30 जून, 2016

पुरस्कारों में आरक्षण

      पंच चाचा कहते हैं- ‘हर क्षेत्र में आरक्षण है फिर पुरस्कारों में क्यों नहीं है। चलो जाओ, हमारा आरक्षण नोबल पुरस्कार के लिए कर के आओ।’
      मैं हैरान परेशान हो गया। पहली बात तो नोबल पुरस्कार जो विभिन्न क्षेत्रों के लिए दिया जाता है उसमें पंच चाचा कहां फिट हो सकेगे। दूसरी यह कि नोबल का रास्ता भी मैं नहीं जानता। मैं साहित्य का विद्यार्थी हूं। मियां की दौड़ मस्जिद तक। वर्षों पहले हमारे गुरुदेव रवीन्द्र को एक नोबल मिला था, अब वे इस संसार में रहे नहीं, पूछना भी संभव नहीं। यदि मेरी दशा पर खुद गुरुदेव को दया आ जाए तो संभव है वे मुझे किसी दिन सपने में कोई रास्ता बता भी जाए। वैसे पंच चाचा ने साहित्य में कुछ खास लिखा-विखा नहीं है। जिसे कोई उल्लेखनीय कह सके या रेखांकित किया जा सके। वे तो बस लोगों से पुरानी कहानियां सुनते हैं और कभी मन होने पर खाली समय में उनको लिपिबद्ध कर लेते हैं। यह महत्त्वपूर्ण काम उनको निश्चय ही कोई न कोई पुरस्कार दिलाएगा, क्यों की जो नोबल की फिराक लगाएगा उसको गली-मौहल्ले या फिर गांव-शहर-जिले का कोई न कोई पुरस्कार तो मिल ही जाएगा।
      पुरस्कारों में आरक्षण नहीं होने के कारण ही देश के बड़े-बड़े पुरस्कारों से अनेक प्रांत अब तक वंचित है। कहीं मूसलाधार वर्षा तो कहीं एक बूंद भी पानी नहीं। यह लोकतंत्र का अपमान है। माना कि इंद्र देव पर हमारा वश नहीं और राजस्थान में वर्षा नहीं होती या कम होती है पर पुरस्कारों पर तो विवाद किया जा सकता है। इधर कुछ मित्रों ने साहित्य अकादेमी द्वारा अब तक राजस्थान के किसी हिंदी लेखक को पुरस्कृत नहीं किए जाने को चिंता का विषय मानते हुए अकादेमी की पुरजोर शब्दों में भर्त्सना की है। दूसरी तरफ अकादेमी द्वारा मुख्य पुरस्कार के साथ अनुवाद पुरस्कार, बाल साहित्य पुरस्कार और युवा पुरस्कार आरंभ किए जाने के बाद कई क्षेत्रीय भाषाओं में पौ-बारा पच्चीस हो गए हैं। एक ही जिले में दस-दस साहित्यकार साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत मिल जाएंगे। ऐसी परिस्थियों में निसंदेह हमे चाचा जी की बात से सहमत होना पड़ेगा कि पुरस्कारों में आरक्षण होना चाहिए।
      केवल साहित्य ही नहीं किसी भी स्तर के पुरस्कारों में आरक्षण होगा तब जरूरी है कि अनेक वर्ग किए जाए। महिला और पुरुष वर्ग, जातिय आरक्षण व्यवस्था के साथ सामान्य के अंतर्गत भी ‘सब-आरक्षण’ होना चाहिए। माना कि सेठों के पास पैसों की कोई कमी नहीं होती पर सम्मान किसे नहीं चाहिए। कई जाट और ब्राह्मण तो पुरस्कारों की आकांक्षा में बावले हुए जाते हैं। उन्होंने तो ‘दे पुरस्कार’ और ‘ले पुरस्कार’ नई स्कीम लोंच कर दी है। इस दे और ले के चक्कर में अनेक पाले बन गए हैं।
      पंच चाचा अभी दुनियादारी से अपरिचित हैं, वे नहीं जानते कि जिस किसी को कोई पुरस्कार मिल जाता है और अगर उससे पूछा जाता है- ‘भैया कैसे मिला।’ तो आप क्या समझते हैं वह बता देगा। नहीं दस बातें नहीं. वह दस हजार बातें भी बताएगा फिर भी असली बात को पेट में दबाए रखेगा। पिछले दिनों की बात है, मैंने गलती से किसी मित्र से पूछ लिया कि दोस्त तुझे पलां पुरस्कार मिला उसके लिए मुझे भी आवदेन करना है। कोई पता, संपर्क-सूत्र, ई-मेल या फोन नंबर तो बताओ। उसकी सूरत में यकायक बदलाव आ गया। चेहरे का रंग बदल गया। बोला- ‘था तो सही पर अभी मामूल नहीं। अबखार देखते रहा करो, उसमें उनका विज्ञापन छपेगा। और यह पुरस्कार तो किस्मत से मिलते हैं, इसके लिए आवेदन तो महज औपचारिकता होती है।’ हे भगवान! मेरे ना सही, पर मेरे पंच चाचा की किस्मत में नोबल लिख दे।
नया अर्जुन, श्रीगंगानगर 22 दिसंबर, 2016

29 मई, 2016

बहु-आयामी साहित्यकार डॉ.मंगत बादल की रचनाधर्मिता

डॉ. नीरज दइया 
राजस्थान के साहित्यिक परिदृश्य की बात करें तो आज डॉ. मंगत बादल एक ऐसा नाम है जिनकी रचनाधर्मिता के अनेक आयाम हैं। आपने विपुल मात्रा में हिंदी और राजस्थानी में सतत साहित्य-सृजन कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। गंगानगर जिले के साहित्य पर एक आलेख लिखते हुए मैंने डॉ. बादल को महाकवि कहा, क्योंकि इक्कीसवीं सदी में दसमेस महाकाव्य, मीरां प्रबंध काव्य अथवा सीता, कैकेयी खंड काव्य का सृजन असल में हमारी साहित्यिक परंपरा को बचाना है। ऐसे नाम हमारे बीच बहुत कम मिलेंगे जिन्होंने छंद को साधते हुए परंपरा को आधुनिक स्वर दिए हैं। दसमेस अथवा मीरां जैसी कालजयी कृतियों के मूल्यांकन हेतु राजस्थानी आलोचना को आयुधों का निर्माण करना शेष है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि छंद के साथ आपने मुक्त छंद में भी पर्याप्त और समान रूप से सृजन किया है।
            गुरु गोविंदसिंह जी के त्याग, बलिदान और उपदेशों की लोक मंलगकारी जमीन पर सृजित ग्यारह सर्गों का महाकाव्य ‘दसमेस’ है। इसे राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी का सूर्यमल्ल मीसण पुरस्कार मिला और यह कृति पंजाबी में यह अनूदित भी हुई है। अपने युग संदर्भों के साथ कुरीतियां, आडंबर, शोषण और साम्प्रदायिक विसंगतियों के कई आयाम इस महाकाव्य में अभिव्यक्त होते हैं। ‘मीरा’ प्रबंध काव्य एक प्रयोग है जिसमें छंद मुक्त होते हुए भी डॉ. बादल आंतरिक लय और नाद को साधते हुए मीरा के चरित्र की विविधताओं के साथ जैसे ऐतिहासिकता का पुर्मूल्यांकन करते हैं। इस कृति को साहित्य अकादेमी दिल्ली द्वारा सर्वोच्च पुरस्कार प्रदान किया गया वहीं यह इस कृति का अनुवाद पंजाबी में भी हुआ है। सीता और कैकई खंड काव्यों में कवि बादल इन चरित्रों के अंतस में उतर कर इनके द्वंद्व को उजागर करते हैं वहीं परंपरा से चली आ रही मान्यताओं और विचार को भी नए आयामों में सोचने का प्रारूप प्रस्तुत करते हैं। कविता के संदर्भ में यहां यह भी कहना उपयुक्त होगा कि राजस्थानी कविता के क्षेत्र में डॉ. मंगत बादल को कृति ‘मीरां’ के विविध आयामों में नई भाषा-शैली के साथ आधुनिकता बोध की तलाश है और इस कृति को प्रख्यात कवि डॉ. नारायणसिंह भाटी की परंपरा में इसे देखा-समझा जाना चाहिए। किसी चरित्र को नए ढंग से नए आयामों द्वारा उद्धाटित करना आपकी काव्य-यात्रा में रेखांकित किए जाने योग्य विशेषता है।
            डॉ. बादल की रचनाधर्मिता के काव्य साहित्य के अंतर्गत मुख्य रूप से दो आयाम नजर आते हैं। एक तो वे इतिहास, परंपरा और मिथकों को नए रूपों में सहेजने-संवारने और नवीन संदर्भों में व्याख्या में सक्रियता प्रदर्शित करते हैं है। इसी के समानांतर दूसरा आयाम यह है कि आप नई कविता में अमूर्त कलात्मक वर्णनों और काल्पनिक रूमानी दुनिया से दूर रहते हैं। डॉ. बादल के रचनालोक में लोक जीवन अपने विविध रूपों और रंगों में अभिव्यक्त होता है। राजस्थान के इस भू-भाग का जीवन जैसा कैसा है वह यहां अपने अंतर्द्वंद्वों के अभिव्यक्त है। इस धरा, लोक और जीवन से जुड़े अनेक प्रश्नों के साथ समस्याओं से रू-ब-रू कराती है आपकी कविता। इस पंक्ति के प्रमाण में हिंदी कविता संग्रह ‘मत बाँधो आकाश’, ‘शब्दों की संसद’, ‘इस मौसम में’, ‘हम मनके इक हार के’, ‘अच्छे दिनों की याद में’ और राजस्थानी में ‘रेत री पुकार’ देख सकते हैं। डॉ. बादल की के काव्य संसार में घर-परिवार और समाज के अनेक चित्र हैं जिनमें बदलते परिवेश में व्यक्ति के आत्म का आत्मविश्लेषन है।
            आपकी एक कविता है- ‘लोग उम्मीद करते हैं’ जिसमें भविष्य की अनेक उम्मीदों के सिलसिलेवार वर्णन के पश्चात काव्य पंक्तियां हैं- “लोग उम्मीद करते हैं / लोग वर्षों से
उम्मीदों के सहारे जी रहे हैं; / और रोजमर्रा की जिन्दगी को / जहर की तरह पी रहे हैं!”
‘छाया का विरोध-पत्र’ कविता में डॉ. मंगत बादल लिखते हैं- “मेरी शब्द रचना भी /
धरती से रस खींचेगी / और उसकी लय / पत्ते-पत्ते को / रस से सींचेगी!” यहां निसंदेह आपके काव्य का केंद्रिय स्वर बहुत कम शब्दों में व्यंजित होता है। डॉ. बादल की पूरी कविता-यात्रा का जुड़ाव अपनी धरती और जड़ों से लगातार देख सकते हैं वहीं आपकी दृष्टि में पत्ते-पत्ते की अभिव्यंजना में प्रत्येक जन से जुड़ाव समझा जा सकता है।
            गद्य रचनाओं की चर्चा करें तो ललित निबंध राजस्थानी में बेहद कम सामने आए हैं और उन में डॉ. बादल की कृति “तारां छाई रात” का उल्लेखनीय है। एक उदाहरण से बात कहूं तो आपका ललित निबंध ‘आंगणो’ हिंदी के प्रख्यात ललित निबंध लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ की श्रेणी का रेखांकित किए जाने योग्य रचना है। राजस्थानी में निबंध रचनाएं और निबंध लेखक बहुत कम है और मंगत बादल इस कम को पूरा करने में लगे हैं। आपकी कृतियां सावण सुरंगो ओसरियो, बात री बात, हेत री हांती निबंध विधा की राजस्थानी में पुस्तकें हैं वहीं आपके व्यंग्य संग्रह भेड अर ऊन रो गणित के अतिरिक्त हिंदी में यह दिल युग है, आन्दोलन सामग्री के थोक विक्रेता, छवि सुधारो कार्यक्रम व्यंग्य संकलन प्रकाशित हुए हैं। डॉ. बादल जहां निबंधों में हमारी परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को पोषित करने में गतिशील दिखाई देते हैं। उनके यहां लोक जीवन और लोक चिक का आकर्षक वर्णन देखने को मिलता है। वहीं व्यंग्य विधा के अंतर्गत बदलते समय और समाज में परंपरा और मूल्यों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पोषण है। किसी समस्या की तरफ संकेत करते हुए व्यंग्यकार उसे रोचकता के साथ वर्णित करता हैं। व्यंग्य लेखक असल में किसी चिकित्सक की भांति हमारी मानसिक और सामाजिक बीमारियों का इलाज करता है। निबंधों में विषयगत नवीनता और विविधता के साथ ही प्रवाहमयी भाषा-शैली से पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
            गद्य की अन्य विधाओं की बात करें तो एक कहानीकार के रूप में हिंदी में “कागा सब तन” तथा राजस्थानी में “कितणो पाणी” कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। कहानियों में ग्रामीण जीवन और उनकी समस्याओं के साथ ही डॉ. बादल ने कुछ कथा प्रयोग भी किए हैं। परंपरागत कहानी के स्वरूप में चकवा-चकवी को अवधारणा को आपने कहानी में आधुनिक संदर्भों में प्रयुक्त किया है। आपके यात्र-वृतांत ‘वतन से दूर’ में देश और परदेश के जीवन के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन देखा जा सकता है। यह टिप्पणी डॉ. मंगत बादल की रचनाधर्मिता को पहचानने और परखने का प्रस्तान बिंदु है, ऐसे बहु-आयामी सृजनधर्मी साहित्यकार की साहित्य-साधना को हम व्यापकता और विशदता के साथ जानने-समझने का प्रयास करें।



08 मई, 2016

मूल और अनुवाद में भेद न करना अनैतिक

साहित्य/बातचीत: डॉ. आईदान सिंह भाटी से डॉ. नीरज दइया की बातचीत | दुनिया इन दिनों 1 से 15 मई 2016 | 

 डॉ. आईदान सिंह भाटी। जन्म 10 दिसम्बर, 1952 नोख, जैसलमेर (राजस्थान)। प्रकाशन : हंसतोड़ा होठां रो सांच, रात-कसूंबल, आंख हींयै रा हरियल सपना (कविता-संग्रह), थार की गौरवगाथाएं (इतिहास-कथाएं), समकालीन साहित्य और आलोचना (आलोचना), गांधीजी री आत्मकथा एवं राईनोसोर्स (गैंडौ) अनुवाद पुस्तकें। अकादमी पत्रिका जागती जोत का सम्पादन भी किया। साहित्य अकादमी का मुख्य एवं अनुवाद पुरस्कार के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित। वर्षों तक कॉलेज शिक्षा में अध्यापन के बाद वर्तमान में जोधपुर में स्थायी आवास एवं स्वतंत्र लेखन।   

 आप वर्षों हिन्दी के प्राध्यापक रहे, फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहे हैं। ऐसा क्यों?
- इसका पहला कारण तो यह है कि राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिन्दी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी, इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।

आपका बाद में महाविद्यालयी-शिक्षा से जुड़ाव रहा और हिन्दी में भी आपका लेखन रहा। आप खुद को किस भाषा का रचनाकार कहलाना पसंद करेंगे, भाषा और रचना का अंतर्सम्बन्ध क्या है? 
- कविता का जहां तक सम्बन्ध है सम्वेदन मातृभाषा से ही जुड़ा रहा है, मैंने हिन्दी सीखी और कुछ कविताएं हिन्दी की लिखी भी हैं, लेकिन सहज अनुभव अपने आप को राजस्थानी में करता हूं। कवि खुद को राजस्थानी का मानता हूं, हां गद्य जरूर हिन्दी में लिखा है।

कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
- मैं राजस्थानी कवि होकर ही सम्पूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की बिरादर में खड़ा होता हूं क्योंकि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं हैं। हिन्दी में मैं अपने आपको उस रूप में हिन्दी का कवि नहीं मानता। हां, साक्षरता के दौरान या जहां लोग राजस्थानी नहीं समझते, वहां मैंने उनके लिए यत्र-तत्र कुछ कविताएं हिन्दी में लिखीं।

लेकिन राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं। उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिन्दी दोनों में देखी जा सकती हैं, जबकि सच तो यह है कि कोई रचना किसी एक भाषा में मौलिक होती है।
- यह वस्तुत: गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा। मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिन्दी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता, लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं, मेरे विचार से अपना सम्प्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं। उनको ऐसा लगा होगा कि हमारी बात ढंग से पाठकों तक पहुंची नहीं है। इसी के रहते हिन्दी अनुवाद करके हिन्दी पाठकों को सहज उपलब्ध करवाया।

क्या यह लेखकीय ईमानदारी का प्रश्न नहीं है कि आप मूल और अनुवाद में भेद प्रकट नहीं करते?
- यह बिल्कुल ही गलत बात है, अनैतिक है। मेरा मानना है कि मूल और अनुवाद का भेद होना ही चाहिए। जैसे अभी कुछ दिनों पहले आपने मेरी राजस्थानी कविता का हिन्दी अनुवाद कर पाठकों तक पहुंचाया। उसको देख-पढ़ कर मुझे बहुत से मित्रों ने बधाई भी दी, साथ ही उन्होंने कहा भी कि आप हिन्दी में क्यों नहीं लिखते?

आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
- मैंने लिखने से पहले खुद से ही सवाल किया कि मैं क्या काम कर सकता हूं। अंतस का उत्तर पाया - मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है, जो मेरे द्वारा सम्भव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। जो चीजें समाज में आ रहीं हैं, जैसे बाजारवाद-वैश्वीकरण का जो दौर आरम्भ हो चुका है, उसमें कविता को हाशिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।

आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?

- मैं समझ गया आपकी बात, छंद मैं लिखता था, गांव में डिंगळ काव्य की परम्परा थी, लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं, आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आये और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं, इसे मैं ठीक नहीं मानता।

राजस्थानी साहित्य के सम्वर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
- कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आयीं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है, वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं। साहित्य को भारतीय परिप्रेक्ष्य के लिए आलोचना की प्रवृति विकसित करनी होगी और हमें खुद छायावादियों की तरह आलोचना में लिखना होगा।

तकनीकी बदलावों के चलते आज सोशल मीडिया पर बहुत से नये रचनाकारों की बाढ़ सी आ रही है, इसमें साहित्य के मापदंड नहीं रहे  और होड़ सी लगी है।
- प्रतिस्पर्द्धा में जिसकी सम्वेदना और भाषा में दम होगा, वही बचेगा। संख्यात्मक वृद्धि हमारे लोकप्रिय साहित्य का विस्तार मानता हूं और यह अच्छा भी है। विराट फलक में पाठक और दर्शक बढ़े हैं, यह अच्छा-बुरा दोनों रूपों में है। समय और लोग, अपने आप अच्छे और बुरे की पहचान कर लेंगे।

फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती हैं। क्या इसमें गम्भीरता है?
- नहीं, यह गम्भीरता नहीं है, लेकिन आप गम्भीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्वपूर्ण भी है।

लेखकीय धैर्य और विवेक के साथ लिखना और त्वरा में बह कर लिखना दोनों भिन्न-भिन्न है? वास्तविक माध्यम और आभासी माध्यमों के बीच आने वाले साहित्य को आप किस रूप में देखते हैं?
- आपने खुद ही कह दिया कि साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरित टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती हैं। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।

राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में सम्भव होगा?
- यह मेरे सम्वेदना से जुड़ा मुद्दा है। मैं आरम्भ से ही इसका पक्षधर रहा हूं, लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया, लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आये, जो अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों ने आंदोलन को न केवल पीछे किया है, बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गये हैं। पहले मजबूत था, अपने घर परिवार बोलचाल रीत-रिवाज से लेकर सम्बन्धों और संस्कारों के साथ सांस्कृतिक मूल्यों से भी आंदोलन जुड़ा था। ये सब घटक उसके अभिन्न अंग थे। दूसरा एक भाषा, एक राष्ट्र और एक धर्म वालों से मुझे बहुत ज्यादा आशा नहीं है। लोक भाषाओं के समर्थक लोग जो राजनेता हैं, वे निरंतर पिछड़ते जा रहे हैं। अगतिशील लोग क्या हमारी लोक भाषा के सम्वेदन और मर्म को समझेंगे! 

एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिन्दी समझते हैं, वे हिन्दी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाषा के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?   
- नीरज जी कितना शानदार आपने सवाल किया है, मुझे ऐसा लगता है कि क्या हमारी लोक भाषाओं के सम्वेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है? ऐसा जो कहते हैं उनके लिए मैं कहूंगा कि मेरे पिता इन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं... जबकि सुनीत कुमार चटर्जी वर्षों पहले अपने एक लेख में स्पष्ट रूप से बहुत सी बातें लिख कर बता चुके हैं कि राजस्थानी अपने आप में पूर्ण भाषा है। मैं हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विरोध नहीं करता, लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं कि राष्ट्र प्रेम या धरती प्रेम या ऐसा कोई प्रेम जो हमारी बहुलतावादी संस्कृति से जुड़ा हुआ हो, वह किसी एक भाषा में नहीं वरन सभी भारतीय भाषाओं में परिलक्षित होता है।

राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
- सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है। वे केवल फोटो खिंचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप हंै कि कोई लाभ हमें मिलने वाला है, उससे वंचित न हो जाएं।

ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?

- लेखक को लिखते जाना चाहिए, बिना किसी की परवाह किये कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना, नहीं छपना तो बाद की बात है, लिखना बहुत जरूरी है। 
संपर्क - 9461375668

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मूल और अनुवाद में भेद नहीं करना अनैतिक
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(बीकानेर / राजस्थानी के ख्यातनाम लेखक डॉ. आईदान सिंह भाटी ‘आईजी’ एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए बीकानेर आए। इस मौके पर ‘भास्कर’ के पाठकों के लिए कवि-कथाकार-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने उनसे विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के अंश)
० आप वर्षों हिंदी के प्राध्यापक रहे फिर भी राजस्थानी में ही लिखते रहें हैं, ऐसा क्यों?
आईजी- इसका पहला कारण तो राजस्थानी मेरी मातृभाषा रही और हिंदी मैंने बाद में पढ़ने-लिखने के दौरान सीखी। राजस्थानी तो जुबान के आंटे में थी इसलिए राजस्थानी में लिखता हूं।
० कविता के संदर्भ में क्या भाषा माध्यम ही महत्त्वपूर्ण है या राजस्थानी में लिखते हुए भी आप खुद को एक भारतीय कवि के रूप में देखते हैं?
आईजी- मैं राजस्थानी कवि होकर ही संपूर्ण भारतीय भाषाओं के कवियों की विरादर में खड़ा होता हूं। क्यों कि अन्य भारतीय भाषाएं भी लोक भाषाएं है।
० राजस्थानी के कुछ लेखक अपनी रचनाओं को दोनों ही भाषाओं में मौलिक मानते हैं, उनकी एक जैसी रचनाएं राजस्थानी और हिंदी दोनों में देखी जा सकती है?
आईजी- यह वस्तुतः गलत बात है। मैं राजस्थानी में लिखता हूं तो राजस्थानी की ही बात करूंगा, मेरी राजस्थानी कविता को मैं हिंदी की कविता कह कर प्रकाशित करता हूं तो यह कोई अच्छी बात तो नहीं है। मैं इसको नैतिकता के स्तर पर भी ठीक नहीं मानता। लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं मेरे विचार से अपना संप्रेषण न होने के कारण ऐसा कर रहे हैं।
० आज के बदलते दौर में लिखना क्यों जरूरी है, या कहूं कि आप क्यों लिखते हैं?
आईजी- मुझे मेरे लिए सबसे सहज काम कविता लिखना लगता है, सहज उस रूप में नहीं है। यह ऐसी सहजता है जो मेरे द्वारा संभव है। आज कविता लिखना इतना सहज नहीं रह गया है। कविता को हासिये पर डालने के सारे उपक्रम चल रहे हैं और इसलिए मैं मानता हूं कि आज कविता की जरूरत पहले से भी अधिक है।
० आपने राजस्थानी कविता का पूरा बदलाव देखा, छंद और मुक्त छंद और उसके बाद आज की कविता। इस बदलाव को आप कवि-आलोचक के रूप में कैसे देखते हैं?
आईजी-मैं समझ गया आपकी बात, छंद में लिखता था गांव में डिंगळ काव्य की परंपरा थी लेकिन जब जोधपुर आया तब लगा कि समकालीनता के लिए मुक्त छंद जरूरी है। मैं पाठ्य या पठित मुक्त छंद जैसा नहीं आज भी मैं गति लय का निर्वाह करता हूं। छंद लिख कर सीख कर हम मुक्त छंद लिखते हैं तो मैं कहूंगा कि हम निराला की तरह छंद का ही प्रयोग कर रहे होते हैं। छंद नहीं आए और कहूं मैं मुक्त छंद में लिखता हूं इसे मैं ठीक नहीं मानता।
० राजस्थानी साहित्य के संवर्धन में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहना चाहेंगे?
आईजी-कमजोर पक्ष है इसे कहें गत्यात्मक नहीं है, आपकी और अर्जुनदेव चारण की किताबें आईं। पर यह या अन्य जो लिखा गया है वह निरंतर नहीं है। इसमें गति और निरंतरता की बहुत जरूरत समझता हूं।
० फेसबुक जैसी आभासी दुनिया में त्वरित टिप्पणियां होती है। क्या इसमें गंभीरता है?
आईजी-नहीं यह गंभीरता नहीं है, लेकिन आप गंभीर टिप्पणी कर रहे हैं तो यह महत्त्वपूर्ण भी है। साहित्य और लोकप्रिय माध्यम की भाषा अलग है, त्वरिक टिप्पणियां साहित्यिक नहीं व्यक्तिगत होती है। इसमें साहित्यिक मूल्यों का अभाव होता है।
०एक लेखक ने कहा कि राजस्थानी के सभी लेखक हिंदी समझते हैं, वे हिंदी माध्यम से पढ़े हैं। राजस्थानी में केवल अपनी मातृभाष के जुड़ाव के वशीभूत या ऋण को चुकाने के लिए राजस्थानी में लिखते हैं। क्या राष्ट्रप्रेम में राजस्थानी को छोड़ दिया जाना चाहिए?
आईजी- क्या हमारी लोक भाषाओं के संवेदन में राष्ट्र प्रेम है ही नहीं क्या ? क्या राष्ट्र प्रेम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त होता है।
०राजस्थानी अकादमी लेखकों-राजनेताओं की उपेक्षा के कारण बंद पड़ी है।
आईजी-सरकारों की अंतिम दृष्टि में साहित्य-कला है वे केवल फोटो खींचवाने के बहाने साहित्य-कला के उपक्रम करते हैं। सब चुप है कि कोई लाभ हमें मिलने वाल है वह वंचित न हो जाए।
०ऐसे प्रतिकूल समय में साहित्यकार का दायित्व क्या है?
आईजी-लेखक को लिखते जाना चाहिए बिना किसी की परवाह किए कि कोई अकादमी है या नहीं। छपना नहीं छपना तो बाद की बात है लिखना बहुत जरूरी है।
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अप्रगतिशील लोग नहीं समझेंगे राजस्थानी का महत्त्व
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० राजस्थानी मान्यता के विषय में आपको क्या लगता है? यह हमारा सपना सच में संभव होगा?
आईजी- मैं आरंभ से ही इसका पक्षधर रहा हूं लेकिन मैं चिल्लाने वाले लोगों के साथ नहीं हूं। पिछले चालीस-पचास वर्षों से साहित्यकारों ने आंदोलन चलाया लेकिन बाजारवाद के साथ ही ऐसे लोग इस आंदोलन में आए जिनको अपने नामों और चेहरों को ही आगे करने के प्रयास करते रहे हैं। वे राजस्थानी के नाम पर सब कुछ अपने पक्ष में कर लेना चाहते हैं। ऐसी प्रवृतियों से आंदोलन को न केवल पीछे किया है बल्कि वे गिनती के चंद लोग लोगों की आंखों में आ गए हैं। 

राजस्थानी भाषा और साहित्य के उद्भट विद्वान् और कवि आलोचक डॉ आईदान सिंह से नीरज दइया की बातचीत "प्रगतिशील राजस्थान"में 21 अप्रैल 2016 के अंक में प्रकाशित । (सौजन्य: दैनिक भास्कर बीकानेर)

17 अप्रैल, 2016

राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश

साहित्य अकादेमी पुरस्कार (राजस्थानी) 2015 से सम्मानित 
राजस्थानी उपन्यास “गवाड़” से चयनित अंश 
उपन्यासकार : मधु आचार्य ‘आशावादी’ / हिंदी अनुवाद : नीरज दइया 
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 साहित्य अकादेमी की टिप्पणीमधु आचार्य ‘आशावादी’ (जन्म : 1960) प्रतिष्ठित राजस्थानी कथाकार और रंगकर्मी है। हिंदी पत्रकारिता से संबद्ध ‘आशावादी’ की गणना जमीन से जुड़े हुए पत्रकारों में होती है।पुरस्कृत उपन्यास गवाड़ अपनी विधागत संरचना में एक विलक्षण और चित्ताकर्षक प्रयोग है। उपन्यास के परंपरा-रूढ़ ढांचे अथवा उसके दोहराव से अछूता है। चरित्रों के ‘कोलाज’ से एक ऐसा प्रच्छन्न कथासूत्र पिरोया गया है, जो उपन्यास विधा की एक नई प्रस्तावना प्रस्तुत करता है।
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अंधेरा
आंखें खोलने के बाद मैंने अंधेरा ही अंधेरा देखा। जन्म के साथ नए प्रकाश की बात एकदम झूठी। अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं देता। चाहे देखने का व्यर्थ प्रयास करते रहें। निगाह किसी स्थान पर स्थिर होनी बेहद कठिन। घर, गवाड़ (मोहल्ले), चौगान, देश, चारों तरफ अंधेरा, आदम जात में अंधेरा, दिमाग में अंधेरा, विचारों में अंधेरा।
    इस अंधेरे को समझने मैं घर से निकला। देखें तो सही, कहां से आता-जाता है अंधेरा? बाहर कदम रखते ही चारों तरफ रोते-बिलखते मनुष्यों को चलते-फिरते देखा, उन की देह पर किसी न किसी अंग की कोई कमी थी। उन चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई थी और वे पागलों की तरह दौड़ने में व्यस्त थे। उन को चेहरों से पहचानना मुश्किल कि वे किसी शहर के हैं अथवा गांव के! कहीं के हो चाहे से, हैं तो मनुष्य ही। मनुष्य-मनुष्य में अंतर करने की बात विचारते मुझे ग्लानि हुई। सोचा- मैं तो स्वयं सर्वथा अंधेरे में हूं।
    कुछ अंतराल बाद फटाखों के छोड़े जाने की तेज-तेज आवाजें सुनाई दी। पास दीपावली तो थी नहीं। इसलिए आश्चर्य हुआ, उन आवाजों की दिशा में मैं दौड़ने लगा। जैसे-जैसे नजदीक पहुंचता जाता, वे आवाजें दूर होती जाती, किंतु बंद नहीं हो रही थी। मुझे लगा, जैसे पूरी पृथ्वी पर इसी तरह की आवाजें ही आवाजें हो रहीं है। तीक्ष्ण आवाजें और दौड़ते-भागते मनुष्य, बस हर तरफ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा था।
    आवाजों से डर कर भागते मनुष्यों में, इन आवाजों के खिलाफ आवाज उठाने की तनिक भी हिम्मत नहीं थी। मुझे अंधेरे का कुछ अर्थ समझ आने लगा। कोई उजाला करने की हिम्मत नहीं करता। अंधेरा डर बन कर मनुष्यों के हृदयों में राज करने लगा। मनुष्य निर्दोश बना उस के कहे अनुसार चलने लगा।
    हर मनुष्य जैसा दिखाई देता है, असल में वैसा होता नहीं। बुद्धिजीवी मूर्ख बन गए, कलाकार अंधे, समाज-सेवक चोर और मनुष्य फकत जानवर। ये दो-दो मुखौटे पहने फिरते हैं और मनुष्यों को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। सच जानिए गजब हो गया है।
    मैंने दौड़ते-भागते मनुष्यों को रोकने का किंचित प्रयास किया, पर वे मुझे गिराते हुए आगे निकल गए। मैं सड़क पर गिरा सोचने लगा। ऐसी कौनसी बात हुई कि मनुष्य मनुष्य को गिराने का प्रयास करता है! मनुष्य खुद को और दूसरों को पहचानने में भूल करता है। मेरे इस विचार का कोई अंत नहीं, मैं सोचता रहा।
    मैंने खड़े होने की चेष्टा की, पर भागमभाग में खड़ा भी नहीं हो सका। खड़े होने की कोशिस करते ही दूसरा कोई धक्का दे कर गिरा जाता। मुझे लगा, बच्चों और जानवरों की भांति सड़क पर रेंगना होगा। तभी कुछ आगे पहुंच सकूंगा, ध्येय पर पहुंचने में देरी होने की पूरी-पूरी संभावना थी। पहुंचना भी तय कहां था। मार्ग में अवरोधों का क्या ठिकाना, कितने आएंगे-रोकेंगे! अवरोध के समक्ष प्रत्येक मनुष्य विवश होता है। आहिस्ता-आहिस्ता अंधेरा, मुझे अपना-सा लगने लगा। मैं अंधेरे में और अंधेरा मुझ में समाता गया।  
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पहचान
मैं सोचने लगा कि इस धरती पर आने से पहले मैं कहां था? जबाब मिलना इतना आसान नहीं था। विगत विचारते इतिहास पर दृष्टिपात किया। पुस्तकें पढ़ने की चेष्टा की। गुरु जी के पास गया। एक ही जबाब मिला। परमात्मा जिसे चाहे जन्म देता है। जन्म लेना-देना तो उसके हाथ में है। इसका अभिप्राय मैं परमात्मा के पास था। लोगों की बातों से तो यही लगा।
    परमात्मा ने मनुष्य को क्यों बनाया! यह बात चिंता की नहीं थी, परंतु मनुष्य को ऐसा क्यों बनाया, यह बात जरा विचारणीय थी। कलाकार जब अपनी रचना को रूप देता है, तब उसमें उम्दा विशेषताएं भरता है। मैंने तो किसी कलाकार को जान-बूझ कर निकृष्ट रचना का सृजन करते देखा नहीं। फिर परमात्मा से यह चूक कैसे हो गई।
    परंतु परमात्मा क्या है? इस प्रश्न का जबाब कहीं नहीं मिला। कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने के अतिरिक्त हम क्या कर सकते हैं, परंतु कल्पनाओं का आधार ही जब परमात्मा हो तब उसका होना मान कर ही कुछ सोचना-समझना होगा। यह त्रासदी है। सोची-समझी और जानी-पहचानी त्रासदी।
    परंतु मुझे जन्म देने का उपकार तो मेरे माता-पिता ने किया। इसका अर्थ मेरी पहचान तो उन दोनों से हैं। मैंने मां से पूछा- मैं तुम्हारे पास आने से पहले कहां था?
    उत्तर मिला- परमात्मा के पास।
    मैं फिर से उलझनों में घिर गया। मुझे लगा कि सभी लोगों की बातों का आधार परमात्मा ही है। वही एक कुबुद्धि है जिसने मनुष्य को धरा पर अलग-अलग जगहों पर भेजा है। एक परमात्मा से हम सभी की पहचान जुड़ी है। परमात्मा के बारे में सोचने की बात बाद में करेंगे। करनी तो होगी कभी।
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परलोक
परमात्मा और जन्म की बातें सोचते-सोचते परलोक की तरफ पहुंचा। मुझे लगा मैं खुद परमात्मा हूं और मेरे आस-पास दो शिष्य खड़े हैं। मैं इस चिंतन में कष्ट पा रहा हूं, छटपटा रहा हूं। पृथ्वी पर ही चमचागिरी चलती हो ऐसी बात नहीं, परलोक में भी इसका चलन है।
    मेरे हालत देख कर एक चम्मच बोला- नारायण! नारायण!! नारयण!!!
    दूसरा बिदका- बंद कर अपना यह अखंड जाप! इसे अब कोई नहीं सुनता।
    मैंने शांत करते हुए कहा- लोक-परलोक तो जीवों की परेशानियां बन गए। पृथ्वी पर चहुंदिस खून ही खून दिखता है, ऐसा लगता है जैसे धरत पर रक्त का कोई सागर फैल गया है। हम चील-कौओं की भांति मंडराते लाशें ढोने का का काम करते हैं।
    मेरी दशा पृथ्वी पर हड्डियां ही हड्डियां देख बिगड़ती गई। शिष्य सलाह देते रहे कि पृथ्वी पर चलें, देखें कि क्या हो रहा है? प्रत्यक्ष-दर्शन के बिना कुछ भी ठीक से मालूम नहीं हो सकता।
    परमात्मा बनने में भी मुश्किल है। परमात्मा मनुष्यों को बनता है, बुद्धि देता है, पर खुद दुखी रहता है। आठों पहर निरंतर पापाचार से मनुष्य जीवन कठिन होता जाता है, तब बेचारे परमात्मा की आत्मा भी द्रवित तो होगी है। शिष्यों के चक्कर में फंस कर पृथ्वी पर जाने का फैसला लिया, तो जाने का साधन विमान बेकार-बेचार नाकारा दिखाई दिया। वर्षों से पृथ्वी पर नहीं जाने से यह हालत होनी स्वभाविक भी थी। फिर पेट्रोल की समस्या अलग से। अरब मुल्कों के लोग अपने झगड़ों में फंसे हैं। तेल लेन-देने की सोचे तो भी कैसे-कौन? तेल का भंडार तो उन के पास है, वे चाहे जिसे दें, ना दें।
    परलोक के लोगों को भी ब्लैक-मार्केटिंग में तेल लेना पड़ता है, लिया और पृथ्वी पर पहुंचे भी। बुराइयां सिर्फ पृथ्वीलोक पर हों ऐसा नहीं था, परलोक में भी अनेक थीं। मुझे तो दोनों स्थानों में कोई फर्क ही नहीं लगता।
    मन की शांति और स्वयं की पहचान के लिए मैं परलोक गया, परंतु सब व्यर्थ जान वापस पृथ्वी पर ही आना पड़ा। वहां जाना कि जीवन का समग्र सार इसी पृथ्वी पर है। इसलिए यहीं कुछ देखना-खोजना होगा। बहुत दूर जाने से कुछ नहीं मिलने वाला। कहीं कोई अंतर नहीं है। फ़कत फर्क है सोचने-समझने का। 
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रहमत चाचा
गवाड़ के प्रत्येक छोटे-बड़े से रहमत चाचा को प्रेम था। रहमत चाचा नमाज के नित-नेमी थे। प्रत्येक से स्नेह रखते। गवाड़ के सभी घरों की रसोई तक उनकी सीधी पहुंच थी। किसी की भी रसोई में जा बैठते। चाय पीते। इच्छा होती तो भोजन भी कर लेते। सरकारी नौकरी से सेवानिवृति के पश्चात वे ‘फ्री’ थे।
    बच्चे सुबह-सुबह ही चाचा के घर के आगे एकत्र हो जाते। उन के घर में जाते और जिस किसी चीज की जरूरत होती भीतर से उठा लाते। चाचा और उन के घरवाले कभी मना नहीं करते। गवाड़ के हर कार्य में रहमत चाचा की हिस्सेदारी रहती। नमाज पढ़ने जाते, तब भी चुन्नू-मुन्नू साथ हो जाते। उन को मस्जिद की चौकी पर बाहर बिठाते और वे बच्चे भी चाचा की नमाज पूरी होने का इंतजार करते। फिर चाचा को जिद कर के मंदिर तक ले कर जाते। इसी तरह प्रतिदिन की दिनचर्या थी चाचा की।
    गली की किसी लड़की की शादी होती तो बारात की अगवानी में चाचा खड़े मिलते। दीपावली होती तो पटाखे जलाने में चाचा पीछे नहीं रहते। गवाड़ की रम्मत के पीछलग्गूओं में भी वे साथ मिल जाते। रम्मत के गीतों भी सुर में सुर मिला कर गाते। उन को गीत कंठस्थ थे। आप जी भर के होली की गुलाल भी उड़ाते।
    ताजिया आते तो रहमत चाचा गवाड़ के सभी बच्चों को साथ ले कर जाते और काम में जुटते। किसी प्रकार का कोई भेदभाव-फर्क नहीं था। प्रत्येक के दुख में रहमत चाचा सबसे पहले पहुंचते। रहमत चाचा की सीख प्रत्येक का पथ-प्रदर्शन करती। इस प्रकार के चाचा प्रत्येक गवाड़ में होते है। आवश्यकता है फकत उन को विस्तार देने की। जाति और धर्म से भी विशाल है गवाड़ और उस में रहने वाले। यह बात मेरी गवाड़ के रहमत चाचा तो प्रमाणित करते हैं। प्रत्येक गवाड़ के रहमत चाचा ऐसे ही लगें रहे तो मनुष्य-मनुष्य में जाति-धर्म का भेद ही नहीं रहेगा। मैं विचार करता हूं कि अब मेरी गवाड़ कैसे किसी एक देश से कम है।
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बता, धन कहां है?  

गवाड़ में काफी लोग ऐसे थे जिनका काम सिर्फ पैसे कमाना था। उन्हें रोटी खाने की भी फुर्सत नहीं थी। फायदा होता तो वे साठ किलोमीटर तक भी आते-जाते। उनका तो जैसे एक ही नारा था- बता, धन कहां है?  
    धन कमाने के चक्कर में वे भूल चुके थे कि भाईचारा, घर और परिवार भी कुछ होता है। वे लोग तो प्रत्येक कार्य को पैसों की तराजू में तोलते। लक्की कुमार, ऊमाराम और भीखमचंद इन तीनों को देखते ही लोग तकिया कलाम जैसे कह उठते- ‘बता, धन कहां है?’ इनकी समझ में बस यह था कि पैसों से ही यह दुनिया चलती है। पैसों के अतिरिक्त यहां कुछ भी नहीं है!
    पैसा ही मां-बाप है। वे सुबह सात बजे घर से निकलते और रात गए उन की वापसी होती। हर समय उन को काम-धंधे की ही लगन लगी रहती। कमाई होनी चाहिए, भले कहीं से हो- कैसे भी हो- चाहे ब्लैक हो या मेहनत की हो। कमाई के लिए वे चोबीसों घंटों तैयार रहते। यह भी सच्चाई है कि कमाई के लिए रिस्क उठाते थे। उन को जरा भी डर नहीं लगता था। वे अपने संबंधियों से भी हर काम के पूरे पैसे लेते थे। कभी किसी को कोई रियायत नहीं।
    एक दिन लक्की कुमार की टांग मोटर साइकिल से गिरने से टूट गई। जैसे-तैसे वह घर पहुंचा, परंतु टूटी-टांग तो इलाज करवाने से ही ठीक होगी। अब इलाज करवाने के पैसे लगेंगे। जैसे-तैसे पैसों की हामी भरी तो अस्पलात दिखाने कौन ले कर जाए। बिना पैसों के तो कभी किसी का एक भी काम किया नहीं था, इसलिए जिस से पूछा वह अपनी गाथा कहता चलता बना। पैसे होते हुए भी अस्पलात पहुंचने में भारी असुविधा।
    जिसे साथ चलने को कहते, वही अपना पीछा छुड़ा लेता। आज लक्की कुमार को पता चला कि सब काम-काज पैसों से नहीं होते। उस की आंखों से अश्रु बह निकले। इस दशा को जब मुनीम जी ने देखा तब दो लड़कों बुला कर भेजा- जाओ! इसे अस्पताल दिखा कर पट्टा बंधवावो।
    मुनीमजी के कहने पर लड़के लक्की कुमार को अस्पताल ले जाने को तत्पर हुए, किंतु अपनी शर्त पर कि ईलाज का खर्चा हमीं करेंगे। लड़कों ने उस दिन प्रमाणित कर दिया कि गवाड़ में लक्की कुमार से गरीब दूजा कोई नहीं है। ईलाज करवाने की मजबूरी थी, इसलिए लक्की कुमार को हामी भरनी पड़ी। दबदबा धन का नहीं, मनुष्यों का होता है। यदि सभी गवाड़ों के लोग इस तथ्य को अंगीकार कर लें तो सहयोग की भावना से हर समस्या का समाधान संभव है।
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बदर गुरु का क्या कहना!
गवाड़ के लोग एक कवि की कविता गाते- “बदर गुरु का क्या कहना! क्या कहना! हां जी हां, जी में ही रहना।” बदर एक आदमी नहीं, चरित्र है। अपनी कुछ विशेषताओं के कारण उसका नाम ‘बदर’ एक प्रतीक रूप समझें। ऐसे बदर तो हर किसी गवाड़ में देखने को मिलेंगे।
    बदर की विशेषता थी कि अपने मुंह से कभी किसी को ‘नहीं’  नहीं बोलना। घर से बाहर निकला तो उस की चाची जी दिखाई देती है। देखते ही कहा- बदर, तुम्हारे चाचा जी को दफ्तर जाना है, बाजार से तरकारी तो ला दे।
    - अभी लाता हूं चाची जी!
    बदर थेला और पैसे लेता, वह तरकारियां लाने बाजार के रास्ते चल देता है। जल्दी-जल्दी चलता है। उस के दिमाग में चाचा जी के दफ्तर जाने की चिंता है। इसलिए जल्द से जल्द सब्जी-मंड़ी पहुंचने की लगी है। परंतु बदर गुरु का इंतजार तो सभी को रहता। गली से जरा आगे निकलता तो सामने भंवर बैठा दिखाई दिया।
    - अरे बदर, तेरा ही इंतजार कर रहा था। मुझ से चला नहीं जाता, टांगों में दर्द है। रामजी मोदी के यहां से दही तो ला कर दे। कढ़ी बनानी है। कढ़ी खा कर ही रामू स्कूल जाएगा।
    - भंवर भाई साहब, अभी लाता हूं।
    तरकारी लाने वाला थेला तो जेब में चला जाता और हाथ में बरनी आ जाती है। बरनी में पहले दही लाकर देना जो था। स्कूल की बात थी। जरा देर होगी तो लड़के की मास्टर जी खबर लेंगे। हांफता-हांफता बदर पहले रामजी मोदी के यहां पहुंचता है। दही लेता और फिर लौटता। भंवर भाई साहब को दही दे कर चाची जी के लिए तरकारी लेने वापिस जाने को हुआ कि सामने से मास्टर जी आते हुए दिखाई दिए। मास्टर जी रिटायर हो चुके थे। बीमार रहते थे। वैसे भी वे बेगार देने वाले मास्टर जी हैं। फिर बदर तो दिखाई देना चाहिए।
    - बदर, कोई काम नहीं है क्या?
    - मास्टर जी, चाची जी ने तरकारी ला कर देने को कहा है।
    - अरे, वह तरकारी तो कोई घर की ही बना लेगी। मुझे कल से बुखार है। डाक्टर के पास चलते हैं, दवाई लानी है। मरने जैसे हालत हो गई है। जा कर साइकिल किराए पर ले कर आ।
    मास्टर जी ने बदर को सामने से कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया। बदर मास्टर जी के साथ अस्पताल रवाना हो गया। डाक्टर को दिखाया। पेंशनवाली डायरी में दवाइयां लिखवाई। वापिस आए। इस काम में तीन घंटे तो लग ही गए थे।
    बदर मास्टर जी को घर तक पहुंचाने आया। उन्होंने कहा- जल्दी में है, खाना तो खा कर जा। भोजन का समय हो गया। बदर ने डपट कर पेट पूजा की। कमर सीधी करने के बहाने जरा-सा लेटा क्या, आंख लग गई। शाम को चार बजे उठा तो काम फिर तैयार था। मास्टरनी जी ने कहा- बदर, लड़के ने सारा दूध पी लिया, अब चाय बानानी है। तुझे भी पीनी है और ये भी लेंगे... ऐसा कर, दूध ले कर आ जल्दी।
    बदर को बर्तन और पैसे दे दिए। वह बाजार की तरफ रवाना हुआ। दूध लाया। चाय बनी। दिमाग में चाची जी की तरकारी तो जाने कब-कहां गुम हो गई। वहां से निकल कर गली में बहार आया तो ठेकेदार जी खड़े दिखाई दिए। देखते ही बोले- बदर, चल आ जा। रविवार है, भैंरू बाबा के दर्शन करने जरूरी है। पुण्य होगा।
    - लेकिन ठेकेदार जी मैं तो हनुमान जी जाया करता हूं।
    - आज भैंरूनाथ के यहां चल चल। एक ही बात है। सभी देवता एक है। मुझे भी साथ मिल जाएगा।
    ठेकेदार जी के कहने पर बदर गाड़ी में जा बैठा और कोड़मदेसर के भैंरू दर्शन हेतु साथ निकल गया। मंदिर में प्रसाद चढ़ाया। आरती की। वापसी तक रात घिर आई। रास्ते में एक तरकारी का गाड़ा दिखाई दिया तब कहीं बदर को स्मरण हुआ कि सर्वप्रथम चाची जी ने तरकारी लाने को कहा था और वह चला भी था। गाड़े वाले को रोक कर बदर ने तरकारी ली। चाची जी के पास पहुंचा तब तक रात्रि का भोजन भी हो चुका था। बदर को चाची जी ने बेशुमार गालियां निकाली। उन का बदर के पास कोई उत्तर नहीं था। सभी के कहे-कहे काम किए, किंतु रहा अयोग्य का अयोग्य। ऐसे बदर हर किसी गवाड़ में मिलेंगे। उन के दर्द की चिंता करने वाला कोई नहीं है।    
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मरे हुए लोग
मैं सच कहता हूं- मरे हुए लोग भी इस धरा पर चलते-फिरते दिखाई देते हैं। लाशों का एक बड़ा सागर देखा जा सकता है। लाश का अभिप्राय क्या है, यही ना कि जिस्म में कोई विचार जिंदा नहीं हो। विचार-विहीन मनुष्य लाश कहे जाते हैं और इस भांति के मनुष्य थोक में दिखाई देते हैं, चलते-फिरते तो सभी है परंतु जिंदा नहीं है। उन के ऐसे जीने का कोई अर्थ नहीं है।
    मुझे एक मनुष्य कहा करता था- जन्म लेकर बड़ा होना, बड़े हो कर शादी करना, बच्चे पैदा करना, बच्चों को पढ़ाना और काम-धंधे लगाना, बूढ़े हो जाएं तब सेवा करवानी और अंततः एक दिन मर जाना, यह काम तो बहुत करते है। जन्म ले कर फिर नया क्या कुछ किया? मुझे पता है कि लोग नए-पुराने का जरा भी चिंतन कहां करते हैं।
    मैं विचार-मग्न हूं कि जिंदा लाशों का परिणाम कितना भयानक है। ऐसे लोग जिंदा रहे उस से पहले मर जाएं तो बेहतर नहीं है क्या? जीवन जीने के कुछ मायने नहीं हों तो फिर कोई जिंदा रहे ही क्यों?
    मैं यही विचार करता हूं कि मनुष्यों को जिंदा लाशों में किसने तब्दील कर दिया? कौन था वह जिसने इतना महान और भयानक अंजाम दिया। मरे हुए लोग, मरे हुए लोगों को मारने में लगे हुए हैं, परंतु लाशों पर कोई असर होता है क्या? इन चलती-फिरती लाशों का भविष्य क्या है और ताजिंदगी मुट्ठी भर लोगों ने इन को अपने अधीन कर रखा है। बंद मुट्ठी किए लोग ही लाशों के कारखाने चलाते हैं।
    गरीब शब्द को एक मजाक बना छोड़ा है, पढ़े-लिखे लोग देखते रहे और वह मार सहन करता गया। गरीब को मनुष्य होने का अहसास किसी ने कभी भी नहीं करवाया!  
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उजाला कहां है?

जानवरों और मनुष्यों में कोई अंतर नहीं लगता है। मनुष्य के खूनी पंजों की शक्ति जानवरों से अधिक हो गई है। मनुष्य ने चुस्ती और फुर्ती भी जानवरों से अधिक हासिल कर ली। छिप कर वार करने का गुण भी मनुष्य ने जानवरों से अधिक पा लिया। इस प्रकार भक्ष्ण के कामों में भी मनुष्य ने जानवरों को पीछे छोड़ दिया है।
       हमें इस बदलाव का संपूर्ण यश अपनी समाज-व्यवस्था को देना चाहिए। द्रोपदी के चीर की भांति मनुष्य का जंगलीपन निरंतर बढ़ता जा रहा है, इस के अंत का कोई सिरा दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता जैसे मनुष्य ही जानवर बन गया। इसके जानवर बन जाने के पीछे बड़ा कारण हमारी चुप्पी है।
    परलोक के मनुष्य अपनी धरा पर आ पहुंचे तो इन मनुष्यों को मार ढेर करे।
    भय। चारों तरफ भय। भय निरंतर मनुष्य का भक्ष्ण करता जाता है, ना तो उसे जिंदा रहने देता है और ना ही मरने देता है। सभी शक्ति से बंधे, एक-दूजे के सहारे जिंदा हैं। अजगर की सांसों में हर अदमजात खींचता जाता है। आदमजात, आदम से भयाक्रांत है। वह भयग्रस्त एक आदम से रहता है और दूसरे को भयग्रस्त रखता है। मन, बुद्धि और विचार सभी यहां भयाक्रांत, इस लिए नया कुछ भी होना संभव नहीं लगता है।
    भय का भयानक नाटक यहां जारी रहता है। कारण है कि नाटक देखने वाले सभी दर्शक भयाक्रांत है। वे मंच तक पहुंचने का साहस ही नहीं कर रहे। बिना आधार के कोई वस्तु टिक नहीं सकती। त्रिशंकु की बात सर्वथा व्यर्थ! अगर सच्ची होती तो बीच आकाश कई बस्तियां बस चुकी होती।
    मैं भयग्रस्त हूं कि दर्शकों में से कोई प्रथमतः मंच पर पहुंच ना जाए, डराने वालों की कहीं कोई पोल ना खोल दे, सच का अभिप्राय कहीं जग-जाहिर ना कर दे। मैं देख रहा हूं- दर्शकों में से कुछ लोग उचक रहे हैं- वे देखिए! खड़े हो रहे हैं- क्या मैं उन्हें एक आवाज लगा दूं?
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दुनिया इन दिनों 30 अप्रैल 2016 में प्रकाशित
 


29 फ़रवरी, 2016

नीरज दइया की कविताएं

रिश्ते
आप कहते हैं-
हमें नाकारा-नालायक
काम के नहीं किसी भी
मगर हम, जब भी पुकारोगे
होंगे हाजिर जैसे भी हैं
दूजे कहां से आएंगे?
कहां से लाओगे?
ले भी आए तो
धो देने से नहीं धुलेंगे
रिश्ते हैं जो भी।

जहां कहीं मन लगे
जिस घर में मन लगे
      जहां-कहीं मन लगे
      जीना मन से
            सुख से।

जीना होता है-
      - सुख से रहना
      - दुख भी सुख से भोगना
      - मौन को देखते रहना उत्साह से
      - हर दिन जीना हर्ष से

घर जीने के लिए होता है
बेमन जीना
अपने ही घर में
      मरना होता है।

यदि मरना ही है
      घर मसान क्यों बनें
बदल लें घर- जीने के लिए
      जीना मन लगा कर
जिस घर में मन रमे
      जहां-कहीं मन जमे।

नंगे पैर ऊंट
समय के
पहाड़ पर
संस्कार विहीन ऊंट
घूमता है-
मुंहबाए
अभी तक नंगे पांव।

ठीक ऐसे ही
बिना भाषा के
घूमते हम नंगे पांव।

भाषा है संजीवनी
आप देखते नहीं
या दिखाई नहीं देता आपको।
बिना भाषा के

वस्त्रों के रहते हुए
हम निर्वस्त्र-नंगे।

नित्य तिल-तिल मरते
भीतर ही भीतर
दिन-रात घुट-घुट कर जीते
बोलते ही लड़खड़ाती है जुबान
इसी के रहते तो-
यह हठ किए हैं।

लाइए!
हम मरणासन्नों को भाषा दे दें
भाषा है संजीवनी।
(राजस्थानी से अनुवाद : कवि स्वयं)
“दुनिया इन दिनों” साहित्य विशेषांक-2 में प्रकाशित