12 अगस्त, 2016

हियै तराजू तोल के चक्कर में

र बात दो प्रकार की होती है। अंदर की और बाहर की। कहने वाले कहते हैं कि बाहर की बात अंदर जाती है और अंदर की बात बाहर आती है। बात के अंदर-बाहर आने-जाने के कई बार बात बदल जाती है। असली बात बीच राह कहीं खो जाती है। बात चाहे अंदर की हो या बाहर की, मगर बात लगातार होनी चाहिए। बात के समर्थकों का मानना है कि बिना बात के भी बात होनी चाहिए। यह सुन कर मुझे संदेह होता है कि जब बात होगी ही नहीं तब वह अंदर-बाहर कैसे आएगी-जाएगी। बात होती है तब हर जगह की बात अलग-अलग होती है, होनी भी चाहिए। बात पर स्थानीयता का प्रभाव अनेक स्तर पर होता है। किंतु क्या बात नहीं है तब भी ये स्थानीयता पीछा नहीं छोड़ती और दो अलग अलग जगहों पर बिना बात भी अलग-अलग बात संभव होती है। बात का होना या नहीं होना हमारे अंदर-बाहर होने या नहीं होने पर निर्भर करता है। हम एक जगह संतुष्ट नहीं होते इसिलिए कभी अंदर होते हैं और कभी बाहर। जब बात के अंदर होते हैं तब बाहर निकलना चाहते हैं और इसके विपरीत जब हमें बात से बाहर रख दिया जाता है तब बात के ऐन मध्य पहुंच कर नहीं मालूम क्या हासिल करना चाहते हैं।
फिल्म आनंद में राजेश खन्ना जब किसी अनजान आदमी से बात कर सकता है और हम जो जान-पहचान वाले से ही बात करने में कतराते हैं। घर पर कोई सगा-संबंधी आ जाए तो दो-चार सावल-जबाब के बाद सोचते हैं- आगे क्या बात करें? हम इधर-उधर की नहीं मूल बात जानना चाहते हैं कि कोई किस काम से आया है। कभी कहीं आप बिना काम ऐसे ही चले जाएं और यह कह भी दे कि ऐसे ही आ गया मिलने, तो सामने वाला विश्वास नहीं करेगा। उसे अंत तक यही लगता रहेगा कि किसी न किसी काम से ही आप उसके यहां पहुंचे हैं। आज के युग में इतनी जटिलताएं है कि बिना काम के कोई किसी के यहां आता-जाता नहीं। कहीं कहीं तो ऐसा भी है कि कहीं काम हो तो भी समयाभाव है। हम चाह कर भी कहीं आने-जाने में बहुत बार खुद को फसा हुआ पाते हैं और निकल नहीं पाते। इस समय में कोई खाली नहीं। सभी अपने में व्यस्त हैं। कुछ ने व्यस्ताएं ओढ़ रखी है। और कुछ नहीं तो इंटरनेट जो है हमारा बहुत सारा समय खा जाता है। आज जब हम कुछ नहीं, बस समय ही सब कुछ है। मैं सोचता जरूर हूं कि समय पर सही बात करूं पर अक्सर नहीं होता। कुछ समय तो ऐसे सोचते बीत जाता है कि अंदर की बात करूं या बाहर की। बात करता हूं पर बहुत आगे बात का सिरा खो जाता है और सोचने लगता हूं कि बात का आगाज ही गलत कर दिया था। पर मुंह से निकली हुई बात और कमान से निकला हुआ तीर भला वापस कब होते हैं।
‘हियै तराजू तोल के तब मुख बाहर आनी’ के चक्कर में बहुत बार बात तराजू पर तुलती नहीं और मैं चुप रहता हूं। कुछ ऐसे माहिर होते हैं जो बिना बात के भी ढेर सारी बातें कर सकते हैं। मसलन- कैसे हो? क्या कर रहे हो? कहां रहते हो? घर का मकान है या किराये का? इन दिनों क्या कर रहे हो? नौकरी में गुजारा हो जाता है क्या? बच्चे कितने हैं? बेटियों के लिए कोई लड़का देखा क्या? क्यों जमाना बहुत खराब है? तबियत कैसी है? कोई बीमारी तो नहीं? थके-थके उदास क्यों नजर आते हो? तुम्हारा शर्ट बहुत सुंदर है, कहां से खरीदा? हाथ में अंगूठी शनि की पहन रखी है क्या? क्या तुम ग्रहों पर विश्वास करते हो? अखाबार में सब लोग झूठा राशिफल क्यों पढ़ते हैं? मैं तो भूत-प्रेत को नहीं मानता, तुम मानते हो क्या?
ऐसी ढेर सारी बातें को करने से क्या फायदा जो किसी काम की नहीं हो। जो भीतर हो वहीं बाहर मुख पर होनी चाहिए। बातों के बवंडर को देख पंच चाचा कहते हैं- अंदर और बाहर की बात में फर्क क्यों?

09 अगस्त, 2016

वह खेत में उपजाता है कविता-कहानी

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का एक छोटा-सा गांव है- परलीका। यह गांव अब आधुनिक राजस्थानी साहित्य में बहुत बड़ा मुकाम बना चुका है। पहली बात तो इस गांव ने कहानी-ग्राम की अवधारणा को साकार कर दिखाया है। दूसरा सच यह है कि इस गांव ने आधुनिक राजस्थानी कहानी को कई प्रमुख कहानीकार दिये हैं, वहीं कहानी-आंदोलन को समर्पित 'कथेसर' जैसी पत्रिका भी यहीं से वर्ष 2012 से प्रकाशित हो रही है। वर्षों पहले हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था- 'जय जवान, जय किसान।' यह नारा परलीका के एक सीमान्त काश्तकार जिनका नाम रामस्वरूप किसान है, के संदर्भ में सार्थक सिद्ध हो रहा है। सच में यह किसान ही है, जो खेत में अपना पसीना बहाकर खेती करता है। किंतु आश्चर्य इस बात का है कि यह किसान अपने खेत में पिछले बीस वर्षों से बीजों के स्थान पर शब्द डाल रहा है। इतना ही नहीं खेत में कविताएं-कहानियां उपजाता है। अथक मेहनती किसान के विषय में उल्लेखनीय है कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बांग्ला नाटक 'रक्त करबी' का इसने राजस्थानी अनुवाद 'राती कणेर' नाम से किया, जिस पर साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार- 2003 अर्पित किया। इतना ही नहीं साहित्य अकादेमी, नयी दिल्ली की ओर से 'राइटर्स इन रेजीडेंसी' के तहत डेढ़ लाख रुपये की स्कॉलरशिप भी रामस्वरूप किसान को दी गई, जिसके अंतर्गत 'तीखी धार' कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ है। साथ ही इसी किसान की रचनाएं राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड तथा कई विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों में शामिल हो चुकी हैं।                 
                  वर्षों से खेती और साहित्य में संलग्न रामस्वरूप किसान की रचनाएं और बाल अब पक चुके हैं। आप का जन्म परलीका में राजेराम बेनीवाल के छोटे से घर में 14 अगस्त, 1952 को हुआ। उनके ही गांव में रहने वाले मित्र कवि-कथाकार डॉ. सत्यनारायण सोनी लिखते हैं- 'किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित्य खेत जाते देख कर कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है।' इस बड़े कवि-कथाकार ने वर्तमान में बदल रहे ग्रामीण जन-जीवन का यर्थाथ जिस बारीकी से प्रकट करने का उपक्रम अपनी रचनाओं में किया है, उसे देख हर कोई विस्मित होता है। बहुत सरलता-सहजता से कुछ ही शब्दों में ऐसी मार्मिक बात किसान की रचनाओं में आती है कि वह सीधे दिल और दिमाग पर छा जाती है। 'घर में रमती कवितावां' नामक सीरीज की एक कविता देखें-'छत पर चढ़'र/ हेलौ मारदयौ/ कोई नीं सुणै/ छात रै लटक ज्यावौ/ सगळौ गांव/ भेळौ हुज्यै'। (छत पर चढ़ कर / आवाज़ देने से / कोई नहीं सुनता / छत से लटक जाने पर / पूरा गांव / एकत्रित हो जाता है।) 
                  किसान की कविता की मार्मिकता मूल भाषा राजस्थानी में कहीं अधिक गहराई के साथ उद्घाटित होती है। वे जिस टकसाली राजस्थानी भाषा का प्रयोग करते हैं, वह परलीका क्षेत्र में बोली जाने वाली स्थानीय भाषा है। वे श्रृंगारिक शब्दों से सुसज्जित और कलात्मक भाषा के विरोधी नहीं है, किंतु ऐसी भाषा और कविता किस काम की जो संप्रेषित ही नहीं हो, इसी स्थिति के लिए उनकी 'कांई कै'णौं चावै' की ये पंक्तियां उल्लेखनीय हैं- 'थांरी/ सिणगरयोड़ी भासा रै/ कामणगारै सबदां रो अरथ/ कोनी आवै/ खोल'र/ बता कवि/ कांईं कै'णो चावै?' (तुम्हारी / श्रृंगारित भाषा के / जादुई शब्दों का अर्थ / नहीं समझता / खुल कर / बता कवि / कहना क्या चाहता है?) यहां संवाद की जीवंत भाषा उनको सीधा जन-जन से जोड़ती है।
                   साहित्य में पहला कदम रामस्वरूप किसान ने राजस्थानी काव्य-कृति 'हिवड़ै उपजी पीड़' से रखा। इस कृति में सात सौ से अधिक दोहें हैं। यह रेखांकित करने योग्य है कि राजस्थानी भाषा अपनी मान्यता के लिए संघर्षरत है और प्रकाशन व्यवसाय नाजुक हालत में है। राजस्थानी पुस्तकों की पहुंच पाठकों तक नहीं है या कहें कि खरीद कर पढ़ने वाले पाठक बहुत कम हैं। ऐसी विकट स्थितियों में भी किसान की इस पुस्तक के अब तक तीन संस्करणों का छपना एक कीर्तिमान है। कवि ने परम्परागत दोहा छंद में आधुनिक भावबोध के साथ मर्मस्पर्शी व्यंजनाओं में अपने अनुभवों-अनुभूतियों को यहां साझा किया है। वहीं चित्रात्मक भाषा द्वारा भावों की सरस प्रस्तुति भी। अपनी लघु-पुस्तिका 'कूक्यो घणो कबीर' में 'कीड़िया' को संबोधित सोरठा-प्रयोग किसान ने किया है, तो 'आ बैठ बात करां' में उनकी छंद-मुक्त राजस्थानी कविताएं हैं। मूल हिंदी में एक लम्बी कविता के रूप में कृति 'गांव की गली-गली' का भी प्रकाशन हुआ है। जिसके विषय में वरिष्ठ कवि विजेन्द्र ने लिखा है- 'किसान ने हिंदी को राजस्थानी की ऊर्जा से सींचकर हिंदी को समृद्ध किया है- यह इस कविता की बड़ी उपलब्धि है।' 
                  आधुनिक संदर्भों में संबोधन काव्य का अति आत्मीय रूपांतरण अथवा कहें नव-प्रयोग कृति 'आ बैठ बात करां' में हुआ है। कवि किसान ने जिस अंतरंता से अपने घर में पत्नी से बात करने का उद्घोष किया है, वह बेहद मर्मस्पर्शी और अद्वितीय है। मामूली से मामूली बात को कविता में मार्मिकता के साथ रूपांतरित कर देना उल्लेखनीय है- 'पतझड़ री/ छाती पर/ पग धर पूगां/ बसंत रै घरां/ आ बैठ/ बात करां।' (पतझड़ की/ छाती पर/ पैर रख कर पहुंचे/ बसंत के घर/ आ बैठ/ बात करें।) 
                  ऐसा कहने की क्षमता रखने वाले इस विरल संवेदना के कवि में अक़सर मित्र फैसला नहीं कर पाते कि ये किसान बड़ा कवि है, या बड़ा कहानीकार। और तो और, इसमें किसी बड़े साहित्यकार से भी बड़ा एक इंसान बसता है। जिसे गांव की गली-गली प्यार करती है और जो मित्रों-परिजनों को देखते ही खिल उठता है। दुश्मन के लिए भी बांहें फैलाए चौड़ी छाती सामने करने वाले ऐसे इंसान को ठीक से समझ पाना सरल नहीं है। 
                  'जद-जद/ खाली हाथ/ बा'वड्यो म्हैं घरां/ हांस'र जेब में हाथ मारयौ/ थूं म्हारी/ देखयो तो कविता लाधी/ रिपियां सूं घणौं मान दियौ/ थूं म्हारी कविता नै।' (जब-जब/ खाली हाथ लिए/ मैं घर लौटा/ हंस कर/ जेब टटोलती तुम मेरी/ देखा तो मिली कविता/ रुपयों से अधिक मान दिया/ तुमने मेरी कविता को।) यह रहस्योद्घाटन है जिसमें किसान अपनी अर्द्धांगिनी आनंदी जी को अपनी कविता के निरंतर परिष्कृत होने का श्रेय देते हैं। उनका पूरा परिवार और गांव स्वयं को आनंदित महसूस करता है। किसान मूलत: कवि हैं और कहीं भी हो वह सदा अपनी दुनिया में खोये रहते हैं। जब कभी अपने बेटे की दुकान में बैठने का अवसर आता है, तब भी वे वहां कविता की संभावना तलाश लेते हैं। उनकी एक मूल हिंदी कविता है- 'बेटा जब कभी बाहर जाता है/ अपनी लोह-रछ की दुकान में/ मुझे बैठा जाता है।/ सामान से ठसाठस दुकान/ लिखने का कमरा बन जाती है।/ जिसमें बैठा मैं/ वहां होते हुए भी वहां नहीं होता,/ ग्राहक खाली हाथ लौट जाते हैं।/ बेटा जब लौटता है/ कविता आगे रख कहता हूं-/ आज की कमाई।/ उसके चेहरे से फिसलकर/ एक फीकी मुस्कान/ दुकान में तैरने लगती है।' जिस आदमी ने ठान लिया हो कि उसे बस कवितामय ही रहना है, तो उस के लिए सर्वत्र कविता ही कविता है। वह सोता है जब तक आंख खुली रहती है तब तक छत को ताकते हुए कविताएं ही कविताएं सोचता है। 
                  रामस्वरूप किसान कवि के साथ-साथ निर्भीक संपादक भी हैं। अपनी त्रैमसिक पत्रिका 'कथेसर' के संपादकीय में लेखन, लेखक और जीवन के गूढ़ विर्मश बड़ी सहजता से लिखते हैं। किसी भी मुद्दे पर वे बेबाक लिखने से नहीं चूकते। राजस्थानी कहानी 'दलाल' से रामस्वरूप किसान चर्चा में आये, जिसे 'कथा' संस्था द्वारा पुरस्कृत किया गया और अंग्रेजी अनुवाद द्वारा यह पूरे देश में राजस्थानी कहानी के कीर्तिमान के रूप में चर्चित रही। बेहद छोटे से कथानक व थोड़े से संवादों के बल पर जिस कलात्मकता से किसान ने पशु-दलाल के चरित्र में मानवीय दृष्टिकोण को व्यंजित किया है, वह निसंदेह अविस्मरणीय है। किसान के अब तक तीन राजस्थानी कहानी-संग्रह- 'हाडाखोड़ी', 'तीखी धार', 'बारीक बात' तथा एक लघुकथा-संग्रह- 'सपनै रो सपनो' प्रकाशित हो चुके हैं। किसान की राजस्थानी कहानियों का हिंदी अनुवाद डॉ. सत्यनारायण सोनी ने किया है, जो जल्द ही पुस्तकाकार प्रकाशित होने वाला है। निश्चय ही इस प्रकाशन से किसान के भीतर बसने वाले महान कहानीकार को भारतीय कहानीकर के रूप में पहचाना जाएगा। 
                   किसान की रचनाएं अपनी लौकिक भाषा स्वरूप में अनेक संभावनाएं लिए हुए हैं। वे अपनी रचनाओं में किसी शब्द के लिए शब्दकोश के बजाय गांव परलीका के जन-जन के कंठों से पोषित भाषा का प्रयोग महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके इन दिनों चर्चित कहानी-संग्रह 'बारीक बात' के संदर्भ में कवि मोहन आलोक ने अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लासिकल पड़ाव मानते हुए राजस्थानी में लिखा- 'किसान की कहानियां अपने शिल्प को साथ लेकर प्रगट होती हैं। यह एक ऐसा शिल्प है जिसे शिल्प नहीं, उनका भाषाई स्वभाव कहना उपयुक्त होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक अपने लेखन में 'मचान' पर खड़ा होकर आपने खेत की रखवाली कर रहा है, और भाषा के बुलबुले उसके चहुंदिस तैर रहे हैं।' 
                  खेत में कड़ी मेहनत के बल पर जीवनयापन करने वाले राजस्थानी के इस अनूठे साहित्यकार रामस्वरूप किसान का भाषा मान्यता आंदोलन में भी सक्रिय योगदान रहा है। इन्हें राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर के मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा पुरस्कार सहित अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके हैं। साथ ही इनकी अनेक रचनाएं कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
  
दुनिया इन दिनों  15 अगस्त, 2016 अंक में प्रकाशित। ब्लॉग पोस्ट लिंक

01 अगस्त, 2016

फन्नेखां लेखक नहीं

जिस तरफ जिंदा आदमी की पहचान है उसकी सांसें, उसी तरह किसी लेखक की पहचान क्या होनी चाहिए? सीधा सा इसका जबाब है- उसका लेखन। अगर कोई आदमी सांस नहीं ले रहा या कहें जिसकी सांसें पूरी हो चुकी होती है, वह मृत कहलाता है। इसी तर्ज पर पन्नेखां को मृत लेखक मानना चाहिए। जो लेखन से थक-हार कर वर्षों से कलम को दूर फेंके बैठा हो, उसे मरा हुआ लेखक माने जाने में हर्ज ही क्या है? माना पन्नेखां जिंदा है, वह रोज उठता है खाता-पीता और सोता है। यह काम तो हर इंसान करता है, लेखक का होता यानी हमेशा नहीं तो दो-चार दिन से, या फिर महीने-साल में कभी तो लिखना होना चाहिए या कि नहीं। पन्नेखां की आखरी किताब बीस साल पहले छपी। मान एक नहीं पांच-सात छपी और कई पुरस्कार मान-सम्मान भी मिल गए या ले लिए तो क्या हुआ। वे तब लेखक थे अब नहीं है। पर उनके भक्त हैं कि अब तक उनकी अर्थी को ढोते चले जा रहे हैं। आखिर कब तक ढोता रहेंगा कोई किसी की अर्थी। जाहिर है कि या तो फन्नेखां को मर जाना चाहिए या फिर अर्थी पर ही यकायक बैठ जाना चाहिए। गला फाड़ कर चिल्लाना चाहिए- अरे भैया, नीचे उतारो। मैं अब लिखना चाहता हूं।
      पंच चाचा के विचार हैं- लेखक अमर होता है। कोई लेखक संसार से चला भी जाता है तो भी वह अपने शब्दों के सांसार में जिंदा रहता है। फन्नेखां ने जब कभी लिखा और खूब लिखा, तभी तो वह लेखक है। जो एक बार जो लेखक हो गया, वह तो हमेशा के लिए लेखक रहेगा। लेखक को लेखक मानना पड़ेगा, उसकी मरजी है कि वह लिखे या नहीं लिखे। किताब छपाए या नहीं छपाए। किताब तो जब छपेगी छप जाएगी। हो सकता है वह लिख-लिख रियाज कर रहा हो। रियाज बहुत जरूरी है। क्या पता इसी रियाज से आगे चल कर वह ऐसा कुछ रचे जिस पर नोबल पुरस्कार मिल जाए।
      मैंने पंच चाचा से कहा कि हमारे राजस्थान से नोबल के लिए नामित लेखक विजयदान देथा ‘बिज्जी’ ने भी खूब रियाज किया था। बताते है कि तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी फिर संकल्प किया अपनी मातृभाषा में लिखने का। वे रवीन्द्र को अपना एक गुरु मानते थे और अपने गुरु की तरह नोबल लाने की पूरी इच्छा थी। तभी तो उस दरवाजे तक पहुंचे। मैंने माना पंच चाचा ठीक और लोग गलत कहते हैं। हो सकता है कि पिछले बीस वर्षों से फन्नेखां जी भी रियाज करते रहे हो। रियाज के कई प्रकार है और उसमें गुप्त रियाज का बड़ा महत्त्व है। ऐसा रियाज जिसे जीते-जी जाहिर नहीं किया जाता।
      हमारे बिज्जी ने रियाज किया था और उसे जाहिर भी किया। अपने आत्मकथ्य और साक्षात्कार में बिज्जी बोले कि उन्होंने तीन सौ कहानियां और तेरह सौ कविताएं लिखी थी। जो बिज्जी से परिचित हैं वे जानते हैं कि वे खुद को खुली किताब की तरह रखते थे। बोरूंदा में उनके पत्राचार, लेखन-विमर्श सभी खुली किताब की तरह उनके जीवन काल में रहे और आज जब वे संसार में नहीं है तब संकट आ गया कि तीन सौ में से तीन कहानियां और तेरह सौ में से एक कविता भी किसी की आंखों के सामने नहीं आ पा रही है। नोबल के लिए नामित लेखक के आरंभिक-सफर को जानने को पाठक-लेखक की उत्सुकता और बेताबी स्वभाविक है। काश ऐसा होता कि बिज्जी के जीवनकाल में यह रहस्य उजागर हो जाता। आज यह संकट देखना-सहना नहीं पड़ता। खैर हुआ सो हुआ। जो होता है वह अच्छे के लिए ही होता है। इस पाठ से हमें सबक लेना है कि ऐसी साधना से हमारा पाठक-वर्ग वंचित नहीं रहे। पन्नेखां विषयक चिंता वाजिब है। फन्नेखां लेखक नहीं है, ऐसा आरोप उनकी गुप्त-साधना के जग-जाहिर होने से ही निराधार हो सकेगा। 
१६-१२-२०१६ नया अर्जुन श्रीगंगानगर में 

 

11 जुलाई, 2016

कहां तक पहुंचा उड़ता पंजाब?

फिल्म 'उड़ता पंजाब' के निर्माता-निर्देशकों को कड़ा झटका लगाने का रहस्य पंच चाचा ने जाहिर कर दिया है। आज युवाओं से बात करते हुए पंच चाचा ने बताया कि वे फिल्म का नाम प्रचारित होते ही निर्देशन अभिषेक चौबे से बात करना चाहते थे पर कर नहीं सके। पंच चाचा ने कहा कि पहले तो अभिषेक चौबे भी मुझे चाचा मानता था, चाचा तो मैं अब भी हूं उसका। पर क्या है जब से वह फिल्म लाइन में गया है मुझे भूल सा गया है। उसने बताया ही नहीं कहां तक पहुंचा उड़ता पंजाब?
अभिषेक चौबे को बचपन से ही उड़ता शब्द से बहुत लगाव था और देश भक्ति का जज्बा उस में मनोज कुमार की फिल्में देख कर जाग गया था। भारत नाम से लगाव होने के कारण अभिषेक पहले फिल्म का नाम उड़ता भारत रखने वाला था, तब पंच चाचा ने उसे कहा कि ऐसा मत कर। अगर फिल्म हिट हो गई तो उड़ता भारत एक, उड़ता भारत दो और फिर तीन-चार न जाने कितने कितने भारत बनाने पड़ेगें। भारत एक है और एक ही रहना चाहिए। इस पर अभिषेक ने चाचा से कहा कि मेरा सपना है कि भारत तरक्की करे, आकाश में खूब ऊंचा उड़े। इसका समाधान पंच चाचा ने बताया कि तुम पहले-पहल पंजाब से शुरुआत करो, बनाओ उड़ता पंजाब। फिल्म हिट हो जाए तो बनाना- उड़ता राजस्थान, उड़ता हरियाणा, उड़ता उत्तर प्रदेश, उड़ता मध्य प्रदेश, उड़ता गुजरात। ऐसी बहुत सी फिल्में अगर बनेगी तो तुम्हारा सपना पूरा हो जाएगा और इन सभी फिल्मों के कोम्बो पैक को नाम देना ‘उड़ता भारत’।
अब जब फिल्म ऑनलाइन लीक हो गई है और मामला पुलिस साइबर विंग में चल गया है तो फिल्म से सभी भाई-बहनों का गुस्सा साफ नजर आना ही है। पंच चाचा ने कहा कि मैं कब से कहता आ रहा हूं कि पाइरेसी को ना बोलें और फिल्में थियेटर में ही देखें पर तुम बच्चे लोग कहां मानते हो। दे दना दन डाउनलोड पर डाउनलोड। देखो मेरी बात भले मानो ना मानो पर अपना शाहिद कपूर नाराज हो रहा है उसकी बात तो मान लो। चाचा जरा से हंसे और बोले मैं भी न जाने क्या क्या कह जाता हूं। अरे भाई अभिषेक चौबे और शाहिद कपूर जैसे मेरे भतीजे भी किसी की बात नहीं मानते, और अपनी मर्जी की करते हैं तो फिर दूसरे भतीजों को क्या दोष। मैं किसी को हाथ पकड़ कर तो रोक नहीं सकता।
पंच चाचा ने कहा कि जब सेंसर बोर्ड ने ‘उड़ता पंजाब’ को ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया, उससे पहले की बात है। फिल्म पर विवाद हुआ करीब 89 सीन कट लगाने का बोर्ड ने कहा था। मामला कोर्ट तक पहुंचा और हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब सिर्फ एक कट के साथ फिल्म को रिलीज होना चौबे जी ने तय किया तो भैया 88 सीन वाली फिल्म भी नहीं उड़ेगी तो कौनसी उड़ेगी। ‘उड़ता पंजाब’ तो ऐसी फिल्म है कि दिन में उड़ेगी, रात में उड़ेगी और दोपहर में भी उड़ेगी। यानी जब देखो जिसे देखो जब तक फिल्म को उड़ा नहीं लेगा, आराम से नहीं बैठेगा। कोई डाउनलोड करके उड़ाएगा, कोई मित्र से मांग कर उड़ाएगा, पर हर कोई उड़ाएगा जरूर। अब देखना यह है कि ऐसे उड़-उड़ के पंजाब कहां तक पहुंचेगा?
मैंने पूछ ही लिया- ‘इस उड़ते तीर को रोका कैसे जाए।’ चाचा के माथे पर सलवटें आई और बोले- ‘आलिया भट्ट ने ट्वीट किया है- आप हमारी दो सालों की मेहनत, खून, पसीना और आंसूओं को बर्बाद मत कीजिएगा। प्लीज 'उड़ता पंजाब' को थियेटर में ही देखिएगा।’ या तो हम आलिया की बात माने या फिर ऐसा भी हो सकता है कि अभिषेक चौबे नई फिल्म ‘उड़ता पाकिस्तान’ बनाए। फिर देखो, सभी पाकिस्तान के पीछे ना भागे तो कहना। भैया, भारत ऐसा देश है जहां कोई किसी को अधिक उड़ने नहीं देता।’

08 जुलाई, 2016

ये मन बड़ा पगा कर रहा

            ‘मन’ का अर्थ समझना-समझाना बेहद कठिन है। बचपन में तो मालूम नहीं था कि भीतर कुछ बला की चीज मन भी लेकर मैं पैदा हुआ हूं। मुझे मेरे मन के बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया। स्कूल में गणित के मास्टरजी ‘मन’ को चालीस किलो बताते रहे और हिंदी के मास्टरजी कुछ दूसरा ही अर्थ बताते थे। तोल का ख्याल तो अब भी समझ में आता है पर सूरदास को पढ़ते हुए गोपियों के मन की व्यथा न तब समझ में आती थी न अब। उस व्यथा को तो जैसे-तैसे रट-रट कर पेपर में पूछे जाने पर उत्तर के रूप में लिखा था अब भी जब ‘उधो मन ना भये दस बीस, एक हुतो जो गयो श्याम संग’ पढ़ता-पढ़ता हूं तो विनोद करने को जी करता है।
            गोपियों के समय फोटो प्रतिलिपियों का चलन नहीं था। पर अब तो खूब है। अब कोई ‘ओरिजनल डोक्यूमेंट’ किसी के संग जाने नहीं देता। हर जगह फोटो-प्रतिलिपि। एक दिन सोचा कि मन की फोटोप्रतिलि कर ली जाए। मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता, फिर फोटो प्रतिलिपि कैसे बनावाएं? मन और मनमीत को सोचते एक गाना याद आता है- मन रे तू काहे ना धीर धरे / वो निर्मोही मोह ना जाने, जिनका मोह करे’ मन को मनमीत का मोह होना लाजमी है पर वह निर्मोही क्यों है। यह स्पष्ट है कि मन का एक गुणधर्म मोह करना है। मोह से बचने के लिए मन को पकड़ कर रखो। मैं मन को पकड़ने के प्रयास करता हूं, पर अभी तक तो पकड़ में नहीं आया। मैं सोचता हूं कि मेरा मन छोटा है या बड़ा? कभी लगता है छोटा है और कभी लगता है नहीं यह तो बहुत बड़ा है। ऐसे में मैं दूसरों के मनों की बात क्यों करूं।
      कभी-कभी सोचता हूं मन को इस बार पकड़ लिया, वश में कर लिया। पर मन है कि वो गया ये गया का छलावा ही करता रहता है। मन का एक गुणधर्म मचलना भी है, जिसे इस गाने में गीतकार ने लिखा है- ‘जब भी कोई कंगना बोले पायल छनक जाये / सोयी-सोयी दिल की धड़कन सुलग-सुलग जाये / करूँ जतन लाख मगर मन मचल मचल जाये।’ ये कंगना और पायल जरूर मेरे जी का जंजाल बनते, पर ऐसा होते-होते बीच में कलम आ गई और उसी से मुझे प्यार हो गया।
      अगर कभी ऐसा महसूस हो कि मन का अर्थ समझ आ गया तो फिर से मन में सवाल उठ खड़ा होता है। ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ कहने वाले ने यह नहीं बताया कि मन अगर दर्पण है तो फिर दर्पण क्या है? दर्पण अगर मन है, तो दोनों नामों की अदला-बदली क्यों? मन का मतलब एक मित्र ने ‘दिल’ बताया, मैंने उसे डांट दिया। भैया यहां मन का अर्थ ही समझ नहीं आ रहा है, और अगर मन का अर्थ दिल मान लूंगा तो अनर्थ मन में आ जमेंगे। दिल तो पागल है जैसे गीतों ने दिल की मिट्टी-पलीत कर दी। दिल को समझदार नहीं कह कर पागल कहने वाले गीतकार को सम्मानित करने वाले संस्थान असहनीय है। मन के अस्थिर होने का की व्यंजना एक गीत में है, जिसमें गीतकार ने ‘मन के नैन हजार’ कहे हैं। कहां आपके हमारे दो नैन या फिर चार नैन और कहां हजार। अरे भाई कोई मुकाबला ही नहीं है।
      मैं उस वक्त चौंका जब मेरा बेटा आज पंच काका को पूछ रहा था- ‘ये जन-गम-मन में मन का मतलब क्या है?’ तब मुझे चुपके से खड़े होकर वहीं कान लगाने को मजबूर होना ही था। पंच चाचा ने उसे मन का अर्थ माइंड यानी दिमाग बताया। यह सुनते ही मैं वहां से इधर-उधर हो गया। सोचा मुझे वे अपनी बातों में शामिल ना कर लें। मन यानी माइंड और दिल यानी हृदय। ये मन बड़ा पंगा कर रहा है। मन ने मेरा अमन, चैन, संतोष और सुख छीन लिया।
naya arjun 01.02.2017 Parat Dar Parat