14 फ़रवरी, 2017

पंच काका के जेबी-बच्चे

ब भी मैं अपनी टोपी खोलता हूं तो उस के भीतर झांकता हूं। मुझे मेरी टोपी खाली मिलती है। सिर में बाल बहुत कम बचे हैं, कभी-कभार कोई भूला-भटका नन्हा-सा बाल बाल टोपी में नजर आ जाता है। सिर में घने लंबे बाल और जूंए हो तो टोपी में कुछ पाए जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है। जब मैं छोटा था, मुझे टोपी पहननी नहीं आती था। धीरे धीरे मैंने जब टोपी पहननी सीख ली तो मैंने दूसरों को टोपी पहनाना भी सीखा। बहुत बार मैं अपने साथी की टोपी को दूसरे साथी को पहनना देता, और दूसरे की तीसरे को। एक की टोपी दूसरे के सिर पर रखने में जो आनंद है, वह कोई हुनरमंद या भुगतभोगी ही जान-समझ सकता है। वे अज्ञानता में जीते हैं, जो इस कला का महत्त्व नहीं जानते। अगर कोई अज्ञानता में जीता भी हो, तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए कि मैं अज्ञानता में जी रहा हूं। इक्कीसवीं सदी के आजाद भारत में हम किसी को अज्ञानता में कैसे जीने दे सकते हैं। मैंने किसी ज्ञान की टोपी या विशेष चश्मा नहीं पहना, पर इतना तो जान गया कि टोपी बहुत कुछ कर सकती है। कुछ का तो मानना है कि टोपी सब कुछ कर सकती है। देश में किस्म-किस्म की टोपियां पाई जाती है। टोपी पहनना और पहनाना हरेक को आना चाहिए।
नेता और जादूगर की टोपी से मैं बड़ा प्रभावित रहा हूं। टोपी की पहचान रखना जरूरी है। जादूगर अपनी टोपी से कुछ भी निकालकर दिखा सकता है। हम चकित-ठगे से देखते हैं। अपनी टोपी पहने नेताजी पांच बरस पूरे होते ही आते हैं। हमें ठगते हैं और गई पांच साल की। हरेक टोपी की अपनी मियाद होती है। अगर जादूगर चाहे तो अपने संदूक या जूतों से भी बहुत कुछ निकाल सकता है। कहते हैं यह आंखों का धोखा है। वे हमारी नजर को बांध देते हैं। एक बार नजर बंधते ही वे जो दिखाना चाहते हैं हमें बस वही दिखता है। हमारी अपनी कोई नजर नहीं बचती है, क्यों कि वे हमारे चश्मा लगा देते हैं। हरा चश्मा दिखाता है कि सब हरा-हरा है और काला चश्मा दिखाता है कि सब काला-काला है। जो जैसा है वैसा तो हमें दिखाई नहीं देता, हम आपस में वाद-विवाद करते हैं।
मेरी इसे कमजोरी कहें या अक्लमंद कि मेरे पेट में कोई बात खटती नहीं। सब कुच पंच काका को बता देता हूं। आज पंच काका ने कहा है कि सारे नेता और जादूगर उनके भतीजे हैं। मैं सोच रहा हूं- भला ऐसे कैसे हो सकता है? सारे नेता, जादूगर और हम सभी पंच काका के भतीजे कैसे हुए। लगता है कि पंच काका ने भी कोई चश्मा पहन रखा है। मैंने प्रतिवाद किया कि यदि काका हम सब आपके भतीजे हैं, तो आप नेता और जादूगर जैसी कोई कलाबाजी दिखाओ। पंच काका ने एक किताब निकाल कर मेरे हाथों में थमा दी। वे बोले- पढ़ो इसकी भूमिका। आंखें खुल जाएगी। मैंने पढ़ा तो सच में मेरी आंखें खुल गई। किताब के लेखक ने बा होशो-हवास में स्वीकार किया था कि हम पंच काका के जेबी बच्चे हैं। मैं मानता हूं कि किसी भी शब्द-शिल्पी का जन्म प्राकृतिक ही संभव है यह जेब से अप्राकृतिक रूप से जन्म लेने का अनोखा कारनाम ऐसा है कि मैं सोच में पड़ गया हूं। सोच रहा हूं कि मैं नमन काका की जेब को करूं या उनकी जेबी-बच्चों को।
० नीरज दइया

13 फ़रवरी, 2017

पूर्णता की तलाश है अलग-अलग विधाओं में लिखना : डॉ. नीरज दइया

साक्षात्कारकर्त्ता : देवकिशन राजपुरोहित
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हर रचना का जन्म सुख देता है। यह समय और मनःस्थितियों की बात होती है कि एक रचनाकार विविध विधाओं में लेखन करता है। लिखना और अलग अलग विधाओं में लिखना असल में किसी पूर्णता की तलाश है। जो बात एक विधा में नहीं है वह दूसरी में होती है और इस प्रकार बहुत सी विधाएं मिलकर ही एक रचनाकार का सुख निर्मित करती है। सब का अपना अपना महत्त्व है और निरंतर लिखना और सक्रिय रहना असल में किसी स्थाई सृजन-सुख की लालसा है। यह कहना है केंद्रीय साहित्य अकादेमी से बाल साहित्य में पुरस्कृत कवि, कहानीकार, अनुवादक, संपादक और आलोचक डा. नीरज दइया का। जो उन्होंने देवकिशन राजपुरोहित से बातचीत में व्यक्त किया।
- राजस्थानी की नई कविता परंपरागत कविता से अलग क्यों हो गई है?
० हरेक विधा और रचना का अपना एक युग और कालखंड होता है। परंपरागत कविताओं की जड़ें ही नई कविता को पोषित करने वाली रही है। समय के साथ प्राथमिकताएं और चुनौतियां बदले हुए रूप में सामने आती है। नई कविता में भी परंपरागत कविता का सौंदर्य नाद और शब्द विन्यास में देखा जा सकता है।
- आपकी आलोचक के रूप में पहचान बानने के क्या कारण रहे?
० मैं नहीं जानता और मानता भी नहीं कि आलोचक के रूप में मेरी पहचान बनी है या नहीं बनी है। यह मेरा काम नहीं है। मेरा उद्देश्य आलोचना में रचना की पहचान करना रहता है। मेरा काम तो बस आलोचना को सृजन जैसे रचना है। मैंने प्रयास किया है कि मैं प्रामाणिकता के साथ अपनी रचना का अहसास बटोरते हुए कुछ तथ्यात्मक और मूलभूत बातों को समझने का प्रयास कर सकूं। इस क्षेत्र में हमें बहुत काम करना होगा।
- मौलिक लेखन के साथ अनुवाद का कार्य कहीं मूल लेखन में बाधा तो नहीं बनाता ?
० अनुवाद से बहुत कुछ सीखने-समझने को मिलता है। असल में अनुवाद जहां भाषाओं में मध्य पुल का कार्य करता है वहीं अनुवादक को नए नए वितान और अनुभव प्रदान करता है। ‘सबद-नाद’ जैसी कृतियों से हम पूरी भारतीय कविता थोड़ा-सा अहसास पा सकते हैं। भारतीय भाषाओं के अलग अलग स्वरों को जानने-समझने के लिए अनुवाद ही एक मात्र रास्ता है।
- इन दिनों हिंदी में खूब व्यंग्य लेखन कर रहे हैं? ऐसा क्यों? क्या राजस्थानी लेखन से मन भर गया है, जो हिंदी में लिख रहे हैं।
० राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी है सो रक्त में घुली हुई भाषा से मन कैसे भर सकता है। राजस्थानी लेखन के साथ हिंदी में लिखना गलत तो नहीं है। हां गलत तब है जब लिखें तो हिंदी में और लाभ के लिए उसे ही अनुवाद कर मूल के रूप में राजस्थानी में प्रस्तुत कर दिया जाए। ऐसे लाभ लेने वाले हिंदी के कुछ रचनाकार हैं। मेरे लेखन में मुझे मेरा लाभ सृजन-सुख लगता रहा है। दैनिक नवज्योति ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में लगातार प्रकाशित कर अब जब व्यंग्यकार बना दिया है तो कुछ इस क्षेत्र में भी बड़ा काम करने की अभिलाषा है।
- अंतिम सवाल राजस्थानी की मान्यता के बारे में।
० राजस्थानी के लिए बीकानेर में मुक्ति संस्था ने संकल्प यात्रा आरंभ की है। मुझे भरोसा है कि मान्यता राजस्थानी को मिल कर रहेगी। भाषा वैज्ञानिक और सभी शिक्षाविदों के साथ जन-जन का समर्थन इसे मिल चुका है।


10 फ़रवरी, 2017

बटज की गड़बड़ -हड़बड़

ब बजट आ रहा है। बजट का आना और जाना फिक्स है। देश में चुनाव भी होने हैं। चुनाव का होना और कब होना कोई फिक्स नहीं होता है। चुनाव और बजट का अपना-अपना समय होता है। दोनों ही लोकतंत्र के बड़े मेहमान हैं। समस्या तब होती है जब दोनों साथ-साथ आते हैं। वैसे अलग अलग आते हैं तो भी दूसरी समस्याएं होती हैं। समस्या से रहित ना चुनाव होता है और ना ही बजट। देश की त्रासदी है कि समस्याएं इतनी हैं कि कोई आए तो समस्या, नहीं आए तो भी समस्या। अगर देश में चुनाव नहीं आए तो बड़ी समस्या हो जाएगी विपक्ष वालों के लिए। अगर आ जाए तो उससे भी बड़ी समस्या है। क्या होगा क्या नहीं का चिंतन होता है। यही हाल बजट का है। फिलहाल समस्या यह सवाल है कि चुनाव से पहले बजट क्यों आ रहा है?
          बजट और चुनाव का सीधा संबंध है। कहने वाले कहते हैं इन दोनों का सीधा-संबंध गलत संबंध है। बजट के बिना चुनाव नहीं होता, और चुनाव इसलिए होता है कि बजट ठीक-ठाक किया जा सके। बजट का चुनाव में और चुनाव में बजट का खेल निराला है। चुनाव और बजट ही दो ऐसी बालाएं नहीं, बलाएं है जो पूरे देश को डांस करवाती है। इतना हो-हल्ला होता है कि सुस्त से सुस्त आदमी भी हाथ पैर मारने लगता है। देखने वालों को डूबता हुआ आदमी भी नृत्य करता हुआ दिखाई देता है। चुनाव के समय देश के डूबने और उसे बचाने की चिंता रहती है। कल की बात है कि श्रीमती जी ने बड़े प्यार से कहा- सुनो जी, ये जो इस बार बजट आ रहा है। इसे ध्यान से देखना। सब कुछ एक बार सस्ता हो जाएगा, क्यों कि चुनाव से पहले सरकार जनता को खुश करेगी। आप भी मुझे खुश करना। मैं ठहरा भोला-भाला कि पूछ बैठा कि क्या अभी तुम दुखी हो? खुश ही तो हो। सब कुछ है तुम्हारे पास। वह बोली- अरे आप तो बिल्कुल नहीं समझते। मेरे कहने का मतलब यह है कि जो जो चीजे सस्ती हो जाएं, वे सभी बिना देरी किए हम खरीद लेंगे। पत्नी के इस प्यार की केवल मेरी समस्या नहीं है, सभी ग्रसित हैं। अखिर भारतीय समस्या है कि पत्नियों की खरीददारी कभी खत्म नहीं होती। वे बार बार पतियों को बाजार ले जाती हैं, बाजार भेजती है और अब तो ले जाने और भेजने का झंझट ही खत्म हो गया है। ऑनलाइन ने ऐसी वला की गाज गिराई है कि सुबह अच्छा भला पति घर से बाहर कमाने जाता है और शाम को लौटता है तो देखता है कितनी क्या नई-नई खरीददारी हो गई है। बजट से पहले ही सरे बजट की टें बोल चुकी है।
          पंच काका कहते हैं कि इस बार बजट में ऐसा बाजा बजने वाला है कि दुनिया भर का बाजार भारतीयों का कचूमर निकाल कर ही दम लेगा। पहले बाजार जाते थे तो घर से तय करके निकलते थे कि क्या लेना है? कितनी हमारी औकात है? अब तो सारी औकात ऑनलाइन को मालूम है। ऐसा सुखी बनाया कि सारी कैशलेस दुनिया से पूरा बाजार घर में घुस आया है। ऐश ने नाम पर ऐश चौपट हो रही है। ऑनलाइन और कैशलेस दुनिया में दिन गिन-गिन के निकालने के सिवाय कोई चारा नहीं है। बटज की गड़बड़-हड़बड़ तो होगी तब होगी, यहां तो नित्य गड़बड़-हड़बड़ झेल रहे हैं।
नीरज दइया

07 फ़रवरी, 2017

जे.एल.एफ. में पंच काका

बीएसएनएल के लिए कुछ बंधु कहते हैं- इसका फुल फोर्म ‘भाई साहब नहीं लगेगा’ है। माना कि सही नाम ‘भारत संचार निगम लिमिटेड’ है, पर कुछ इन भाई-बंधुओं और बहनों का क्या करें जो इस लिमिटेड को अनलिमिटेड कर ऐसी घुसपैठ करते हैं। सच में ऐसी मेधा पर आश्चर्य होता है। नाम का संक्षिप्त रूप और उसका वितारित रूप कुछ का कुछ बनाना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है कि नाम का बंटाधार कर देना। यह कल्पना शक्ति का कमाल है कि कुछ का कुछ करना उनके लिए सहज होता है। जब जयपुर-साहित्योत्सव को एक लेखक ने ‘गधों का मेला’ कहा, मुझे उनकी अनलिमिटेड मेधा पर ईर्ष्या हुई। ऐसा उन्होंने जब सोचा और लिख कर बुद्धि-प्रदर्शन किया तो कुछ दूसरे लेखक भी कहां चूकने वाले थे। जो लेखक मेले में बुलाने से चूक गए, वे सभी बुलाए गए लेखकों को गधे कहने पर मुंडी हिलाने लगे। इसके साथ ही तीसरे किस्म के लेखकों का एक सवाल आया- जनाब, हजूरेआला आपको जब वहां बुलाया गया और आप गए भी थे, तब क्या वह गधों का मेला नहीं था। जाहिर है यह आपका पराक्रम रहा होगा कि सारे गघे उस समय घोड़े नजर आ रहे होंगे। इंसान आजकल रूप बदलने में माहिर है। वैसे कहा जाता रहा है कि इंसान असल में जानवर ही था और अनेक घटना-प्रसंगों के हवाले उसमें अब भी भीतर का जानवर यदा-कदा प्रगट होता रहता है। कभी-कभी इंसान कुत्ता-कुतिया बनता है, तो कभी-कभी भेड़िया और चींटियां। ये अलग अलग रंग-रूप धारण करने वाले इच्छाधारी इंसान है। ऐसा भी हो सकता है कि कोई ऐनक इजाद हो गया हो कि गधों वाले ऐनक को लगाने से सभी इंसान गधे दिखाई देने लगे। जे.एल.एफ. में पंच काका भी गधों की भीड़ में शामिल दिखाई दिए।
          गधे को गधा कहना चाहिए पर जो गधा नहीं हो उसे क्या गधा कहना चाहिए? गधे को इंसान अथवा इंसानों को गधा कहना दोनों का अपमान है। इंसान गधा कैसे हो सकता है, और गधा इंसान कैसे हो सकता है? जाहिर है कि नई ऐनकी-विद्या यानी आंखों पर ऐनक लगाए रखने की विद्या है, जिससे कोई ऊंट बन सकता है और कोई शेर-बिल्ला या फिर बिल्ली बन सकता है। कुता-कुत्तिया और गधा-गधी का असली रूप ऐनक उतार कर ही देखा जा सकता है। ऐसे बड़े बोल बोलने वाले बिल्ले और बिल्लियां जरा बरसात अथवा पानी से बच कर रहें। अगर वे बरसात में भीग गए तो उन्हें देखते ही सब भीगा बिल्ला या भीगी बिल्ली कहेंगे। इन जंतुओं का भीगना और किसी के सामने से आना-भागना अशुभ अपशुगन माना जाता है। पंच काका को जब किसी ने जे.एल.एफ. को गधों का मेला कहने का किस्सा सुनाया तो वे तपाक से बोले- ओह वह खुद तो ऊंट है। उससे खुद अपनी तो संभलती नहीं, संभली नहीं गई और अब काचर का बीज बना सौ मण दूध फाड़ना चाहता है। भैया, जे.एल.एफ की इतनी भीड़ सिद्ध करती है कि किंगफिशर और दोस्तों के साथ विश्व साहित्य से जुड़ने की गजब की चाहत युवाओं में है। वे अपने साथी और समूह के साथ विभिन्न रसों का आस्वाद लेते हैं। एक साथ समानान्तर चल रहे सारे सत्र तो कोई देख नहीं सकता, इसलिए सूंधने वालों की भरमार है। इंटरनेट फ्रेंडली है तो सब देखो घर बैठे और घर बैठे उपलब्ध नहीं है तो वह है सेल्फी और फोटो-सुख। सेल्फी का चसका ऊपर से लेकर नीचे तरफ यहां चमचमाता है। असल में फोटो में चमचमाना और नहीं चमचमाया ही जे.एल.एफ. की माया और चर्चा का कारण है।
 नीरज दइया

01 फ़रवरी, 2017

लोक देवता का देवत्व

लोक पर किसी एक की मिल्कियत नहीं होती, फिर भी कुछ मुगालते में रहते हैं। उन्होंने लोक को अपनी बपोती बना लिया है। हमारा लोक भी ऐसा भोला-भोला कि वह बपोती बन जाता है। हम सभी के लोक को कुछ धोक कर और कुछ धोखा दे कर खुद का मानवाने लगते हैं। कुछ भाई-बंधु जो वर्षों से लोक पर धणियाप जमाए हुए हैं तो कुछ इस संसार से इसे काख में लिए-लिए कूच कर गए। जब वे इस असार संसार को छोड़ गए तो लोक पीछे छूट गया। वे ले कर जाना चाहते थे पर अपने साथ लोक को नहीं ले जा सके। उनके पक्षधर कहते हैं कि उनके चले जाने से लोक अनाथ हो गया। यह तो गनीमत है कि लोक अनेक खांचे में बंटा हुआ है। खांचे भी ऐसे कि कोई कहीं भी खुद को फिट कर सकता है। लोक कलाओं के छद्म-मर्मज्ञ और लोकगीतों-लोककथाओं के हत्यारे-डाकू लोक की दुकानें चलाने के लिए समाज की आंखों में धूल झोंकते रहेंगे। बिना धूल झोंके तो नजारा साफ साफ नजर आ जाता है। यह इस धूलि की तासीर है जो वर्षों से फायदेमंद रही है और रहेगी। रहे भी क्यों नहीं, हम इस माटी के जाये-जनमें हैं, और इसी माटी से बने हैं। लोक तो हमारे रक्त में है। जो इस हमारे इस लोक को नहीं जानता, उसके लिए हमारा पाखंड पाखंड नहीं सर्वोत्तम सत्य है।
लोक में हीरे-नगीने-जवारात बरसों से गुमशुदा पड़े थे। एक काल खंड ऐसा आया कि उनको हमारे एक महान लेखक ने खोज-खोज कर निकाला और सभी लोककथाओं में लोककथाओं को सुनाने वाले सुजान का नाम भी ससम्मान ग्रंथों में अंकित किया। किंतु आगे चलकर लोककथाओं का मन मचलने लगा। लोककथाओं ने कहा कि हमें तो मौलिकता के खांचे में डाल दो। फिर क्या था, कहने और सुनने भर की देरी थी। सारी लोक संपदा को अपने नाम के मौलिकता के खाते में डालना आरंभ किया गया। साथ कर लिए कुछ लठैत कि कोई ‘चूं’ नहीं करे। जिसकी जरा भी ‘चूं-चा’ की, उसे चुप करा दिया गया। इस सब के बीच बड़े मान-सम्मान और बड़ी-बड़ी दुकानों से गठबंधन हुआ। जितना लाभ बटोरा जा सकता था, बटोर लिया गया। शेष रहा खाली बर्तन। पर यह बर्तन भी अक्षय-पात्र निकला। अब भी वैसी ही परंपरा निभा रहा है।
इस सदी में एक नए पद ‘लोक देवता’ का आविष्कार किया गया है। शास्त्र और लोक के अनुसार तो कोई मरने पर ही देवता या दानवों की श्रेणी में जाता है। जीते-जी देवता और दानवों की श्रेणी में गमन का सूत्रपात हो चुका है। लोक देवता के पद पर देश के महान से महान बुद्धिजीवी, लेखक, दार्शनिक और बैज्ञानिक बिराजने को आतुर और उत्सुक हैं। पंच काका ने एक लोक देवता की खोज कर उन्हें इस पदबीं से सम्मानित कर दिया और भला हो उस घड़ी का कि जिस घड़ी उन्होंने लोक देवता जैसा पद स्वीकार कर लिया। वैसे वे महान आत्मा के धनी लोक देवता से भी उच्च पद के अधिकारी हैं। वे कारीगर ऐसे हैं कि अच्छे भले मिनख को गधा बना कर उसके आगे गाजर बांध देते हैं। गधा गाजर के लिए पीछे-पीछे फिरता है, पर गाजर है कि उसके आगे-आगे चलती है। यह गुण ही लोक-देवता का देवत्व है कि गधों को वे चाहे जितना फिराते हैं और गाजर को भी बचाए रखते हैं। तो बोलिए इस सदी के स्वनामधन्य लोक-देवता फलाणचंद जी की जय। 
-नीरज दइया