15 जनवरी, 2017

बाबा जी के चेलों, खूब खाओ बैंगन

बीबीसी ने हड़प्पा सभ्यता के बैंगन का खुलासा क्या किया, हमारे सामने चार हजार साल पुराने खट्टे-मीठे बैंगन का इतिहास जवान हो गया। पंच चाचा पूछ रहे हैं- आदि-आचार्य श्री बैंगनाचार्य ने वर्षों पहले बैंगन खाने पर प्रतिबंध लगया था, मगर क्यों?
    मैंने कहा- मुझे नहीं मालूम ये आदि आचार्य कौन थे और उन्होंने ऐसा प्रतिबंध भी लगया था। आप जानते हैं तो बताएं। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मुझे बैंगन से परहेज नहीं है। वैसे अधिक पसंद नहीं करता हूं। पंच चाचा मूड में आ गए, बोले- भतीजे, लोग कहते हैं बै-गुन, यानी बिना गुन था। नासमझ है, देखते ही नहीं कि बैंगन के सिर पर ताज है। वह राजा है। हींग और लहसुन से तैयार करो बैंगन का सूप तो पीने से पेट फूलना, गैस, बदहजमी व अपच जैसी बीमारियां नहीं होती। भुने हुए बैंगन को खाओ तो कफ निकल कर खांसी ठीक कर देता है। भुने हुए बैंगन में शक्कर डालकर खाली पेट खाओ एनीमिया दूर। स्किन कैंसर, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, दिल के रोगियों के लिए भी बैंगन फायदेमंद है। तुमको पता है इसमें निकोटिन होता है और स्मोकिंग छुड़ा सकता है। भैया जो लोग गंजे होते जाते हैं वे अगर बैंगन खाए तो बालों का झडऩा बंद हो सकता है। बैंगन कॉलेस्ट्रोल कंट्रोल करता है।
    मैंने कहा- चाचा जी, मैं बोरी एक बैंगन ला देता हूं। अगर आप जगह-जगह बांटना चाहते हैं तो। मुझे नहीं सुनना बैंगन पुराण। मैंने पहले ही कह दिया मुझे अधिक पसंद नहीं है। जब घर में बनता है मैं खा लेता हूं। आप तो यह बताएं कि वह प्रतिबंध कैसे लगा था।
    पंच चाचा बोले- ये आदि आचार्य बैंगनाचार्य लोक में बाबाजी के नाम से प्रसिद्ध है। ये वे बाबाजी थे जिन्होंने अपने सभी चेलों को बैंगन खाने से मना किया था और खुद खाते थे। मैंने बीच में प्रतिवाद किया- यही तो बताएं कि खुद खाते थे तो दूसरों को मना क्यों किया था।
    पंच चाचा जरा परेशानी में बोले- वर्षों से बाबाजी को बैंगन बहुत पसंद थे, वे बड़े चाव से खाते थे। लेकिन उनको खुद याद नहीं, कब उन्होंने चेलों को बैंगन खाने से मना किया था। भेड़ चाल है किसी चेले को बैंगन पसंद नहीं था तो उस ने चर्चा फैला दी कि बाबाजी ने मना किया है। या ऐसा भी हो सकता है कि गुरुकुल में बैंगन कम आए होंगे और रसौइया जरा शातिर होगा। उसने सोचा- बैंगन कम है सो उसने चालाकी दिखाई और बोल दिया बाबाजी ने सब चेलों को बैंगन खाने से मना किया है। एक बार कोई बात चल निकलती है फिर उसे रोकना मुश्किल होता है। हुया यह कि आज वर्षों बाद किसी दुखीराम नामक चेले ने प्रतिवाद किया तो मामला समझ में आया।
    वर्षों बाद बाबाजी को मालूम चला कि चेले भी बैंगन खाना चाहते हैं। फिर क्या था उन्होंने फेसबुक स्टेटस लिखा है- बाबा जी चेलो, खूब खाओ बैंगन। बीच में मैंने तपाक से सवाल किया- पंच चाचा, ये बाबाजी अब तक जिंदा है और फेसबुक यूजर है? दुखीराम जैसे चेले मूर्ख है। अगर बैंगन ही खाने थे तो बाबाजी से बिना पूछे भी खा सकते थे। चाचाजी, आपकी कहानियों में काल-साम्य नहीं दिखता।
    पंच चाचा के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आई। बोले- ये बैंगन जितना सीधा दिखता है उतना साम्य में नहीं आता। कई किस्से मशहूर है। एक बार अकबर के सामने बीरबल ने बैंगन की तारीफ कर दी और दूसरे दिन भद्द, तो अकबर ने पूछा- बीरबल जनाब, ऐसा क्यों? बीरबल ने जबाब दिया- जहांपनाह, कल बैंगन खाया, बहुत अच्छा लगा। रात बैंगन ने खराबी कर दी। कल वाली बात फिर दोहरा कैसे सकता हूं।
० नीरज दइया
naya arjun 15.01.2017

09 जनवरी, 2017

हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार

        सुबह सुबह एक लेखक मित्र अपने साजो सामान के साथ मेरे घर पहुंच गए। गले में झोला और हाथ में बैग उठाए वे अपने शॉल को ठीक करते बाहर खड़े थे। मैं पहुंचा तो मुस्कुराते हुए बोले- “नमस्कार। बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। संयोग ऐसा बना कि आज बिना बताए आ ही गया हूं। काका है तो घर में ही?” मैंने मुस्कुरा कर हां कहा और बिन बुलाए मेहमान को भीतर लिया। यह सुखद आश्चर्य था कि वे थे तो मेरे मित्र, और मिलने आए थे काका से। खैर उन्हें मैंने काका जी से मिलवाया। वे ऐसे मिले जैसे उन्हें बरसों से जानते हो। पांव-धोक के बाद उन्होंने अपने श्रद्धा-सुमनों के तौर पर पंच काका के समक्ष किसी मदारी की भांति अपने झोले और बैग से ना जाने क्या-क्या निकाल कर जैसे पूरी दुकान ही सजा डाली। उनका इतना प्रेम और आदर देखकर शुक्र है कि मेरी आंखें नहीं झलझालाई। चाय के बाद उन्हीं के प्रसाद से हमने सुबह का नाश्ता किया। मैंने सोचा अब ठीक मौका है, पूछ लूं कि भैया कैसे आना हुआ। मैंने पूछा तो उन्होंने फिर वही रटा-रटाया जबाब दिया कि बहुत दिनों से सोच रहा था कि पंच काका से मिलना है। सो बिना बताए आ गया। मैं कब हार मानने वाला था। दोस्तों में कभी हार माननी भी नहीं चाहिए। सीधे पूछ लिया- “आए हो तो काका जी से कुछ काम होगा, तभी तो आए हो।” वे बोले- “हां, तो फिर क्या हुआ। जिससे काम होगा करेंगे। तुमसे मतलब।”
          मुझे इतने रुखे जबाब की उम्मीद नहीं थी। मैंने सोचा बच्चू तू भले मत बता। बाद में काका जी से पता कर लूंगा। मैं अपने काम का कह कर दूसरे कमरे में आ गया। सोचा ये मेरा मित्र हो न हो किसी अटके काम के लिए ही आया है। वे कुछ बाते कर रहे हैं, तब तक कुछ लिख लूं। कल रात दोस्तों के साथ बातें करते हुए हाल ही घोषित पुरस्कार पर कुछ पीड़ाएं और चिंताएं पता चली थी। सोचा वैसे तो पुरस्कार विषय नया नहीं है। इस पर बहुत कुछ लिखा गया है। फिर भी यह विषय हरि अनंत हरिकथा अनंता की भांति लिखने लायक और समसामयिक है। पहले सोचा कि गीत लिखता हूं। तो मुखड़ा बनाया- ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’। पर मेरी छवि तो गीतकार वाली है नहीं इसलिए गीत लिखने का विचार त्याग दिया। लिखना आसान काम नहीं है। पहले तो क्या लिखूं और फिर किस विधा में लिखूं का तनाव झेलना पड़ता है। ख्याल आया कि कहीं ऐसा तो नहीं ये लेखक भाई आया है वह किसी पुरस्कार की अभिलाषा में ही आया हो। पंच काका कहीं किसी पुरस्कार में निर्णायक तो नहीं बना दिए गए हैं। ‘हाय पुरस्कार, होय पुरस्कार’ मुखड़ा ऐसे मुखों पर फबता है, जिन्हे पुरस्कार की लालसा थी पर नहीं मिला। जिन्हें पुरस्कार मिल गया है वे थोड़े समय बाद इसे अपने मुख की शोभा बना सकते हैं। रहस्य यह है कि इस गीत के बिना साहित्यकारों का साहित्यकार होना बेकार है। कहने को कहा कुछ भी जाए। जैसे कि मैं पुरस्कार के लिए नहीं लिखता हूं। पुरस्कार तो बस लॉटरी है। पुरस्कार श्रेष्ठ लेखन का पैमान नहीं है। ऐसे अनेक हैडिंग हैं, पर सच्चाई यह है कि ऐसा कोई बिरला ही होगा जो पुरस्कारों के लिए नहीं लिखता। मैं इतना लिख कर पंच काका को दिखाने गया तो देखा मेरे मेहमान मित्र पंच काका के पैर दबा रहे हैं। मित्र संकुचाए, मैंने संकोच किया तो काका ने कहा- “आ जाओ। अब जब आ ही गए हो तो।” “मैंने अपनी नई रचना आरंभ की सोचा आपसे सलाह ले लूं।” पर यह क्या मेरे लिखे को सुनकर दोस्त कपड़ों से बाहर हो गया। बोला- “तुम बड़े बेशर्म हो। छुप-छुप कर हमारी बातें सुनते हो। व्यंग्य लिखते हो। कोई दूसरा नहीं मिला क्या? अरे पुरस्कार के लिए मरते हैं तो यह हक है हमारा। चाचा जी और मेरी बात पक्की है।”
० नीरज दइया 
 

06 जनवरी, 2017

अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक

ह सत्य नहीं है कि जो लिखता है, लेखक उसे कहते हैं। लिखते तो बहुत हैं, सभी लिखने वाले लेखक नहीं कहलाते। लेखक कहलाने के लिए केवल लिखना जरूरी नहीं, कुछ दिखना और दिखाना भी होता है। हमें जो कुछ दिखाते और दिखते हैं लेखक, वे प्रायः वैसे नहीं होते हैं। दिखना और वास्तविकता अक्सर अलग होती है। जो असलियत नहीं है उसे दिखाना और हमारा देखते रहना ही हमारी समस्या है। एक अखबार द्वारा एक लेखक को मानदेय दिया जाता था और वह लेखक इसे प्रचारित भी करता था। वह कहता रहता मुझे इतने रुपये मिलते हैं। यह पर्याप्त मानदेय है। इसे संयोग कहें या मेरा प्रयास कहिए कि मेरा भी नंबर उस अखबार लग गया। मैं छपा तो मानदेय का इंतजार करने लगा। यह मेरे भाग्य का ही दोष रहा होगा कि मुझे मानदेय भिजवाना वे भूल गए। भूल सुधार करने के प्रयास में एक दिन समय निकाल कर अखबार के दफ्तर पहुंचा और मानदेय का जिक्र किया। सामने बैठे महोदय को सांप सूंघ गया। पहले तो चुप्पी साधे रहे। मैं इंतजार करता रहा कि कुछ कहेंगे। मेरी दाल नहीं गली तो मैंने पूरी कहानी परोस दी कि अमुख साहब लेखक को मानदेय दिया जाता हैं। मुझे भी मिलना चाहिए। मैंने देखा कि पूरी कहानी सुनकर उनकी सांसें लौट गई। बोले- आप जिन अमुख लेखक की बात कर रहे हैं, वे सच में ही अमुख लेखक है। यहां अमुख साहब यहां आते हैं। हमारे ना ना करते हुए भी अमुख साहब बहुत खर्चा कर जाते हैं। अमुख जी छापने की मिन्नतें करते हैं। मैंने प्रतिप्रश्न किया- अमुख का मतलब क्या है? वे बोले- अमुख से हमारा अभिप्राय है कि उनका मुख नहीं है। वैसे तो मुख सभी के होता है, उनके भी है। वे बोलते बहुत हैं। साफ शब्दों में कहें तो हमारे गरीब और जरूरतमंद मित्र हैं। ऐसे तो वे हमसे मांग नहीं सकते और मांगेंगे भी कब तक। उन्हें मांगने में शर्म और हमें देने में शर्म। इसलिए कभी कभार अमुख को हम कुछ मुख के लिए दे दिया करते हैं। आप अपने अमुख को कुछ देंगे और हम जो खुद को प्रमुख मान बैठे हैं, हमें कुछ नहीं देंगे। वे भड़क गए। बोले- आप प्रमुख कब से हो गए। और आपके पास देने को क्या है? रचनाएं लिखना और भेज देना इसमें प्रमुख क्या है? प्रमुख होता है- मुखिया। बहुत से लेखकों को साथ लेकर जो चलता है और दो-चार संस्थाएं जिसकी जेब हो। कुछ पुरस्कार और सम्मान भी हाथ में होने चाहिए। पत्रिकाओं पर होल्ड होना चाहिए या खुद की अपनी पत्रिका होनी चाहिए। जो उठा-पटक और अखाड़ेबाज होता है, उसे हम प्रमुख कहते हैं। आप हमारे लिए ना तो अमुख हैं और ना प्रमुख। बोला- आप मुझे जानते नहीं। मैं क्या हूं। ये तो आप अपने अमुख और प्रमुख लेखकों से पूछ लेना। फिलहाल आपको बता देना जरूरी है कि इन तथाकथित अमुख और प्रमुख लेखकों की किताबों के आमुख मैं ही लिखा करता हूं। उन्हें ठीक करता हूं। वे मेरे सुझाव मानते हैं। मैं क्या सड़कछाप लेखक हूं? मानदेय नहीं देना तो मना कर सकते हैं। मैं तो मानदेय केवल अपने मान को ही मानता हूं। आपका मुझे मान देना यानी लेखन मान लेना ही मेरा मानदेय है। पर एक को देना और दूसरे को नहीं देना, यह सरासर गलत है। वे मुस्कुराते हुए बोले- सही-गलत की बात आप कर रहे हैं? हम अखबारवाले कभी गलत नहीं होते। हमें बहुत काम रहते हैं। आपकी गलतफहमी दूर किए देते हैं कि हमने आपको क्यों छापा? आप समझते होंगे कि आपकी रचना में दम था इसलिए छपा। ऐसा नहीं है बंधु ! यह तो हमें पंच काका ने कहा था कि कि आप अच्छा लिखते हैं। आपको अवसर मिलना चाहिए। तब मिल गया। समझे आप। 
० नीरज दइया 

अपनी धरा और धारा के विशिष्ट कहानीकार : बुलाकी शर्मा

भारतीय साहित्य में अपने विपुल लोक साहित्य के बल पर राजस्थानी साहित्य अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। आधुनिक युग में आरंभ के बहुत वर्षों तक यहां के कुछ रचनाकारों ने लोककथाओं के संरक्षण के लिए जहां लोककथाओं को लिपिबद्ध किया, वहीं कुछ रचनाकारों ने समकालीन भारतीय कहानी के समानांतर राजस्थानी कहानी के विकार की दिशा में कदम बढ़ाए। वहीं आगे चलकर अपनी परंपरा और लोक धरोहर को कुछ कहानीकारों ने आधुनिक संदर्भों में प्रयुक्त किया, जिससे राजस्थानी साहित्य की श्रीवृद्धि हुई।
इसी क्रम में वर्ष 2016 के लिए साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कहानीकार बुलाकी शर्मा की बात करें, जिन्हें दूसरे कहानी संग्रह ‘मरदजात अर दूजी कहाणियां’ (2013) के लिए हाल ही में पुरस्कार की घोषणा हुई है। एक प्रसिद्ध लोककथा का स्मरण कराना चाहूंगा- “जसमल ओडण”। इस लोककथा का एक पाठ राणी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत के संग्रह “माझळ रात” में भी देखा जा सकता है। इसी पाठ के बिलकुल समानांतर बुलाकी शर्मा के प्रथम कहानी-संग्रह “हिलोरो” (1994) की शीर्षक कहाणी को देखेंगे तो लगेगा कि जसमल ओडण के स्थान पर नायिका चिड़कली को कहणीकार ने युग-संदर्भों से सहजते हुए जैसे नवीन सृजना के धरातल पर सृजित किया है।
लोकथा में जसमल पर राव खंगार रीझता है और इस कहाणी में नायिका चिड़कली पर ठेकेदार हमीद रीझता है। यह महज संजोग है कि लोककथा में राव खंगार ने जसमल का हाथ पकड़ा और बुलाकी शर्मा की कहाणी में चाय के कप के साथ ही हमीद ने चिड़कली का हाथ पकड़ लिया। स्त्रि की कहानी वर्षों बाद भी एक जैसी नजर आती है। राजा के नए रूप में ठेकेदार जैसे चरित्र हमारे समाज में हैं। लोककथा में जसमल अपने सत की डोर से बंधी अंततः स्वयं को अग्नि के सुपर्द कर प्राण होमती है, और कहाणी की नायिका चिड़कली चूंकि किसी लोककथा की नायिका नहीं है इसलिए उस के हृदय में कहानी की अंतिम पंक्ति में कहानीकार एक हिलोर उठते दिखाता है कि ठेकेदारजी इन दिनों एक बार भी नहीं आए, क्या हुआ होगा उन्हें.... एक बार आए तो कितना अच्छा रहे। यह पूरे समय और संदर्भों का बदल जाना है।
अपने समय और संदर्भों को स्वर देने वाले बुलाकी शर्मा इसी मार्मिकता के लिए राजस्थानी कहानी के क्षेत्र में पहचाने जाते हैं। राजस्थानी कहानी में परंपरा विस्तार का श्रेय बुलाकी शर्मा जैसे कहानीकारों को दिया जाएगा। जसमल का चिड़कली के रूप में अवतरण प्रगतिशील सोच का परिणाम भी कहा जा सकता है। कवि मनीषी कन्हैयालाल सेठिया के इस कहानी के संदर्भ में विचार देखें- “हिलोरो राजस्थानी भाषा की कहानी विधा को बहुत आगे बढ़ाती है और यह कहाणी कहानीकार बुलाकी शर्मा को अमर करने वाली रचना है।” अब यह उक्ति किसी बड़े पुरस्कार से कमतर नहीं है। बुलाकी शर्मा वर्ष 1978 से निरंतर राजस्थानी और हिंदी में सृजनरत हैं। आपके हिंदी में दो कहानी संग्रह और चार व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हैं। वहीं बाल साहित्य की भी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई है। मौकिक साहित्य की राजस्थानी में छः पुस्तकें प्रकाशित हैं। संपादन और अनुवाद का कार्य भी आपने किया है। गत वर्ष आपका साहित्य अकादेमी से राजस्थानी अनुवाद ‘रवीन्द्रनाथ रो बाल-साहित्य’ दो खंडों में प्रकाशित हुआ है। 
समाज के मध्यम वर्ग के घर-संसार, उनके क्रिया-कलापों और परस्पर संबंधों को उजागर करती बुलाकी शर्मा की कहानियों की दुनिया उनकी अपनी निजी दुनिया से जुड़ी है। अपने जीवन-जगत और राजस्थानी पर्यावरण को कहानी के रूप में ढालते हुए वे कुछ परिवर्तन जरूर करते हैं फिर भी मूल सत्य और वास्तविकताएं कहीं न कहीं कहानी के पाठ में झांकती है। अगर कहा जाए कि कहानियों की संवेदना में शर्मा का व्यंग्यकार होना बेहद असरकारक रहता है तो बात अधिक स्पष्ट होगी। वे उन सामाजिक पीड़ाओं और अव्यवस्थाओं को चुनते हैं जिन से उन्हें लगता है कि यह ठीक नहीं हो रहा। शब्द ही वह साधना है जिसके माध्यम से कोई लेखक अपना प्रतिकार और प्रतिरोध प्रस्तुत करता है।
किसी रचनाकार के समग्र मूल्यांकन में उसके लेखन-ग्राफ को देखा जाना चाहिए। समाज के बदलाव को आज हम जिस रूप में देखते हैं उसका अहसास अथवा संकेत बहुत से रचनाकार अपनी रचनाओं में बहुत पहले ही कर दिया करते हैं। बुलाकी शर्मा ऐसे ही रचनाकार हैं। पुरस्कृत संग्रह की कहानियां- मरजात, घाव और बर्थ डे प्रजेंट की नायिकाएं समय के सामने हार नहीं मानती हैं। इन नायिकाओं का प्रतिरोध और विश्वास ही पूरे बदलाव के उपरांत भी कहीं कुछ गहरे संस्कारों और आदर्शों पर आस्था बनाए रखने का परचम थामें हैं। हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं, जो किसी भी हमले को आत्मसात करने में सक्षम है। संपूर्ण जातिय अस्मिता से जुड़ी इन कहानियों में कहानीकार जीवन मूल्यों की बात असरदार ढंग से करता है, वहीं इन कहानियों में नवीन भाषा और शिल्प में सधे अनेक चेहरों को साफ देखा जा सकता है। अनेक चरित्रों को हमारी स्मृति में स्थान मिलता है। कहानियों में जहां परंपरा है तो राजस्थानी रीति-रिवाजों में उलझा समाज है। कहानी “ऐब” में केंद्रिय विषय तो दहेज है किंतु इसका विचित्र मानसिक आधार भी यहां रेखांकित हुआ है। समधी ने मांग से अधिक दहेज दे दिया तो संतोष नहीं वरन ऐसी शंका है कि जरूर कहीं कोई लड़की में दोष है। इसी के रहते अपनी नई बहू में कमियों को ढूंढ़ने के प्रयासों में नई व्यंजनाएं कहानी उद्धाटित करती है। कुछ कहानियों में व्यंग्य और बाल मनोविग्यान के रंग दिखाई देते हैं तो कुछ में प्रयोग भी हैं। कहानियों में संस्मरण और डायरी विधा का भी सुंदर प्रयोग कहानीकार ने किया है। कोई रचनाकार जब विविध विधाओं में लिखता है तो उसकी विधाओं में दूसरी विधाएं भी अपना असर छोड़ती है।
बुलाकी शर्मा री कहानियों को यदि हम एक उक्ति में समेटना चाहे तो कहा जा सकता है कि इन में बनते-बिगड़ते संबंधों और संबंधों के ठंडे और निरस होते जाने की पीड़ाएं उजागर होती है। कहानी के माध्यम से वे जीवन में ऊर्जा, उष्मा और उत्साह के लिए प्रयासरत है। उल्लेखनीय है कि शर्मा अपनी कहानियों में कहीं कोई रास्ता अथवा समास्याओं का हल आरोपित नहीं करते। सहज-सरल प्रवाहमयी भाषा में अंतर्द्वंद्वों को उजागर करती इन कहानियों की विशिष्टता के रहते अलग से पहचाना जा सकता है। संभवतः साहित्य अकादेमी पुरस्कार इन कहानियों का अपनी धरा और धारा में विशिष्ट होने का प्रमाण है।
० नीरज दइया

(दुनिया इन दिनों पाक्षिक 15 जनवरी, 2017 संपादक श्री सुधीर सक्सेना)



04 जनवरी, 2017

साहित्य में माफिया

माफिया कोई भी हो, घातक होता है। साहित्य माफिया भी कम घातक नहीं होता। भू-माफिया, खनन-माफिया आदि अनेक माफिया के साथ साहित्यिक-माफिया के सक्रिय होने की चर्चा इन दिनों जोर-शोर से है। पंच काका का मानना है कि सारे माफियाओं में साहित्य-माफिया सबसे खतरनाक होता है, इसके आगे सारे माफिया पानी भरते हैं। जिस प्रकार कर में परोक्ष-अपरोक्ष दो प्रकार के कर होते हैं, वैसे ही साहित-माफिया एक प्रकार का परोक्ष माफिया होता है। इस माफिया के अनेक विभेद है। गांव से लेकर शहर और महानगरों में इसकी अनेक स्वतंत्र-परतंत्र शाखाएं खुली हुई है। कहीं-कहीं लाभ के लिए गठबंधन बंध चुके हैं, और कहीं तैयारिया चल रही है। इस माफिया का धेय वाक्य है ‘अपना उल्लू सीधा करो।’ वैसे आज हर कोई केवल और केवल अपना उल्लू सीधा करने में लगा है, तब कोई कैसे मान ले कि साहित्य लिख कर कोई किसी दूसरे का उल्लू सीधा करेगा। जो कुछ भी कोई करता है, तो सबसे पहले अपना भला करता है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि जो खुद अपना भला नहीं कर सकता, वह भला किसी दूसरे का क्या भला करेगा। कहने को तो साहित्य में तो पूरे देश-समाज, घर-परिवार और खुद की अनेक बातें की जाती है। इसमें भला क्या, और किस का भला? इस सीधे अर्थ की व्याख्या बिना साहित्य माफिया के नहीं हो सकती। कुछ भी लिखने के लिए मूड का होना परम आवश्यक है। फिर मूड बना कर अगर लिख लिया, तो छपना आवश्यक होता है। यह छपना ही आजकल प्रकाशित होने में बदल गया है। अपने-अपने शब्दों को प्रकाशित करने के अनेक मार्ग है, किंतु इसमें वोल्टेज और पावर बढ़ाने की दक्षता माफिया के पास है। यहां संबंधों की भूमिका अहम होती है। यह ठीक वैसा ही है- जैसे बोलने वाला तो कमा कर खा लेता है, और चुपचाप बैठने वाला भूख से मरता है। साहित्य-माफिया हमारे मौन को मुखरित करता है। हमें मंच देता है। दांव-पेच देता है। सबसे बड़ी बात कि हमारे पास जो-जो नहीं होता है, वह सब देता है। बस मांगने भर की देरी है। आप कहें पाठक चाहिए तो पाठक हाजिर, आप कहें श्रोता तो श्रोता हाजिर, आप कहें तालियां बजाने वाले चाहिए तो वह भी मिलेंगे। किसी को हूट कराना हो, तो ऐसी सेवाओं के लिए माफिया सदा तत्पर है। फर्श से अर्श और अर्श से फर्श पर पहुंचाने-पटकने का काम बड़े हुनर से करते-कराते हैं कि कानों-कान खबर नहीं होती कि क्या हुआ। संस्थाओं के पदाधिकारी और मान-सम्मान आदि हर प्रकार की सेवाएं यहां उपलब्ध और सुलभ है। ‘सुलभ’ शब्द आते ही जो दूसरा शब्द साथ-साथ बंधा आता है, ठीक वैसे ही माफिया के साथ-साथ इसके कार्यकर्ताओं की फौज भी बंधी-बंधाई रकम की तरह चलती है।
ये जो सब कुछ विचार है, पंच काका के हैं। देनहार कोई ओर है की भांति वे अपने प्रवचन आपको भेज रहे हैं। मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है। मैं तो एकदम शरीफ हूं। इतना शरीफ कि ‘साहित्य-माफिया’ का नाम ही आज पहली बार सुना है। आपको यकीन करना होगा। मेरा मानना है कि ये माफिया का केवल नाम-नाम होता है। असल में होता कुछ नहीं। लोगों की बनाई हुई फालतू बातें और मनगढ़त किस्से हैं। आज इतना समय किसे है कि साहित्य जैसे पक्कड़ धंधे में कोई हाथ अजमाएगा। यह तो मेरे जैसे कुछ सिरफिर हैं, जिनको लिखने-पढ़ने की लत लगी है। भला आज दौड़-भाग के इस युग में कुछ पढ़ने-लिखने की आदत कोई क्यों डालेगा। क्या मिलता है? दूसरे बहुत से काम हैं। क्या सारे काम खत्म हो गए हैं कि ये नौबत आ पहुंची है। ये तो फालतू का काम है। अब अगर गिनती के लोगों में आपका शुमार है, तो आपकी इच्छा है। मेरा तो मानना है अब लिखना-पढ़ना और माफिया बस फैशन बन गया है।
नीरज दइया