी ने बताया- ‘आंखों में मोती और मुंह में सोने का तुस देना है।’ ये बात मुझे परेशान करने लगी कि ऐसे जानने वाले लोग जब चले जाएंगे तब कौन ध्यान रखेगा इन बातों का। मैंने पाया दादा जी के लड़के रमेश को भी ऐसा कुछ ध्यान नहीं था। बस सारा काम हो रहा था, अंतिम क्रिया का सामान लाने वालों से लेकर उस सामान का प्रयोग करने वालों तक का जैसे कोई क्रम बिना किसी निर्धारण के किया हुआ था।
      वह समय आया जब अर्थी को उठा कर गली में लाया गया और हम शमशान की तरफ ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए हजूम में चल निकले। अब घर से रोने के स्वर में काफी तेजी आई किंतु लोगों के समवेत स्वर-घोष में वह मंद लगा। शव को कंधा देने वाले जवान थे वे तेजी से चले तो पीछे चलने वालों पीछे छूटने लगे। किसी ने दौड़ कर शव को कंधा देने वालों को धीरे चलने का कहा तब पीछे वालों को थोड़ी राहत मिली। फिर भी चार जवानों और कुछ बूढ़ों की इस दौड़ में मुकाबला काफी देर तक होना था। सभी राम नाम की सत्यता को जैसे कंठस्त फिर फिर कर रहे थे। सभी को यह सत्य विदित था। इस झूठे जगत में जिस की सत्यता का जयघोष हो रहा था, वह कौन था? वह वहां आगे था या कहीं पीछे छूटता चला जा रहा था। ऐसा तो नहीं उस परम सत्य को बूढे दादा जी ने मौत से मिल कर पा लिया था और वे उस के पास पहुंच गए थे या हम उनको नियति के आगोश में सौंपने चले जा रहे थे।
००००

01 मार्च, 2017

चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू

स बदलते समय में बहुत कुछ वदल रहा है। आए दिन कुछ न कुछ देखने-सुनने और भोगने को मिल रहा है। किसे सही कहें, और किसे गलत? सही और गलत दोनों पक्ष साथ-साथ चलते हैं। सवाल यह है कि हम किसे सही मानते हैं। यह सोचना होगा कि हम जिसके पक्ष में हैं, उसके पक्ष में क्यों है। कई बार हमारी आंखें, खुली होते हुए भी बंद होती है। जानबूझ कर आंखें बंद कर लेने वाले भी हमीं हैं। सही को सही और गलत को गलत बोलना चाहिए। मूक-दर्शकों की वजह से गलत अंततः लाइलाज बीमारी बन जाता है और हम बेबस हो जाते हैं।
           वही राजे-महाराजे हैं। अब बस राजा का चेहरा बदल गया है। घृतराष्ट-युग में लोग बहुत चीं-चा करते थे। आज भी चीं-चा करने का सिलसिला जारी है। सभी इस चीं-चीं और चीं-चा में शामिल होते हैं, पर जहां करना होता है वहां ‘चूं’ नहीं करते हैं। आवाज उठाने से कतराते हैं। डरते हैं। हम समूह-गान तो गा लेते हैं, पर एकल-गान जैसे हमारे बस की बात नहीं। लोग क्या कहेंगे? ऐसा सोचते हुए अपनी ‘चूं’ को भीतर का भीतर रखते हैं। गलत होता है तो ‘चूं’ होनी चाहिए। एक ‘चूं’ होने से संभव है दूसरे भी ‘चूं’ में शामिल हो जाएं। हमें संगठित होकर अपनी ‘चूं’ को समवेत सुर में गूंज बना देना होता है। पंच काका कहते हैं- हे निरीह प्राणियों! लोकतंत्र में ‘चूं’ का महत्त्व समझो। अपनी चूं को भीतर दबा लेना लोकतंत्र की हत्या है।
           जब चूहों की चूं-चा सुनाई देती है तो हम तुरंत उन्हें पकड़ कर घर से बाहर कर देना चाहते हैं। पिंजरा केवल चूहों के लिए नहीं हम सभी के लिए अलग-अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है। घर में कबूतर आते हैं और अपना गाना- ‘गटर-गूं, गटर-गूं’ के स्थाई अंतरे में सुनाते हैं। उनके गाने को हम सुनना नहीं चाहते, और उन्हें उड़ा देते हैं। वे फिर से आते हैं, और अपना पुराना छूटा हुआ राग गुनगुनाते हैं। हम चूं-चा और गटर-गूं जैसी कोई आवाज पसंद नहीं करते हैं। यह हमारी पसंद है कि कुछ कुत्तों-बिल्लियों की हाऊ-हाऊ और म्याऊ-म्याऊ पसंद है। जीवन के आस-पास अनेक जीवन है। मच्छर, मक्खी से लेकर ऊंट-हाथी तक के अनेक जीव-जंतु और पेड़-पौधों से हमारा परिचय सिमटता जा रहा है।
           यह आत्मबोध मुझे कल ही हुआ जब पंच काका ने सैर करते समय एक पेड़ के पास रूक कर अचानक पूछ लिया- जानते हो यह किसका पेड़ है? मैं बगले झांकने लगा। उस पेड़ को ऊपर-नीचे से गौर से देखते हुए सोच रहा था- काश! यह पेड़ खुद बोल पाता। काका हंसे और बोले- वाह बाहदुर, तुम्हारी पीढ़ी के क्या कहने। दिन-रात ना जाने किस-किस ‘टीं-टा-टू’ में खोए रहते हो। अपनी झेंप मिटाते हुए मैंने काका से कहा- हम प्रकृति से कट से गए हैं। बहुत से पेड़-पौधों के नाम हमें ध्यान नहीं। अनेक जीव-जंतुओं के नाम नहीं जानते हैं। काका बोले- नहीं जानते तभी तो पूछ रहा हूं। अब की पीढ़ी सो रही है। मैं पूछता हूं कि तुम लोग कब तक सोते रहोगे। कभी खुद से खुद को बाहर निकलो। अपने आस-पास को पहचानों। दुनिया बहुत बड़ी है। तुमने दुनिया को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया। जेब में बंद कर लिया है। ये क्या तुम्हारा इंटरनेट जो है, दिन-रात लगे रहते हो। सुनो, ये ‘शिरीष का पेड़’ है। कल तुम हजारी प्रसाद जी का निबंध पढ़ रहे थे।
 ० नीरज दइया