11 नवंबर, 2016

यारबाज आलोचक को नमन

साहित्य में कवि-कहानीकार और लेखकों की जमात में एक आलोचक नाम का तुर्मखां होता है। इस तुर्मखां का नाम चाहे कोई हो पर जन उसके नाम के आगे आलोचक लिखा जाने लगता है उसी दिन से समझ लेना चाहिए कि यह ऐसा है कि जिसका कोई भरोसा नहीं कर सकता। भरोसा इस अर्थ में कि कब क्या कह दे या लिख दे, पहले से कोई कुछ भी नहीं जान सकता। कभी कभी मुझे तो ऐसा लगता है कि ये जनाब खुद तुर्मखां जी भी अपने बारे में यह नहीं जानते कि कब कौनसा गुल खिला देंगे। पता नहीं किसको हंसा और किसको रुला देंगे। नए शोध खोज से यह भी पता चला है कि ये महाशय आलोचना करते हैं मगर अपनी ही मित्र-मंडली और इनको जहां कुछ लाभ दिखता है बस उनकी ही।
वैसे मेरे मन की बात आपको मैं बता देता हूं यह जानते हुए भी कि आप अपने मन की बात कभी नहीं बाताते फिर भी मैं मूर्ख हो हूं ऐसा मूर्ख ही रहना चाहता हूं। इसका कारण भी साफ है कि मैं अपने मन के बोझ को ऐसे हलका कर लेता हूं और आप हैं कि अपने मन पर कितना कितना बोझ लादे हैं। ऐसे में आपकी इस समझदारी और यारबाज आलोचक को नमन करना जरूरी है। आपको नमन करने से आप खुश होगें और कहेंगे कि देखा खुद को खुद ही मूर्ख कहता है तब हम समझदार कैसे कहें। यह बात भी आप प्रत्यक्ष नहीं कहते बस मन पर ऐसा सोच कर बोझ बढ़ाते हैं। प्रत्यक्ष में तो हल्की सी मुस्कान देते हैं इस मूर्खता पर जिसमें आपकी विद्वता का पाखंड भी झलकता है। यारबाज आलोचक को नमन इसलिए कि ऐसे नमन से ही कभी हमारा भी नंबर लग जाए शायद।
अगर मैं किसी पत्रिका का संपादक होता तो अपने दोस्तों की किताबों की समीक्षा के लिए ऐसे यारबाज आलोचक को पत्र के साथ किताबे भेजता और फिर देखता कि वह लिखता है कि नहीं लिखता। एक भेजता और दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी भेजता रहता जब तक कि वह लिख नहीं देता। मानदेय का लालच दिखा कर भी आलोचक को चित किया जा सकता है। अधिक से अधिक क्या करना होगा किसी कार्यक्रम में कोई पद देकर बुलाना पड़ता और खर्च भी कितना आने जाने का रहने ठहरने और खाने पीने का होता है। मानदेय के नाम पर स्मृति चिह्न और श्रीफल-शॉल में तो सब गद्गद हो जाते हैं। ऐसे में पांच-पच्चीस क्या दिखा दिए कि बल्ले-बल्ले हो जाती।
ऐसे यारबाज आलोचकों को पटाने की दूसरी विधियां भी हैं। किसी होटल का या घर में ही कुछ प्रबंध कर देना होता है और चाहिए क्या बस शाम को कुछ गम गलत करा दिया जाए तो माता सरस्वती की ऐसे कृपा होती है कि शाम के इंतजार में ये कुछ भी कर गुजरते हैं। अगर आपकी जरा-सी सहमति हो तो कुछ अचूक विधियां भी है जिनके इतेमाल से तो यारबाज आलोचक उम्र भर के लिए चित हो जाते हैं। आप को बस इतना समझ लेना है कि मधुर स्वर और गीत-संगीत के साथ राग-रंग हर किसी की कमजोरी होता है। ये यारबाज आलोचक तो बस जरा-सा लटका-झटका दिखाया कि हांजी हांजी बोलने के अलावा सब कुछ भूल जाते हैं। आपकी हल्की-सी मुस्कान और जरा-सी अदा नाज-नखरे अनमोल है और जो मोल में नहीं खरीदा जा सकता उसे खरीदने के लिए कुछ अनमोल ही चाहिए।
अफसोच है कि मैं किसी पत्रिका का संपादक नहीं हूं, संस्था का पदाधिकारी भी नहीं और गुरुओं ने ऐसे संस्कार डाले कि ऐसा-वैसा कुछ करने से डरता हूं। मेरे साथ बस मेरी सच्चाई है। पंच चाचा कहते हैं- आलोचना से कुछ नहीं होता। आलोचक में ही अगर दम-खम होता तो वह खुद कुछ नहीं लिख लेता क्या?
 
० नीरज दइया

03 नवंबर, 2016

शुद्ध चीजों का गणित

जैसे-जैसे हमारे देश ने विकास किया है, वैसे-वैसे चीजों की शुद्धता दर घटती गई है। जहां देखो वहीं कुछ न कुछ चर्चा होती रहती है। चर्चा का क्या है? अच्छी और बुरी दोनों ही प्रकार की चर्चाएं होती हैं। क्या सच में अब ना तो पहले जैसा दूध रहा है, ना धी। समय के साथ सब कुछ बदल गया, तब दूध-धी को भी तो बदलना था कि नहीं? फिर भी बहुत लोग पुराना राग क्यों आलापते हैं? यह तो अच्छा हुआ कि चीजों के भाव अब आसमान छूने लगे हैं। पहले जैसे भाव अब नहीं रहे। पर लोग है कि पहले के भावों को याद करते रहते हैं। कहते हैं- अब पहले जैसे भाव नहीं रहे। अगर आज के इस दौर में पहले जैसे भाव हो जाए तो शामत किसकी आएगी। मरेगा तो बेचारा गरीब आदमी ही। वह तो पहले से ही अधमरा है, उसे क्यों पूरा मारने की मन में लिए बैठे हो?
पहले की बातें अब भूल भी जाएं। अरे भाई पहले तो भाव को पकड़ने और परखने वाले बहुत भले लोग हुआ करते थे। ऐसे लेखक भी होते थे, जो लोक प्रचलित अनेक बातों को खुद का मिर्च-मसाल और अपना मौलिक तेल का फौवा लगाकर ऐसी खुशबू जोड़ते थे कि सब कुछ अपने नाम के ब्रांड में बदल देने का हुनर जो जानते थे। पुराने माल को नया बनाकर वे बेचने में उस्ताद थे। बिना उदाहरण के तो आप को कोई बात समझ ही आती नहीं। नया जमाना है तो समझ भी विकसित होनी चाहिए। पर नहीं आप तो जरा सी बात क्या सुनते हैं कि अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाकर न जाने क्या का क्या अर्थ निकाल लेते हैं।
‘रायां रा भाव रातै ई गया’ जैसी सामान्य-सी अनेक लोक-उक्तियों से कथाओं का जन्म क्या कोई मामूली बात है। उससे भी गैर मामूली बात है कि लोक की बातों पर अपनी मुहर लगा कर अपनी मौलिक कहना और अपने नाम से बेचना। आम कहां से आए? यह बात आम खाने वाले को बताए या नहीं बताएं, क्या इससे आम के स्वाद में कोई फर्क पड़ता है? आप बस आम खाएं, और बगीचा चाहे मेरा हो मेरे पिता का हो या फिर पंच चाचा का आपको क्या मतलब। अगर आपमें भी कुछ करने का ऐसा हुनर छिपा है तो कीजिए। कौन कलम या हाथ पकड़ रहा है? कहा ना, यह काम हर कोई कहां कर सकता है? और कोई इसे करता है तो उसकी आत्मा जानती है कि किस कदर लोक का चीरहरण कर अपने शब्दों में पिरोने का महान कार्य किया जाता है।
सब कुछ रेडिमेड बरतने वालों को खबर ही कहां कि कौनसी चीजें कहां से आती है। शुद्ध चीजों का गणित समझना कोई आसान काम नहीं। आपको पता है कि मिर्च कितने प्रकार की होती हैं? चलिए आप तो बस यह बताएं कि मिर्च कितने रंगों में पाई जाती है? छोड़िए, यह तो पता होगा कि किसी को मिर्ची लगाई कैसे जाती है? अरे क्या कभी आपने मिर्च लगाने का महत्त्वपूर्ण काम नहीं किया। आपको कुछ तो अनुभव होगा ही, क्यों किसी को मिर्ची लगती है? पंच काका मिर्च की थेली लाएं हैं और उनके कुछ भतीजे खंख से परेशान हो रहे हैं। शुद्ध चीजों का गणित इतना गड़बड़ा गया है कि अब शुद्ध चीजों को हजम करना मुश्किल हो गया है। अरे किसी को कोई शुद्ध बात कह कर देख लो, तुरंत मिर्ची लगने लगेगी। समय के बहाव में हम और हमारे स्वार्थ इस कदर हम पर हावी हो चुके हैं कि कहीं भी हमें हमारे फायदे और नाम में कुछ किंतु-परंतु दिखाई देता है, या कोई अलग झलक नजर आए तो हम तुरंत बेचैन हो जाते हैं। सही को सही और गलत को गलत स्वीकार करने की शुद्धता का गणित हमारे पास अब बचा नहीं है। अब तो ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि!’ का युग है।
० नीरज दइया

02 नवंबर, 2016

संकट में इन्हें सूचित कीजिए

अंग्रेज भारत क्या आए, सब कुछ उलटा-पुलटा कर गए। यह मैं नहीं पंच चाचा कह रहे हैं। उनकी डायरी बोल रही है। मेरी हालत ऐसा कुछ कहने या लिखने की नहीं है। आपकी हो तो आप जाने। मैं तो बस इतना जानता हूं कि मेरे ऐसा कहने-लिखने पर बहुत से सवाल होते हैं। एक सीधी-सी बात में लोगों को अनेक पेच दिखाई देते हैं। वैसे यह बात हमारे पंच चाचा जितनी सीधी-सपाट है। डायरी में लिखा है कि पहले सब मानते थे कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नव संवत्सर प्रारंभ होता है। राजस्थानी समाज का नया साल दीपावली के दिन से आरंभ होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन से आरंभ करते हैं। पंजाब में नया साल बैशाखी के साथ आता है और इस्लामिक कैलेंडर का नया साल मुहर्रम से आरंभ होता है। यह नववर्ष के सिलसिले में जनवरी-फरवरी को अपनाते हुए हमने धर्मनिरपेक्षता का परिचय दिया है। सब अपना अपना नया साल मनाओ पर जनवरी-फरवरी या कहें अप्रैल-मई में ऐसे अटके है कि यह हमारी अनेकता में एकता का लाजबाब उदाहरण बन गया है। साला कोई साल का समापन दिसम्बर में करता है, तो कोई मार्च को साल का ऐंडिंग बताता है। अजीब माथापच्ची है।
    इन सब बातों का दोष पंच चाचा अपनी डायरी में अंगेजों को देते हुए अनेक बातें लिखते हैं। आज संयोग ऐसा बैठा है कि वे अपनी डाय़री बाहर भूल गए और यह मेरे हाथ लग गई। हमारे धर्मनिरपेक्ष देश के बारे में पंच चाचा के विचार मुझे प्रभावित करते हैं। वे तो आज भी नववर्ष का शुभारंभ दीपावली से करते हैं। आप भले पंच चाचा को ठेठ मारवाड़ी या राजस्थानी कह लें, पर वे अपनी आस्था पर अडिग है। सच में यह बहुत बड़ी बात है कि पंच चाचा की आस्था में उनका सुख, समृद्धि, वैभव और ऐश्वर्य समाहित है।
    पंच चाचा की आस्था का अनुपम उदाहरण उनकी डायरी के पहले पन्ने पर देख रहा हूं। अनेक जानकारियों के बाद बड़े अक्षरों में छपा है- ‘संकट में इन्हें सूचित कीजिए।’ पंच चाचा ने जहां मेरा नाम लिखा होना चाहिए वहां हमारे शहर और आस-पास के अनेक देवी-देवताओं के नाम लिख दिए हैं। लिखा है कि संकट में इन्हें सूचित कीजिए : कोड़मदेसर भैंरूनाथ, हनुमानजी, गढ़ गणेशजी, देशनोक करणी माता, नगणेचीजी माताजी, सालासर बालाजी, पूनरासर बालाजी, मोरखाणा सुसाणीदेवी...। मैं तो इतने नाम देख कर हैरान हूं कि अगर संकट के समय इन्हें सूचित करना पड़ा तो कैसे सूचित करूंगा। काश कि यहां मेरा नाम और मोबाइल नंबर लिखे हुए होते तो मैं सोचता कि पंच चाचा को मुझ पर भरोसा है। पंच चाचा खुदा ना करे कि आप पर कोई संकट आ जाता है तो मैं क्या करूंगा। मैं कर भी क्या सकता हूं। सच में तो करेंगे ये सभी जिनके अपाने नाम लिखें हैं। डॉक्टर भी सब कुछ करने के बाद भी कहते हैं- सब ऊपर वाले के हाथ में है। ये ऊपर वाला अनेक नामों से हमारे आस-पास अपने कुछ स्थान बनाकर बैठा है। पंच चाचा का भरोसा है कि संकट के समय ये सभी या इन में से कोई एक-आधा मदद जरूर करेगा।
    मैं उस युग की कल्पना कर रहा हूं जब इन सभी देवी-देवताओं के पास भी मोबाइल आ जाएगा और पंच चाचा जैसे हमारे चाचा जिस किसी भी नाम लिखेंगे साथ में मोबाइल नंबर भी लिखेंगे। मुझे पता नहीं कि मैं संकट में इन्हें सूचित कर सकूंगा या नहीं, फिलहाल संकट में तो मैं आने वाला हूं क्यों कि दरवाजा बजा है और संभव है कि पंच चाचा आ रहे हो। मैं यहां उनकी डायरी को लिए बैठा हूं यह जानकर वे नाराज जरूर होंगे। मैं भला उन्हें क्यों नाराज करने लगा। मैंने कुछ नहीं देखा, कुछ नहीं पढ़ा और हां आपसे पूछे तो आप भी कह देना कि मैंने आपको कुछ नहीं बताया।


28 अक्टूबर, 2016

दीप जलाए

सभी को
लीलता है-
अंधकार
मूर्त-अमूर्त
नहीं छोड़ता
वह किसी को
मगर मन में
जगमग करता है-
एक दीप सदा....

इस मन-दीपक को
आस-उम्मीद की
रोशनी देते रहना तुम।

तुम जो बैठे हो
दीप जलाएं
मेरे मन-आंगन !

-नीरज दइया

23 अक्टूबर, 2016

दो कविताएं • नीरज दइया

तुम को संबोधित

कौन हो तुम ?
कौन हो सकते हो तुम ?
तुम को संबोधित है-
मेरी सारी कविताएं।

मैं खोजता हूं-
कविताओं में तुम को !
हमारे समय में
यह एक रहस्य है
जब कविताओं में तुम
खोजते नहीं खुद को...
खोजता हूं मैं जिसे
पा लेता हूं- तुम को।
तुम से जुदा
मैं स्मृतियों में खोया-
तुम को सामने पाकर
तुम को संबोधित हूं !
००००

जान से खेल जाती हैं

क्या चिंटियां घूमती हैं-
बस भोजन की तलाश में...
ऐसा क्यों सोचते हो तुम ?
जब भी वे आतीं है पास
बचते हैं हम और तुम
खुद को बचाते हुए
बचते हुए, दूर करते हैं
दूर हो जाना चाहते हैं
फिर भी वे, पास आती हैं
बार-बार आती हैं....
रास्ता बदल-बदल कर आती हैं
क्या हर बार वे आती हैं-
भोजन की तलाश में ?
जान से खेल जाती हैं
कभी-कभी जिद्दी चिंटियां
क्या चिंटियां घूमती हैं-
अपनी मृत्यु का सपना लेकर।
००००