05 मार्च, 2017

नियति के आगोश में

सुबह कितनी जल्दी हो जाती है पता ही नहीं चलता। लगा अभी थोड़ी देर पहले ही तो रात को सोए थे, और इतनी जल्दी कैसे पूरी रात गुजर गई। अभी मेरी आंखें पूरी खुली भी नहीं थी, खुलने को तैयार भी नहीं थी कि लगा कोई बाहर हमारा दरवाजा पीट रहा है। एक सपना अभी आंखों में अटका था, कुछ स्मृति में और कुछ विस्मृत होते हुए। किसी ने सपने की हत्या कर दी। मैं अपने सपने को भूल सोचने लगा कि कुछ लोग बेवकूफ होते हैं। वे किसी के घर का दरवाजा बजाना भी नहीं जानते, और वह भी सुबह-सुबह के वक्त। सोचते नहीं- अरे, कोई सो रहा होगा। क्यों किसी की नींद में खलल डाला जाए। कोई सपने न जाने कहां तक जाता कैसे पूरा होता। ऐसे लोगों को कौन समझाएं कि भैया किसी का दरवाजा बजाना सीखो। क्या यह नहीं होना चाहिए कि आहिस्ता से दरवाजे पर दस्तक करें और फिर इंतजार की मुद्रा में तकिन विश्राम। मानता हूं ऐसा थोड़ा-सा इंतजार भी बहुत बड़ा लगता है। पर यह भी तो सोचिए कि भीतर जो कोई भी है, उसे थोड़ा वक्त लगेगा या नहीं। क्या वह बस इसी इंतजार में है कि आप दरवाजा बजाएं और वह झट से खोल दें। ऐसा भी नहीं है कि आपने बटन दबाया और मेरे घर का दरवाजा किसी तिलस्म की तरह सिम-सिम पलक झपकते ही अपने आप खुल जाए।
      मैं झुंझलाते-झल्लाते हुए उठ कर नाराजगी लिए दरवाजे तक पहुंचा और दरवाजा खोला। सूनी आंखों से निहारते दो अपरिचित-से चेहरे थे। उन के पीछे कुछ दूरी पर सामने वाली आंटी खड़ी थी, जो अपने हाथ से इशारा करते हुए मुझ से कहने लगी- ‘सामने वाले दादा जी गुजर गए हैं।’ मैं सामने के घर की दिशा में देखते हुए उन लड़कों को पहचानने की कोशिश करने लगा। लगा अरे ये तो यहीं के, सामने घर में ही रहते हैं। काफी बार इनको देखा है। जिन दादा जी की बात बताई जा रही थी, वे उनके पोते हैं। मैं अपने सपने को याद करता हुआ इस सच को पहचान नहीं सका। मेरा पहले का गुस्सा और खीज जा चुके थे। वे चले गए और मैं भीतर आ गया। पत्नी ने पूछा- ‘कौन थे।’ मैंने सारी कहानी एक पंक्ति में बता दी- ‘सामने घर में दादा जी गुजर गए हैं।’ मैंने पाया बिना किसी भाव के वह बोली- ‘ये तो होना ही था। अच्छा हुआ जीवन सुधर गया। मुक्त हो गए, अगर एक दिन पहले संसार छोड़ते तो बड़ा पुन्न रहता। आब तो वैशाख भी उतर गया।’ मैं जिरह करने के मूड में जरा भी नहीं था, किंतु अब वैशाख के उतरने ने मुझे गहरे तक हिला कर रख दिया- ‘क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से। ये बातें बस कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं। तुम तो जल्दी से चाय बनाओ।’ मेरे प्रतिवाद से वह कुछ झुंझला जरूर गई थी, किंतु मौत की खबर उस में किसी आश्चर्य या दुख के भाव को ला पाने में असमर्थ रही। मैं अपने सपने को जैसे पूरा भूल चुका था। मानो वह स्मृति कहीं चली गई थी और मैं उसका पीछा कर रहा था। अंततः मैं हार गया मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मौत एक जीवन ले जा चुकी थी और मेरा सपना भी बिना किसी मौत के मुझ से दूर चला गया।
      मुझे ऐसा क्यों लगने लगा कि यह जीवन भी एक सपना है और उसे एक दिन चले जाना है। जीवन के रंगमंच पर जैसे कोई नया नाटक आरंभ हो चुका था। कोई भी मौत कभी नाटक नहीं, सच्चाई होती है। मैं सोचने लगा कि कितनी सहजता से हम किसी के अंत पर ऐसी चर्चा कर लेते हैं। कुछ विमर्श बाहरी-भीतरी यहां बस चलते रहते हैं। पूरे संसार में कहना-सुनना और निरंतर विचार करना जारी था, संसार तो बहुत बड़ा था। उसका हृदय भी बड़ा था। वह ऐसे कितने ही गम वर्षों से झेलता आया था। पर गली तो छोटी थी। बेहद तंग तो नहीं पर इतनी बड़ी भी नहीं। इतने लोगों के कारण गली तंग लगने लगी थी। सभी बड़ी सहजता-सरलता से अपने विचारों में खोए थे और अंतिम यात्रा के लिए जरूरी काम जारी थे।
      जीवन का सत्य क्या है? किसी जीवन की सच्चाई क्या है? जो जीवन जा चुका है, वही तो जानता है- अपनी सच्चाई। कैसे वह इस संसार से चला गया। वह गया है या उसे कोई ले कर गया है। वह किसी के साथ अपनी इच्छा से या अनिच्छा से चला गया। वह इस संसार में अकेला आया था और गया भी अकेले। पर ऐसे अकेले कोई कैसे जा सकता है। इस आने जाने में किसी की इच्छा क्यों नहीं होती। ऐसे कोई कहीं आना-जाना नहीं चाहता। सब यहीं रहना चाहते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ना हमारा आना, ना हमारा जाना और ना ही हमारा ठहरना। यही जीवन की सच्चाई है।  जब जीवन हमारा है, तो इस पर हमारा अधिकार क्यों नहीं है। जीवन पर हमारा अधिकार होना ही चाहिए। यह क्या भला, जीवन हमारा और अधिकार हमारे नहीं। मैं सोचने लगा कि मौत भी जब आती है, तब वह जीवन का दरवाजा पीटती है, या फिर हल्के-से दस्तक देकर थोड़ा इंतजार करती है। नहीं मौत तो बिना किसी दरवाजे पर दस्तक दिए आती है, उसके लिए कोई दरवाजा बंद हो नहीं सकता। मैं भी क्या-क्या सोचने लगा। मैं अभी जरा जल्दी में हूं और ये गंभीर बातें तो हमें आराम से करनी चाहिए। ऐसा हम कभी सोचते भी नहीं। ऐसा कुछ सोचने के लिए जीवन में अवकाश नहीं। आज अवकाश है- रविवार। मैं सोच रहा हूं। आज का दिन ही मौत ने चुना, जब मौत पास के घर में आई और किसी जीवन को चुरा कर ले गई। आना उसकी नियती है। 
      उसके आ कर जाने से गली में स्त्रियों का विलाप अब किसी गीत की भांति रुक रुक कर फिर फिर जारी हो रहा था। इस रोने में दर्द तो था, किंतु बहुत ठहरी हुई सहजता भी थी। जैसे उन सब से सोच रखा था कि ऐसा होना नियति है। दादा जी ने अस्सी बरस ले लिए। अब उनको इस संसार से जाना ही था। वे बीमार भी रहने लगे थे। घर-परिवार के सभी काम तो उन्होंने कब के कर दिए। उनका अब कोई काम नहीं था। जैसे वे पिछले काफी वर्षों से इसी दिन का इंतजार कर रहे थे। मैं भी इंतजार कर रहा था कि कब घर से बाहर निकलूं। मुझे भी उन लोगों में शामिल होना था। चाय-नाश्ते के बाद अब मैं भी घर के बाहर अंतिम-यात्रा में शामिल होने पहुंचे लोगों के बीच पहुंच चुका था। मातम में पूरी गली जैसे मौन होकर विलाप सुन रही थी। वहां काफी लोग जमा थे, पर सभी मौन और भाव-शून्य बस शव-यात्रा की तैयारियों में व्यस्त थे। इन दिनों धूप अधिक होने लगी है, इसलिए सब कुछ जल्दी-जल्दी निपट जाए तो अच्छा। इस जल्दबाजी में मैं भी शामिल था। यह तो अच्छा हुआ, आज रविवार है नहीं तो एक छुट्टी शहीद हो जाती।
      मौत को डरावनी कहा जाता है पर हम सब को देख कर कोई हमें डरे हुए नहीं कह सकता था। हम मौत से डरे हुए नहीं थे। यह मौत जो एक जीवन ले कर चली गई थी, बड़ी जानी-पहचानी थी। हम सब जैसे तैयार थे कि उसको आना है। जिस देह में एक जीवन था वह जीवन भी अब थक चुका था। वह जीवन जहां वर्षों रहा था, वह शरीर अब किसी काम का नहीं था। अंततः जीवन मुक्त हो गया। जैसे जीवन जाते जाते अपनी छांया यहीं छोड़ गया। देह उस जीवन की प्रतिलिपि थी और घर वाले उस प्रतिलिपि को घर से बाहर कर देना चाहते थे। जीवन से रहित देह को रखने का स्थान घर नहीं होता। यह कोई नयी बात नहीं है, सभी यहां ऐसा ही करते हैं। करते क्या है, हम सब को ऐसे करना होता है। बस एक बंदरिया को देखा है जो अपने मृत बच्चे को छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमती रहती है। हम ऐसा नहीं करते, ऐसा नहीं कर सकते। घर वालों के लिए खुशी की बात थी जो कोई किसी को कह नहीं रहा था पर उन सब ने स्वीकार कर लिया था कि दादा जी चले गए हैं तो घर में एक कमरा खाली हो जाएगा। यह उनका कमरा अब किसी और को मिल जाएगा। हमेशा के लिए नहीं। ठीक ऐसे ही जैसे दादा जी को कभी यह मिला था। उन के जाने से बाकी किसी दूसरे के हिस्से था। कहीं कुछ भी खाली नहीं हुआ था। कमरे के फिर से भर जाने की बात और सब कुछ भरा-भरा था। वे अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।
      आज वह घर औरतों से भरा हुआ था और गली आदमियों से। औरतों को तो घर में ही रोने का काम करना था। और कुछ जानती थी कि उनको बस चुपचाप यहां काफी देर तक बैठना है। उन औरतों में जो बस अभी-अभी आईं थी, वे पूछ रही थी- ‘ऐसे कैसे हुआ?’ वे बस पूछने के लिए पूछ रही थी। उन सब को सब मालूम था। नहीं भी मालूम होता तो भी यह मालूम होना कोई बहुत जरूरी नहीं था। वे कुछ पूछने और बात करने का रिवाज निभा रहीं थीं। आदमियों में भी रिवाज निभाने वाले काफी थे।
      हम सब को शव-यात्रा के पीछे-पीछे जाना था। हमारी सब की अपनी अपनी समस्याएं थी। अलग-अलग समस्याओं थी पर मेरी कोई समस्या नहीं थी। आज रविवार जो था। मैं ऐसे लोगों में शामिल हूं जो हर रविवार को तो कम से कम समस्याओं की छुट्टी रखते हैं। मेरे पास बैठे सज्जन को रविवार के होते हुए भी दुख था कि नगर निगम को समय पर फोन कर के गाड़ी मंगावा लेते तो इतनी दूर पैदल नहीं चलता पड़ता। एक दूसरे सज्जन को समस्या थी कि हम नई पीढ़ी के लोग पुराने रस्मो-रिवाज भूलते जा रहे हैं। अब के लोगों को अर्थी तक बांधना नहीं आता। क्या हमें इन सब बातों को जानना नहीं चाहिए। कैसे-क्या संस्कार होने चाहिए यह तो सभी को ध्यान होना चाहिए। जो कुछ संस्कार जानते थे वे जो जानते थे वैसा कर रहे थे, उन करने वालों के कामों में भी कमियों का बखान कुछ अधिक जानने वाले लोगों में होने लगा। वे कर कुछ भी नहीं रहे थे। न रोका-टोकी बस एक दूसरे को बता रहे थे- ऐसे नहीं, हमारे तो ऐसा होता है।
      इतने में सुबह जो लड़का मुझे कहने आया था, वह आया और मेरे पास बैठे एक बुजुर्ग को पूछने लगा- ‘दादा जी, ये मोती और सोने का तुस कैसे करना है।’ दादा जी ने बताया- ‘आंखों में मोती और मुंह में सोने का तुस देना है।’ ये बात मुझे परेशान करने लगी कि ऐसे जानने वाले लोग जब चले जाएंगे तब कौन ध्यान रखेगा इन बातों का। मैंने पाया दादा जी के लड़के रमेश को भी ऐसा कुछ ध्यान नहीं था। बस सारा काम हो रहा था, अंतिम क्रिया का सामान लाने वालों से लेकर उस सामान का प्रयोग करने वालों तक का जैसे कोई क्रम बिना किसी निर्धारण के किया हुआ था।
      वह समय आया जब अर्थी को उठा कर गली में लाया गया और हम शमशान की तरफ ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए हजूम में चल निकले। अब घर से रोने के स्वर में काफी तेजी आई किंतु लोगों के समवेत स्वर-घोष में वह मंद लगा। शव को कंधा देने वाले जवान थे वे तेजी से चले तो पीछे चलने वालों पीछे छूटने लगे। किसी ने दौड़ कर शव को कंधा देने वालों को धीरे चलने का कहा तब पीछे वालों को थोड़ी राहत मिली। फिर भी चार जवानों और कुछ बूढ़ों की इस दौड़ में मुकाबला काफी देर तक होना था। सभी राम नाम की सत्यता को जैसे कंठस्त फिर फिर कर रहे थे। सभी को यह सत्य विदित था। इस झूठे जगत में जिस की सत्यता का जयघोष हो रहा था, वह कौन था? वह वहां आगे था या कहीं पीछे छूटता चला जा रहा था। ऐसा तो नहीं उस परम सत्य को बूढे दादा जी ने मौत से मिल कर पा लिया था और वे उस के पास पहुंच गए थे या हम उनको नियति के आगोश में सौंपने चले जा रहे थे।
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01 मार्च, 2017

चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू

स बदलते समय में बहुत कुछ वदल रहा है। आए दिन कुछ न कुछ देखने-सुनने और भोगने को मिल रहा है। किसे सही कहें, और किसे गलत? सही और गलत दोनों पक्ष साथ-साथ चलते हैं। सवाल यह है कि हम किसे सही मानते हैं। यह सोचना होगा कि हम जिसके पक्ष में हैं, उसके पक्ष में क्यों है। कई बार हमारी आंखें, खुली होते हुए भी बंद होती है। जानबूझ कर आंखें बंद कर लेने वाले भी हमीं हैं। सही को सही और गलत को गलत बोलना चाहिए। मूक-दर्शकों की वजह से गलत अंततः लाइलाज बीमारी बन जाता है और हम बेबस हो जाते हैं।
           वही राजे-महाराजे हैं। अब बस राजा का चेहरा बदल गया है। घृतराष्ट-युग में लोग बहुत चीं-चा करते थे। आज भी चीं-चा करने का सिलसिला जारी है। सभी इस चीं-चीं और चीं-चा में शामिल होते हैं, पर जहां करना होता है वहां ‘चूं’ नहीं करते हैं। आवाज उठाने से कतराते हैं। डरते हैं। हम समूह-गान तो गा लेते हैं, पर एकल-गान जैसे हमारे बस की बात नहीं। लोग क्या कहेंगे? ऐसा सोचते हुए अपनी ‘चूं’ को भीतर का भीतर रखते हैं। गलत होता है तो ‘चूं’ होनी चाहिए। एक ‘चूं’ होने से संभव है दूसरे भी ‘चूं’ में शामिल हो जाएं। हमें संगठित होकर अपनी ‘चूं’ को समवेत सुर में गूंज बना देना होता है। पंच काका कहते हैं- हे निरीह प्राणियों! लोकतंत्र में ‘चूं’ का महत्त्व समझो। अपनी चूं को भीतर दबा लेना लोकतंत्र की हत्या है।
           जब चूहों की चूं-चा सुनाई देती है तो हम तुरंत उन्हें पकड़ कर घर से बाहर कर देना चाहते हैं। पिंजरा केवल चूहों के लिए नहीं हम सभी के लिए अलग-अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है। घर में कबूतर आते हैं और अपना गाना- ‘गटर-गूं, गटर-गूं’ के स्थाई अंतरे में सुनाते हैं। उनके गाने को हम सुनना नहीं चाहते, और उन्हें उड़ा देते हैं। वे फिर से आते हैं, और अपना पुराना छूटा हुआ राग गुनगुनाते हैं। हम चूं-चा और गटर-गूं जैसी कोई आवाज पसंद नहीं करते हैं। यह हमारी पसंद है कि कुछ कुत्तों-बिल्लियों की हाऊ-हाऊ और म्याऊ-म्याऊ पसंद है। जीवन के आस-पास अनेक जीवन है। मच्छर, मक्खी से लेकर ऊंट-हाथी तक के अनेक जीव-जंतु और पेड़-पौधों से हमारा परिचय सिमटता जा रहा है।
           यह आत्मबोध मुझे कल ही हुआ जब पंच काका ने सैर करते समय एक पेड़ के पास रूक कर अचानक पूछ लिया- जानते हो यह किसका पेड़ है? मैं बगले झांकने लगा। उस पेड़ को ऊपर-नीचे से गौर से देखते हुए सोच रहा था- काश! यह पेड़ खुद बोल पाता। काका हंसे और बोले- वाह बाहदुर, तुम्हारी पीढ़ी के क्या कहने। दिन-रात ना जाने किस-किस ‘टीं-टा-टू’ में खोए रहते हो। अपनी झेंप मिटाते हुए मैंने काका से कहा- हम प्रकृति से कट से गए हैं। बहुत से पेड़-पौधों के नाम हमें ध्यान नहीं। अनेक जीव-जंतुओं के नाम नहीं जानते हैं। काका बोले- नहीं जानते तभी तो पूछ रहा हूं। अब की पीढ़ी सो रही है। मैं पूछता हूं कि तुम लोग कब तक सोते रहोगे। कभी खुद से खुद को बाहर निकलो। अपने आस-पास को पहचानों। दुनिया बहुत बड़ी है। तुमने दुनिया को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया। जेब में बंद कर लिया है। ये क्या तुम्हारा इंटरनेट जो है, दिन-रात लगे रहते हो। सुनो, ये ‘शिरीष का पेड़’ है। कल तुम हजारी प्रसाद जी का निबंध पढ़ रहे थे।
 ० नीरज दइया

28 फ़रवरी, 2017

याद नहीं अब कुछ

साहिर लुधियानवी साहब का बहुत पुराना गान है जिसमें नायिका नायक को भूलने की बात पर कहती है कि मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है। नए संदर्भों में यह गाना आब बेहद प्रासंगिक हो गया है। हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी को हक था कि उन्होंने बड़े नोटों को एक झटके में भूलाने का प्रबंध कर दिया। नोटों से हमारी मोहब्बत बहुत पुरानी थी, भला ऐसे कैसे भूल जाएं। काश ‘भूल जाना’ कहना जितना आसान है, उतना ही असल में भूल जाना आसान होता। कुछ कहना सरल होता है, और कहे हुए को लिखना भी अधिक कठिन नहीं होता, पर कहे-लिखे पर अमल करना बेहद कठिन होता है।
           प्रेम में सब कुछ भूला जा सकता है, पर नोटों से ऐसा प्रेम करने वाले भी है जिन्होंने सब कुछ भूला कर बस नोटों को ही याद रखा है। राम-राम जपना, पराया माल अपना.... की तर्ज पर वे सबका माल अपने माल में शामिल करते चले आ रहे थे कि जैसे चालीस चोरों के सामने अलीबाबा आ गए। सारे चोरों ने शोर मचाया- ‘उड़ी बाबा, उड़ी बाबा।’ पर किसी ने नहीं सुना। असल में ये हुआ था कि ऐसी घोषणा सुन कर सारे चोरों की जबान तालु के चिपक गई। साथ में पैर भी जमीन से चिपक गए। वे हिल-डुल भी नहीं सके। ऐसे सुन्न हुए कि अब तक होश नहीं आया है। भूल गए सब कुछ, याद नहीं अब कुछ.... गाने में तो नायक ‘जूली’ की याद में सब कुछ भूल कर, केवल अपने प्यार को याद रखे जाने का ऐलान करता है। आनंद बक्षी साहब के इस गाने का यदि आप स्मरण करें तो पाएंगे कि इसमें सार की बात कही गई है। वैसे बात तो नायक और नायिका की है, पर अब बात बड़े नोटों पर लागू हो रही है। इतना भी दूर मत जाओ कि पास आना हो मुश्किल, और इतना भी पास मत आओ कि दूर जाना हो मुश्किल। यानी धन से पर्याप्त दूरी जरूरी है। नोटों में चोर तो ऐसे घुल-मिल गए कि उन्हें होश ही नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है।ऐसो को भला कहां याद रहता है कि किस-किस का कहां-कहां से खजाना लूटा। लूटे और लुटे हुए का हिसाब बड़ा कठिन है। बचते-बचाते फिरो अब। अगर पकड़ कर धर लिए गए तो हिसाब कैसे दिया जाएगा। प्यार के मामले में तो ‘आई लव यू’ कहा और काम चल गया। इनकम टेक्स वाले बेदर्द होते हैं, उनके लिए ‘आई लव यू, धाई लव यू’ कुछ नहीं होता। वे बस इतना ही पूछते हैं- ‘आयो कहां से धनश्याम, रैना बिताई किस धाम.. हाय राम।’ इनकम टैक्स के इस अनोखे गीत-संगीत से डरने वाले अब निर्धनों की मनुहारें कर रहे थे- ‘ले लो ना भैया। भाई साहब आप ले लो। बहन जी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आप को लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम से हम नहीं मांगेंगे। आपको दे कर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं अब कुछ....। ’काश ! ये धनवान लोग पहले कभी अपना जरा-सा भी प्यार दिखाते। अरे हमें नहीं तो अपनों को और अपने आस-पास वालों पर ही दिखाते। जिसके पास भरा-पूरा तालाब है। वे आप जितना पीना है, पी लें भाई। नहाना है तो नहा लो। पर अपने आस-पास जो प्यासे मार रहे हैं, उधर भी मुंडी धुमा कर देख लो। कुछ बूंदें या एक-आध गिलास उन बेचारों के नाम कर दो। मान तुम्हारा और तुम्हारे बाप-दादों का धन है। वे यहां छोड़ गए थे। जाते-जाते तुम भी छोड़ जाओगे। कल किसने देखा भैया। यहां का हिसाब यहीं है। पंच काका कहते हैं- ‘काल करे सो आज कर। आज करै सो अब।’ भैया, अब तुम्हारी दौलत तुम से कह रही है- ‘तुम मुझे भूल भी जाओ, ये हक है तुमको..।’

* नीरज दइया

20 फ़रवरी, 2017

पत्नियां, पार्टियां और पटरियां

त्नियां, पार्टियां और पटरियां की राशि एक है। पत्नी के विषय में किसी को क्या संदेह हो सकता है कि वे जानदार होती हैं। पार्टियों में जान फूंकनी पड़ती है। पटरियां ना जानदार होती हैं और ना ही उन में जान फूंक कर जानदार बनाया जा सकता है। वे बेचारी बेजान होती है। हर फूंक से बेअसर रहती हैं। पत्नियों और पार्टियों के पटरियों पर चलने के विषय में आपका क्या मत है? मैं समझता हूं कि पटरियों पर पत्नी हो या पार्टी, किसी को भी चलना-चलाना सरल बात नहीं होती। दूसरी तरफ अगर आप ने अगर अपनी या किसी की भी पत्नी के विषय में पटगरियों के संबंध में कोई भी बयान दे दिया तो आपकी खैर नहीं है। बेहतर यह है कि पत्नियों और पर्टियों के विषय में पटरी पर होने या उतारने की घोषणा गोपनीय रखी जाए। इसी में लाभा है कि ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि को देख कर भी अनदेखा किया जाए। आपने भूल कर अपनी पत्नी को कह दिया- तुम पटरी पर चल रही हो, अथवा कह दिया- तुम पटरी पर नहीं चल रही, तो दोनों स्थितियों में कलह का प्रबल योग है।
          मैं केवल पतियों की बात नहीं कर रहा, इसे आप अपने या दूसरे के पति पर प्रयोग के रूप में अजमा कर देख लें- तुम पटरी पर चल रहे हो अथवा तुम पटरी पर नहीं चल रहे, कहना मूर्खता है। पति-पत्नी दोनों शब्दों की राशि एक है और ऐसे संवाद दोनों को बिदकाते हैं। अस्तु यह संबाद कहना-सुनना खतरनाक और हानिकार समझा जाए। सोचिए कि जब खुद के घर में नहीं कहा जा सकता, तो बाहरी सदस्य के लिए प्रयोग कर लिया गया तो बड़ा चक्कर चल जाएगा। पटरी पर होने या न होने से भी खतरनाक है- पटरी पर नहीं होना पाया जाना अथवा पकड़े जाना। आज ऐसा कौन है जो दावे के साथ कह सके कि मैं पटरी पर हूं। न पति पटरी पर है और न पत्नियां, फिर पार्टियों की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए। पार्टियों के लोग पार्टियां बदलते रहते हैं और कभी जब ऐसा संभव नहीं होता, तो अपनी ही पार्टी का नाम बदल लेते हैं। बदलाव की मांग से ही कुछ बदलने की प्रक्रिया आरंभ होती है।
          आगरा के चौधरी बशीर और गजाला लारी बसापा में थे तो मायावती ने शादी कराई थी और सपा में आने के बाद तलाक हो गया। पति-पत्नी और पार्टी बदलने वाले बार बार सोचते हैं कि अब हम पटरी पर हैं, पर पटरियों की माया इतनी सरल कहां होती है। पटरियां भले बेजान हो किंतु वे उन्हीं लोगों के लिए होती हैं जो खुद चलते हैं। राजा भोज की लोककथा की भांति ये पटरियां कहीं नहीं जाती पर इन पर चलने वाले भले इन पे चले या इनके आस-पास चलें, और चलते रहें तो मंजिल पा सकते हैं। जो पटरियों से उतर कर बहुत दूर चले जाते हैं, उसका राम ही मालिक होता है। चौधरी बशीर जी का बीएसपी से समाजवादी पार्टी, उसके बाद कांग्रेस, फिर राष्ट्रीय समानता दल और आखिर में लौटकर फिर बीएसपी में पहुंचना विदित है। विधायक रहे बशीर चौधरी के पास अब न तो पत्नी है और न ही कोई पार्टी।
          पंच काका कहते हैं कि पति-पत्नी को पार्टी कहना ही गलत है, फिर भी वकील इनको दो पार्टियां मानते हैं। इनकी जब आपस में पटरी नहीं बैठती तो ये पार्टियां रेल की पटरियों की तरह जुदा होकर भटकती-भटकाती हैं। 
 ० नीरज दइया

17 फ़रवरी, 2017

खाने-पीने की शिकायत

बिना खाए-पीए कोई जिंदा नहीं रह सकता। जिंदा रहने के लिए खाना-पीना बेहद जरूरी है। अब यह बात अलग है कि कोई आटे में नमक जितना खाता-पीता है और कोई नमक को छोड़ कर केवल आटा खाता है। आटे और नमक का रिस्ता ही कुछ ऐसा है कि इनके कुछ ऐसे भी दिवाने हैं कि आटा और नमक दोनों ही खा जाते हैं। किसी के लिए कुछ नहीं छोड़ने पर समस्याएं आरंभ होती है। कहते हैं कि कोई आटे में नमक जितना खाए तो जायज बात है और जो खाने का अनुपात बिगाड़े यानी आटे जितना खाए तो वह बड़ा हिम्मत वाला शेर दिल होता है। उसके फसने की संभावनाएं अधिक रहती है। यह तो पूरे मरने जैसा काम है कि सब कुछ खा जाएं। बुजुर्ग कह गए कि खाना-पीना सदैव छिप कर होना चाहिए। सभी चुपचाप खाने में विश्वास रखते हैं। अपने-अपने नियम है कि कोई खाने से पहले पीता हैं तो कोई खाने के अंतराल को बीच-बीच में पी कर भरता है। कुछ ना खाने के पहले, ना बीच में और ना ही बाद में पीते हैं। पीने से दूर रहने वाले बहुत है, तो ऐसे भी हैं कि कुछ पीने को मिल जाए तो खाने की छुट्टी। जो भी हो किंतु खाना और पीना सार्वजनिक क्रियाएं नहीं है अथवा नहीं होनी चाहिए।
            पीने के छूट हर किसी को नहीं होती, किंतु जवानों को तो पीने का परमिट मिला होता है। सेना में नियम इतने कठोर है कि सभी का हाजमा दुरुस्त रहता है। जहां सभी पेच कसे हुए हो तो मशीन कम खराब होती है। अगर वहां किसी का हाजमा खराब हो जाए, तो पुखता इंतजाम है। बी.एस.एफ. का एक जवान अपना तेज फेसबुक पर वीडियो के जरिए जगजाहिर कर देता है। सारी आंखें खुल जाती है। जय जबान और जय किसान का सच सामने आ चुका है। किसानों की तो पहले से ही दाल पतली थी। वे तो दाल को खाते हैं और जहां पीने का मन हुआ तो दल को ही पी लेते हैं। सभी ऐसा सोचते थे कि जवानों तो खाने-पीने की ऐश है। वे मजे से है। देश के रक्षक और सुरक्षा-प्रहरी या हमारे अन्नदाता किसान दोनों ही मोर्चे बेहद जरूरी है। आजाद देश में कोई कुछ भी करता है तो उस पर नियम-कानून और अनेक धाराएं हैं। अब अगर आपका दिल कमजोर है और काबू में नहीं रहता तो अपराधियों को अच्छा खाना दे दिया। ऐसा नहीं करना था यह तो शिकायत का मामला बनता है।
            ना खाने की शिकायत होनी चाहिए और ना खिलाने की। ना पीने की शिकायत होनी चाहिए और ना पिलाने की। यानी खाने-पीने की शिकायत नहीं होनी चाहिए। खाना-पीना तो सब जगह चलता रहता है। सरे-आम नहीं तो चोरी-छिप्पे। जिनको खाना-पीना है, वे खाएंगे-पिएंगे और जिनको रोना-धोना है वे रोएंगे-धोएंगे। दुष्यंत ने माकूल लिखा था- “न हो कमीज तो पांवों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।” पर अब लगता है कि जो लोग मुनासिब थे कूच कर गए। अब समय बदल गया है और लोग अपना पेट ऐसे-वैसे नहीं ढकते। पंच काका कहते हैं कि अपना देश अजीब है। यहां खाने-पीने पर भी पहरे हैं। लोग पीने की शिकायत करते हैं। अरे ये तो कुदरत का दिया हसीं इनाम है। इस इनाम को दो नाजुक होंठों से छू लेने दो एंड सिंग विथ मी- छलकाए जाम, आईये आप की आंखों के नाम, होठों के नाम।
नीरज दइया