17 नवंबर, 2016

नमक नमकीन हो गया

फवाह का क्या, कुछ भी फैल सकती है। इसके कई कारण हैं। प्रमुख तो यह कि ‘अफवाह’ उड़ती या उड़ाई जाती है। उड़ने वालों की गति चलने वालों से सदैव अधिक होती है। हमारे देश में बड़ी समस्या जनसंख्या और बेरोजगारी का कोढ़ है। जनता-जनार्दन में निठल्ले लोग हैं, जिनके पास कोई काम-धंधा नहीं। वे बस सोचते हैं। सोचना हर नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है। सोचने और बिना सोचे बोलने का क्या है, कुछ भी सोचा और बका जा सकता है। दिमाग का दोष है वह कहीं का कहीं चला जाता है। सोचने पर तो पाबंद नहीं लग सकती। बोलने पर पाबंदी लगाई जा सकती है। कोई जैसा जी में आए अंट-संट ऐसे कैसे बोल सकता है। नियम-कानून नहीं है क्या? सब के होते हुए भी यह खतरा उठाने वाले बहुत हैं। कुछ का कुछ बोलते हैं और न जाने कहां खिसक जाते हैं।
नियम कानून मुझ पर लगते हैं और मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। पर जनाब, भारत मेरा देश है और समस्त भारतीय मेरे भाई-बहनों में से बहुत बिगड़े हुए भाई-बहन भी है। कहीं भी कुछ का कुछ बोल देते हैं। आपको और हम को पता नहीं चल सकता कि हमारे किस भाई अथवा बहन ने यह करतूत की है। दूर क्यों जाएं, अब नमक की ही बात लें। मान लिया कि बाद में पता चल गया कि अफवाह थी। दाम में इतना हेर-फेर नहीं हो सकता। फिर भी कुछ घंटों के लिए तो पूरे देश को नमकीन कर दिया। न मालूम इस थोड़े से समय में कितनों की जिंदाबाद और मुर्दाबाद हो गई।
मेरी घरवाली को मैं बस-स्टैंड छोड़ के आ रहा था कि बीच राह फोन आया। फोन पर और वैसे भी वह कैसा भी बोलती हो, पर मैं यही कहूंगा कि उसकी मधुर वाणी से मुझे सुनने को मिला कि घर जाते समय पांच थेली नमक खरीद के ले जाना। मैंने मन की बात उसे कह दी कि कल ही तो नमक मंगवाया था। एक थेली घर में रखी है। वह बोली- आज का अखबार पढ़ा क्या? उसके ऐसे फालतू सबालों से मैं परेशान हूं। वह जानती है कि मैंने नहीं पढ़ा, फिर ऐसा सवाल क्यों जिसका जबाब पता हो। मैंने हार मान कह दिया- ठीक है घर जाते हुए दस थेली नमक ले जाऊंगा और नमक का हलवा बना कर खा लूंगा। अब वह नरम होती बोली- तुम तो नाराज हो जाते हो। आज के अखबार में छपा है कि नमक पांच सौ रुपये किलो हो गया है। इसलिए स्टोक करना जरूरी है। देखना हमें बहुत फायदा हो जाएगा। मैं फायदे में विश्वास करता हूं. मैंने तुरंत कहा ‘ठीक है’ और फोन काट दिया। मैं ऐसे फायदे में विश्वास रखता हूं।
मैं रास्ते में सोचने- आजकल लोग नमक का महत्त्व समझते ही नहीं। नमक खा कर देश का और गद्दारी करते हैं। पहले नमक का कितना मान-सम्मान था, हो सकता हो उसी मान सम्मान को लौटाने के लिए भाव बढ़ाए हों। खैर मेरी समझदारी कि घर के पास वाली दुकान से पांच थेली नमक खरीद लिया। पर यह क्या कुछ ही देर में उस दुकान का लड़का मेरे घर आ पहुंचा। कहने लगा- चाचाजी, नमक के दो हजार रुपये मंगवा रहे हैं। मैं चौंक पड़ा, यह कैसा हिसाब है? क्यों दो हजार क्यों? गुस्से में यह सवाल मुंह से निकल पड़ा। वह दयनीय स्वर में बोला- चाचाजी कह रहें है कि पंच चाचा का भतीजा बड़ा उस्ताद निकला। नमक के भाव बढ़ गए और वह पुरानी रेट में सुबह-सुबह नमक खरीद कर चपत मार गया। मैं अब भला बच्चे से क्या लड़ाई करता। उसे हजार-हजार के दो नोट पकड़ाने लगा, तो वह मुस्कुराया और बोला- मुझे भी उल्लू बनाना चाहते हैं, ये नहीं चलेंगे। मरता मैं क्या न करता, घर के भीतर गया और वे नमक की थेलियां उठाया लाया। उसे पकड़ाते हुए बोला- “बोलना छुट्टे नहीं है, होंगे तब खरीद लेंगे।’

14 नवंबर, 2016

बाल की खाल निकालना

‘बाल की खाल निकालना’ का अर्थ आप के लिए भले ‘व्यर्थ तर्क करना’ अथवा ‘व्यर्थ का दोष निकालना रहे’, पर मेरे लिए कुछ अलग है। यह मेरे अनुभव की बात है। मेरे बाल बहुत कम है और जो बाल मेरा साथ छोड़कर चले गए हैं उनमें से कोई भी बाल अपनी खाल साथ लेकर नहीं गया। कोई गया भी है तो मुझे इसकी खबर नहीं। शायद यही कारण है कि मैं कभी किसी के बाल की खाल नहीं निकालता। बाल शब्द बाल-गोपाल से जुड़ कर मुझे आनंदित करता है। बो कृष्ण कन्हैया, माखनचोर मटकीफोड़ जैसे भीतर ही भीतर गुदगुदाता है। अब वैसे बाल-गोपाल और आनंद कहां।
आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे भारत देश में वर्ष 5 से 14 तक के बाल-गोपालों की संख्यां 25.96 करोड़ है, और इनमें से 1.01 करोड़ बालक-बालिकाओं की खाल दिन-प्रतिदिन निकाली जा रही है। अब तक तो बाल की खाल निकालने वालों की इस संख्या में निश्चित रूप से काफी बढ़ोत्तरी हो गई होगी।
मैं तो किसी एक बाल-गोपाल की खाल आंखों के सामने निकलते देखता हूं तो मेरा खून खोल उठता है। मेरे जैसे भाई-बंधुओं का खून इतना खौला और खौलता है फिर भी आलम यह है कि अब तक हम कुछ भी कर नहीं सके हैं। किसी होटल, ढाबे, मैकेनिक, दुकान अथवा सार्वजनिक संस्थान में काम करते हुए देश के नन्हें-नन्हें बालक-बालिकाएं जीवन की आग में समय से पहले ही पक रहे हैं। हम इन काम करने वाले बालों-गोपालों और गोपिकाओं की खाल इतनी निकाल लेंगे कि वे खाल रहित हो जाएंगे। मोटी चमड़ी और खाल रहित लोग देश को कहां से कहां तक पहुंचाएंगे यह कहने-सुनने का विषय नहीं है। अब अगर आपकी समझ पर इतना भी शक करूं तो हो गया बेड़ा गर्क। शिक्षा और साक्षरता का भले असर नहीं हो पर आपक इस देश में रहने का अनुभव क्या काफी नहीं है, इन सब बातों के लिए।
बचपन में ही हम इतनी बड़ी आबादी के इतने बड़े हिस्से को बिना खाल का बना देंगे तो ये बिना खाल वाले भावी नौजवान देश के लिए कैसे सपने और भविष्य की कल्पना करेंगे। कवि राजेश जोशी ने अपनी कविता में लिखा- “सारी चीज़ें हस्बवमामूल/ पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए/ बच्चेा, बहुत छोटे-छोटे बच्चेज/ काम पर जा रहे हैं।” बच्चे काम पर जा नहीं रहे उनको जाना पड़ रहा है। कवि की भांति मेरा भी यह कहना है कि अब दुनिया में शायद कुछ भी बचा नहीं है। दया-शर्म, प्रेम-सद्भवाना, नियम-कानून सब जैसे होते हुए भी बेअसर हो गए हैं। बालश्रम के सारे कानून धरे के धरे रहते हैं और माता-पिता बच्चों को काम पर भेज रहे हैं। और जिनके काम है वे इस बात से बेपरवाह कि कभी कहीं उनकी भी खाल कोई तो निकालेगा ही। मान लिया कि आपके पास ऐसा हुनर है कि कोई अपाका बाल तक बाँका नहीं कर सकता।
हे लक्ष्मी पुत्रों हम आपसे अनुनय करते हैं कि बाल की खाल निकालना बंद करो। माना सब की अपनी अपनी मजबूरियां हैं। गरीबी, बेरोजगारी के इस आलम में जब पढ़े-लिखें और समझदार लोग अपना शोषण कराने के लिए विवश है तो ऐसे बाल-गोपालों को तो अपने भविष्य के बारे में पूरा पता भी नहीं है।
हमारे सब के अपने अपने काम है। समय ही कहां है। इस दौड़-भाग में बस फुर्सत इतनी है कि ऐसे बाल-गोपाल जहां कहीं मिलते हैं उन्हें देख भर लेते हैं। हमारे मशीन होते शरीर में बची-खुची थोड़ी संवेदनाएं जाग्रत हुई तो बस उनके बल पर अधिक से अधिक छोटा सा संवाद भर होता है।
- बेटा तू कितने बरस का है?
या भाषा भी ऐसी कि ‘ऐ तेरी उम्र कितनी है?’
हमारे देश और उनके सपनों से हमें क्या लेना-देना। इतने हमारे काम-काज के बीच हम मन में यह जो इतना सोचते भर है वह बहुत है। किसी से बैर करने में क्या फायदा। हम बिना मतलब के फजीहत करने में विश्वास नहीं रखते। हां हमारा मतलब हो तो हम हमारे दो रुपये के लिए फजीहत कर सकते हैं।
देश का जो कानून है वह अपने आप चल-फिर भी नहीं सकता। उसे चलाने-फिराने वाले कानून को घुमाने-फिराने के ऐसे लेन-देन में उलझे हैं कि कोई उम्मीद की किरण दिखाई नहीं देती है। आखिर उनका भी तो अपना घर-परिवार है और महंगाई है जो देश में इस कदर बढ़ती चली जा रही है। कभी कोई सिरफिरा कुछ करता भी है तो कहानी का अंत सभी पक्षों की तरफ बस एक-सा ही होता है कि यार बाल-बाल बच गए। वर्ना लपेटने वाले बहुत है। हम बाल-बाल बचते आएं है और मेरे बारे में तो आपको बता दूं कि मेरे तो बाल भी बहुत कम बचे हैं। जो भी बचे हुए बाल है उनको बाल-बाल बचाना बहुत जरूरी है।
पंच काका कहते हैं कि जो कोई समाजसुधारक बनकर समाज को सुधारने चलता है, तो उसे यह समाज और इसके कानूनों से यह संसार अपने पहले ही अनुभव में इतना कुछ सुधार कर ठीक कर देता है कि फिर आगे कभी वह किसी सुधार का नाम लेने की हिम्मत नहीं करता। काका तो बड़े अनुभवी हैं। कहते हैं- बच्चों, हमें बस अपना ध्यान रखना है। यह हमारा मसला कभी नहीं होना चाहिए कि क्यों कोई किसी बाल की खाल निकाल रहा है? अगर ऐसा विचार आए तो मेरे पास विगत घटनाओं का भंडार है। जान लें सभी बाल बाल बचे हैं। उन कहानियों को सुनकर आपके रोंगटे खड़े नहीं हो जाए तो कहना।
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12 नवंबर, 2016

पांच सौ और हजार के नोट का चक्कर

मेरे बेटे ने मुझे आवाज दी- “पापा जल्दी आओ। ये मोदी जी ने क्या कर दिया?” मैं किताब पढ़ने में खोया था जहां था वहीं से पढ़ते-पढ़ते बोला- “कौनसे मोदी जी ने क्या कर दिया?” उसकी उतेजना बढ़ गई और वह लगभग भागता हुआ आया और मेरा हाथ पकड़ कर टीवी वाले कमरे में ले गया। वह कह रहा था कि हमारे देश में मोदी जी कोई दस-बीस थोड़ी ही है बस एक ही मोदी जी हैं। पांच सौ और हजार के नोटों को बंद करने की घोषणा माननीय प्रधानमंत्री जी के श्रीमुख से सुनकर सन्न रह गया। जैसे लड़के ने मुझे आवाज दी, वैसे ही मैंने गृह-मंत्रालाय को पुकारा। “अरे सुनती हो, इधर आना जरा।” मुझ में और मेरी पत्नी में कुछ बड़े अंतर है उनमें एक अंतर यह है कि मैं अक्सर किताब में खोया मिलता हूं और वह रसोईघर में। हाथ आटे से सने हुए वह आई तो मुझे पुरानी फिल्म के किसी खास सीन की याद आनी चाहिए थी पर मैं तो ‘मुद्राराक्षस’ के नए पाठ से उसका साक्षात्कार करवाने को उत्सुक था। उसके स्वर में प्रेम नहीं झल्लाहट थी कि क्या हुआ मुझे क्यों बुलाया है। मैं उसे कुछ बताता-समझता इतने में पंच काका अपने कमरे से निकल कर मेरी तरफ आते दिखाई दिए। वे कह रहे थे- “शोर क्यों मचा रहे हो? क्या हुआ?”
अब मैं वक्ता था और मेरे श्रोता में गृहमंत्रालय के वरिष्ठतम सदस्य पंच काका भी शामिल थे। उन्हें मैं क्या समझता। मैंने कहा- “आप खुद अपनी आंखों से देख लो क्या हुआ है?” समाचार वाचक और माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी फिर-फिर एक ही किस्सा बड़े आराम से दोहरा रहे थे, और हम सब का आराम जैसे उनकी घोषणा से खराब हो रहा था। पत्नी ने कहा- “ऐसे थोड़ी ही हो सकता है?” और पंच काका का सवाल था- “अब क्या होगा?” दोनों के अपने अपने संदर्भ थे। मुझे पत्नी को समझना था कि ऐसा हो चुका है और पंच काका को यह कि अब कुछ नहीं हो सकता है। हमारे नोटों का कचरा हो गया है। अभी कुछ ही दिनों पहले पंच काका ने अपनी एक दुकान और जमीन बेची थी और करोड़पति होने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हो चुका था। मुझे डर लगने लगा कि कहीं हार्ट अटेक नहीं आ जाए क्यों कि दुकान और जमीन से प्राप्त रकम में काला और सफेद धन का कुछ चक्कर ऐसा था कि बहुत सारी रकम उन्होंने अपने लॉकर में और घर में रख ली थी। पंच काका सोफे पर ऐसे बैठे ही अब क्या होगा बोलने के बाद एकदम शांत चित हो कर जैसे कहीं खो गए। मैंने लड़के से कह कर पानी मंगवाया और पंच काका को पीने का निवेदन किया तो उन्होंने गिलास को फेंक कर पटक दिया और चिल्लाते हुए बोले कि मैं इस घर में बड़ा हूं तो क्या हुआ तुम भी अब छोटे नहीं हो। फिर तुमने मुझे जोर देकर क्यों नहीं कहा कि सारा रुपया बैंक में जमा करा दो अथवा कहीं ठीक ढंग से लगा दो। अब मैं बूढ़ा हो गया हूं। धन रोक कर बैठ गया और अब बर्बाद हो गया ना। अब चीखने की बारी गृहमंत्रालय यानी मेरी पत्नी की थी। वह मेरे हाथ जोड़ती हुई बोली- “मुझे माफ कर दीजिए।” मैंने कहा- “क्यों क्या हुआ?” उसने जो कुछ बताया उससे मुझे ज्ञात हो गया कि मेरा शक सही था, बहुत बार मुझे लगता कि रुपयों-पैसों में कुछ गड़बड़ हो जाती है। वह कभी पांच सौ का नोट तो कभी हजार का नोट जेब से मार कर छुपा कर रख देती। अब सारी पोल सामने आ गई। इन सब के बीच एक तीसरा धमका भी मुझे सुनना था। टीवी वाले कमरे में मेरे बेटे ने अपना गुल्लक लाकर फोड़ दिया। अब जमीन पर हमारे समाने कुछ नोट पांच सौ के कुछ हजार के बिखरे पड़े थे। अगर कोई दूसरा दिन होता तो गुल्लक के बिखरे हुए नोटों में मेरा बेटा पांच सौ और हजार के नोट पहले उठाता। उसने छोटे नोट और सिक्के पहले उठाए और अंत में सभी पांच सौ और हजार के नोट उठाए और बोला- “लो ये आपके लिए।”
० नीरज दइया
 

11 नवंबर, 2016

यारबाज आलोचक को नमन

साहित्य में कवि-कहानीकार और लेखकों की जमात में एक आलोचक नाम का तुर्मखां होता है। इस तुर्मखां का नाम चाहे कोई हो पर जन उसके नाम के आगे आलोचक लिखा जाने लगता है उसी दिन से समझ लेना चाहिए कि यह ऐसा है कि जिसका कोई भरोसा नहीं कर सकता। भरोसा इस अर्थ में कि कब क्या कह दे या लिख दे, पहले से कोई कुछ भी नहीं जान सकता। कभी कभी मुझे तो ऐसा लगता है कि ये जनाब खुद तुर्मखां जी भी अपने बारे में यह नहीं जानते कि कब कौनसा गुल खिला देंगे। पता नहीं किसको हंसा और किसको रुला देंगे। नए शोध खोज से यह भी पता चला है कि ये महाशय आलोचना करते हैं मगर अपनी ही मित्र-मंडली और इनको जहां कुछ लाभ दिखता है बस उनकी ही।
वैसे मेरे मन की बात आपको मैं बता देता हूं यह जानते हुए भी कि आप अपने मन की बात कभी नहीं बाताते फिर भी मैं मूर्ख हो हूं ऐसा मूर्ख ही रहना चाहता हूं। इसका कारण भी साफ है कि मैं अपने मन के बोझ को ऐसे हलका कर लेता हूं और आप हैं कि अपने मन पर कितना कितना बोझ लादे हैं। ऐसे में आपकी इस समझदारी और यारबाज आलोचक को नमन करना जरूरी है। आपको नमन करने से आप खुश होगें और कहेंगे कि देखा खुद को खुद ही मूर्ख कहता है तब हम समझदार कैसे कहें। यह बात भी आप प्रत्यक्ष नहीं कहते बस मन पर ऐसा सोच कर बोझ बढ़ाते हैं। प्रत्यक्ष में तो हल्की सी मुस्कान देते हैं इस मूर्खता पर जिसमें आपकी विद्वता का पाखंड भी झलकता है। यारबाज आलोचक को नमन इसलिए कि ऐसे नमन से ही कभी हमारा भी नंबर लग जाए शायद।
अगर मैं किसी पत्रिका का संपादक होता तो अपने दोस्तों की किताबों की समीक्षा के लिए ऐसे यारबाज आलोचक को पत्र के साथ किताबे भेजता और फिर देखता कि वह लिखता है कि नहीं लिखता। एक भेजता और दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी भेजता रहता जब तक कि वह लिख नहीं देता। मानदेय का लालच दिखा कर भी आलोचक को चित किया जा सकता है। अधिक से अधिक क्या करना होगा किसी कार्यक्रम में कोई पद देकर बुलाना पड़ता और खर्च भी कितना आने जाने का रहने ठहरने और खाने पीने का होता है। मानदेय के नाम पर स्मृति चिह्न और श्रीफल-शॉल में तो सब गद्गद हो जाते हैं। ऐसे में पांच-पच्चीस क्या दिखा दिए कि बल्ले-बल्ले हो जाती।
ऐसे यारबाज आलोचकों को पटाने की दूसरी विधियां भी हैं। किसी होटल का या घर में ही कुछ प्रबंध कर देना होता है और चाहिए क्या बस शाम को कुछ गम गलत करा दिया जाए तो माता सरस्वती की ऐसे कृपा होती है कि शाम के इंतजार में ये कुछ भी कर गुजरते हैं। अगर आपकी जरा-सी सहमति हो तो कुछ अचूक विधियां भी है जिनके इतेमाल से तो यारबाज आलोचक उम्र भर के लिए चित हो जाते हैं। आप को बस इतना समझ लेना है कि मधुर स्वर और गीत-संगीत के साथ राग-रंग हर किसी की कमजोरी होता है। ये यारबाज आलोचक तो बस जरा-सा लटका-झटका दिखाया कि हांजी हांजी बोलने के अलावा सब कुछ भूल जाते हैं। आपकी हल्की-सी मुस्कान और जरा-सी अदा नाज-नखरे अनमोल है और जो मोल में नहीं खरीदा जा सकता उसे खरीदने के लिए कुछ अनमोल ही चाहिए।
अफसोच है कि मैं किसी पत्रिका का संपादक नहीं हूं, संस्था का पदाधिकारी भी नहीं और गुरुओं ने ऐसे संस्कार डाले कि ऐसा-वैसा कुछ करने से डरता हूं। मेरे साथ बस मेरी सच्चाई है। पंच चाचा कहते हैं- आलोचना से कुछ नहीं होता। आलोचक में ही अगर दम-खम होता तो वह खुद कुछ नहीं लिख लेता क्या?
 
० नीरज दइया

03 नवंबर, 2016

शुद्ध चीजों का गणित

जैसे-जैसे हमारे देश ने विकास किया है, वैसे-वैसे चीजों की शुद्धता दर घटती गई है। जहां देखो वहीं कुछ न कुछ चर्चा होती रहती है। चर्चा का क्या है? अच्छी और बुरी दोनों ही प्रकार की चर्चाएं होती हैं। क्या सच में अब ना तो पहले जैसा दूध रहा है, ना धी। समय के साथ सब कुछ बदल गया, तब दूध-धी को भी तो बदलना था कि नहीं? फिर भी बहुत लोग पुराना राग क्यों आलापते हैं? यह तो अच्छा हुआ कि चीजों के भाव अब आसमान छूने लगे हैं। पहले जैसे भाव अब नहीं रहे। पर लोग है कि पहले के भावों को याद करते रहते हैं। कहते हैं- अब पहले जैसे भाव नहीं रहे। अगर आज के इस दौर में पहले जैसे भाव हो जाए तो शामत किसकी आएगी। मरेगा तो बेचारा गरीब आदमी ही। वह तो पहले से ही अधमरा है, उसे क्यों पूरा मारने की मन में लिए बैठे हो?
पहले की बातें अब भूल भी जाएं। अरे भाई पहले तो भाव को पकड़ने और परखने वाले बहुत भले लोग हुआ करते थे। ऐसे लेखक भी होते थे, जो लोक प्रचलित अनेक बातों को खुद का मिर्च-मसाल और अपना मौलिक तेल का फौवा लगाकर ऐसी खुशबू जोड़ते थे कि सब कुछ अपने नाम के ब्रांड में बदल देने का हुनर जो जानते थे। पुराने माल को नया बनाकर वे बेचने में उस्ताद थे। बिना उदाहरण के तो आप को कोई बात समझ ही आती नहीं। नया जमाना है तो समझ भी विकसित होनी चाहिए। पर नहीं आप तो जरा सी बात क्या सुनते हैं कि अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाकर न जाने क्या का क्या अर्थ निकाल लेते हैं।
‘रायां रा भाव रातै ई गया’ जैसी सामान्य-सी अनेक लोक-उक्तियों से कथाओं का जन्म क्या कोई मामूली बात है। उससे भी गैर मामूली बात है कि लोक की बातों पर अपनी मुहर लगा कर अपनी मौलिक कहना और अपने नाम से बेचना। आम कहां से आए? यह बात आम खाने वाले को बताए या नहीं बताएं, क्या इससे आम के स्वाद में कोई फर्क पड़ता है? आप बस आम खाएं, और बगीचा चाहे मेरा हो मेरे पिता का हो या फिर पंच चाचा का आपको क्या मतलब। अगर आपमें भी कुछ करने का ऐसा हुनर छिपा है तो कीजिए। कौन कलम या हाथ पकड़ रहा है? कहा ना, यह काम हर कोई कहां कर सकता है? और कोई इसे करता है तो उसकी आत्मा जानती है कि किस कदर लोक का चीरहरण कर अपने शब्दों में पिरोने का महान कार्य किया जाता है।
सब कुछ रेडिमेड बरतने वालों को खबर ही कहां कि कौनसी चीजें कहां से आती है। शुद्ध चीजों का गणित समझना कोई आसान काम नहीं। आपको पता है कि मिर्च कितने प्रकार की होती हैं? चलिए आप तो बस यह बताएं कि मिर्च कितने रंगों में पाई जाती है? छोड़िए, यह तो पता होगा कि किसी को मिर्ची लगाई कैसे जाती है? अरे क्या कभी आपने मिर्च लगाने का महत्त्वपूर्ण काम नहीं किया। आपको कुछ तो अनुभव होगा ही, क्यों किसी को मिर्ची लगती है? पंच काका मिर्च की थेली लाएं हैं और उनके कुछ भतीजे खंख से परेशान हो रहे हैं। शुद्ध चीजों का गणित इतना गड़बड़ा गया है कि अब शुद्ध चीजों को हजम करना मुश्किल हो गया है। अरे किसी को कोई शुद्ध बात कह कर देख लो, तुरंत मिर्ची लगने लगेगी। समय के बहाव में हम और हमारे स्वार्थ इस कदर हम पर हावी हो चुके हैं कि कहीं भी हमें हमारे फायदे और नाम में कुछ किंतु-परंतु दिखाई देता है, या कोई अलग झलक नजर आए तो हम तुरंत बेचैन हो जाते हैं। सही को सही और गलत को गलत स्वीकार करने की शुद्धता का गणित हमारे पास अब बचा नहीं है। अब तो ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि!’ का युग है।
० नीरज दइया